TRENDING TAGS :
ट्रंप–किम की संभावित चौथी मुलाकात: क्या इस बार टूटेगा परमाणु गतिरोध या फिर तस्वीरें ही बनेंगी इतिहास
Trump Kim Meeting 2026: ट्रंप और किम जोंग उन की संभावित चौथी मुलाकात 2026 में उत्तर कोरिया के परमाणु गतिरोध को बदल सकती है। जानिए 2018 से अब तक क्या बदला और इस बार समझौते की कितनी उम्मीद है।
Trump Kim Meeting 2026 (Image Credit-Social Media)
Trump Kim Meeting 2026: डोनाल्ड ट्रंप और किम जोंग उन की संभावित चौथी मुलाकात को सिर्फ दो नेताओं की एक और शिखर बैठक मानना बड़ी भूल होगी। इसके पीछे करीब नौ साल की धमकियां, परमाणु और मिसाइल परीक्षण, एक-दूसरे के लिए असाधारण बयान, तीन ऐतिहासिक मुलाकातें, हनोई में टूटी बातचीत, बदलती वैश्विक राजनीति और रूस के साथ उत्तर कोरिया की बढ़ती नजदीकी की पूरी कहानी है।
अगस्त 2026 में यह कहानी फिर एक नए मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। 19 अगस्त को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वह इसी साल उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन से मिलेंगे। इससे एक दिन पहले वॉल स्ट्रीट जर्नल ने खबर दी थी कि ट्रंप अपने अधिकारियों से किम के साथ मुलाकात की तैयारी के लिए कह रहे हैं और नवंबर में चीन के शेनझेन में होने वाले एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग सम्मेलन के आसपास यह मुलाकात संभव हो सकती है। लेकिन अभी तारीख और जगह तय नहीं है और उत्तर कोरिया ने भी बैठक की औपचारिक पुष्टि नहीं की है।
यानी अभी इसे तय शिखर बैठक कहना जल्दबाजी होगी। ट्रंप जरूर दरवाजा खोल चुके हैं, लेकिन प्योंगयांग ने उसे पूरी तरह खोला नहीं है।
दिलचस्प बात यह है कि किम की बहन और उत्तर कोरिया की प्रभावशाली नेता किम यो जोंग ने ट्रंप और किम के व्यक्तिगत संबंधों को अच्छा बताया है, लेकिन साथ ही साफ किया है कि अमेरिका की कथित शत्रुतापूर्ण नीति में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। उत्तर कोरिया ने हाल में अमेरिका और दक्षिण कोरिया के सैन्य अभ्यासों में कटौती को भी पर्याप्त नहीं माना।
यही इस संभावित चौथी मुलाकात की सबसे बड़ी पहेली है। ट्रंप मानते हैं कि उनका व्यक्तिगत रिश्ता किम को बातचीत की मेज पर ला सकता है। किम का संदेश है कि व्यक्तिगत रिश्ता अपनी जगह है, लेकिन परमाणु हथियार और राष्ट्रीय सुरक्षा उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
2017 में दोनों नेता परमाणु युद्ध की भाषा बोल रहे थे
आज यह कल्पना करना मुश्किल लग सकता है कि ट्रंप और किम कभी एक-दूसरे को लगभग युद्ध की धमकियां दे रहे थे। लेकिन 2017 में अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच तनाव बेहद खतरनाक स्तर पर पहुंच गया था।
