India-US Relations: ट्रंप के दौर में भारत! दोस्ती बड़ी या राष्ट्रीय हित? किस राह पर आगे बढ़ेगी बात?

India-US Relations: ट्रंप के दौर में भारत-अमेरिका रिश्तों के सामने दोस्ती और राष्ट्रीय हित की चुनौती क्या है? जानिए रूस, चीन और अमेरिका के बीच भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की राह।

Yogesh Mishra
Published on: 28 Aug 2026 7:51 PM IST
India-US Relations Trump India Relations Explained in Hindi
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India-US Relations Trump India Relations Explained in Hindi 

India-US Relations: अंतरराष्ट्रीय राजनीति में तस्वीरें अक्सर धोखा देती हैं। दो नेता गले मिलते हैं। एक-दूसरे को मित्र बताते हैं। मंच से प्रशंसा करते हैं। दुनिया इसे दोस्ती मान लेती है। लेकिन अगली सुबह वही मित्र शुल्क बढ़ा सकता है, तेल खरीदने पर दबाव डाल सकता है और कह सकता है कि पहले मेरे देश का हित देखा जाएगा। डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका की विदेश और व्यापार नीति में इसी सच को असाधारण स्पष्टता से सामने रखा है। उनका सिद्धांत लगभग घोषित है - America First। तब भारत को भी एक बात उतनी ही स्पष्टता से स्वीकार करनी होगी - India First। नरेंद्र मोदी और ट्रंप के व्यक्तिगत संबंध अच्छे हो सकते हैं। भारत और अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी भी बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन अमेरिका भारत का मित्र इसलिए है क्योंकि दोनों के हित अनेक जगह मिलते हैं, और जहां हित नहीं मिलेंगे वहां दोस्ती की अपनी सीमा होगी। रूस हमें ऊर्जा और रक्षा की जरूरतों में महत्वपूर्ण है। चीन हमारा सबसे कठिन रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी है, लेकिन विशाल पड़ोसी और बड़ा व्यापारिक साझेदार भी है। यूरोप बाजार, पूंजी और तकनीक का बड़ा स्रोत है। इसलिए भारत के सामने सवाल यह नहीं होना चाहिए कि अमेरिका, रूस और चीन में से किसे चुना जाए। असली सवाल यह है कि क्या भारत इतना शक्तिशाली और आत्मविश्वासी हो चुका है कि वह तीनों के साथ अपने हित के अनुसार संबंध रख सके। शायद इक्कीसवीं सदी में रणनीतिक स्वायत्तता का नया अर्थ यही है।

ट्रंप की दुनिया में दोस्ती से ज्यादा महत्वपूर्ण है सौदा

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों की पुरानी भाषा को तेजी से बदला है। व्यापार अब केवल व्यापार नहीं है। शुल्क विदेश नीति का हथियार है। बाजार रणनीतिक दबाव का माध्यम है। ऊर्जा भू-राजनीति का औजार है। ट्रंप प्रशासन ने फरवरी 2026 में अस्थायी आयात अधिभार लगाया और उसकी व्यापार नीति में अलग-अलग देशों के साथ अलग शर्तों पर सौदे करने की प्रवृत्ति स्पष्ट है। भारत और अमेरिका ने फरवरी में व्यापार समझौते की दिशा में संयुक्त वक्तव्य जारी किया, लेकिन बातचीत उसके बाद भी चलती रही। जुलाई में अमेरिका ने जबरन श्रम संबंधी अपनी धारा 301 कार्रवाई के तहत भारत के कुछ आयात पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत शुल्क लगाया। भारत सरकार के अनुसार लगभग 45 प्रतिशत भारतीय निर्यात इससे बाहर रहा, जबकि बाकी लगभग 55 प्रतिशत पर अतिरिक्त शुल्क लागू हुआ। दोनों देश द्विपक्षीय व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए बातचीत जारी रखे हुए हैं। अभी कुछ दिन पहले अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कहा कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता लगभग पूरा होने के करीब है। यह एक दिलचस्प स्थिति है। एक तरफ रणनीतिक निकटता है। दूसरी तरफ शुल्क और बाजार पहुंच पर कठोर सौदेबाजी है। यही ट्रंप युग की विदेश नीति है—मित्रता अपनी जगह, हिसाब अपनी जगह।

