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United Nations Future: क्या संयुक्त राष्ट्र समाप्त हो जाएगा, UN के भविष्य और बदलाव की पूरी कहानी
United Nations Future: क्या संयुक्त राष्ट्र खत्म होने की ओर है या बदलती दुनिया के साथ खुद को फिर से तैयार कर रहा है?
United Nations Future United Nations Reform Explained in Hindi
United Nations Future: संयुक्त राष्ट्र की चमक काफी धुंधली पड़ गयी है बावजूद इसके कि वर्तमान में इसके 193 सदस्य देश हैं और उसकी महासभा में दुनिया के लगभग सभी संप्रभु देशों की मौजूदगी उसे अब भी सबसे व्यापक वैश्विक संस्था बनाती है। संयुक्त राष्ट्र के 11 शांति अभियानों में 2025 के अंत तक करीब 48,000 वर्दीधारी कर्मी और कुल मिलाकर 56,000 से अधिक लोग काम कर रहे थे। लेकिन बदलाव की मांगें, इस संगठन पर होते प्रहार ऐसे संकेत दे रहे हैं कि भले ही ये संगठन खत्म न हो लेकिन कुछ बड़े बदलाव जरूर होंगे।
2024 में सदस्य देशों द्वारा जिस ‘पैक्ट फॉर द फ्यूचर’ को अपनाया, उसमें संयुक्त राष्ट्र को खत्म करने की बात नहीं, बल्कि वैश्विक शासन व्यवस्था को बदलने और सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने की प्रतिबद्धता जताई गई है।
फिर भी एक ज्यादा गंभीर सवाल सामने है। क्या संयुक्त राष्ट्र केवल एक ऐसी संस्था बन सकता है जो मौजूद तो रहे, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े युद्धों, आर्थिक संकटों और नई वैश्विक चुनौतियों पर निर्णायक असर डालने की क्षमता लगातार खोती जाए? यानी सवाल यह नहीं कि न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र का भवन बंद होगा या उसके झंडे उतर जाएंगे। असली सवाल यह है कि आने वाले दशकों में जब दुनिया किसी बड़े युद्ध, महामारी, जलवायु संकट, साइबर हमले, कृत्रिम बुद्धिमत्ता या अंतरिक्ष से जुड़े विवाद का सामना करेगी, तब क्या देश समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र की ओर देखेंगे?
आज उपलब्ध संकेतों को देखें तो संयुक्त राष्ट्र के अचानक खत्म हो जाने की तुलना में उसका धीरे-धीरे राजनीतिक रूप से कमजोर होना कहीं अधिक वास्तविक संभावना दिखाई देती है।
1945 की दुनिया के लिए बनी संस्था
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 1945 में उस दुनिया के लिए हुई थी जो दूसरे विश्व युद्ध की तबाही से निकल रही थी। उस समय दुनिया की शक्ति-संरचना कुछ बड़ी सैन्य और औद्योगिक शक्तियों के इर्द-गिर्द केंद्रित थी। अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता और वीटो का अधिकार मिला। आज भी यही पांच देश सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं।
लेकिन दुनिया बदल चुकी है। संयुक्त राष्ट्र की सदस्य संख्या 1945 के 51 देशों से बढ़कर 193 हो चुकी है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के दर्जनों नए देश अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हैं। भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है और प्रमुख आर्थिक तथा तकनीकी शक्ति बन चुका है। अफ्रीका में 50 से अधिक देश हैं। जापान और जर्मनी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में हैं। दुनिया अब एक या दो शक्ति केंद्रों से नहीं चलती, बल्कि कई अलग-अलग शक्ति केंद्र एक साथ प्रभाव डालते हैं।
यही कारण है कि सुरक्षा परिषद की संरचना पर सवाल लगातार बढ़ा है। 2024 के ‘पैक्ट फॉर द फ्यूचर’ में सदस्य देशों ने खुद माना कि परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, समावेशी, पारदर्शी, प्रभावी, लोकतांत्रिक और जवाबदेह बनाने की जरूरत है। इसमें अफ्रीका के ऐतिहासिक रूप से कम प्रतिनिधित्व को सुधारने को प्राथमिकता देने की बात भी कही गई है। परिषद के विस्तार और वीटो के भविष्य पर चर्चा को भी सुधार प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया है।
इसका मतलब यह नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश संस्था को खत्म करना चाहते हैं। इसका उल्टा ज्यादा सही है। वे मानते हैं कि संस्था की जरूरत बनी हुई है, लेकिन उसकी मौजूदा संरचना आज की दुनिया को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती।
संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी समस्या पैसे की है या राजनीति की?
