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रूस के लोगों को आधी रात मिला परमाणु हमले का अलर्ट, हैकर्स ने सरकारी ऐप को बनाया हथियार!
Russia Cyber Attack: रूस के आपातकालीन सेवा ऐप पर साइबर हमले के बाद कई क्षेत्रों में परमाणु हमले के फर्जी अलर्ट भेजे गए। इससे पहले यूक्रेन के एयर रेड अलर्ट ऐप को भी निशाना बनाया गया था।
Cyber Attack
Russia Cyber Attack: रूस में सरकारी आपातकालीन सेवाओं (Emergency Services) के मोबाइल ऐप पर हुए बड़े साइबर हमले (Cyber Attack) ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ा दी है। हमलावरों ने सरकारी ऐप का इस्तेमाल कर कई रूसी क्षेत्रों के नागरिकों को परमाणु हमले (Nuclear Attack) की झूठी चेतावनियां भेज दीं। इन संदेशों में दावा किया गया था कि देश के अलग-अलग हिस्सों की ओर परमाणु हथियार दागे गए हैं। हालांकि, ये सभी अलर्ट फर्जी थे। सोमवार तड़के रूस के आपातकालीन स्थिति मंत्रालय (EMERCOM) ने साइबर हमले की पुष्टि करते हुए बताया कि उसके मोबाइल एप्लिकेशन को निशाना बनाया गया है और इसके जरिए लोगों तक गलत सूचनाएं पहुंचाई गई हैं। मंत्रालय के तकनीकी विशेषज्ञ ऐप की सुरक्षा खामियों को दूर करने और सेवाएं सामान्य करने में जुटे हैं। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि इस हमले से कितने नागरिक प्रभावित हुए हैं।
रूस के कई प्रांतों में एक साथ पहुंचने लगे परमाणु हमले के फर्जी संदेश
रूसी मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक, 2 नवंबर की रात करीब 2:45 बजे आपातकालीन सेवाओं के मोबाइल ऐप और कई क्षेत्रीय सरकारी सूचना चैनलों पर एक जैसे फर्जी अलर्ट दिखाई देने लगे। मॉस्को, सेंट पीटर्सबर्ग, स्वेर्दलोव्स्क, तुला, चेल्याबिंस्क और ट्यूमेन समेत कई क्षेत्रों के लोगों को ये संदेश मिले।
कुछ अलर्ट में दावा किया गया था कि रूस के विभिन्न इलाकों की ओर परमाणु हथियार दागे गए हैं। इस तरह के संदेश सामने आने से नागरिकों के बीच डर और भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती थी। साइबर हमले का असर केवल मोबाइल ऐप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि क्षेत्रीय आपातकालीन सूचना चैनलों पर भी फर्जी संदेश दिखाई दिए।
हालांकि, अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि हमलावरों ने किसी केंद्रीय तकनीकी प्रणाली में सेंध लगाई थी या अलग-अलग सरकारी खातों और सेवाओं को निशाना बनाया था। इस साइबर हमले की जिम्मेदारी भी अब तक किसी संगठन ने प्रमाणित रूप से नहीं ली है।
रूस का दावा- मुख्य आपातकालीन चेतावनी व्यवस्था पर नहीं पड़ा असर
घटना के बाद रूस के आपातकालीन स्थिति मंत्रालय ने नागरिकों को भरोसा दिलाया कि देश की मुख्य सार्वजनिक चेतावनी प्रणाली (Public Warning System) सुरक्षित और सामान्य रूप से काम कर रही है। मंत्रालय के मुताबिक, साइबर हमले का असर केवल प्रभावित मोबाइल एप्लिकेशन और कुछ सूचना माध्यमों पर पड़ा है।
सायरन, लाउडस्पीकर, एसएमएस और रेडियो-टेलीविजन के जरिए आपातकालीन चेतावनी जारी करने वाली व्यवस्थाएं पहले की तरह काम कर रही हैं। मंत्रालय ने लोगों से संयम बनाए रखने और मोबाइल ऐप या अन्य माध्यमों से मिलने वाले संदिग्ध संदेशों पर बिना पुष्टि भरोसा न करने की अपील की है।
फिलहाल तकनीकी विशेषज्ञ प्रभावित एप्लिकेशन की कमजोरियों का पता लगाने और उसे सुरक्षित तरीके से बहाल करने में लगे हुए हैं।
रूस से पहले यूक्रेन के चेतावनी ऐप पर भी हुआ था साइबर हमला