उत्तर कोरिया लगातार मिसाइल परीक्षण कर रहा था। उसका लक्ष्य ऐसी अंतरमहाद्वीपीय मिसाइल विकसित करना था जो अमेरिकी मुख्यभूमि तक पहुंच सके। अमेरिका को आशंका थी कि प्योंगयांग परमाणु हथियारों को ऐसी मिसाइलों पर तैनात करने की क्षमता हासिल कर सकता है।
ट्रंप ने उत्तर कोरिया को ‘फायर एंड फ्यूरी’ जैसी चेतावनी दी। किम ने भी पीछे हटने के बजाय अमेरिका को चुनौती दी। उस समय कोरियाई प्रायद्वीप पर युद्ध की आशंका वास्तविक थी।
फिर अचानक कहानी बदली
धमकियों की जगह बातचीत ने ले ली और 12 जून 2018 को सिंगापुर में ट्रंप और किम पहली बार आमने-सामने बैठे। यह किसी कार्यरत अमेरिकी राष्ट्रपति और उत्तर कोरियाई नेता की पहली मुलाकात थी। दोनों ने नए अमेरिका–उत्तर कोरिया संबंध बनाने, कोरियाई प्रायद्वीप में स्थायी शांति व्यवस्था की दिशा में काम करने और उत्तर कोरिया की पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण की प्रतिबद्धता की बात कही।
तस्वीरें दुनिया भर में छा गईं। दो ऐसे नेता जो कुछ महीने पहले एक-दूसरे को युद्ध की धमकी दे रहे थे, अब साथ चल रहे थे, हाथ मिला रहे थे और मुस्कुरा रहे थे।
लेकिन तस्वीर और समझौते में फर्क था।
सिंगापुर घोषणा में परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा तो तय की गई, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि उत्तर कोरिया कितने हथियार और कितनी परमाणु सामग्री खत्म करेगा, निरीक्षण कैसे होगा और उसके बदले अमेरिका प्रतिबंधों में कितनी और किस क्रम में राहत देगा। यही अस्पष्टता आगे चलकर सबसे बड़ी समस्या बनी।
हनोई ने दिखा दिया कि व्यक्तिगत दोस्ती की भी एक सीमा होती है
फरवरी 2019 में ट्रंप और किम दूसरी बार वियतनाम के हनोई में मिले।
इस बार दोनों नेताओं के सामने तस्वीरों से आगे जाने का मौका था। लेकिन बातचीत उस जगह अटक गई जहां असली राजनीति शुरू होती है—उत्तर कोरिया कितना परमाणु ढांचा खत्म करेगा और बदले में अमेरिका कितने प्रतिबंध हटाएगा।
ट्रंप ने बाद में साफ कहा कि उत्तर कोरिया व्यापक प्रतिबंध हटाने की मांग कर रहा था, जबकि अमेरिका उसके बदले ज्यादा बड़ा परमाणु कदम चाहता था। समझौता नहीं हो सका और बैठक बिना किसी बड़े समझौते के खत्म हो गई।
यही ट्रंप–किम कूटनीति की असली परीक्षा थी और यहां व्यक्तिगत रिश्ते पर्याप्त साबित नहीं हुए। फिर जून 2019 में दोनों तीसरी बार कोरियाई असैन्य क्षेत्र पनमुनजोम में मिले। ट्रंप उत्तर कोरिया की जमीन पर कदम रखने वाले पहले कार्यरत अमेरिकी राष्ट्रपति बने। दृश्य फिर ऐतिहासिक था। लेकिन इस बार भी कोई ठोस परमाणु समझौता नहीं हुआ।
इसके बाद बातचीत लगभग बंद हो गई। यानी 2018 और 2019 की तीन मुलाकातों ने युद्ध का तत्काल खतरा जरूर कम किया, लेकिन उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को खत्म नहीं किया।
और अब सात साल बाद जब ट्रंप फिर किम से मिलने की बात कर रहे हैं, तब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या चौथी मुलाकात पिछली तीन मुलाकातों से कुछ अलग कर पाएगी?