संयुक्त राष्ट्र इस समय वित्तीय दबाव में भी है। संयुक्त राष्ट्र की अपनी UN80 पहल के अनुसार, उसके सचिवालय को गंभीर नकदी संकट का सामना करना पड़ रहा है। इसका एक बड़ा कारण सदस्य देशों द्वारा अपने अनिवार्य अंशदान का देर से या पूरा भुगतान न करना है। संयुक्त राष्ट्र साफ कहता है कि UN80 का उद्देश्य इस वित्तीय संकट को अकेले हल करना नहीं है, बल्कि उपलब्ध संसाधनों में काम करने की क्षमता बढ़ाना और संस्था को अधिक प्रभावी बनाना है।
2026 में UN80 के तहत संयुक्त राष्ट्र के काम करने के तरीके, पुराने दायित्वों, संस्थागत ढांचे और खर्च की समीक्षा की जा रही है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने 2026 में कहा कि संस्था को अधिक चुस्त, कम खर्चीला, एक-दूसरे से बेहतर जुड़ा और प्रभावी बनाने के लिए सुधार जरूरी हैं। 2026 के लिए प्रस्तावित बजट में भी बड़ी कटौती और कर्मचारियों की संख्या घटाने की योजना सामने आई। लेकिन पैसा समस्या का केवल एक हिस्सा है।
संयुक्त राष्ट्र के सामने मूल चुनौती यह है कि दुनिया की बड़ी शक्तियां उसके नियमों को कितना स्वीकार करती हैं और कब तक स्वीकार करती हैं। किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था की ताकत केवल उसके पास मौजूद कर्मचारियों, बजट या इमारतों से नहीं आती। उसकी असली ताकत इस बात से आती है कि शक्तिशाली देश भी उसके बनाए नियमों और प्रक्रियाओं को गंभीरता से लें। यहीं से सुरक्षा परिषद और वीटो का प्रश्न सामने आता है।
वीटो, संयुक्त राष्ट्र की ताकत भी और कमजोरी भी
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में 15 सदस्य हैं। इनमें पांच स्थायी सदस्य हैं और दस अस्थायी सदस्य। स्थायी पांच देशों को वीटो का अधिकार प्राप्त है। इसका अर्थ यह है कि किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर किसी स्थायी सदस्य की नकारात्मक वोटिंग उसे रोक सकती है। 1945 में यह व्यवस्था एक व्यावहारिक समझौता थी। दुनिया की बड़ी शक्तियों को यह भरोसा दिलाना जरूरी था कि उनके मूल सुरक्षा हितों के खिलाफ कोई निर्णय उन पर थोपा नहीं जाएगा। लेकिन यही व्यवस्था आज संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी राजनीतिक समस्या बन जाती है, खासकर तब जब किसी बड़े संघर्ष में कोई स्थायी सदस्य स्वयं पक्षकार हो या उसके महत्वपूर्ण हित जुड़े हों।
तब सवाल उठता है कि जिस संस्था का काम अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की रक्षा करना है, क्या वह उन परिस्थितियों में प्रभावी फैसला ले सकती है जहां उसके सबसे शक्तिशाली सदस्य ही एक-दूसरे से सहमत न हों?
