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अमेरिका से इस्राइल तक सत्ता से नाराज जनता, ट्रंप से दूर युवा तो नेतन्याहू पर बहुमत का संकट
Trump Netanyahu Political Crisis: अमेरिका में ट्रंप से युवाओं की नाराजगी और इस्राइल में नेतन्याहू के गठबंधन पर बहुमत का संकट, महंगाई और युद्ध बने चुनाव के प्रमुख मुद्दे।
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Trump Netanyahu Political Crisis: दुनिया की राजनीति और पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित करने वाले दो महत्वपूर्ण चुनावों की उलटी गिनती शुरू हो गई है। अमेरिका में तीन नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आर्थिक और विदेश नीतियों को लेकर मतदाताओं की नाराजगी बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। दूसरी ओर, इस्राइल में 27 अक्टूबर को होने वाले संसदीय चुनाव से पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को अपनी सत्ता के लिए कठिन राजनीतिक समीकरणों का सामना करना पड़ रहा है। दोनों देशों में परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन चुनावी बहस के केंद्र में महंगाई, युद्ध, राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक नेतृत्व की विश्वसनीयता जैसे मुद्दे हैं। अमेरिका में विशेष रूप से युवा मतदाताओं का बदलता रुख रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनौती बनकर उभरा है, जबकि इस्राइल में दक्षिणपंथी दलों के बीच मतों का बंटवारा और विपक्षी दलों का उभार नई सरकार के गठन को जटिल बना रहा है।
अमेरिका में 21 अक्टूबर को जारी न्यूयॉर्क टाइम्स और सिएना विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय सर्वेक्षण ने राष्ट्रपति ट्रंप के प्रति बढ़ती असंतुष्टि को रेखांकित किया है। तीन हजार से अधिक मतदाताओं पर आधारित इस सर्वेक्षण में 36 प्रतिशत लोगों ने राष्ट्रपति के कामकाज को स्वीकृति दी, जबकि 59 प्रतिशत ने असहमति व्यक्त की। जीवनयापन की बढ़ती लागत से निपटने के मामले में केवल 29 प्रतिशत मतदाता उनके कामकाज से संतुष्ट मिले, जबकि 69 प्रतिशत ने असंतोष जताया। पेट्रोल की कीमतों के मामले में यह अंतर और अधिक था। यहां 24 प्रतिशत लोगों ने ट्रंप की नीतियों का समर्थन किया, जबकि 73 प्रतिशत असंतुष्ट थे। सर्वेक्षण में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को राष्ट्रीय स्तर पर दस प्रतिशत अंकों की बढ़त मिली है। हालांकि यह राष्ट्रीय जनमत का संकेत है, प्रत्येक संसदीय क्षेत्र के चुनाव परिणाम का पूर्वानुमान नहीं। 
दो साल में बदला युवा मतदाताओं का रुख, ट्रंप के लिए बढ़ी चुनौती
अमेरिकी राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव 18 से 29 वर्ष के मतदाताओं के बीच दिखाई दे रहा है। वर्ष 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में युवा मतदाताओं, विशेष रूप से युवा पुरुषों के एक हिस्से में ट्रंप ने अपना समर्थन बढ़ाया था। आर्थिक अवसरों, रोजगार, आव्रजन नियंत्रण और महंगाई कम करने के वादों ने उन्हें आकर्षित किया था। लेकिन राष्ट्रपति के रूप में दूसरे कार्यकाल के लगभग दो वर्षों बाद सामने आए सर्वेक्षणों में इस आयु वर्ग के भीतर उनकी लोकप्रियता में गिरावट के संकेत हैं।
न्यूयॉर्क टाइम्स और सिएना के सर्वेक्षण संबंधी रिपोर्टों में बताया गया है कि युवा मतदाताओं के बीच डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रति झुकाव बढ़ा है। विभिन्न सर्वेक्षणों में ट्रंप के कामकाज को स्वीकृति देने वाले युवाओं का अनुपात अलग-अलग है। सितंबर में प्रकाशित कुछ सर्वेक्षणों में यह लगभग 20 से 31 प्रतिशत के बीच रहा। युवा महिलाओं के बीच रिपब्लिकन समर्थन विशेष रूप से कमजोर दिखाई दिया, जबकि युवा पुरुषों में दोनों दलों के समर्थन के बीच अंतर अपेक्षाकृत कम था। 