2026 का किम 2018 वाले किम से कहीं ज्यादा मजबूत है
सबसे बड़ा बदलाव उत्तर कोरिया की परमाणु क्षमता में हुआ है।
SIPRI के 2026 के आकलन के मुताबिक जनवरी 2026 तक उत्तर कोरिया के पास करीब 60 परमाणु वारहेड हो सकते हैं और उसके पास कम से कम 30 और हथियार बनाने के लिए पर्याप्त विखंडनीय सामग्री होने का अनुमान है।
लेकिन इस संख्या को लेकर पूरी तरह निश्चित होना संभव नहीं है।
19 अगस्त को ट्रंप ने खुद कहा कि उत्तर कोरिया के पास 57 बेहद शक्तिशाली परमाणु हथियार हैं। इसके अगले ही दिन दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री ने इससे काफी बड़ा अनुमान दिया और कहा कि उत्तर कोरिया के पास 80 से 120 परमाणु वारहेड हो सकते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह सटीक संख्या नहीं है और विभिन्न शोध संस्थाओं के आंकड़ों पर आधारित अनुमान है।
इसलिए स्टोरी में 57 को उत्तर कोरिया के हथियारों की पक्की संख्या लिखना सही नहीं होगा। इसे ट्रंप का अनुमान बताना ज्यादा सटीक है।
असल बात संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण है। उत्तर कोरिया ने पिछले वर्षों में अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को आगे बढ़ाया है।
2018 में किम को उम्मीद थी कि बातचीत के बदले आर्थिक राहत मिल सकती है। 2026 में वह कहीं ज्यादा मजबूत स्थिति से बातचीत कर सकते हैं।
सबसे बड़ा बदलाव है रूस
2018 के उत्तर कोरिया और 2026 के उत्तर कोरिया के बीच सबसे बड़ा भू-राजनीतिक अंतर रूस है।
यूक्रेन युद्ध के बाद उत्तर कोरिया और रूस के रिश्ते तेजी से मजबूत हुए हैं। प्योंगयांग ने रूस को बड़ी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद दिया है। दक्षिण कोरियाई आकलन के अनुसार उत्तर कोरिया रूस को 1.5 करोड़ से ज्यादा तोप के गोले और कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें उपलब्ध करा चुका है। उत्तर कोरियाई सैनिक भी रूस की तरफ से युद्ध में शामिल हुए हैं।
इस सहयोग का एक और महत्व है। उत्तर कोरियाई हथियारों को वास्तविक युद्ध का अनुभव मिल रहा है। दक्षिण कोरियाई अधिकारियों के मुताबिक कुछ उत्तर कोरियाई मिसाइलों की सटीकता में युद्ध के अनुभव और रूसी तकनीकी मदद की वजह से सुधार हो सकता है।
इसका मतलब यह है कि किम अब अमेरिका के सामने उस देश के नेता के रूप में बैठेंगे जिसे पूरी तरह अलग-थलग करना पहले की तुलना में मुश्किल है।
उसके पास रूस है। चीन के साथ उसके रिश्ते भी बने हुए हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसके पास परमाणु हथियार हैं। इसलिए किम के पास बातचीत से हट जाने का विकल्प भी है।यही 2026 की कूटनीति को 2018 से अलग बनाता है।
ट्रंप को इस बार क्या चाहिए?
