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शर्मिंदा हैं अंग्रेज! गुलामी के 79 साल बाद भारत से मांगेगा माफी, क्या मुआवजा भी देने की है तैयारी?
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने गुलामी के इतिहास पर औपचारिक माफी की मांगों को सुनने की इच्छा जताई है।
UK Slavery Apology: ब्रिटेन ने अपने इतिहास के एक ऐसे अध्याय पर फिर से चर्चा शुरू कर दी है, जिसकी गूंज आज भी अफ्रीका और कैरेबियाई देशों में सुनाई देती है। ट्रांसअटलांटिक गुलामों के व्यापार में ब्रिटेन की भूमिका को लेकर प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने बड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा है कि ब्रिटेन इस ऐतिहासिक अन्याय के लिए औपचारिक सरकारी माफी की मांगों को सुनने और प्रभावित देशों के साथ बातचीत करने के लिए तैयार है।
हालांकि, उन्होंने आर्थिक मुआवजा देने की मांग को खारिज कर दिया है। बर्नहम ने यह बात कॉमनवेल्थ देशों के नेताओं की बैठक से पहले 'द गार्जियन' में लिखे अपने लेख में कही। उनका कहना है कि सदियों पहले हुए अपराधों के लिए आज के ब्रिटिश नागरिकों को आर्थिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके बजाय ब्रिटेन गरीब कॉमनवेल्थ देशों को कर्ज के बोझ से राहत दिलाने और विकास में मदद करने पर ध्यान देना चाहता है।
ब्रिटेन की मंशा पर सवाल, माफी के लिए बातचीत का प्रस्ताव
बर्नहम ने अपने लेख में माना कि गुलामी के दौरान लाखों अफ्रीकी लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार हुआ। उन्हें उनके परिवारों से अलग किया गया, इंसान के बजाय संपत्ति की तरह खरीदा-बेचा गया और जबरन मजदूरी कराई गई। ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने इस दर्द और उसके आज तक बने हुए असर पर दुख जताया है। उन्होंने कहा कि प्रभावित देशों और संगठनों के साथ बातचीत का एक व्यवस्थित रास्ता तैयार किया जाएगा।
इस प्रक्रिया में ब्रिटिश सरकार की ओर से औपचारिक माफी मांगने की मांग पर भी चर्चा होगी। हालांकि, बर्नहम ने साफ कर दिया कि वह गुलामी के बदले सीधे आर्थिक मुआवजे को सही रास्ता नहीं मानते। उनके मुताबिक, आज की पीढ़ी को उन ऐतिहासिक घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा, जिनमें उसकी कोई व्यक्तिगत भूमिका नहीं थी।
ब्रिटेन ने लाखों अफ्रीकी लोगों को बनाया था गुलाम
ट्रांसअटलांटिक गुलाम व्यापार का इतिहास बेहद दर्दनाक रहा है। इस व्यवस्था के तहत अफ्रीका से लोगों को जबरन पकड़कर अटलांटिक महासागर के पार अमेरिका और कैरेबियाई इलाकों में ले जाया गया। वहां उनसे खेतों, खदानों और दूसरे कामों में जबरन मजदूरी कराई जाती थी। उपलब्ध ऐतिहासिक आंकड़ों के मुताबिक, ब्रिटेन ने करीब 32 लाख अफ्रीकी लोगों को इस व्यापार के तहत अटलांटिक पार पहुंचाया था। यूरोपीय देशों की कुल भूमिका इससे भी बड़ी थी और इस व्यापार में 1.25 करोड़ से अधिक अफ्रीकी लोगों को पकड़कर गुलामी के लिए भेजा गया था।
ब्रिटेन ने 1807 में गुलामों की खरीद-बिक्री पर रोक लगाने वाला कानून बनाया। इसके बाद 1833 में गुलामी खत्म करने का कानून पारित हुआ, जो 1834 से लागू हुआ। हालांकि, गुलामी की व्यवस्था से पूरी तरह बाहर निकलने में कई साल लगे और 1838 तक इस प्रक्रिया को पूरा किया गया। इस इतिहास का एक बड़ा विरोधाभास यह भी रहा कि गुलामी खत्म होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने पीड़ितों के बजाय गुलामों के मालिकों को आर्थिक मुआवजा दिया था।
गुलामों के मालिकों को मिला था मुआवजा, पीड़ित रह गए खाली हाथ
ब्रिटेन की तत्कालीन सरकार ने गुलामों के मालिकों को करीब 2 करोड़ पाउंड का मुआवजा दिया था। यह उस दौर में सरकार के सालाना बजट का बहुत बड़ा हिस्सा था। इस भुगतान के लिए ब्रिटिश सरकार ने कर्ज भी लिया था, जिसे चुकाने की प्रक्रिया 2015 तक जारी रही। दूसरी ओर, जिन लोगों और परिवारों ने पीढ़ियों तक गुलामी और शोषण झेला, उन्हें इस तरह का कोई सीधा मुआवजा नहीं मिला। यही वजह है कि कैरेबियाई देशों के कई नेता और संगठन आज भी ब्रिटेन से आर्थिक भरपाई की मांग कर रहे हैं।
गुलामी खत्म हुई, लेकिन भारतीय मजदूरों को भी झेलना पड़ा शोषण