रूस के मामले में भारत को अपनी जरूरत देखनी होगी

भारत को इस अमेरिकी व्यवहार से नाराज होने के बजाय उसे समझना चाहिए। अमेरिका अपने किसानों के लिए भारतीय कृषि बाजार में ज्यादा पहुंच चाहता है। अपनी कंपनियों के लिए बेहतर अवसर चाहता है। व्यापार घाटे को कम करना चाहता है। रूस से भारत की ऊर्जा खरीद पर उसकी अपनी भू-राजनीतिक चिंताएं हैं। भारत की समस्या यह है कि उसके हित हर जगह अमेरिकी हितों से मेल नहीं खाते। रूस इसका सबसे साफ उदाहरण है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिम ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, लेकिन भारत ने रूसी तेल खरीदना बंद नहीं किया। इसका कारण केवल रूस से पुरानी मित्रता नहीं था। भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में है। कच्चे तेल की कीमत में थोड़ी वृद्धि भी महंगाई, परिवहन लागत, रुपये, सरकारी वित्त और सामान्य परिवार के बजट तक असर डालती है। 2026 में पश्चिम एशिया के संकट और आपूर्ति व्यवधान के बीच भारत की रूसी तेल पर निर्भरता फिर बहुत ऊंची हुई। जून और जुलाई में रूस से आयात 26 लाख बैरल प्रतिदिन से अधिक पहुंचा और भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी आधे से अधिक हो गई। अमेरिका में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने की राजनीतिक कोशिश भारत के लिए इसीलिए गंभीर प्रश्न है। वाशिंगटन इसे रूस पर आर्थिक दबाव की रणनीति के रूप में देख सकता है। नई दिल्ली को वही निर्णय अपने 140 करोड़ से अधिक नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा के तराजू पर तौलना पड़ता है।

रूस केवल तेल नहीं, भारत की पुरानी रणनीतिक जरूरत भी है

रूस के साथ भारत का रिश्ता केवल तेल का भी नहीं है। दशकों से रक्षा सहयोग इसका महत्वपूर्ण आधार रहा है। भारतीय सैन्य व्यवस्था में रूसी मूल के हथियार और उपकरण बड़ी संख्या में मौजूद हैं। परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष सहित कई क्षेत्रों में सहयोग का लंबा इतिहास है। भारत पिछले वर्षों में अमेरिका, फ्रांस, इजरायल और स्वदेशी उत्पादन की ओर रक्षा स्रोतों का विविधीकरण कर रहा है, लेकिन रूस को अचानक हटाना न व्यावहारिक है और न रणनीतिक रूप से बुद्धिमानी। दूसरा पहलू चीन है। रूस को पूरी तरह चीन की गोद में धकेल देना भी भारत के दीर्घकालीन हित में नहीं होगा। मॉस्को और बीजिंग की निकटता पहले ही काफी बढ़ चुकी है। भारत चाहेगा कि रूस के पास चीन के अलावा भी महत्वपूर्ण एशियाई साझेदार बने रहें। इसलिए रूस के साथ संबंध को केवल यूक्रेन युद्ध की खिड़की से देखना भारत के लिए पर्याप्त नहीं है। पश्चिम की प्राथमिकता आज यूक्रेन है। भारत की प्राथमिकता अगले कई दशकों तक चीन भी रहेगा। विदेश नीति में दोनों दृष्टियों का अंतर स्वाभाविक है।

चीन से मुकाबला भी जरूरी, बातचीत भी

और चीन ही वह जगह है जहां भारतीय रणनीतिक स्वायत्तता की सबसे कठिन परीक्षा होती है। 2020 की गलवान हिंसा के बाद भारत-चीन संबंध दशकों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे। सीमा पर सैन्य जमावड़ा बढ़ा। विश्वास टूटा। भारत ने चीनी ऐप पर प्रतिबंध लगाए और निवेश की जांच कठोर की। लेकिन अक्टूबर 2024 के सैनिक-वापसी समझौते के बाद संबंधों में धीरे-धीरे संवाद लौटा। 25 अगस्त 2026 को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने बीजिंग में सीमा प्रश्न पर विशेष प्रतिनिधियों की 25वीं बैठक की। दोनों पक्षों ने सीमा पर शांति बनाए रखने, संवाद बढ़ाने और विवाद के स्वीकार्य समाधान की तलाश जारी रखने पर सहमति जताई। अब शी चिनफिंग के सितंबर में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए भारत आने की संभावना भी चर्चा में है, हालांकि यात्रा कार्यक्रम अभी अंतिम नहीं बताया गया है। यदि यह यात्रा होती है तो सात वर्षों में उनका पहला भारत दौरा होगा। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत और चीन मित्र बन गए हैं। सीमा विवाद मौजूद है। सामरिक अविश्वास मौजूद है। हिंद महासागर से पाकिस्तान तक चीन की गतिविधियां भारत की चिंता हैं। लेकिन दोनों परमाणु शक्तियां हैं। दोनों विशाल अर्थव्यवस्थाएं हैं। दोनों पड़ोसी हैं। भूगोल बदला नहीं जा सकता। इसलिए स्थायी टकराव भी नीति नहीं हो सकता।