ट्रंप की तरफ से पहल के पीछे कई कारण हो सकते हैं।
सबसे पहला और सबसे साफ कारण है कि वह अपनी व्यक्तिगत कूटनीति को फिर से इस्तेमाल करना चाहते हैं। ट्रंप का मानना है कि दूसरे नेता जहां पारंपरिक राजनयिक तरीकों से बात नहीं कर पाते, वहां उनका व्यक्तिगत रिश्ता काम कर सकता है।
उन्होंने 19 अगस्त को कहा कि किम के साथ उनका अच्छा संबंध होना अच्छी बात है। उसी मौके पर उन्होंने उत्तर कोरिया के 57 परमाणु हथियार होने की बात भी कही।
दूसरा कारण एशिया में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है।
चीन और रूस के बीच बढ़ती नजदीकी, उत्तर कोरिया का रूस के साथ सैन्य सहयोग और जापान तथा दक्षिण कोरिया की सुरक्षा चिंताएं अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती हैं।
तीसरा कारण यह है कि ट्रंप को विदेश नीति में किसी बड़ी उपलब्धि की जरूरत है। उत्तर कोरिया के साथ ऐसा समझौता, जो कम से कम परमाणु खतरे को बढ़ने से रोक दे, उनके लिए बड़ी राजनीतिक उपलब्धि बन सकता है।
लेकिन इसके लिए उन्हें किम से कुछ वास्तविक हासिल करना होगा।
सिर्फ हाथ मिलाना पर्याप्त नहीं होगा।
अमेरिका ने सैन्य अभ्यास कम करके पहले ही संकेत दे दिया
ट्रंप प्रशासन ने दक्षिण कोरिया के साथ होने वाले संयुक्त सैन्य अभ्यास को भी कम किया है।
उल्ची फ्रीडम शील्ड अभ्यास को 11 दिन से घटाकर पांच दिन के आसपास कर दिया गया और उसका एक हिस्सा कंप्यूटर आधारित अभ्यास में बदल दिया गया। इसके पीछे ट्रंप ने किम के साथ अपने अच्छे रिश्ते और दक्षिण कोरिया के साथ दूसरे मतभेदों का भी हवाला दिया। (AP News)
लेकिन प्योंगयांग इससे प्रभावित होता नहीं दिखा।
उत्तर कोरिया ने कहा कि अभ्यासों में कमी से उनका मूल स्वरूप नहीं बदला है। इसके बाद उसने करीब 10 कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें भी दागीं। (AP News)
यही घटना भविष्य की बातचीत के लिए महत्वपूर्ण है।
अमेरिका ने एक संकेत दिया। उत्तर कोरिया ने उसके जवाब में अपनी सैन्य गतिविधि बंद नहीं की।
इसका मतलब है कि किम शायद पहले से ही यह संदेश देना चाहते हैं कि बातचीत के लिए उन्हें सिर्फ प्रतीकात्मक रियायतें नहीं चाहिए।
किम इस बार क्या मांग सकते हैं?
किम की सबसे बड़ी मांग शायद परमाणु हथियारों को खत्म करने की नहीं, बल्कि अपनी परमाणु क्षमता को स्वीकार करवाने की होगी।
यही सबसे कठिन टकराव है।
अमेरिका की घोषित नीति लंबे समय से उत्तर कोरिया के पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण की रही है। लेकिन प्योंगयांग अब उस स्थिति से बहुत दूर जा चुका है जिसमें वह अपने परमाणु कार्यक्रम को सौदे की वस्तु मानता था।
किम यह कह सकते हैं कि पहले वास्तविकता स्वीकार की जाए। उत्तर कोरिया परमाणु शक्ति है। उसके बाद हथियार नियंत्रण पर बातचीत की जाए।यह अमेरिका के लिए बहुत कठिन फैसला होगा। क्योंकि यदि वॉशिंगटन व्यवहारिक रूप से उत्तर कोरिया को परमाणु शक्ति मान लेता है तो दुनिया के दूसरे देशों को भी एक खतरनाक संदेश जा सकता है—अगर किसी देश ने पर्याप्त परमाणु हथियार बना लिए, तो अंततः बड़ी शक्तियां उसे स्वीकार कर लेंगी। लेकिन दूसरी तरफ पूर्ण निरस्त्रीकरण की मांग पर अड़े रहने से बातचीत शुरू ही नहीं हो सकती।
यहीं से बीच का रास्ता निकल सकता है।
पूर्ण निरस्त्रीकरण नहीं, पहले परमाणु खतरे को रोकना
अगर चौथी मुलाकात होती है तो सबसे व्यवहारिक समझौता शायद यह नहीं होगा कि उत्तर कोरिया अपने सारे परमाणु हथियार खत्म कर दे।
वास्तविक संभावना इससे छोटी लेकिन महत्वपूर्ण हो सकती है।
उत्तर कोरिया नए परमाणु परीक्षण रोक सकता है। परमाणु सामग्री का उत्पादन सीमित कर सकता है। लंबी दूरी की मिसाइलों के परीक्षण पर रोक लगा सकता है। अपने परमाणु कार्यक्रम के कुछ हिस्सों पर निरीक्षण की अनुमति दे सकता है। बदले में अमेरिका कुछ प्रतिबंधों में राहत और सुरक्षा आश्वासन दे सकता है। ऐसा समझौता पूर्ण निरस्त्रीकरण नहीं होगा। लेकिन यह कम से कम परमाणु हथियारों की संख्या लगातार बढ़ने की रफ्तार रोक सकता है। यही शायद 2026 की वास्तविक कूटनीति का सबसे व्यावहारिक लक्ष्य है।
लेकिन किम को इससे क्या मिलेगा?
