संयुक्त राष्ट्र संघ: युद्ध के बीच उसकी भूमिका, सीमाएँ और वास्तविकता

United Nations Role in War: युद्ध के समय संयुक्त राष्ट्र की भूमिका क्या होती है? जानिए सुरक्षा परिषद, वीटो शक्ति, महासचिव की सीमाएँ और वैश्विक राजनीति की वास्तविकता।

Yogesh Mishra
Published on: 3 March 2026 5:21 PM IST
United Nations Role in War
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United Nations Role in War (Image Credit-Social Media)

United Nations Role in War: जब भी दुनिया के किसी हिस्से में बड़ा युद्ध या गंभीर सैन्य टकराव होता है, तब सबसे पहला सवाल उठता है—संयुक्त राष्ट्र कहाँ है? वह कुछ कर क्यों नहीं रहा? आम लोगों को अक्सर लगता है कि संयुक्त राष्ट्र एक ऐसी वैश्विक संस्था है जो चाह ले तो युद्ध रोक सकती है। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। संयुक्त राष्ट्र कोई विश्व सरकार नहीं है। उसके पास अपनी स्थायी सेना नहीं है। और न ही वह किसी महाशक्ति पर आदेश थोप सकता है। उसकी शक्ति राजनीतिक, कूटनीतिक और नैतिक है—सैन्य नहीं। इसलिए बड़े शक्ति-संघर्षों में वह ‘कमज़ोर’ या ‘चुप’ दिखाई देता है, जबकि वास्तव में वह अपनी संरचनात्मक सीमाओं के भीतर सक्रिय रहता है।

संयुक्त राष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्था है सुरक्षा परिषद (UN Security Council)। यही वह मंच है जहाँ अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े फैसले लिए जाते हैं। लेकिन इसकी संरचना ही उसकी सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी दोनों है। इसमें पाँच स्थायी सदस्य—अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस—वीटो अधिकार रखते हैं। यदि इन पाँच में से कोई भी किसी प्रस्ताव के खिलाफ हो, तो वह प्रस्ताव रुक जाता है। इसका मतलब यह है कि जब संघर्ष में इन महाशक्तियों में से कोई सीधे शामिल हो या किसी पक्ष का मजबूत समर्थक हो, तो संयुक्त राष्ट्र निर्णायक कार्रवाई नहीं कर पाता। यही कारण है कि महाशक्तियों के टकराव वाले युद्धों में संयुक्त राष्ट्र अक्सर बयान देता है। अपील करता है। लेकिन बाध्यकारी सैन्य कदम नहीं उठा पाता।

संयुक्त राष्ट्र का ‘सही’ या ‘मूल’ रोल क्या है—यह समझना बेहद जरूरी है। उसका उद्देश्य युद्ध लड़ना नहीं। बल्कि युद्ध रोकने का प्रयास करना है। वह एक मंच है जहाँ विरोधी पक्ष संवाद कर सकते हैं। वह युद्धविराम प्रस्ताव लाने की कोशिश करता है। वह अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और नागरिक सुरक्षा की बात उठाता है। वह मानवीय सहायता यानि शरणार्थियों, घायलों, और विस्थापित लोगों के लिए एजेंसियों को सक्रिय करता है। जब युद्ध शुरू हो जाता है, तो संयुक्त राष्ट्र की प्राथमिक भूमिका लड़ाई रोकना नहीं। बल्कि लड़ाई को फैलने से रोकना और मानवीय क्षति कम करना बन जाती है।

जब हम पूछते हैं कि संयुक्त राष्ट्र अभी क्या कर रहा है? तो आम तौर पर उसका काम तीन स्तरों पर चलता है। पहला, सुरक्षा परिषद की आपात बैठकें बुलाना और सभी पक्षों से संयम की अपील करना। दूसरा, महासचिव के बयान—जो अक्सर युद्धविराम, अंतरराष्ट्रीय कानून और नागरिक सुरक्षा पर जोर देते हैं। तीसरा, मानवीय ढांचे को सक्रिय करना—यानी राहत सामग्री, शरणार्थी प्रबंधन, स्वास्थ्य सहायता, और अंतरराष्ट्रीय निगरानी। लेकिन यदि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य एकमत न हों, तो प्रस्ताव पारित होना कठिन हो जाता है। तब संयुक्त राष्ट्र बयान देने वाली संस्था जैसा प्रतीत होता है। जबकि वह वास्तव में सदस्य देशों की सहमति का बंधक होता है।

अब प्रश्न आता है—महासचिव सही हैं या गलत? यह प्रश्न नैतिक से अधिक राजनीतिक है। महासचिव का पद किसी देश के पक्ष में खड़ा होने के लिए नहीं है। उनका दायित्व है संतुलित भाषा का प्रयोग करना। सभी पक्षों से संयम की अपील करना। अंतरराष्ट्रीय कानून का स्मरण कराना। यदि वे एक पक्ष को कठोर शब्दों में दोष दें, तो दूसरा पक्ष उन्हें पक्षपाती घोषित कर सकता है। यदि वे संतुलित भाषा बोलें, तो आलोचक उन्हें कमज़ोर या निष्क्रिय कह सकते हैं। इसलिए महासचिव की भूमिका सीमित लेकिन संवेदनशील होती है। वे युद्ध रोकने के लिए नैतिक दबाव बनाते हैं, न कि सैन्य आदेश देते हैं।

क्या इसका अर्थ यह है कि संयुक्त राष्ट्र विफल है? पूरी तरह नहीं। इतिहास में संयुक्त राष्ट्र ने कई शांति-रक्षा मिशन चलाए हैं। युद्धविराम की निगरानी की है। शरणार्थियों को राहत दी है। और युद्ध अपराधों की जांच में सहयोग किया है। लेकिन जब संघर्ष में महाशक्तियाँ सीधे आमने-सामने हों, तब उसकी संरचनात्मक सीमाएँ स्पष्ट हो जाती हैं। वह वही कर सकता है जिसकी सदस्य राष्ट्र अनुमति दें।

अंततः संयुक्त राष्ट्र की चुप्पी अक्सर उसकी सीमित शक्ति का परिणाम होती है, न कि उसकी उदासीनता का। वह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का दर्पण है। यदि दुनिया विभाजित है, तो संयुक्त राष्ट्र भी विभाजित दिखेगा। यदि महाशक्तियाँ एकमत हों, तो संयुक्त राष्ट्र अत्यंत प्रभावी हो सकता है। इसलिए समस्या केवल संस्था की नहीं। बल्कि उस वैश्विक शक्ति-संतुलन की है जिसके भीतर वह काम करता है।

संयुक्त राष्ट्र युद्ध नहीं रोक सकता जब तक शक्तिशाली राष्ट्र स्वयं न चाहें। उसका काम हथियार उठाना नहीं, बल्कि संवाद, दबाव और मानवीय संतुलन बनाए रखना है। उसकी सीमाएँ स्पष्ट हैं। लेकिन उसकी अनुपस्थिति में वैश्विक अराजकता और भी अधिक हो सकती है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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