Plane Crash Story: 33,333 फीट से गिरीं, फिर भी बच गईं! वेस्ना वुलोविच की अविश्वसनीय कहानी

Plane Crash Story: वेस्ना वुलोविच 33,333 फीट की ऊंचाई से विमान हादसे में जीवित बच गई थीं। जानिए 1972 की दुर्घटना, उनकी चोटों, गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड और इस घटना से जुड़े विवाद की पूरी कहानी।

Yogesh Mishra
Published on: 9 Oct 2026 8:42 PM IST
Vesna Vulovic Plane Crash | Woman Survived Plane Crash Explained in Hindi | Newstrack Hindi News
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Vesna Vulovic Plane Crash | Woman Survived Plane Crash Explained in Hindi | Newstrack Hindi News

Plane Crash Story: 26 जनवरी 1972 की शाम यूरोप के आसमान में एक यात्री विमान उड़ रहा था। करीब 33 हजार फीट की ऊंचाई पर अचानक विमान में विस्फोट हुआ और वह बुरी तरह टूटने लगा। जमीन हजारों मीटर नीचे थी, तापमान जमा देने वाला था और इतनी ऊंचाई पर किसी के बचने की उम्मीद लगभग नहीं थी। लेकिन जब चेकोस्लोवाकिया के बर्फ से ढके जंगलों में बचाव दल मलबा खोज रहा था, तो उन्हें एक युवती जिंदा मिली। उसकी खोपड़ी, रीढ़, पैर और पेल्विस की हड्डियों में गंभीर चोटें थीं, फिर भी वह सांस ले रही थी। विमान में सवार बाकी 27 लोगों की मौत हो चुकी थी। उस युवती का नाम था वेस्ना वुलोविच। वह यूगोस्लाविया की विमान परिचारिका थीं। 1985 में उनका नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार वह बिना पैराशूट 10,160 मीटर यानी 33,333 फीट की ऊंचाई से हुई गिरावट में जीवित बची थीं।

लेकिन इस कहानी का एक जरूरी पहलू अक्सर छूट जाता है। वेस्ना खुले आसमान में अकेली 33 हजार फीट से जमीन तक नहीं गिरी थीं। दुर्घटना के दौरान वह विमान के पिछले हिस्से के मलबे में फंसी हुई थीं। विमान की संरचना, पेड़, बर्फ, जमीन का ढलान और टक्कर की परिस्थितियों ने उनकी जान बचाने में भूमिका निभाई होगी। बाद में दुर्घटना की वास्तविक ऊंचाई और कारण को लेकर भी सवाल उठे। इसलिए यह सिर्फ एक चमत्कार की कहानी नहीं, बल्कि विमानन, भौतिक विज्ञान, चिकित्सा और इतिहास से जुड़ी बेहद असाधारण घटना है।

वह उड़ान जिस पर वेस्ना को शायद होना ही नहीं था

वेस्ना वुलोविच का जन्म 3 जनवरी 1950 को बेलग्रेड में हुआ था। युवावस्था में उन्होंने विमान परिचारिका के रूप में काम शुरू किया। 26 जनवरी 1972 को वह JAT Yugoslav Airlines की उड़ान 367 के चालक दल में शामिल थीं। विमान मैकडॉनेल डगलस DC-9 था और उसे स्टॉकहोम से कोपेनहेगन होते हुए ज़ाग्रेब और फिर बेलग्रेड जाना था। वेस्ना ने बाद में बताया था कि संभवतः उनका नाम इसी नाम वाली दूसरी विमान परिचारिका के साथ भ्रम के कारण इस उड़ान के लिए आ गया था। वह कोपेनहेगन से विमान में सवार हुईं। उस समय उन्हें बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि यह यात्रा उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल देगी। विमान में कुल 28 लोग थे। कोपेनहेगन से उड़ान भरने के करीब 46 मिनट बाद, स्थानीय समयानुसार शाम 4 बजकर 1 मिनट पर, चेकोस्लोवाकिया के ऊपर विमान में विस्फोट हुआ।

33 हजार फीट की ऊंचाई पर क्या हुआ?

आधिकारिक जांच के अनुसार विमान के सामान वाले हिस्से में रखा विस्फोटक फटा। इससे विमान गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गया और उसके बड़े हिस्से अलग हो गए। विमान उत्तरी बोहेमिया के स्र्ब्स्का कामेनित्से गांव के आसपास गिरा, जो आज चेक गणराज्य में है। इतनी ऊंचाई पर विमान के टूटने से स्थिति बेहद खतरनाक हो सकती है। केबिन का दबाव तेजी से बदल सकता है, बाहर की हवा बेहद ठंडी होती है और ऑक्सीजन की मात्रा जमीन की तुलना में बहुत कम होती है। इसके अलावा विमान अनियंत्रित होकर तेजी से नीचे आ सकता है। हालांकि बाद के कुछ ऐतिहासिक अध्ययनों में दुर्घटना का क्रम थोड़ा अलग बताया गया है। उनके अनुसार विस्फोट के बाद विमान तुरंत पूरी तरह हवा में बिखर नहीं गया था। नियंत्रण व्यवस्था खराब होने के बाद पायलटों ने विमान को संभालने की कोशिश की और तेज गिरावट के दौरान उसके तीन बड़े हिस्से अलग हुए। यानी यह जरूरी नहीं कि विस्फोट के साथ ही पूरा विमान 33 हजार फीट से अलग-अलग टुकड़ों में सीधे नीचे गिरने लगा हो।

वेस्ना विमान के पिछले हिस्से में कैसे बचीं?