हार्वर्ड विश्वविद्यालय के युवा मतदाता सर्वेक्षण ने भी इस बदलाव को उजागर किया है। 30 सितंबर से सात अक्टूबर के बीच किए गए सर्वेक्षण में मध्यावधि चुनाव में मतदान करने की संभावना रखने वाले 18 से 29 वर्ष के युवाओं में 63 प्रतिशत ने कहा कि मतदान की उनकी प्रमुख प्रेरणा ट्रंप और उनकी नीतियों का विरोध है। इसके विपरीत 14 प्रतिशत ने ट्रंप का समर्थन अपने मतदान की प्रमुख वजह बताया। लगभग 17 प्रतिशत ने कहा कि ट्रंप उनके मतदान निर्णय का प्रमुख कारक नहीं हैं। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि युवा मतदाताओं के एक बड़े हिस्से के लिए चुनाव सामान्य दलगत प्रतिस्पर्धा से आगे बढ़कर राष्ट्रपति की नीतियों के मूल्यांकन का अवसर बन गया है। 
विशेषज्ञों के अनुसार युवा मतदाताओं की इस नाराजगी का एक बड़ा कारण आर्थिक असुरक्षा है। रोजगार मिलने के बावजूद आवास, किराया, स्वास्थ्य सेवाओं, परिवहन और रोजमर्रा की आवश्यकताओं पर बढ़ता खर्च उनकी बचत और जीवन स्तर को प्रभावित कर रहा है। कई युवा मतदाता यह मानते हैं कि आर्थिक सुधार के राजनीतिक दावों का लाभ उनकी व्यक्तिगत जिंदगी तक नहीं पहुंचा है। महंगाई के साथ शिक्षा का खर्च और भविष्य में घर खरीद पाने की चिंता भी उनकी राजनीतिक प्राथमिकताओं को प्रभावित कर रही है।
ईरान युद्ध ने बढ़ाई मुश्किलें, विदेश नीति भी चुनावी मुद्दा
राष्ट्रपति ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट के पीछे घरेलू आर्थिक परिस्थितियों के अलावा ईरान के साथ युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव को भी महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। युद्ध से जुड़ी सैन्य कार्रवाइयों, अमेरिका की भूमिका और उसके आर्थिक परिणामों पर मतदाताओं के बीच असहमति सामने आई है। पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने और पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों पर दबाव बढ़ने ने अमेरिकी घरेलू राजनीति में भी इस मुद्दे को प्रमुखता दी है।
न्यूयॉर्क टाइम्स-सिएना सर्वेक्षण में ईरान युद्ध पर ट्रंप के कामकाज को लेकर भी नकारात्मक प्रतिक्रिया दर्ज हुई है। यह राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि राष्ट्रपति के समर्थकों के एक हिस्से ने वर्ष 2024 में अमेरिका को विदेशी युद्धों से दूर रखने और घरेलू अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता देने की उम्मीद के साथ उनका समर्थन किया था। अब युद्ध के आर्थिक और सामरिक परिणामों को लेकर मतभेद उभर रहे हैं।
युद्ध की वास्तविक सैन्य लागत, ऊर्जा बाजार में उसके प्रभाव तथा अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दबाव का व्यापक आकलन अभी भी विभिन्न संस्थाएं कर रही हैं। इसलिए संघर्ष के सभी आर्थिक परिणामों को केवल एक नीति या निर्णय से जोड़ना उचित नहीं होगा। लेकिन चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मतदाता विदेश नीति को अपनी घरेलू आर्थिक परेशानियों से जोड़कर देख रहे हैं।
रूस के प्रति नीति में बदलाव पर भी उठ रहे सवाल
ईरान युद्ध और ऊर्जा संकट के बीच ट्रंप प्रशासन की रूस नीति भी अमेरिकी राजनीतिक बहस का हिस्सा बनी हुई है। राष्ट्रपति ट्रंप ने यूक्रेन युद्ध समाप्त कराने और रूस के साथ बातचीत आगे बढ़ाने को अपनी विदेश नीति की प्राथमिकताओं में शामिल किया था। हालांकि रूस और यूक्रेन के बीच स्थायी शांति स्थापित करने की कोशिशों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली है।