इस पूरे घटनाक्रम का एक और गंभीर पहलू यह है कि रूस में साइबर हमला सामने आने से कुछ घंटे पहले यूक्रेन के सार्वजनिक हवाई हमले की चेतावनी देने वाले ऐप (Air Raid Alert App) को भी निशाना बनाया गया था। रविवार, 1 नवंबर को हुए इस हमले के बाद कीव समेत कई क्षेत्रों के नागरिकों को परमाणु और रासायनिक खतरे से जुड़े फर्जी अलर्ट मिले थे।
यूक्रेनी वायुसेना के अनुसार, इन संदेशों में सड़कों पर लड़ाई शुरू होने और रूस की अत्याधुनिक 'ओरेशनिक' मिसाइल (Oreshnik Missile) के इस्तेमाल जैसी चेतावनियां भी शामिल थीं। हालांकि, यूक्रेनी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि किसी विकिरण खतरे (Radiation Threat) की पुष्टि नहीं हुई है।
हमले के बाद प्रभावित ऐप को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया, जबकि हवाई हमलों की चेतावनी देने वाली दूसरी व्यवस्थाएं काम करती रहीं। यूक्रेन के एक सरकारी रणनीतिक संचार केंद्र ने इस साइबर हमले के लिए रूस पर आरोप लगाया है। हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं है कि रूस और यूक्रेन के ऐप पर हुए दोनों साइबर हमलों के बीच कोई सीधा संबंध है या नहीं।
सरकारी चेतावनी प्रणाली हैक होना क्यों है इतना बड़ा खतरा?
रूस और यूक्रेन की घटनाओं ने आपदा प्रबंधन (Disaster Management) और सरकारी चेतावनी प्रणालियों की साइबर सुरक्षा (Cyber Security) पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। किसी सामान्य मोबाइल ऐप का हैक होना और आपातकालीन सूचना प्रणाली में सेंध लगना दो अलग-अलग तरह की समस्याएं हैं। सरकारी अलर्ट को नागरिक विश्वसनीय मानते हैं और उसके आधार पर तुरंत कार्रवाई करते हैं।
ऐसे में अगर परमाणु हमले, रासायनिक रिसाव, मिसाइल आक्रमण या भूकंप जैसी किसी आपदा की झूठी सूचना जारी हो जाए तो बड़ी संख्या में लोग एक साथ सुरक्षित स्थानों की ओर भाग सकते हैं। इससे सड़कों पर अफरा-तफरी, भगदड़, परिवहन व्यवस्था बाधित होने और आपातकालीन सेवाओं पर अनावश्यक दबाव पड़ने का खतरा पैदा हो सकता है।
इसका एक दूसरा पहलू भी है। अगर लोगों को बार-बार फर्जी चेतावनियां मिलती हैं तो धीरे-धीरे सरकारी अलर्ट पर उनका भरोसा कमजोर हो सकता है। ऐसी स्थिति में वास्तविक आपदा के दौरान भी लोग चेतावनी को गंभीरता से लेने में देरी कर सकते हैं, जिससे जान-माल का नुकसान बढ़ सकता है।
साइबर युद्ध का नया मोर्चा बनी नागरिक सुरक्षा व्यवस्था
रूस और यूक्रेन में लगभग एक ही समय पर सामने आई इन घटनाओं से पता चलता है कि आधुनिक युद्ध और अंतरराष्ट्रीय तनाव के दौर में डिजिटल नागरिक सुरक्षा व्यवस्था (Digital Civil Protection System) भी साइबर हमलों के निशाने पर है। अब साइबर हमलावरों के लिए केवल डेटा चोरी करना या सर्वर ठप करना ही चुनौती नहीं है, बल्कि सरकारी पहचान का इस्तेमाल करके फर्जी आदेश और चेतावनियां जारी करना भी बड़ा खतरा बन गया है।
ऐसी प्रणालियों को सुरक्षित रखने के लिए मजबूत प्रमाणीकरण (Authentication), संदेशों का स्वतंत्र सत्यापन, सीमित प्रशासनिक अधिकार और वैकल्पिक चेतावनी माध्यमों की जरूरत है। हालांकि, रूस और यूक्रेन में हुए इन हमलों में किस तकनीकी कमजोरी का फायदा उठाया गया, इसकी जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं हुई है।
इन घटनाओं ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है कि सरकारें अपनी आपातकालीन चेतावनी प्रणालियों को कितना सुरक्षित बना पाई हैं। क्योंकि किसी भी देश में ऐसी व्यवस्था पर साइबर हमला केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि लाखों नागरिकों की सुरक्षा और सार्वजनिक विश्वास से जुड़ा गंभीर खतरा बन सकता है।


