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ईरान पर फिर हमले की तैयारी में अमेरिका? ट्रंप ने कहा- 10 मिनट में परमाणु ठिकाने खाक, खामेनेई ने भी दे दी चेतावनी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान के परमाणु ठिकानों पर नए हमले की चेतावनी के बाद पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ गया है।
US-Iran Tensions: पश्चिम एशिया एक बार फिर युद्ध और शांति के बीच खड़ा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के बचे हुए परमाणु प्रतिष्ठानों पर नए हमले की चेतावनी देकर क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है। जवाब में ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने अमेरिका और इजरायल को आगाह किया है कि किसी भी नए हमले का जवाब तत्काल दिया जाएगा और ईरानी सैन्य कार्रवाई किसी भौगोलिक सीमा तक सीमित नहीं रहेगी। पिछले आठ महीने से चल रहे संघर्ष के बीच यह बयानबाजी ऐसे समय तेज हुई है जब अमेरिका में तीन नवंबर को मध्यावधि संसदीय चुनाव होने हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने खाड़ी क्षेत्र के सहयोगी देशों को चुनाव के बाद संभावित नए सैन्य हमलों और ईरान की जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार रहने को कहा है। हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने अभी नए हमलों के बारे में अंतिम निर्णय नहीं लिया है।
इस घटनाक्रम का दूसरा और अपेक्षाकृत कम चर्चित पहलू यह है कि युद्ध की आशंका के समानांतर कूटनीतिक बातचीत भी तेज हो गई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कतर की मध्यस्थता से होर्मुज जलडमरूमध्य को दो दिनों के भीतर पूरी तरह खोलने का प्रस्ताव तैयार होने की जानकारी दी है। ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसिन रजाई ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के पत्र के बदले हुए स्वर को सकारात्मक संकेत बताया है। उधर अमेरिकी विदेश मंत्री रुबियो ने भी कहा है कि कूटनीतिक समाधान संभव हुआ तो अमेरिका उसके लिए तैयार है। इस प्रकार पश्चिम एशिया में इस समय दो प्रक्रियाएँ एक साथ चल रही हैं। पहली, अमेरिका और इजरायल की संभावित सैन्य कार्रवाई तथा दूसरी, कतर और दूसरे मध्यस्थ देशों के माध्यम से संघर्ष समाप्त कराने का प्रयास।
ट्रंप का नया बयान, 'पिकैक्स माउंटेन' बना अमेरिका का अगला निशाना
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 31 अक्टूबर की रात फ्लोरिडा स्थित अपने मार-ए-लागो आवास पर पत्रकारों से बातचीत में ईरान को लेकर एक महत्वपूर्ण बयान दिया। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका ईरान की परमाणु क्षमताओं के बड़े हिस्से को पहले ही नष्ट कर चुका है, लेकिन अभी एक-दो ठिकानों पर कार्रवाई बाकी है। ट्रंप ने विशेष रूप से 'पिकैक्स माउंटेन' नामक भूमिगत परिसर का उल्लेख किया। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार यह एक ऐसा स्थान है जहाँ ईरान द्वारा बड़ी संख्या में यूरेनियम संवर्धन के सेंट्रीफ्यूज स्थानांतरित किए जाने की आशंका है। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी सेना इन बचे हुए ठिकानों के खिलाफ बहुत कम समय में कार्रवाई कर सकती है।
ट्रंप के इस बयान का सैन्य और राजनीतिक, दोनों दृष्टियों से महत्व है। अमेरिका लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपनी सुरक्षा और पश्चिम एशिया में सहयोगी देशों के लिए खतरा बताता रहा है। ईरान का तर्क है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। पिकैक्स माउंटेन को लेकर भी अमेरिका और ईरान के दावों में अंतर है। अमेरिकी पक्ष इस परिसर को संभावित परमाणु गतिविधियों से जोड़ रहा है, जबकि तेहरान ऐसे आरोपों से इनकार करता रहा है। इसलिए ट्रंप के बयान को किसी नए परमाणु हथियार कार्यक्रम का स्वतंत्र रूप से सत्यापित प्रमाण नहीं माना जा सकता। यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि ट्रंप ने हमला करने की क्षमता और संभावित लक्ष्य की बात कही है, लेकिन उन्होंने नए हमले का कोई औपचारिक आदेश सार्वजनिक नहीं किया है।
तीन नवंबर का अमेरिकी चुनाव क्यों बना युद्ध के लिए महत्वपूर्ण?