इस समस्या का कोई आसान समाधान भी नहीं है। वीटो समाप्त करने या सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता बदलने के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन करना पड़ेगा। चार्टर के अनुच्छेद 108 के अनुसार ऐसे संशोधन के लिए महासभा के दो-तिहाई सदस्यों की मंजूरी के साथ सभी स्थायी सदस्यों सहित दो-तिहाई सदस्य देशों द्वारा उसका अनुमोदन जरूरी है। यानी जिन देशों के विशेषाधिकार को बदलना है, उनकी सहमति प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है। यही कारण है कि सुरक्षा परिषद सुधार पर चर्चा दशकों से चल रही है, लेकिन बुनियादी ढांचे में बदलाव बेहद धीमा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र सिर्फ सुरक्षा परिषद नहीं है
जब सुरक्षा परिषद किसी युद्ध को रोकने में असफल होती है तो पूरा संयुक्त राष्ट्र असफल दिखाई देने लगता है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र इससे कहीं बड़ा तंत्र है। आज भी उसके जरिए शांति अभियान, मानवीय सहायता, शरणार्थी सहायता, बच्चों और खाद्य सुरक्षा से जुड़े कार्यक्रम, विकास संबंधी काम, स्वास्थ्य, नागरिक उड्डयन, मौसम, परमाणु सुरक्षा, समुद्री कानून और कई अंतरराष्ट्रीय मानकों से जुड़े काम चलते हैं। संयुक्त राष्ट्र की मुख्य संस्थाओं में महासभा, सुरक्षा परिषद, आर्थिक एवं सामाजिक परिषद, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और सचिवालय शामिल हैं। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र प्रणाली से जुड़ी अनेक एजेंसियां और संस्थाएं अलग-अलग क्षेत्रों में काम करती हैं। इसलिए संयुक्त राष्ट्र का भविष्य एक ही पैमाने से नहीं मापा जा सकता। संभव है कि उसकी सामूहिक सुरक्षा संबंधी राजनीतिक भूमिका कमजोर हो, लेकिन मानवीय और तकनीकी भूमिका बनी रहे। यह भी संभव है कि कुछ क्षेत्रों में उसकी भूमिका मजबूत हो और कुछ में बड़ी शक्तियां उसके बाहर फैसले लेने लगें। यानी भविष्य का संयुक्त राष्ट्र शायद आज के संयुक्त राष्ट्र जैसा एक समान प्रभाव वाला संगठन न हो। उसकी ताकत अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग हो सकती है।
सबसे बड़ा खतरा: संयुक्त राष्ट्र खत्म नहीं, किनारे हो जाए
यही शायद संयुक्त राष्ट्र के भविष्य का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। कल्पना कीजिए कि 193 देश किसी दिन मतदान करके संयुक्त राष्ट्र को समाप्त करने का फैसला कर दें। यह बहुत बड़ा राजनीतिक और संस्थागत संकट होगा। लेकिन इससे पहले एक और स्थिति पैदा हो सकती है। बड़ी शक्तियां संयुक्त राष्ट्र को केवल उन मामलों में इस्तेमाल करें जिनमें उन्हें फायदा दिखाई देता हो और बाकी मामलों में दूसरे मंचों का सहारा लें। आज की दुनिया में ऐसे कई मंच पहले से मौजूद हैं। जी-7, जी-20, ब्रिक्स, नाटो, यूरोपीय संघ, अफ्रीकी संघ, आसियान और कई क्षेत्रीय संगठन अपने-अपने क्षेत्रों और हितों के अनुसार फैसले लेते हैं। इनका अस्तित्व अपने आप में संयुक्त राष्ट्र के खत्म होने का प्रमाण नहीं है। बल्कि यह बताता है कि दुनिया में शक्ति के कई केंद्र विकसित हो चुके हैं। अगर यही प्रवृत्ति बढ़ती गई तो संयुक्त राष्ट्र धीरे-धीरे एक ऐसी संस्था बन सकता है जिसकी महासभा में दुनिया के सभी देश बैठते हों, जिसके मानवीय कार्यक्रम चलते हों और जिसकी एजेंसियां रोजमर्रा का काम करती हों, लेकिन बड़े युद्धों और सुरक्षा संकटों पर निर्णायक बातचीत कहीं और होती हो। ऐसी स्थिति में संयुक्त राष्ट्र कानूनी रूप से पूरी तरह जीवित रहेगा, लेकिन राजनीतिक रूप से उसकी केंद्रीयता कम हो सकती है।
लीग ऑफ नेशंस से क्या सबक मिलता है?