ऊर्जा बाजार में स्थिरता लाने और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति बनाए रखने के प्रयासों के बीच रूस से संबंधित प्रतिबंधों तथा ऊर्जा व्यापार पर अमेरिकी रुख चर्चा में रहा है। आलोचकों का तर्क है कि प्रतिबंधों में ढील या रूस के साथ आर्थिक संपर्क बढ़ाने से मॉस्को की सौदेबाजी की स्थिति मजबूत हो सकती है। दूसरी ओर, इस नीति के समर्थक इसे ऊर्जा कीमतों और कूटनीतिक संवाद के संदर्भ में देखते हैं।
अमेरिकी चुनाव में रूस नीति का असर केवल यूक्रेन युद्ध तक सीमित नहीं है। मतदाताओं के सामने यह प्रश्न भी है कि विदेशों में अमेरिकी रणनीतिक भूमिका बनाए रखने की आर्थिक कीमत कितनी होनी चाहिए और राष्ट्रपति की नीतियां देश के नागरिकों को क्या प्रत्यक्ष लाभ पहुंचा रही हैं।
प्रतिनिधि सभा में बदलाव हुआ तो ट्रंप की मुश्किलें कैसे बढ़ेंगी?
तीन नवंबर का चुनाव अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए नहीं, बल्कि कांग्रेस के लिए है। अमेरिका की प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की नियमित चुनाव वाली लगभग एक-तिहाई सीटों के लिए मतदान होगा। कई राज्यों में राज्यपाल तथा अन्य पदों के चुनाव भी होंगे। इस प्रक्रिया को मध्यावधि चुनाव कहा जाता है, क्योंकि यह राष्ट्रपति के चार वर्षीय कार्यकाल के बीच आयोजित होती है।
चुनाव के परिणाम ट्रंप के शेष राष्ट्रपति कार्यकाल में उनकी विधायी प्राथमिकताओं और प्रशासनिक जवाबदेही को प्रभावित कर सकते हैं। यदि डेमोक्रेटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल करती है, तो बजट और नए विधेयकों को पारित कराना रिपब्लिकन प्रशासन के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। सदन की समितियां सरकारी नीतियों, प्रशासनिक फैसलों और वित्तीय गतिविधियों पर सुनवाई तथा जांच भी कर सकती हैं।
हालांकि राष्ट्रपति के संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं होंगे। ट्रंप के पास कानूनों पर वीटो लगाने और अपने वैधानिक कार्यकारी अधिकारों का उपयोग करने की शक्ति बनी रहेगी। उच्चस्तरीय नियुक्तियों और संधियों से जुड़े सीनेट के अधिकार भी उसके चुनाव परिणाम तथा वहां के राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करेंगे। केवल प्रतिनिधि सभा में विपक्षी बहुमत होने से राष्ट्रपति की सभी नियुक्तियां नहीं रुकतीं।
मध्यावधि चुनाव वर्ष 2028 के राष्ट्रपति चुनाव की राजनीतिक तैयारियों को भी प्रभावित कर सकता है। रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भविष्य के नेतृत्व और डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर नए उम्मीदवारों की राजनीतिक स्थिति पर नवंबर के परिणामों का असर पड़ सकता है। लेकिन चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में बढ़त को वास्तविक चुनाव परिणाम मानना जल्दबाजी होगी।
इस्राइल में नेतन्याहू की सत्ता के सामने गठबंधन का संकट
अमेरिका की तरह इस्राइल में भी चुनावी राजनीति पर युद्ध और अर्थव्यवस्था की गहरी छाप है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाली लिकुड पार्टी को 27 अक्टूबर के संसदीय चुनाव में विपक्षी दलों के साथ-साथ अपने राजनीतिक खेमे के भीतर मतों के बंटवारे की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। इस्राइल की 120 सदस्यीय संसद नेसेट में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है। किसी एक दल के लिए इतनी सीटें जीतना असामान्य है। यही वजह है कि चुनाव से पहले और बाद में गठबंधन की राजनीति सरकार गठन में निर्णायक भूमिका निभाती है।