किम के लिए सबसे बड़ा लाभ आर्थिक राहत से पहले राजनीतिक मान्यता होगी। जब दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति का राष्ट्रपति आपके साथ बार-बार बैठता है, तो यह अपने आप में उत्तर कोरिया के लिए बड़ी प्रचार उपलब्धि है। किम अपने देश में यह संदेश दे सकते हैं कि अमेरिका को आखिरकार उत्तर कोरिया से बात करनी पड़ी। यही वजह है कि चौथी मुलाकात सिर्फ अमेरिका के लिए जोखिम नहीं है। यह उत्तर कोरिया को वैधता देने का जोखिम भी है। अगर बैठक हुई, तस्वीरें आईं और दोनों नेताओं ने एक-दूसरे की तारीफ की लेकिन परमाणु कार्यक्रम में कोई वास्तविक बदलाव नहीं आया, तो सबसे बड़ा फायदा किम को होगा। उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच मिलेगा।
उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ बराबरी की तस्वीर मिलेगी। और बदले में उन्हें अपने परमाणु हथियार छोड़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
दक्षिण कोरिया सबसे ज्यादा सावधान क्यों है?
दक्षिण कोरिया इस बातचीत का समर्थन करता दिखाई दे रहा है, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ा सवाल अपनी सुरक्षा का है। अमेरिका दक्षिण कोरिया का सबसे महत्वपूर्ण सैन्य सहयोगी है। इसलिए अगर वॉशिंगटन उत्तर कोरिया को बातचीत के लिए लुभाने के नाम पर सैन्य अभ्यास लगातार कम करता है, अमेरिकी सैनिकों की भूमिका बदलता है या सुरक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव करता है तो सियोल में चिंता बढ़ सकती है।
24 अगस्त को दक्षिण कोरिया और अमेरिका के विदेश मंत्रियों ने उत्तर कोरिया के परमाणु खतरे से निपटने के लिए करीबी सहयोग बनाए रखने पर जोर दिया। यह संकेत महत्वपूर्ण है कि बातचीत की संभावना बढ़ने के बावजूद सियोल अपनी सुरक्षा व्यवस्था कमजोर नहीं करना चाहता। (Reuters)
दक्षिण कोरिया की चिंता बिल्कुल सीधी है।
अगर अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच कोई सौदा होता है, तो उसमें दक्षिण कोरिया की सुरक्षा कीमत नहीं बननी चाहिए।
जापान को इससे भी ज्यादा चिंता है
जापान की समस्या अलग है।
अमेरिका शायद उन मिसाइलों पर ज्यादा ध्यान दे सकता है जो अमेरिकी मुख्यभूमि तक पहुंच सकती हैं। लेकिन जापान उत्तर कोरिया की कम और मध्यम दूरी की मिसाइलों की पहुंच में है।