इतिहास में इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण लीग ऑफ नेशंस है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद बनाई गई यह संस्था अंतरराष्ट्रीय विवादों को रोकने और शांति बनाए रखने के उद्देश्य से बनी थी। लेकिन दूसरे विश्व युद्ध से पहले उसकी राजनीतिक क्षमता कमजोर पड़ती गई और अंततः संयुक्त राष्ट्र ने उसकी जगह ले ली।
यह तुलना पूरी तरह समान नहीं है। आज का संयुक्त राष्ट्र लीग ऑफ नेशंस से बहुत अधिक व्यापक और मजबूत संस्थागत ढांचा रखता है। उसके पास 193 सदस्य हैं, व्यापक एजेंसियां हैं और दशकों में विकसित हुआ अंतरराष्ट्रीय कानून और सहयोग का तंत्र है। फिर भी लीग का सबक महत्वपूर्ण है। किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था का अस्तित्व अपने आप उसकी प्रभावशीलता की गारंटी नहीं होता। अगर सदस्य देश उसके फैसलों को लगातार नजरअंदाज करने लगें, तो संस्था का राजनीतिक महत्व कम हो सकता है, भले ही उसका औपचारिक ढांचा बना रहे।इसलिए संयुक्त राष्ट्र के भविष्य का सबसे बड़ा खतरा शायद उसका अचानक गायब होना नहीं, बल्कि उसकी धीरे-धीरे अप्रासंगिक होती भूमिका है।
क्या दुनिया दूसरा संयुक्त राष्ट्र बना सकती है?
सैद्धांतिक रूप से ऐसा संभव है। इतिहास में एक अंतरराष्ट्रीय संस्था की जगह दूसरी संस्था बन चुकी है। लेकिन आज की दुनिया में नया संयुक्त राष्ट्र बनाना बेहद कठिन होगा। मान लीजिए वर्तमान व्यवस्था इतनी कमजोर हो जाए कि दुनिया के बड़े देश नई संस्था बनाना चाहें। तब पहला सवाल होगा कि उसमें शक्ति का बंटवारा कैसे होगा। क्या अमेरिका और चीन को विशेष अधिकार मिलेंगे? भारत को किस स्तर की भूमिका मिलेगी? अफ्रीका को कितनी स्थायी सीटें मिलेंगी? यूरोप का प्रतिनिधित्व कैसे होगा? परमाणु हथियार रखने वाले देशों को क्या अलग अधिकार मिलेंगे? छोटे देशों की आवाज कितनी होगी? मतदान एक देश एक वोट के आधार पर होगा या आबादी, आर्थिक ताकत और योगदान को भी महत्व मिलेगा? और सबसे कठिन सवाल यह होगा कि बड़ी शक्तियां ऐसी संस्था के फैसलों को कितना स्वीकार करेंगी जो उनके मूल सुरक्षा हितों के खिलाफ जा सकते हों। यानी नया संयुक्त राष्ट्र बनाना पुराने संयुक्त राष्ट्र में सुधार करने से आसान नहीं होगा।
इसके अलावा वर्तमान संयुक्त राष्ट्र से जुड़े इतने सारे अंतरराष्ट्रीय समझौते, संस्थाएं, कर्मचारी, बजट, कार्यक्रम और कानूनी व्यवस्थाएं हैं कि उनकी जगह नई व्यवस्था बनाना कई दशकों का काम हो सकता है। इसीलिए फिलहाल अधिक वास्तविक रास्ता यह दिखाई देता है कि दुनिया संयुक्त राष्ट्र को खत्म करने की बजाय उसके भीतर बदलाव की कोशिश करे।
2024 का ‘पैक्ट फॉर द फ्यूचर’ क्या बताता है?