इस्राइल के ताजा जनमत सर्वेक्षणों के आंकड़े भी जटिल राजनीतिक स्थिति की ओर संकेत कर रहे हैं। 22 अक्टूबर तक नौ सर्वेक्षण संस्थाओं के आंकड़ों के एक संकलन में नेतन्याहू समर्थक दलों को औसतन लगभग 53 सीटें मिलती दिखाई गई हैं, जबकि नेतन्याहू विरोधी यहूदीवादी दलों का औसत लगभग 49 सीट है। अरब दलों और अन्य राजनीतिक समूहों की स्थिति अलग है। अलग-अलग सर्वेक्षणों में नेतन्याहू के राजनीतिक खेमे का आंकड़ा 48 से 62 सीटों तक दिखाई देता है। इससे स्पष्ट है कि किसी एक सर्वेक्षण को अंतिम जनादेश नहीं माना जा सकता। 
नेतन्याहू के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि दक्षिणपंथी मतदाताओं का समर्थन अनेक दलों में विभाजित है। उनकी लिकुड पार्टी के अतिरिक्त इतामार बेन-ग्विर की ओत्जमा यहुदित, धार्मिक यहूदी दल शास और यूनाइटेड तोरा जूडाइज्म तथा अन्य दक्षिणपंथी राजनीतिक समूह भी चुनाव मैदान में हैं। ऐसे में नेतन्याहू अपने समर्थक मतदाताओं को छोटे दलों की बजाय प्रभावी गठबंधन सहयोगियों के पक्ष में मतदान करने का संदेश दे रहे हैं।
1992 की याद दिलाकर छोटे दलों के मतदाताओं को साधने की कोशिश
नेतन्याहू अपने चुनाव प्रचार में वर्ष 1992 के संसदीय चुनाव की परिस्थितियों का उल्लेख कर रहे हैं। उस चुनाव में दक्षिणपंथी राजनीतिक खेमे के भीतर मतों के विभाजन ने सरकार गठन के समीकरणों को प्रभावित किया था और यित्जाक राबिन के नेतृत्व में लेबर पार्टी की सरकार बनी थी। नेतन्याहू मतदाताओं को आगाह कर रहे हैं कि छोटे राजनीतिक दलों को मिलने वाले वोट यदि संसदीय प्रतिनिधित्व में नहीं बदल पाए, तो इससे उनके व्यापक राजनीतिक खेमे की सीटों की संख्या प्रभावित हो सकती है।
इस्राइल की चुनाव प्रणाली में किसी पार्टी को संसद में प्रवेश पाने के लिए कम से कम 3.25 प्रतिशत वैध मत प्राप्त करने होते हैं। इससे कम वोट पाने वाली पार्टी को कोई सीट नहीं मिलती। यही नियम छोटे दलों को महत्वपूर्ण बनाता है, क्योंकि संसदीय प्रतिनिधित्व की सीमा पार न कर पाने वाले दलों के वोट किसी दूसरे दल की सीटों में स्थानांतरित नहीं होते।
नेतन्याहू की पार्टी ने छोटे दलों को चुनाव मैदान से हटाने के प्रयासों के साथ उनके मतदाताओं तक सीधे पहुंचने की रणनीति भी अपनाई है। ओफर विंटर की अम्खा इस्राइल पार्टी और अन्य छोटे राजनीतिक समूहों का उल्लेख इस संदर्भ में किया जा रहा है। छोटे दलों की उपस्थिति से गठबंधन की कुल सीटों पर पड़ने वाला प्रभाव नेतन्याहू के चुनाव अभियान का प्रमुख विषय बन गया है।
इस्राइल में विपक्ष भी कई हिस्सों में विभाजित है। पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाली याशार पार्टी, पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट और याइर लापिद से जुड़े राजनीतिक समूह तथा अन्य विपक्षी दल नेतन्याहू के विकल्प के रूप में मतदाताओं का समर्थन मांग रहे हैं। लेकिन विपक्षी दलों की कुल सीटों और चुनाव के बाद उनके बीच संभावित सहयोग को एक ही बात नहीं माना जा सकता। सरकार गठन के लिए केवल नेतन्याहू का विरोध पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि आवश्यक बहुमत पर राजनीतिक सहमति भी बनानी होगी। 
ईरान के खिलाफ सख्त रुख बना नेतन्याहू के प्रचार का प्रमुख मुद्दा
नेतन्याहू की चुनावी रणनीति में राष्ट्रीय सुरक्षा और ईरान के प्रति कठोर नीति को विशेष स्थान मिला है। उन्होंने ईरान की मौजूदा शासन व्यवस्था को इस्राइल की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बताया है। नेतन्याहू का तर्क है कि ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमताओं के साथ-साथ उसके सहयोगी सशस्त्र संगठनों की गतिविधियां क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित करती हैं।