इसलिए टोक्यो के लिए सबसे खराब स्थिति यह होगी कि अमेरिका अपनी जमीन को खतरे में डालने वाली लंबी दूरी की मिसाइलों पर समझौता कर ले, लेकिन जापान को निशाना बनाने वाली मिसाइलें उत्तर कोरिया के पास बनी रहें।
ऐसी स्थिति में जापान और दक्षिण कोरिया दोनों अमेरिका की सुरक्षा प्रतिबद्धता पर नए सवाल उठा सकते हैं।
और अगर अमेरिकी परमाणु छतरी पर भरोसा कम होता है तो पूर्वी एशिया में अपनी परमाणु क्षमता विकसित करने की बहस और तेज हो सकती है।
यानी ट्रंप–किम की बातचीत का असर सिर्फ दो देशों पर नहीं पड़ेगा। यह पूरे एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
चीन और रूस भी इस बैठक को बहुत ध्यान से देखेंगे
चीन के लिए सबसे अच्छी स्थिति यह है कि कोरियाई प्रायद्वीप पर युद्ध का खतरा कम हो।
लेकिन चीन यह नहीं चाहेगा कि अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच ऐसा रिश्ता बन जाए जिससे किम बीजिंग से दूर चले जाएं।
रूस के लिए भी यही बात लागू होती है।
पुतिन और किम के बीच पिछले कुछ वर्षों में जो सैन्य संबंध बने हैं, वे अब सिर्फ राजनीतिक दोस्ती नहीं हैं। उत्तर कोरिया रूस को हथियार दे रहा है और बदले में उसे आर्थिक और सैन्य लाभ मिल रहे हैं। (Reuters)
इसलिए अमेरिका अगर किम को रूस से थोड़ा दूर करने की कोशिश करता है तो यह बातचीत का एक बड़ा रणनीतिक लक्ष्य हो सकता है। लेकिन यह आसान नहीं होगा। किम के लिए रूस अब सिर्फ एक दोस्त नहीं, बल्कि वैकल्पिक शक्ति केंद्र है।
क्या ट्रंप इस बार जीत सकते हैं?
अगर सफलता का मतलब सिर्फ मुलाकात है तो ट्रंप और किम दोनों जीत जाएंगे। ट्रंप कह सकेंगे कि उन्होंने फिर संवाद शुरू कर दिया। किम कह सकेंगे कि अमेरिकी राष्ट्रपति खुद उनसे मिलने आए। लेकिन अगर सवाल परमाणु कार्यक्रम का है तो तस्वीर बदल जाती है।
अगर उत्तर कोरिया नए परमाणु परीक्षण रोकता है, परमाणु सामग्री का उत्पादन सीमित करता है, लंबी दूरी की मिसाइलों पर रोक लगाता है और निरीक्षण स्वीकार करता है तो ट्रंप के पास वास्तविक उपलब्धि होगी।
वह कह सकेंगे कि उन्होंने 2018 की तुलना में ज्यादा कठिन परिस्थितियों में किम से कुछ ठोस हासिल किया।
लेकिन अगर किम केवल मुलाकात, आर्थिक राहत और सैन्य अभ्यासों में कमी हासिल कर लेते हैं और अपना परमाणु कार्यक्रम जस का तस रखते हैं तो यह ट्रंप के लिए राजनीतिक नुकसान होगा।
तब आलोचक यही कहेंगे कि उन्होंने एक बार फिर तस्वीर तो बना ली, लेकिन समस्या हल नहीं की।
क्या किम बैठक से इनकार कर सकते हैं?