अमेरिका के साथ साझेदारी, लेकिन किसी खेमे में स्थायी जगह नहीं

यहां एक दिलचस्प विरोधाभास पैदा होता है। अमेरिका चाहता है कि भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में बड़ी भूमिका निभाए। भारत क्वाड में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ है। रक्षा, तकनीक, खुफिया सहयोग, समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति शृंखलाओं में अमेरिका के साथ संबंध पिछले दो दशकों में असाधारण रूप से बढ़े हैं। चीन के साथ तनाव के समय यह साझेदारी भारत के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन यदि अमेरिकी आर्थिक दबाव बहुत बढ़ता है तो वही भारत चीन के साथ संबंध सामान्य करने में अधिक रुचि दिखा सकता है। यही बड़ी शक्तियों की राजनीति का विरोधाभास है। दबाव हमेशा अपेक्षित परिणाम नहीं देता। कभी-कभी वह जिस देश को अपने करीब लाने के लिए बनाया जाता है, उसे विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित कर देता है। 2026 में भारत की विदेश नीति पर हुए गंभीर अध्ययनों का भी निष्कर्ष लगभग यही है कि ट्रंप की वापसी ने भारत के बाहरी वातावरण को अधिक अस्थिर जरूर बनाया है, लेकिन नई दिल्ली ने अपनी मूल रणनीति नहीं बदली। वह अलग-अलग शक्तियों के साथ संबंधों का विविधीकरण और संतुलन बनाए रखना चाहती है।

अमेरिका से दूरी बनाना भी भारत के हित में नहीं

लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि भारत अमेरिका से दूरी बनाने की भूल करे। अमेरिका के साथ संबंध भारत के लिए असाधारण महत्व रखते हैं। विशाल अमेरिकी बाजार भारतीय निर्यात के लिए जरूरी है। भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग का बड़ा हिस्सा अमेरिकी अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। रक्षा तकनीक, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष, ऊर्जा, शिक्षा और अनुसंधान में सहयोग की अपार संभावनाएं हैं। अमेरिका में विशाल भारतीय मूल का समुदाय दोनों देशों के बीच सामाजिक और आर्थिक पुल है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन की बढ़ती शक्ति के सामने भारत और अमेरिका के कई रणनीतिक हित स्वाभाविक रूप से मिलते हैं। इसलिए रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ अमेरिका-विरोध नहीं हो सकता। शीतयुद्धकालीन गुटनिरपेक्षता को नए नाम से वापस लाना भी समाधान नहीं है। आज की दुनिया अलग है। भारत अमेरिका के साथ क्वाड में बैठ सकता है। रूस के साथ ब्रिक्स और दूसरे मंचों पर काम कर सकता है। चीन के साथ सीमा वार्ता कर सकता है। यूरोप के साथ व्यापार बढ़ा सकता है। पश्चिम एशिया में इजरायल और अरब देशों दोनों से संबंध रख सकता है। यही बहु-संरेखण भारत की वास्तविक शक्ति बन सकता है।

रणनीतिक स्वायत्तता केवल बयान नहीं, आर्थिक ताकत मांगती है

लेकिन रणनीतिक स्वायत्तता की भी एक कीमत होती है। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि भारत किसी दबाव में नहीं आएगा। यदि हमें अमेरिकी शुल्क की चिंता नहीं करनी तो अपने निर्यात बाजार विविध करने होंगे। यदि रूसी तेल पर प्रतिबंध का जोखिम नहीं उठाना तो ऊर्जा स्रोत विविध करने होंगे। यदि चीन पर निर्भरता कम करनी है तो घरेलू विनिर्माण मजबूत करना होगा। यदि विदेशी रक्षा आपूर्ति राजनीतिक दबाव का साधन न बने तो रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ानी होगी। यदि डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था के झटकों से बचना है तो आर्थिक शक्ति और रुपये की विश्वसनीयता बढ़ानी होगी। विदेश नीति अंततः घरेलू क्षमता पर खड़ी होती है। कमजोर अर्थव्यवस्था रणनीतिक स्वायत्तता की घोषणा कर सकती है, उसे निभा नहीं सकती। विशाल बाजार, तकनीकी क्षमता, मजबूत सेना, ऊर्जा सुरक्षा और प्रतिस्पर्धी उद्योग ही किसी देश को यह स्वतंत्रता देते हैं कि वह महाशक्तियों से कह सके—हम आपके साथ हैं, लेकिन हर प्रश्न पर आपके पीछे नहीं।

