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दुनिया में हर जगह US बेस, लेकिन भारत में क्यों नहीं? वजह जानकर चौंक जाएंगे
US Military Bases Worldwide: जानिए अमेरिका के दुनिया भर में सैन्य बेस होने के बावजूद भारत में एक भी स्थायी बेस क्यों नहीं है और इसके पीछे क्या है भारत की रणनीति
US Military Bases Worldwide But Not In India
US Military Bases Worldwide But Not In India: दुनिया में अपनी सैन्य ताकत के लिए मशहूर अमेरिका ने यूरोप, एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व के कई देशों में अपने मिलिट्री बेस स्थापित कर रखे हैं। ये ठिकाने सिर्फ उसकी ताकत नहीं दिखाते, बल्कि उसकी वैश्विक रणनीति का हिस्सा भी होते हैं। लेकिन जब बात भारत की आती है, तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है। भारत जैसे बड़े और अहम देश में अमेरिका का एक भी स्थायी सैन्य ठिकाना नहीं है। यह सवाल इसलिए भी दिलचस्प हो जाता है क्योंकि दोनों देशों के बीच रिश्ते पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हैं। इसके बावजूद भारत अपनी जमीन पर किसी विदेशी सेना को स्थायी तौर पर जगह क्यों नहीं देता, आई इस बारे में जानते हैं विस्तार से-
रणनीतिक स्वायत्तता यानी फैसले अपने, दबाव किसी का नहीं
भारत की विदेश नीति का सबसे अहम आधार उसकी रणनीतिक स्वायत्तता है। इसका मतलब यह है कि भारत अपने फैसले किसी दूसरे देश के दबाव में आकर नहीं लेता। आजादी के बाद से ही भारत ने गुटनिरपेक्ष रहने की नीति अपनाई, ताकि वह किसी एक ताकत के साथ पूरी तरह न जुड़ जाए। किसी विदेशी देश को अपनी जमीन पर सैन्य ठिकाना देना इस सिद्धांत के खिलाफ माना जाता है, क्योंकि इससे यह संकेत जाता है कि देश किसी एक शक्ति के प्रभाव में है। भारत हमेशा यह दिखाना चाहता है कि वह स्वतंत्र रूप से अपने हितों के अनुसार निर्णय लेता है। यही वजह है कि दशकों से यह नीति लगातार बनी हुई है।
संप्रभुता का मुद्दा यानी जमीन पर पूरा नियंत्रण जरूरी
किसी भी देश के लिए उसकी जमीन और उस पर नियंत्रण सबसे बड़ी ताकत होती है। जब कोई विदेशी सेना किसी देश में स्थायी ठिकाना बनाती है, तो कई बार उसे विशेष अधिकार मिलते हैं, जिससे स्थानीय सरकार का नियंत्रण सीमित हो सकता है। भारत इस तरह की व्यवस्था को स्वीकार नहीं करना चाहता। वह अपनी जमीन पर पूरी तरह खुद का नियंत्रण बनाए रखना चाहता है। इसलिए वह किसी भी विदेशी सैन्य ठिकाने को अनुमति देने से बचता है। भारत के लिए संप्रभुता सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि उसकी नीति का मूल है।
सुरक्षा का जोखिम - युद्ध में बन सकता है निशाना
जहां-जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने होते हैं, वहां युद्ध या तनाव के समय खतरा भी बढ़ जाता है। मध्य पूर्व में कई बार ऐसा देखा गया है कि अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले हुए हैं। भारत इस तरह के खतरे से दूर रहना चाहता है। अगर भारत में अमेरिकी बेस होता, तो वह भी उन देशों की सूची में आ सकता था जो अमेरिका के विरोधियों के निशाने पर रहते हैं। भारत अपनी जमीन को किसी अंतरराष्ट्रीय संघर्ष का हिस्सा नहीं बनाना चाहता, इसलिए वह इस तरह के जोखिम से बचता है।