अमेरिका में तीन नवंबर 2026 को प्रतिनिधि सभा और सीनेट से संबंधित मध्यावधि चुनाव होने हैं। इन चुनावों का राष्ट्रपति ट्रंप के शेष कार्यकाल की राजनीति और संसद में सत्ता संतुलन पर प्रभाव पड़ेगा। ईरान के संदर्भ में इन चुनावों का महत्व इसलिए बढ़ गया है क्योंकि ट्रंप ने आठ अक्टूबर को स्पष्ट रूप से कहा था कि अमेरिका तीन नवंबर के चुनाव से पहले ईरान के खिलाफ नया हमला नहीं करेगा। उस समय उन्होंने ईरान के साथ बातचीत को उपयोगी बताया था। लेकिन चुनाव के बाद सैन्य कार्रवाई की संभावना खुली रखी गई थी।
अमेरिकी समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस ने 28 अक्टूबर को राजनयिक सूत्रों के आधार पर बताया था कि अमेरिकी अधिकारियों ने पश्चिम एशिया के कई देशों को संभावित नए हमलों के बारे में सतर्क किया है। चेतावनी में केवल ईरान पर अमेरिकी हमले की आशंका नहीं थी, बल्कि उसके जवाब में खाड़ी क्षेत्र के ऊर्जा प्रतिष्ठानों और दूसरे महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचों पर ईरानी कार्रवाई की संभावना भी शामिल थी। अमेरिकी अधिकारियों ने सहयोगी देशों से ऐसी परिस्थितियों के लिए तैयार रहने को कहा था। हालांकि इस सूचना को अंतिम सैन्य निर्णय के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया। दो राजनयिक सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रपति ने तब तक कोई अंतिम फैसला नहीं लिया था।
अमेरिकी चुनाव और युद्ध के संबंध को लेकर सितंबर में रॉयटर्स ने भी महत्वपूर्ण जानकारी प्रकाशित की थी। ट्रंप प्रशासन के भीतर कुछ वरिष्ठ सहयोगी चुनाव से पहले युद्ध को और अधिक न बढ़ाने के पक्ष में थे। उनके सामने युद्ध के आर्थिक प्रभाव, ऊर्जा कीमतों और घरेलू राजनीतिक परिस्थितियों की चुनौती थी। हालांकि इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि प्रशासन केवल चुनावी कारणों से अपने सैन्य निर्णय ले रहा है। ईरान की परमाणु गतिविधियाँ, अमेरिकी सहयोगियों की सुरक्षा और क्षेत्रीय सैन्य स्थिति भी अमेरिकी नीति निर्धारण के घोषित तथा महत्वपूर्ण पहलू हैं।
ईरान की जवाबी चेतावनी, खामेनेई ने सैन्य कमांडरों को दिया निर्देश
अमेरिकी चेतावनियों के बाद ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने 31 अक्टूबर को अपने सैन्य कमांडरों के साथ बैठक में कड़ा रुख अपनाया। ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी इरना के अनुसार खामेनेई ने निर्देश दिया कि अमेरिका या इजरायल की किसी भी धमकी का तत्काल और प्रभावशाली जवाब दिया जाए। यह प्रतिक्रिया केवल ईरान की सीमाओं के आसपास तक सीमित नहीं होगी। उन्होंने अमेरिकी और इजरायली ठिकानों की संभावित लक्ष्य सूची को अद्यतन करने का भी निर्देश दिया। इस बयान की गंभीरता इसलिए अधिक है क्योंकि यह केवल सामान्य राजनीतिक चेतावनी नहीं, बल्कि सैन्य नेतृत्व को संबोधित संदेश के रूप में सामने आया है। हालांकि इस संबंध में उपलब्ध जानकारी मुख्य रूप से ईरानी सरकारी मीडिया पर आधारित है।
ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व में इस वर्ष बड़ा परिवर्तन हुआ है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल के शुरुआती हमलों में तत्कालीन सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई मारे गए थे। इसके बाद मार्च में उनके पुत्र मोजतबा खामेनेई ने देश का सर्वोच्च नेतृत्व संभाला। इस बदलाव के बाद ईरान की विदेश नीति और सुरक्षा व्यवस्था पर दुनिया की नजर बनी हुई है। नए सर्वोच्च नेता की ओर से सैन्य कमांडरों के साथ बैठक की यह पहली सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट की गई घटना है। इसीलिए उनके संदेश को ईरान के मौजूदा सुरक्षा दृष्टिकोण के एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसिन रजाई ने भी संभावित नए हमले पर जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि ईरान के पास जवाब देने के लिए नए हथियार और विकल्प हैं। हालांकि उन्होंने इन हथियारों की प्रकृति और संभावित लक्ष्यों का स्पष्ट विवरण सार्वजनिक नहीं किया। इसलिए ईरान की इस चेतावनी का अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि उसने किसी विशेष देश या सैन्य अड्डे पर हमले की घोषणा कर दी है। फिलहाल यह संभावित अमेरिकी या इजरायली कार्रवाई को रोकने के लिए सैन्य प्रतिरोध और चेतावनी की रणनीति का हिस्सा है।
धमकियों के बीच अमेरिका के पत्र ने खोला बातचीत का रास्ता
युद्ध की आशंकाओं के बीच एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम भी सामने आया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की ओर से ईरान को भेजे गए पत्र पर तेहरान में गंभीर विचार-विमर्श हुआ है। मोहसिन रजाई ने ईरानी सरकारी टेलीविजन को बताया कि अमेरिका के रुख और बातचीत के स्वर में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ है। उन्होंने इसे सकारात्मक संकेत कहा, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि ईरान ने पत्र का औपचारिक जवाब अभी नहीं दिया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी अमेरिका की बातचीत दोबारा शुरू करने की कोशिश का स्वागत किया है। हालांकि ईरान का कहना है कि प्रत्यक्ष वार्ता तभी संभव होगी जब वाशिंगटन उसकी निर्धारित शर्तों को स्वीकार करेगा।
ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत में सबसे बड़ी कठिनाई विश्वास की कमी है। अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार प्राप्त करने से रोकने की गारंटी चाहता है। दूसरी ओर ईरान आर्थिक प्रतिबंधों, उसके बंदरगाहों की नाकेबंदी और तेल निर्यात पर अमेरिकी दबाव को समाप्त करना चाहता है। इसके साथ ही ईरान की मांग है कि क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था में उसकी भूमिका और समुद्री व्यापार से जुड़े उसके हितों को भी स्वीकार किया जाए। ईरानी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि पिछले एक महीने से अधिक समय से कूटनीतिक संदेशों का आदान-प्रदान चल रहा है, लेकिन दोनों पक्ष किसी अंतिम समझौते तक नहीं पहुँचे हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर समझौता हुआ तो दुनिया को बड़ी राहत
मौजूदा तनाव का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री मार्ग दुनिया के महत्वपूर्ण तेल तथा प्राकृतिक गैस परिवहन मार्गों में शामिल है। पश्चिम एशिया के अनेक देशों से निकलने वाले ऊर्जा संसाधन इसी रास्ते अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँचते हैं। इस क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई, जहाजों की आवाजाही पर प्रतिबंध या समुद्री परिवहन में बाधा आने से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और जहाजरानी लागत प्रभावित होती है। पिछले आठ महीने के संघर्ष में यह मार्ग अमेरिका और ईरान के बीच आर्थिक तथा सामरिक दबाव का प्रमुख केंद्र बन चुका है।