यह बताता है कि सदस्य देशों ने खुद समस्या को किस तरह देखा है। 2024 में अपनाए गए ‘पैक्ट फॉर द फ्यूचर’ में वैश्विक शासन को बदलने, बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करने और सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रतिबद्धता जताई गई। दस्तावेज में सुरक्षा परिषद को वर्तमान दुनिया का बेहतर प्रतिनिधित्व करने वाला बनाने की बात कही गई। अफ्रीका के ऐतिहासिक कम प्रतिनिधित्व को सुधारने को प्राथमिकता देने और परिषद का विस्तार करने पर चर्चा आगे बढ़ाने की बात भी इसमें है। वीटो के भविष्य और उसके इस्तेमाल की संभावित सीमाओं पर भी बातचीत जारी रखने की प्रतिबद्धता दर्ज की गई। इसका महत्व इसलिए है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश यह नहीं कह रहे कि संस्था पुरानी हो चुकी है, इसलिए उसे खत्म कर दिया जाए। वे कह रहे हैं कि उसे बदलती दुनिया के अनुसार ढालने की जरूरत है। 2026 में भी सुरक्षा परिषद सुधार पर अंतर-सरकारी बातचीत जारी है। यानी बहस समाप्त नहीं हुई है, बल्कि चल रही है।
संकट का संकेत भी और सुधार का मौका भी
2026 संयुक्त राष्ट्र के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संस्था अपने 80वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। UN80 पहल इसी मौके पर शुरू की गई व्यापक सुधार प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य केवल खर्च घटाना नहीं है। इसमें यह भी देखा जा रहा है कि संयुक्त राष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों में कितना दोहराव है, कौन से पुराने काम जारी हैं, कौन से कामों को बेहतर ढंग से किया जा सकता है और संस्था की संरचना को भविष्य की जरूरतों के अनुसार कैसे बदला जाए। संयुक्त राष्ट्र की अपनी भाषा में मौजूदा व्यवस्था पर दबाव इतना बढ़ चुका है कि सुधार को टालना मुश्किल होता जा रहा है। मई 2026 में महासचिव ने UN80 की प्रगति रिपोर्ट जारी करते हुए मौजूदा स्थिति को अस्थिर बताते हुए सुधार को आगे बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया। इसका एक अर्थ यह भी है कि संयुक्त राष्ट्र खुद मान रहा है कि वह जिस तरह काम करता रहा है, उसी तरह हमेशा काम नहीं कर सकता। लेकिन यह संस्था के अंत की घोषणा नहीं है। बल्कि इसका उल्टा है। कोई संस्था खुद को बदलने की कोशिश तब करती है जब वह अपने अस्तित्व और भूमिका को बनाए रखना चाहती है।
2045 में संयुक्त राष्ट्र कैसा होगा?
2045 में संयुक्त राष्ट्र अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे करेगा। तब दुनिया 1945 से बहुत अलग होगी। तब सबसे बड़े सवाल केवल युद्ध और परमाणु हथियार नहीं होंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर हमले, अंतरिक्ष में बढ़ती गतिविधियां, जलवायु परिवर्तन, समुद्र का बढ़ता तापमान, सीमा-पार जल संकट, जैव सुरक्षा, वैश्विक असमानता और नई तकनीकों से पैदा होने वाले जोखिम भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में होंगे। इनमें से कई समस्याओं की सबसे बड़ी खासियत यह है कि उनका समाधान कोई एक देश अकेले नहीं कर सकता। किसी देश की सीमा के भीतर पैदा हुई आग को पड़ोसी देश की सीमा पर रोकना संभव नहीं हो सकता। जलवायु संकट पासपोर्ट नहीं देखता। महामारी सीमा पर रुकती नहीं। साइबर हमला कुछ सेकंड में दूसरे महाद्वीप तक पहुंच सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के शक्तिशाली मॉडल एक देश में बन सकते हैं लेकिन उनका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। यही वह क्षेत्र है जहां संयुक्त राष्ट्र की जरूरत खत्म होने के बजाय बढ़ भी सकती है। लेकिन जरूरत और प्रभावशीलता एक ही चीज नहीं हैं।
दुनिया को संयुक्त राष्ट्र की ज्यादा जरूरत हो सकती है, फिर भी देश उसके बाहर अपने हित साध सकते हैं। इसलिए अगले 20 से 30 वर्षों का सबसे बड़ा प्रश्न यही होगा कि क्या संयुक्त राष्ट्र नई वैश्विक समस्याओं के लिए प्रभावी साझा नियम बनाने की क्षमता विकसित कर पाता है।
भारत के लिए इसका क्या अर्थ है?