यह संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
यही इस समय सबसे महत्वपूर्ण बात है।
ट्रंप ने कहा है कि वह इस साल किम से मिलेंगे। लेकिन प्योंगयांग ने अभी तक औपचारिक रूप से ऐसी बैठक की घोषणा नहीं की है। उत्तर कोरिया ने यह जरूर कहा है कि दोनों नेताओं के व्यक्तिगत संबंध अच्छे हैं, लेकिन अमेरिकी नीति में बदलाव नहीं आया है।
इसका मतलब है कि किम के पास बातचीत का रास्ता खुला रखने का विकल्प है, लेकिन वे जल्दी में नहीं हैं।
उनके पास इंतजार करने की वजह भी है।
उत्तर कोरिया का परमाणु कार्यक्रम आगे बढ़ रहा है। रूस के साथ संबंध मजबूत हैं। चीन से संबंध बने हुए हैं। और अमेरिका खुद बातचीत के लिए पहल कर रहा है।
ऐसे में किम की सौदेबाजी की ताकत 2018 के मुकाबले ज्यादा है।
असली सवाल परमाणु निरस्त्रीकरण नहीं, परमाणु नियंत्रण हो सकता है
यही इस संभावित चौथी मुलाकात का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
2018 में बातचीत का केंद्र था—उत्तर कोरिया अपने परमाणु हथियार खत्म करेगा या नहीं।
2026 में शायद सवाल बदल चुका है।
अब सवाल यह हो सकता है कि उत्तर कोरिया के पास जो परमाणु हथियार हैं, उनके और बढ़ने को कैसे रोका जाए।
यह बदलाव अमेरिका के लिए राजनीतिक रूप से असहज होगा। लेकिन कूटनीतिक रूप से शायद ज्यादा व्यावहारिक भी।
क्योंकि उत्तर कोरिया को आज उस स्थिति में वापस ले जाना बेहद मुश्किल है जहां वह अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने के लिए तैयार हो।
इसलिए अगर ट्रंप वास्तविक सफलता चाहते हैं तो उन्हें शायद एक चरणबद्ध समझौते की तरफ जाना होगा।
पहले परीक्षण बंद।फिर उत्पादन सीमित।फिर निरीक्षण।फिर हथियारों की संख्या पर सीमा। और बहुत लंबे समय में निरस्त्रीकरण।ऐसी प्रक्रिया धीमी होगी। इसमें कई साल लग सकते हैं। लेकिन यही शायद उस गतिरोध से निकलने का सबसे वास्तविक रास्ता है जिसमें अमेरिका और उत्तर कोरिया पिछले सात साल से फंसे हैं।
चौथी मुलाकात की सबसे बड़ी परीक्षा कैमरों के बाद होगी
ट्रंप और किम दोनों को ऐतिहासिक तस्वीरों की ताकत समझ में आती है। सिंगापुर में तस्वीर इतिहास बनी थी।
हनोई में तस्वीरें थीं, लेकिन समझौता नहीं।पनमुनजोम में ट्रंप ने उत्तर कोरिया की जमीन पर कदम रखा, लेकिन परमाणु नीति नहीं बदली। इसलिए चौथी मुलाकात की असली परीक्षा यह नहीं होगी कि दोनों नेता कितनी गर्मजोशी से हाथ मिलाते हैं। परीक्षा यह होगी कि कैमरों के हटने के बाद दोनों किस बात पर सहमत होते हैं।
अगर सिर्फ यह घोषणा होती है कि दोनों नेताओं के बीच रिश्ते बहुत अच्छे हैं, तो उत्तर कोरिया के परमाणु हथियार वहीं रहेंगे और दुनिया सात साल बाद फिर उसी जगह खड़ी होगी।
लेकिन अगर दोनों पक्ष यह स्वीकार करते हैं कि अमेरिका तत्काल पूर्ण निरस्त्रीकरण नहीं करा सकता और उत्तर कोरिया अनिश्चितकाल तक अपना परमाणु शस्त्रागार बढ़ाता नहीं रह सकता, तो एक वास्तविक मध्य रास्ता निकल सकता है।
यही इस बैठक की सबसे बड़ी संभावना है।
और यही सबसे बड़ा खतरा भी।
क्योंकि अगर कूटनीति सफल हुई तो ट्रंप युद्ध का जोखिम कम करने वाले राष्ट्रपति के रूप में अपनी छवि मजबूत कर सकते हैं और किम आर्थिक तथा सुरक्षा लाभ लेकर अपने शासन को और मजबूत कर सकते हैं।
लेकिन अगर कूटनीति सिर्फ कैमरों का कार्यक्रम बनी, तो किम को विश्व-स्तरीय वैधता लगभग मुफ्त मिल जाएगी।
और ट्रंप से इतिहास फिर वही सवाल पूछेगा—
सिंगापुर ने उम्मीद पैदा की थी। हनोई ने उसकी सीमा बता दी थी। पनमुनजोम ने इतिहास रचा था। लेकिन चौथी मुलाकात के बाद आखिर बदला क्या?