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने 31 अक्टूबर को बताया कि कतर में मध्यस्थों के साथ एक नया प्रस्ताव तैयार हुआ है। इसके अंतर्गत आवश्यक शर्तें स्वीकार होने पर होर्मुज जलडमरूमध्य को दो दिन के भीतर पूरी तरह खोलने की व्यवस्था बनाई जा सकती है। इससे पहले ईरान ने एक सप्ताह के भीतर मार्ग खोलने का प्रस्ताव रखा था। उस प्रस्ताव में ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकेबंदी समाप्त करने, विदेशों में जमा ईरानी संपत्तियों को मुक्त करने और तेल बिक्री से जुड़े प्रतिबंधों में छूट देने जैसी शर्तें थीं। अमेरिका ने पहले वाले प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया था। नया प्रस्ताव इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि समुद्री यातायात बहाल करने की प्रस्तावित अवधि सात दिनों से घटाकर दो दिन कर दी गई है।
लेकिन यहाँ भी असहमति का एक बड़ा विषय मौजूद है। मोहसिन रजाई ने कहा है कि भविष्य में होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों को ईरान और ओमान की सहमति से निर्धारित मार्ग का पालन करना होगा और उनका आवागमन ईरानी प्रबंधन के अधीन रहेगा। अमेरिका और उसके सहयोगी देश लंबे समय से इस समुद्री क्षेत्र में निर्बाध अंतरराष्ट्रीय नौवहन पर जोर देते रहे हैं। इसलिए केवल जलडमरूमध्य खोलने की समयसीमा तय कर लेना पर्याप्त नहीं होगा। इसके संचालन, नियंत्रण और सुरक्षा से संबंधित शर्तों पर भी सहमति आवश्यक होगी। अभी होर्मुज को 48 घंटे में पूरी तरह खोलने का कोई अंतिम लागू समझौता घोषित नहीं हुआ है।
इजरायल का रुख और नेतन्याहू की रणनीति
ईरान के विरुद्ध अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की संभावनाओं पर इजरायल की राजनीति का भी महत्वपूर्ण प्रभाव है। इजरायल में हाल में संसदीय चुनाव हुए हैं और नई सरकार के गठन की प्रक्रिया चल रही है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान की वर्तमान सत्ता व्यवस्था के संदर्भ में बड़े राजनीतिक परिवर्तन की संभावना को ऐतिहासिक अवसर के रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी इस स्थिति से स्पष्ट है कि इजरायल की सुरक्षा नीति केवल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने तक नहीं, बल्कि क्षेत्र में ईरान की सैन्य और राजनीतिक शक्ति को कमजोर करने के व्यापक लक्ष्य से भी जुड़ी है। हालांकि इजरायल में नई सरकार के गठन और उसके घटक दलों की भूमिका से आगामी नीतिगत निर्णय प्रभावित हो सकते हैं।
इजरायली चुनाव के बाद तेल अवीव में हजारों लोगों ने अरब और यहूदी दलों की साझा सरकार के समर्थन में प्रदर्शन किया है। हालिया चुनाव में अरब नेतृत्व वाले दलों को 120 सदस्यीय संसद नेसेट में 19 सीटें मिली हैं। यह घटनाक्रम बताता है कि इजरायल की आंतरिक राजनीति में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन और बहस चल रही है। ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई पर सरकार का अंतिम रुख तथा अमेरिका के साथ समन्वय आने वाले दिनों में विशेष महत्व रखेगा।
फारस की खाड़ी में अमेरिका की सैन्य ताकत बढ़ी, 9,000 अतिरिक्त सैनिक भेजे
संभावित नए सैन्य अभियान को लेकर अमेरिकी गतिविधियाँ केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं हैं। एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने पिछले महीने विमानवाहक पोत यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट और मरीन सैनिकों को ले जाने वाले उभयचर युद्धपोतों को फारस की खाड़ी की ओर भेजा था। इस तैनाती में लगभग 9,000 अतिरिक्त सैन्यकर्मी शामिल थे। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार इससे क्षेत्र में अमेरिकी नौसैनिक और मरीन कर्मियों की संख्या 20 हजार से अधिक हो सकती है। साथ ही सैकड़ों सैन्य विमानों की संभावित उपलब्धता भी अमेरिका की क्षेत्रीय सैन्य क्षमता को बढ़ाती है।