22 अक्टूबर को सामने आई रिपोर्टों के अनुसार नेतन्याहू ने ईरानी शासन को हटाए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनके इस रुख को चुनावी अभियान के साथ-साथ इस्राइल की दीर्घकालिक क्षेत्रीय सुरक्षा रणनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। हालांकि आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि लंबे संघर्ष ने इस्राइल की आंतरिक सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और नागरिक जीवन पर क्या प्रभाव डाला है। 
ईरान का प्रश्न नेतन्याहू के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस्राइल में राष्ट्रीय सुरक्षा लंबे समय से चुनावी राजनीति का केंद्रीय मुद्दा रही है। सात अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद उत्पन्न परिस्थितियों, गाजा युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़े सैन्य संघर्षों ने मतदाताओं की प्राथमिकताओं को गहराई से प्रभावित किया है। नेतन्याहू अपनी सरकार की सैन्य कार्रवाइयों और सुरक्षा नीतियों को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, जबकि विपक्ष उनसे सुरक्षा संबंधी विफलताओं और युद्ध के परिणामों पर जवाब मांग रहा है।
चुनावों के बाद ईरान पर नए हमले की संभावना, अमेरिका और इस्राइल में चर्चा
अमेरिका और इस्राइल के चुनावों के बीच ईरान पर संभावित नई सैन्य कार्रवाई का प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो गया है। 22 अक्टूबर को अमेरिकी सार्वजनिक प्रसारक एनपीआर ने इस विषय की जानकारी रखने वाले एक व्यक्ति के हवाले से बताया कि दोनों देशों के सैन्य अधिकारी नवंबर की शुरुआत में संभावित कार्रवाई की तैयारी कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार पहले अक्टूबर के मध्य में हमले के विकल्प पर विचार हुआ था, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने उस समय कार्रवाई के पक्ष में सहमति नहीं दी।
नई संभावित सैन्य कार्रवाई का समय दोनों देशों के चुनाव संपन्न होने के बाद का बताया जा रहा है। हालांकि सैन्य योजना तैयार करने और हमला करने का अंतिम राजनीतिक निर्णय दो अलग बातें हैं। उपलब्ध रिपोर्टों से यह निश्चित नहीं होता कि नवंबर में हमला किया ही जाएगा। सैन्य तैयारियों का उद्देश्य ईरान पर कूटनीतिक दबाव बढ़ाना भी हो सकता है। 
इस विषय में ट्रंप और नेतन्याहू के बीच मतभेद भी सामने आए हैं। अक्टूबर के मध्य में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार नेतन्याहू चुनाव से पहले ईरान के खिलाफ नई कार्रवाई पर विचार कर रहे थे, जबकि ट्रंप ने अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले संघर्ष बढ़ाने के प्रति अनिच्छा दिखाई। इस्राइली प्रधानमंत्री कार्यालय ने चुनाव से पहले हमले के लिए दबाव बनाने संबंधी एक रिपोर्ट का खंडन किया था। बाद में नेतन्याहू ने भी सार्वजनिक रूप से कहा कि वह मतदान से पहले ईरान पर पूर्वनियोजित हमला करने के पक्ष में नहीं हैं। 
इन घटनाक्रमों के बीच ट्रंप ने नेतन्याहू की चुनावी उम्मीदवारी का सार्वजनिक समर्थन किया है। हालांकि इस्राइल के विपक्षी नेताओं ने स्पष्ट किया है कि देश की अगली सरकार का निर्णय इस्राइली नागरिकों को करना है। इस स्थिति ने अमेरिका और इस्राइल के राजनीतिक संबंधों में एक नया पहलू जोड़ा है, क्योंकि दोनों देशों के नेतृत्व के बीच विदेश नीति पर सहयोग और राजनीतिक प्राथमिकताओं में अंतर एक साथ दिखाई दे रहे हैं। 
महंगाई और जीवनयापन का खर्च इस्राइल में भी बड़ा मुद्दा