भारत के लिए संयुक्त राष्ट्र सुधार का सवाल केवल प्रतिष्ठा का विषय नहीं है। यह बदलती विश्व व्यवस्था में प्रतिनिधित्व का प्रश्न है। भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के विस्तार की मांग करता रहा है। उसके पीछे तर्क यह है कि वर्तमान परिषद में दुनिया की आज की राजनीतिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकता पर्याप्त रूप से दिखाई नहीं देती। लेकिन भारत के लिए संयुक्त राष्ट्र का महत्व केवल सुरक्षा परिषद की सीट तक सीमित नहीं है। भारत एक ऐसी बहुपक्षीय व्यवस्था में भी रुचि रखता है जिसमें विकासशील देशों की आवाज अधिक प्रभावी हो, वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार हो और नई तकनीक, जलवायु तथा विकास के मुद्दों पर निर्णय लेने में व्यापक भागीदारी हो। यही कारण है कि भारत जैसे देशों के लिए संयुक्त राष्ट्र का कमजोर होना अपने आप में लाभ की स्थिति नहीं होगी। अगर वैश्विक संस्था कमजोर होती है और उसके स्थान पर केवल बड़ी शक्तियों के छोटे-छोटे समूह निर्णय लेने लगते हैं, तो दुनिया का राजनीतिक संतुलन और जटिल हो सकता है। दूसरी तरफ यदि संयुक्त राष्ट्र सुधार के जरिए अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण संस्था बनता है तो भारत के लिए उसकी भूमिका कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
क्या ब्रिक्स या कोई दूसरा मंच संयुक्त राष्ट्र की जगह ले सकता है?
ब्रिक्स, जी-20 या क्षेत्रीय संगठन संयुक्त राष्ट्र के विकल्प के रूप में चर्चा में जरूर आते हैं, लेकिन अभी इन्हें उसका सीधा विकल्प मानना सही नहीं होगा। इन मंचों की अपनी सीमाएं और अपनी उपयोगिता हैं। कुछ आर्थिक सहयोग पर केंद्रित हैं, कुछ सुरक्षा पर, कुछ क्षेत्रीय मामलों पर। संयुक्त राष्ट्र का दायरा कहीं ज्यादा व्यापक है।अधिक संभावित तस्वीर यह है कि भविष्य में दुनिया एक ही संस्था से नहीं चलेगी। संयुक्त राष्ट्र वैश्विक स्तर का सबसे व्यापक मंच बना रह सकता है, जबकि उसके साथ कई क्षेत्रीय और बहुपक्षीय मंच अपनी-अपनी भूमिका निभाते रहेंगे। दुनिया शायद एक ऐसे ढांचे की ओर बढ़ रही है जिसमें शक्ति एक जगह केंद्रित नहीं होगी। सवाल यह होगा कि संयुक्त राष्ट्र उस बहुध्रुवीय दुनिया का केंद्रीय मिलन-बिंदु बना रहता है या नहीं।
संयुक्त राष्ट्र के सामने असली परीक्षा क्या होगी?