हालांकि युद्धपोतों और सैनिकों की तैनाती का अर्थ अपने आप में यह नहीं होता कि हमला निश्चित है। ऐसी तैनाती के माध्यम से अमेरिका सैन्य विकल्प तैयार रखने, सहयोगी देशों को सुरक्षा का भरोसा देने और ईरान पर बातचीत के लिए दबाव बढ़ाने का प्रयास भी कर सकता है। अमेरिकी अधिकारियों ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि चुनाव के बाद संभावित अभियान कितनी जल्दी शुरू हो सकता है। सैन्य तैयारी और सैन्य कार्रवाई का औपचारिक निर्णय दो अलग बातें हैं।
सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और दूसरे खाड़ी देश क्यों चिंतित?
ईरान और अमेरिका के बीच किसी नए युद्ध का सबसे तत्काल प्रभाव खाड़ी क्षेत्र के देशों पर पड़ सकता है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों की अर्थव्यवस्था ऊर्जा उत्पादन और निर्यात से गहराई से जुड़ी है। क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठान भी मौजूद हैं। यदि अमेरिका ईरान के परमाणु या सैन्य प्रतिष्ठानों पर नए हमले करता है और ईरान जवाब में ऊर्जा प्रतिष्ठानों, समुद्री मार्गों या क्षेत्रीय सैन्य ठिकानों को निशाना बनाता है तो संघर्ष का विस्तार हो सकता है।
पिछले दिनों यमन के ईरान समर्थित हूती संगठन द्वारा सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों और हवाई अड्डों पर हमलों की घटनाएँ भी सामने आई हैं। इसके जवाब में सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन में हूती नियंत्रण वाले क्षेत्रों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की है। इससे पहले से जटिल क्षेत्रीय सुरक्षा परिस्थिति और गंभीर हो गई है। संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्रालय ने संबंधित पक्षों से संयम बरतने तथा राजनीतिक समाधान तलाशने की अपील की है। यह अपील बताती है कि खाड़ी के अनेक देश नए व्यापक सैन्य संघर्ष से बचना चाहते हैं।
आठ महीने से चल रहे युद्ध ने अमेरिका को भी पहुँचाया आर्थिक नुकसान
फरवरी के अंतिम सप्ताह में शुरू हुए संघर्ष के बाद अमेरिका को भारी आर्थिक व्यय उठाना पड़ा है। एसोसिएटेड प्रेस के अनुसार पेंटागन ने अमेरिकी संसद को जो नवीनतम अनुमान उपलब्ध कराया था, उसके मुताबिक ईरान युद्ध पर अमेरिकी करदाताओं के लगभग 47.1 अरब डॉलर खर्च हो चुके हैं। युद्ध के कारण ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी और दूसरी आर्थिक लागतों का असर अमेरिकी घरेलू राजनीति पर भी पड़ा है। इसी कारण राष्ट्रपति ट्रंप के सामने सैन्य उद्देश्यों को पूरा करने और लंबे संघर्ष को समाप्त करने की दोहरी चुनौती मौजूद है।
ट्रंप ने चुनावी सभाओं में कई बार कहा है कि युद्ध का अंत निकट है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि वह ईरान को परमाणु हथियार प्राप्त करने से रोकने की शर्त पर ही किसी अंतिम समाधान को स्वीकार करना चाहते हैं। उनकी रणनीति में सैन्य दबाव और वार्ता दोनों एक साथ दिखाई देते हैं। दूसरी तरफ ईरान का नेतृत्व यह संदेश दे रहा है कि वह बातचीत को तैयार है, लेकिन दबाव में बिना शर्त समझौता स्वीकार नहीं करेगा। इसी विरोधाभास के कारण शांति प्रयासों की प्रगति के बावजूद सैन्य तनाव बना हुआ है।
भारत के लिए इस तनाव का क्या अर्थ है?