नेतन्याहू के लिए केवल राष्ट्रीय सुरक्षा ही चुनावी चुनौती नहीं है। इस्राइल में महंगाई, आवास की कीमतें और नागरिकों पर बढ़ता आर्थिक बोझ भी राजनीतिक बहस में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। युद्ध और सुरक्षा पर होने वाले खर्च के साथ सामान्य नागरिकों की आर्थिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन का प्रश्न लगातार उठ रहा है।
इस्राइल की अर्थव्यवस्था ने पिछले दशकों में तकनीकी उद्योग, नवाचार और निर्यात के माध्यम से उल्लेखनीय विकास किया है। इसके बावजूद नागरिकों के एक हिस्से को आवास, खाद्य पदार्थों और अन्य आवश्यक सेवाओं की बढ़ती कीमतों का सामना करना पड़ रहा है। आर्थिक विकास के राष्ट्रीय आंकड़ों और आम परिवार की वास्तविक क्रयशक्ति के बीच अंतर चुनावी विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
विपक्षी राजनीतिक दल इन परिस्थितियों को नेतन्याहू सरकार की आर्थिक प्राथमिकताओं से जोड़कर प्रस्तुत कर रहे हैं। दूसरी ओर, सरकार समर्थक दल युद्धकालीन सुरक्षा आवश्यकताओं और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को अपनी नीतियों का आधार बताते हैं। चुनाव में यह मुद्दा विशेष रूप से उन मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ अपने दैनिक जीवन की आर्थिक चुनौतियों को भी प्राथमिकता देते हैं।
ईरान का संकट और दो चुनावों का संबंध
अमेरिका और इस्राइल के इन चुनावों की सबसे महत्वपूर्ण समानता यह है कि दोनों देशों की राजनीतिक बहस पर ईरान के साथ सैन्य संघर्ष का प्रभाव दिखाई देता है। अमेरिकी मतदाताओं के लिए युद्ध के साथ ईंधन की कीमतों, सरकारी खर्च और विदेशी सैन्य हस्तक्षेप के प्रश्न जुड़े हुए हैं। इस्राइली मतदाताओं के लिए ईरान राष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और सरकार की सैन्य रणनीति से संबंधित मुद्दा है।
23 अक्टूबर को होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकरों पर हमलों की नई रिपोर्टों ने पश्चिम एशिया में तनाव को और बढ़ा दिया है। इस सामरिक समुद्री मार्ग में असुरक्षा का असर वैश्विक तेल परिवहन और ऊर्जा बाजारों पर पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र ने क्षेत्र में तनाव कम करने और कूटनीतिक प्रयासों की आवश्यकता दोहराई है। ऐसे समय में अमेरिका और इस्राइल के आगामी चुनाव केवल घरेलू राजनीतिक घटनाएं नहीं रह गए हैं, बल्कि उनके परिणामों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी नजर है। 
फिर भी दोनों देशों की राजनीतिक परिस्थितियों में मौलिक अंतर है। अमेरिका में मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति ट्रंप के पद पर बने रहने का निर्णय नहीं करेगा। वहां मतदाता कांग्रेस में प्रतिनिधित्व का निर्धारण करेंगे, जिससे राष्ट्रपति की विधायी क्षमता और प्रशासनिक जवाबदेही प्रभावित होगी। इसके विपरीत इस्राइल में चुनाव सीधे अगली सरकार के गठन से संबंधित है। इसलिए नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति नई संसद में गठबंधन बनाने की क्षमता पर निर्भर करेगी।
इन चुनावों के परिणाम भविष्य की अमेरिकी विदेश नीति, इस्राइल की सुरक्षा रणनीति और पश्चिम एशिया में कूटनीतिक संभावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन परिणाम आने से पहले यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि मतदाताओं की नाराजगी किस सीमा तक वास्तविक सीटों में बदल सकेगी। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि महंगाई, युद्ध और नेतृत्व की जवाबदेही दोनों लोकतंत्रों में चुनावी बहस के प्रमुख विषय बने हुए हैं।