संतुलित विदेश नीति यानी सबके साथ संबंध, किसी पर निर्भरता नहीं
भारत की विदेश नीति की एक खास बात यह है कि वह सभी बड़ी ताकतों के साथ संतुलन बनाकर चलता है। अमेरिका के साथ उसके रिश्ते मजबूत हो रहे हैं, लेकिन रूस के साथ उसके पुराने रक्षा संबंध भी कायम हैं। इसके अलावा चीन के साथ प्रतिस्पर्धा होने के बावजूद संवाद भी जारी रहता है। अगर भारत अमेरिका को अपने यहां सैन्य ठिकाना बनाने की अनुमति देता है, तो इससे यह संतुलन बिगड़ सकता है। इससे अन्य देशों के साथ रिश्तों में तनाव आ सकता है। भारत इस स्थिति से बचना चाहता है और इसलिए वह किसी एक देश के साथ पूरी तरह जुड़ने से परहेज करता है।
आत्मनिर्भर सैन्य ताकत
भारत आज दुनिया की बड़ी सैन्य शक्तियों में शामिल है। उसकी सेना, वायुसेना और नौसेना लगातार मजबूत हो रही हैं। इसके साथ ही भारत के पास परमाणु क्षमता भी है, जो उसकी सुरक्षा को और मजबूत बनाती है।
भारत अब अपने रक्षा उपकरण खुद बनाने पर भी जोर दे रहा है। आत्मनिर्भर भारत के तहत कई आधुनिक हथियार और तकनीक देश में ही विकसित की जा रही हैं। ऐसे में भारत को अपनी सुरक्षा के लिए किसी विदेशी सेना या बेस की जरूरत नहीं पड़ती।
बिना बेस के भी मजबूत हैं भारत-अमेरिका संबंध
यह समझना जरूरी है कि भारत में अमेरिकी बेस न होने का मतलब यह नहीं है कि दोनों देशों के बीच दूरी है। वास्तव में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग काफी मजबूत है।
दोनों देशों के बीच हुए समझौते उन्हें एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं का सीमित उपयोग करने की अनुमति देते हैं, जैसे ईंधन भरना, मरम्मत करना या अन्य लॉजिस्टिक जरूरतों को पूरा करना। इसके अलावा दोनों देश नियमित रूप से संयुक्त सैन्य अभ्यास भी करते हैं। इस तरह भारत अपनी नीति से समझौता किए बिना अमेरिका के साथ मजबूत संबंध बनाए रखता है।
अमेरिका के बेस कहां और क्यों होते हैं
अमेरिका आमतौर पर उन्हीं देशों में अपने सैन्य ठिकाने बनाता है जहां उसका सैन्य गठबंधन होता है या जहां उसे रणनीतिक जरूरत होती है। जैसे जापान और जर्मनी में उसके ठिकाने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बने, जबकि मध्य पूर्व में उसकी मौजूदगी सुरक्षा और संसाधनों से जुड़ी है।
भारत इन परिस्थितियों में फिट नहीं बैठता। भारत न तो अमेरिका के किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा है और न ही ऐसा देश है जहां अमेरिका को अपनी सेना तैनात करने की जरूरत हो। भारत खुद एक मजबूत और स्वतंत्र शक्ति है।
बदलते वैश्विक हालात में भारत और अमेरिका के रिश्ते और मजबूत हो रहे हैं। खासकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में दोनों देश कई मुद्दों पर साथ काम कर रहे हैं।
फिर भी भारत भविष्य में भी किसी विदेशी सैन्य ठिकाने को अपनी जमीन पर अनुमति नहीं देगा उसकी जगह संयुक्त अभ्यास, तकनीकी साझेदारी और लॉजिस्टिक सहयोग के नए तरीके जरूर सामने आएंगे।
भारत और अमेरिका के बीच संबंध लगातार बेहतर हो रहे हैं, लेकिन यह रिश्ता बराबरी और सम्मान पर आधारित है। भारत साफ तौर पर यह दिखाना चाहता है कि वह सहयोग के लिए तैयार है, लेकिन अपने फैसलों पर उसका पूरा नियंत्रण रहेगा।