अगर अगला बड़ा युद्ध शुरू होता है और संयुक्त राष्ट्र केवल बैठकें आयोजित करता रह जाता है, जबकि असली समझौता कुछ शक्तिशाली देशों के बीच किसी दूसरे मंच पर होता है, तो उसकी राजनीतिक विश्वसनीयता को नुकसान होगा। अगर अगली महामारी आती है और देश फिर भी साझा नियम बनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र प्रणाली का इस्तेमाल करते हैं, तो उसकी भूमिका मजबूत होगी। अगर जलवायु संकट पर दुनिया को साझा व्यवस्था चाहिए और संयुक्त राष्ट्र बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण मंच बना रहता है, तो संस्था की प्रासंगिकता बनी रहेगी। अगर कृत्रिम बुद्धिमत्ता और साइबर तकनीक के लिए वैश्विक नियम बनाने में संयुक्त राष्ट्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, तो 21वीं सदी की नई समस्याओं के बीच उसका महत्व बढ़ सकता है। यानी संयुक्त राष्ट्र का भविष्य उसके पुराने इतिहास से कम और नई समस्याओं को हल करने की उसकी क्षमता से ज्यादा तय होगा।
क्या संयुक्त राष्ट्र समाप्त हो जाएगा?
निकट भविष्य में संयुक्त राष्ट्र के औपचारिक रूप से समाप्त हो जाने की संभावना के स्पष्ट संकेत नहीं हैं। इसके 193 सदस्य हैं, उसकी वैश्विक संस्थागत मौजूदगी बहुत व्यापक है और सदस्य देशों ने हाल के वर्षों में उसे खत्म करने के बजाय सुधारने की प्रतिबद्धता जताई है। 2024 का ‘पैक्ट फॉर द फ्यूचर’ और 2026 की UN80 पहल दोनों इसी दिशा की ओर संकेत करते हैं। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि उसका भविष्य सुरक्षित है। सबसे बड़ा खतरा संयुक्त राष्ट्र का बंद हो जाना नहीं, बल्कि उसका धीरे-धीरे ऐसा मंच बन जाना है जहां दुनिया बहस तो करे, लेकिन असली फैसले कहीं और हों। अगर ऐसा हुआ तो संयुक्त राष्ट्र का भवन रहेगा, झंडा रहेगा, महासभा चलेगी, शांति अभियान चलते रहेंगे और उसकी एजेंसियां दुनिया भर में काम करती रहेंगी। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण सवालों पर उसकी पकड़ कम होती जाएगी। दूसरी संभावना इससे बिल्कुल अलग है। सुरक्षा परिषद में वास्तविक सुधार हो, दुनिया के बदलते शक्ति संतुलन को प्रतिनिधित्व मिले, वित्तीय व्यवस्था स्थिर हो, महासभा की भूमिका मजबूत हो और नई तकनीक, जलवायु, साइबर तथा अंतरिक्ष जैसे विषयों पर प्रभावी वैश्विक नियम बनें। तब संयुक्त राष्ट्र खत्म नहीं होगा, बल्कि 1945 की संस्था से बदलकर 21वीं सदी की संस्था बन सकता है। इसलिए असली सवाल यह है कि जब 2045 में उसके 100 साल पूरे होंगे, तब दुनिया उसे किस रूप में देखेगी। एक ऐसी संस्था के रूप में, जिसने बदलती दुनिया के साथ खुद को बदल लिया? या फिर ऐसी संस्था के रूप में, जो कानूनी रूप से जीवित रही, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े फैसलों के केंद्र से धीरे-धीरे बाहर हो गई? संयुक्त राष्ट्र का भविष्य शायद इन दोनों में से किसी एक छोर पर तय नहीं होगा। ज्यादा संभव है कि आने वाली दुनिया में उसकी भूमिका कई क्षेत्रों में मजबूत और कुछ क्षेत्रों में कमजोर हो। लेकिन एक बात लगभग तय है: दुनिया को जितनी तेजी से नई समस्याएं घेर रही हैं, उतनी ही तेजी से उसे साझा नियमों और साझा मंचों की जरूरत भी बढ़ रही है।