अफ्रीकी गुलामी पर कानूनी रोक लगने के बाद ब्रिटिश साम्राज्य के कई उपनिवेशों में खेतों और बागानों के लिए मजदूरों की जरूरत बनी रही। इस कमी को पूरा करने के लिए भारत से बड़ी संख्या में लोगों को दूसरे देशों में भेजा गया। इसे इंडेंचर्ड लेबर यानी अनुबंधित मजदूरी की व्यवस्था कहा जाता था। 1838 से 1917 के बीच करीब 20 लाख भारतीयों को कैरेबियाई देशों और दक्षिण अफ्रीका जैसे ब्रिटिश उपनिवेशों में काम करने के लिए ले जाया गया।
इनमें से कई लोगों को विदेश में काम की वास्तविक परिस्थितियों की पूरी जानकारी नहीं दी गई थी। वहां पहुंचने के बाद उन्हें कम मजदूरी पर कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ा। इस व्यवस्था में भारतीय मजदूरों का शोषण भी ब्रिटिश औपनिवेशिक इतिहास का अहम हिस्सा रहा है। इसलिए गुलामी और उसके बाद की मजदूरी व्यवस्था पर होने वाली चर्चा भारत के लिए भी ऐतिहासिक महत्व रखती है।
शशि थरूर ने उठाया भारत में ब्रिटिश शासन के अत्याचारों का मुद्दा
ब्रिटिश प्रधानमंत्री के बयान पर कांग्रेस सांसद और लेखक शशि थरूर ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन को केवल अफ्रीकी लोगों की गुलामी के लिए ही नहीं, बल्कि भारत में औपनिवेशिक शासन के दौरान हुए अत्याचारों और आर्थिक लूट के लिए भी माफी मांगनी चाहिए। थरूर का कहना है कि भारत ने ब्रिटिश शासन के दौरान भारी नुकसान उठाया और इस इतिहास को स्वीकार करना जरूरी है।
थरूर पहले भी ब्रिटेन से भारत के लिए प्रतीकात्मक मुआवजे की मांग कर चुके हैं। उनका सुझाव रहा है कि ब्रिटेन 200 साल तक हर साल भारत को एक पाउंड दे। उनके मुताबिक, इस मांग का मकसद बड़ी रकम हासिल करना नहीं, बल्कि ब्रिटेन से अपने औपनिवेशिक अतीत की जिम्मेदारी स्वीकार करवाना है। उनके इस रुख से साफ है कि ब्रिटेन की प्रस्तावित माफी की बहस केवल अफ्रीका और कैरेबियाई देशों तक सीमित नहीं रहने वाली है।
किंग चार्ल्स ने भी माना, अतीत में लोगों के साथ हुआ अन्याय
ब्रिटेन के राजा किंग चार्ल्स तृतीय भी कैरेबियाई क्षेत्र के दौरे के दौरान गुलामी के इतिहास पर टिप्पणी कर चुके हैं। बहामास में उन्होंने अतीत में लोगों के साथ हुए अन्याय और उनके दर्द को स्वीकार किया तथा गुलामी के पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी। हालांकि, उनकी ओर से औपचारिक माफी नहीं दी गई। ब्रिटिश राजपरिवार की ओर से यह रुख भी सामने आया है कि सरकारी माफी जैसे नीतिगत फैसले चुनी हुई सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
कॉमनवेल्थ बैठक से पहले राजा की टिप्पणियों और प्रधानमंत्री बर्नहम के लेख ने इस मुद्दे को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। कैरेबियाई देशों की नेता और बारबाडोस की प्रधानमंत्री मिया मोटली ने बातचीत के लिए ब्रिटेन की पहल का स्वागत किया है, लेकिन उनका कहना है कि आर्थिक मुआवजे की मांग खत्म नहीं हुई है। कैरेबियाई देशों के लिए केवल दुख जताना पर्याप्त नहीं है; वे ऐतिहासिक अन्याय के असर को कम करने के लिए ठोस कदम चाहते हैं।
गरीब देशों के कर्ज में राहत देने की योजना लाएगा ब्रिटेन
आर्थिक मुआवजे की मांग को स्वीकार नहीं करने के बावजूद बर्नहम ने गरीब कॉमनवेल्थ देशों के लिए एक दूसरी योजना का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत कमजोर अर्थव्यवस्था वाले देशों को कर्ज चुकाने के लिए ज्यादा समय और कम ब्याज दर उपलब्ध कराने की कोशिश की जाएगी। इस पहल में ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन की भूमिका भी बताई गई है। बर्नहम का मानना है कि कई गरीब देश अपने बजट का बड़ा हिस्सा कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च कर देते हैं, जिससे स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी जरूरी सेवाओं के लिए पैसा कम बचता है। ब्रिटेन इन देशों को स्वच्छ ऊर्जा अपनाने और विकास के दूसरे कामों में भी सहयोग देना चाहता है।
कॉमनवेल्थ बैठक में माफी और मुआवजे का मुद्दा रहेगा अहम
कॉमनवेल्थ देशों के नेताओं की आगामी बैठक में गुलामी का इतिहास, औपचारिक माफी और आर्थिक भरपाई जैसे मुद्दे चर्चा में रहने की उम्मीद है। एक तरफ ब्रिटेन बातचीत और विकास सहायता के जरिए आगे बढ़ने की बात कर रहा है, तो दूसरी तरफ प्रभावित देश चाहते हैं कि ऐतिहासिक अन्याय को केवल स्वीकार ही न किया जाए, बल्कि उसके असर को दूर करने के लिए ठोस कदम भी उठाए जाएं। ऐसे में बर्नहम की पहल से बातचीत का रास्ता जरूर खुल सकता है, लेकिन मुआवजे के सवाल पर ब्रिटेन और कैरेबियाई देशों के बीच मतभेद बने रहने की संभावना है।