ट्रंप ने भारत को एक जरूरी सबक दिया है

ट्रंप ने अनजाने में भारत को एक उपयोगी सबक भी दिया है। अंतरराष्ट्रीय संबंध भावनाओं पर नहीं चलते। अमेरिका भारत को लोकतांत्रिक मित्र कह सकता है और अगले दिन अपने किसानों के हित में भारत से बाजार खोलने की मांग कर सकता है। रूस पुराना मित्र हो सकता है, लेकिन तेल उसी कीमत पर बेचेगा जिसमें उसका आर्थिक हित होगा। चीन सीमा पर प्रतिस्पर्धी हो सकता है और उसी समय भारत के साथ अरबों डॉलर का व्यापार कर सकता है। यूरोप मानवाधिकार और नियम आधारित व्यवस्था की बात करते हुए अपने उद्योगों की रक्षा भी करेगा। इसमें कोई असामान्यता नहीं है। यही राष्ट्र-राज्य की प्रकृति है। समस्या तब पैदा होती है जब हम नेताओं के व्यक्तिगत संबंधों को देशों के स्थायी हितों का विकल्प समझ लेते हैं। मोदी और ट्रंप की व्यक्तिगत निकटता उपयोगी हो सकती है। कठिन वार्ता में संवाद का रास्ता खुला रख सकती है। लेकिन भारत-अमेरिका संबंध किसी एक प्रधानमंत्री और किसी एक राष्ट्रपति से बहुत बड़े हैं। सरकारें बदलेंगी। राष्ट्रीय हित बने रहेंगे।

भारत का रास्ता न अमेरिका की छतरी, न रूस का सहारा

भारत के लिए अगला दशक शायद इसी संतुलन की परीक्षा होगा। चीन आर्थिक और सैन्य शक्ति के रूप में सामने रहेगा। अमेरिका दुनिया की सबसे प्रभावशाली शक्ति बना रहेगा। रूस ऊर्जा, रक्षा और यूरेशियाई राजनीति में महत्वपूर्ण रहेगा। यूरोप तकनीक और बाजार का बड़ा केंद्र रहेगा। जापान, ऑस्ट्रेलिया, खाड़ी देश और दक्षिण-पूर्व एशिया भी भारत की रणनीति में बढ़ती भूमिका निभाएंगे। ऐसे में किसी एक खेमे में स्थायी रूप से प्रवेश करना भारत की संभावनाओं को सीमित करेगा। लेकिन सभी से मित्रता की घोषणा करते रहना भी नीति नहीं है। रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ कठिन निर्णयों से बचना नहीं, उन्हें अपने हित में लेना है। कभी अमेरिका के साथ खड़ा होना भारत के हित में होगा। कभी रूस से तेल खरीदना। कभी चीन से बातचीत करना। कभी चीन का दृढ़ता से मुकाबला करना। नीति में विरोधाभास दिखाई दे सकता है, लेकिन यदि उसके केंद्र में भारतीय हित स्पष्ट है तो वही परिपक्व कूटनीति है।

आखिर में दोस्ती नहीं, भारत का हित सबसे ऊपर

ट्रंप का सबसे प्रसिद्ध राजनीतिक वाक्य है - अमेरिका पहले। भारत को उससे नाराज होने की जरूरत नहीं है। बल्कि उससे सीखने की जरूरत है। अमेरिका यदि अपने किसान, अपने उद्योग, अपनी नौकरी और अपनी सुरक्षा को पहले रखता है तो भारत को भी अपने किसान, अपने उद्योग, अपनी ऊर्जा, अपने बाजार और अपनी सुरक्षा को पहले रखना चाहिए। मित्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन राष्ट्रीय हित उससे बड़ा है। रूस हमारा स्थायी उद्धारक नहीं है। अमेरिका हमारा स्थायी संरक्षक नहीं है। चीन हमारा स्थायी शत्रु होना भी अनिवार्य नहीं है। देशों के बीच केवल हित स्थायी होते हैं और समझदार राष्ट्र उन्हीं के अनुसार अपने रिश्ते बदलते हैं। शायद भारत की विदेश नीति अब उसी परिपक्व अवस्था में प्रवेश कर रही है जहां उसे दुनिया से यह पूछने की जरूरत नहीं कि वह किस खेमे में है। उसे इतना मजबूत होना है कि दुनिया उससे पूछे - भारत किस मुद्दे पर किसके साथ खड़ा होगा? जिस दिन यह प्रश्न दुनिया पूछने लगेगी, उसी दिन रणनीतिक स्वायत्तता नारा नहीं, भारत की वास्तविक शक्ति बन जाएगी।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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