भारत की दृष्टि से पश्चिम एशिया का यह संकट केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति का विषय नहीं है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है और फारस की खाड़ी के देश इसके प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य में लंबे समय तक बाधा रहने से कच्चे तेल और एलएनजी की अंतरराष्ट्रीय कीमतों, परिवहन तथा समुद्री बीमा लागत पर दबाव पड़ सकता है। तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ने पर भारत के आयात बिल, परिवहन लागत और व्यापक महँगाई पर असर पड़ने की आशंका रहती है। हालांकि घरेलू पेट्रोल, डीजल या गैस की कीमतों में कितना परिवर्तन होगा, यह अंतरराष्ट्रीय मूल्यों के अतिरिक्त कर व्यवस्था, तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति और विनिमय दर पर भी निर्भर करता है।
भारत के लिए दूसरी महत्वपूर्ण चिंता पश्चिम एशिया में रहने वाले भारतीय नागरिक हैं। खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय कामगार और पेशेवर कार्यरत हैं। संघर्ष का विस्तार होने पर हवाई सेवाएँ, समुद्री परिवहन, रोजगार और विदेशों से आने वाले धनप्रेषण प्रभावित हो सकते हैं। साथ ही भारत के संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, ईरान, इजरायल और अमेरिका के साथ अलग-अलग आर्थिक तथा रणनीतिक संबंध हैं। इसलिए क्षेत्र में तनाव कम होना भारत की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापक आर्थिक हितों से जुड़ा हुआ है।
अब अगले तीन दिन क्यों महत्वपूर्ण?
अमेरिका में तीन नवंबर को मतदान होना है। उससे पहले राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से नया सैन्य हमला न करने की सार्वजनिक प्रतिबद्धता रही है, लेकिन चुनाव के बाद की स्थिति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। अमेरिकी अधिकारियों ने क्षेत्रीय सहयोगियों को संभावित हमलों के लिए सतर्क किया है, लेकिन अंतिम निर्णय होने की पुष्टि नहीं हुई है। दूसरी ओर ईरान ने सैन्य कमांडरों को जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार रहने का संदेश दिया है और साथ ही कतर के माध्यम से बातचीत जारी रखी है। इन परिस्थितियों में तीन नवंबर के बाद अमेरिकी प्रशासन के निर्णय, इजरायल की सुरक्षा नीति, ईरान की प्रतिक्रिया और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े प्रस्ताव पर बातचीत का परिणाम अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।
सबसे बड़ी संभावना किसी एक निश्चित नतीजे की नहीं, बल्कि विभिन्न दिशाओं में विकसित हो सकने वाले घटनाक्रम की है। यदि अमेरिका और ईरान होर्मुज के संचालन तथा प्रतिबंधों पर समझौते के करीब पहुँचते हैं तो सैन्य तनाव कम करने का रास्ता खुल सकता है। इसके विपरीत यदि परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला हुआ तो ईरान के घोषित जवाबी रुख के कारण संघर्ष दूसरे देशों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों तक फैलने का जोखिम पैदा होगा। यह भी संभव है कि दोनों पक्ष सैन्य दबाव बनाए रखते हुए बातचीत जारी रखें।


