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400 उड़ानें, 1 लाख टन हथियार और 65 लाख किलो गोला-बारूद! ईरान पर ट्रंप का सबसे खौफनाक प्लान लीक, दहल जाएगी दुनिया
Donald Trump Iran attack plan: मिडल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ बड़े सैन्य विकल्पों की समीक्षा की है। इजरायल को भारी मात्रा में हथियार सप्लाई और होर्मुज संकट के चलते दुनिया में युद्ध की आशंका बढ़ गई है।
Donald Trump Iran attack plan: मिडल ईस्ट की धरती एक बार फिर बारूद के ढेर पर खड़ी नजर आ रही है। ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा तनाव अब उस मोड़ पर पहुंच गया है, जहां से वापसी का रास्ता केवल युद्ध की ओर जाता दिख रहा है। ताजा खबरों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर एक निर्णायक और बड़ा हमला करने की तैयारी में हैं। गुरुवार को हुई एक बेहद गुप्त और उच्चस्तरीय बैठक ने इन आशंकाओं को हकीकत में बदल दिया है। इस बैठक में यूएस सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के कमांडर ब्रैड कूपर और जॉइंट चीफ्स के चेयरमैन ने राष्ट्रपति ट्रंप को युद्ध की नई योजनाओं पर विस्तार से ब्रीफिंग दी। महज 45 मिनट चली इस मीटिंग ने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों के कान खड़े कर दिए हैं क्योंकि यह संकेत है कि ट्रंप अब ईरान के साथ चल रहे इस गतिरोध को बलपूर्वक खत्म करने का मन बना चुके हैं।
तीन नई युद्ध योजनाएं: ईरान के बुनियादी ढांचे को दहलाने की तैयारी
एक्सियोस (Axios) की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने ट्रंप के सामने हमले की तीन अलग-अलग रणनीतियां पेश की हैं। इनमें से एक योजना बेहद खतरनाक है, जिसे "छोटी और जोरदार" हमलों की लहर कहा जा रहा है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य ईरान के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों, जैसे बिजली संयंत्रों, तेल रिफाइनरियों और संचार केंद्रों को पलक झपकते ही तहस-नहस करना है। अमेरिकी सेना को उम्मीद है कि जब आसमान से बमों की बारिश होगी, तो तेहरान की सरकार घुटनों पर आ जाएगी। अमेरिका चाहता है कि इस दबाव के जरिए ईरान को परमाणु मुद्दे पर बातचीत की मेज पर लाया जाए और उसे अपनी शर्तों पर झुकने के लिए मजबूर किया जाए। यह रणनीति साफ दिखाती है कि अमेरिका अब कूटनीति के बजाय सैन्य शक्ति के इस्तेमाल को प्राथमिकता दे रहा है।
इजरायल की जबरदस्त 'किलेबंदी': 6,500 टन गोला-बारूद की खेप
युद्ध की इन आहटों के बीच अमेरिका ने अपने सबसे भरोसेमंद साथी इजरायल को हथियारों से पाट दिया है। पिछले महज 24 घंटों के भीतर अमेरिका से दो विशाल मालवाहक जहाज और कई सैन्य विमान इजरायल पहुंचे हैं। इनमें करीब 6,500 टन (65 लाख किलोग्राम) घातक गोला-बारूद, अत्याधुनिक सैन्य ट्रक और जॉइंट लाइट टैक्टिकल व्हीकल्स (JLTVs) शामिल हैं। 'द इजरायल टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायली रक्षा मंत्रालय इस बड़ी सैन्य मदद को अपने 'ऑपरेशन रोरिंग लायन' का हिस्सा मान रहा है। फरवरी के अंत से लेकर अब तक अमेरिका इजरायल को 400 से ज्यादा उड़ानों के जरिए 1 लाख टन से भी ज्यादा युद्ध सामग्री भेज चुका है। इतनी बड़ी मात्रा में हथियारों की सप्लाई इस बात का स्पष्ट सबूत है कि आने वाले दिनों में पूरा क्षेत्र एक भीषण सैन्य अभियान का गवाह बन सकता है।
होर्मुज समुद्री मार्ग पर कब्जे का प्लान और जमीनी सेना का खतरा
सेंट्रल कमांड ने ट्रंप के सामने एक और साहसिक योजना रखी है, जिसमें दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक समुद्री मार्ग 'स्ट्रैट ऑफ होर्मुज' के एक हिस्से पर कब्जा करना शामिल है। ईरान ने फिलहाल इस रास्ते को बाधित कर रखा है, जिससे वैश्विक तेल सप्लाई और व्यापार पर बुरा असर पड़ा है। ट्रंप इस रास्ते को व्यावसायिक जहाजों के लिए फिर से खोलने पर अड़े हैं। हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस समुद्री मार्ग पर नियंत्रण पाने के लिए केवल हवाई हमले काफी नहीं होंगे, बल्कि अमेरिका को वहां अपनी जमीनी सेना (Ground Troops) भी उतारनी पड़ सकती है। अगर ऐसा होता है, तो यह युद्ध और भी लंबा और खूनी खिंच सकता है। ट्रंप फिलहाल ईरान के बंदरगाहों की नाकेबंदी को अपनी सबसे बड़ी ताकत मान रहे हैं, लेकिन अगर ईरान ने लचीला रुख नहीं अपनाया, तो वह 'मिलिट्री एक्शन' का बटन दबाने में देर नहीं करेंगे।
क्या परमाणु मुद्दे पर झुकेगा ईरान?
अमेरिकी रणनीतिकारों का मानना है कि सैन्य हमले का डर ईरान को अपनी परमाणु नीतियों में बदलाव करने पर मजबूर कर देगा। अमेरिका की नाकेबंदी की वजह से ईरान पहले ही आर्थिक तंगी और ईंधन की किल्लत से जूझ रहा है। अब बमबारी की धमकी के जरिए ट्रंप प्रशासन यह संदेश देना चाहता है कि या तो ईरान उनकी शर्तों पर शांति समझौता करे या फिर अपने अस्तित्व को खतरे में डाले। इस पूरे घटनाक्रम ने वैश्विक बाजार में भी हलचल मचा दी है क्योंकि तेल की कीमतों में उछाल आने की आशंका बढ़ गई है। 1 मई की इस बड़ी खबर ने साफ कर दिया है कि दुनिया शांति और युद्ध के बीच एक बेहद महीन लकीर पर खड़ी है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि क्या मिडल ईस्ट एक और महाविनाशकारी युद्ध की आग में झोंका जाएगा या कूटनीति की कोई आखिरी उम्मीद अभी बाकी है।