वेस्ना विमान के पिछले हिस्से में थीं। दुर्घटना के दौरान वह एक भोजन परोसने वाली ट्रॉली और विमान की संरचना के बीच फंस गईं। विमान का यह हिस्सा टूटकर अलग हुआ, लेकिन कुछ हद तक एक संरचना के रूप में नीचे आया। यह बात उनकी जान बचने को समझने में सबसे महत्वपूर्ण है। किसी इंसान का खुले आसमान में गिरकर सीधे कठोर जमीन से टकराना और विमान के बड़े हिस्से के अंदर फंसकर गिरना एक जैसी परिस्थितियां नहीं हैं।मलबे का आकार, उसका घूमना, हवा में उसकी स्थिति, पेड़ों से टकराना और जमीन पर पहुंचते समय संरचना का टूटना, इन सभी चीजों से शरीर पर पड़ने वाला झटका बदल सकता है। वेस्ना जिस जगह मिलीं, वहां बर्फ, पेड़ और ढलानदार जमीन थी। इन चीजों ने टक्कर का असर कुछ कम किया होगा, ऐसा माना जाता है। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि पेड़ और बर्फ अपने आप किसी व्यक्ति को इतनी ऊंचाई से गिरने पर बचा सकते हैं। इस घटना में कई असाधारण परिस्थितियां एक साथ मौजूद थीं।

जंगल में किसने मलबे के अंदर से जीवित आवाज सुनी?

विमान गिरने के बाद आसपास के लोग और बचाव दल घटनास्थल पर पहुंचे। बर्फ और पेड़ों के बीच विमान का मलबा फैला हुआ था। इसी दौरान स्थानीय निवासी ब्रूनो होंके ने मलबे के भीतर से आवाज सुनी और वेस्ना को जीवित पाया। उनकी हालत बेहद गंभीर थी। शरीर की कई हड्डियां टूट चुकी थीं और रीढ़ में भी गंभीर चोट थी। शरीर के निचले हिस्से में कुछ समय के लिए पक्षाघात हो गया था। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां लंबे इलाज और पुनर्वास की शुरुआत हुई। उनके कोमा में रहने की अवधि को लेकर अलग-अलग स्रोतों में अलग आंकड़े मिलते हैं। कुछ विवरण करीब दस दिन बताते हैं, जबकि गिनीज के रिकॉर्ड में 27 दिन का उल्लेख मिलता है।

इतनी ऊंचाई से गिरने पर शरीर के साथ क्या होता है?

इतनी ऊंचाई से गिरना सामान्य परिस्थितियों में लगभग हमेशा जानलेवा होता है। लेकिन यहां एक जरूरी बात समझनी होगी। गिरती हुई वस्तु की गति अनंत तक नहीं बढ़ती रहती। गुरुत्वाकर्षण शरीर को नीचे खींचता है, जबकि हवा उसका विरोध करती है। जैसे-जैसे गति बढ़ती है, हवा का प्रतिरोध भी बढ़ता जाता है। एक स्थिति में दोनों के बीच संतुलन बन सकता है और तब वस्तु लगभग एक निश्चित गति से गिरने लगती है। इसे अंतिम वेग कहते हैं। मानव शरीर की अंतिम गति उसकी मुद्रा और हवा की स्थिति के अनुसार बदलती है और सामान्य परिस्थितियों में यह लगभग 190 से 300 किलोमीटर प्रति घंटे के दायरे में हो सकती है। लेकिन वेस्ना के मामले में इस संख्या को सीधे लागू करना सही नहीं होगा, क्योंकि वह खुले आसमान में अकेली नहीं गिर रही थीं। वह विमान के एक बड़े हिस्से में फंसी थीं, जिसका अपना आकार, वजन और हवा में व्यवहार था। इस घटना में असली सवाल यह है कि जमीन से टकराने के समय मलबे की गति कितनी थी और रुकने के दौरान कितनी दूरी और कितने समय में उसकी गति कम हुई।

पेड़ और बर्फ ने किस तरह मदद की होगी?

भौतिक विज्ञान में किसी वस्तु को रोकने का तरीका बहुत मायने रखता है। अगर कोई वस्तु बहुत तेज गति से चट्टान से टकराकर लगभग तुरंत रुक जाए तो शरीर पर बहुत बड़ा बल पड़ सकता है। लेकिन अगर वह किसी ऐसी संरचना से टकराए जो टूटती, दबती या मुड़ती हुई उसे कुछ दूरी में रोकती है तो औसत झटका कम हो सकता है। इसी सिद्धांत का इस्तेमाल कारों की सुरक्षा में भी होता है। कार का अगला हिस्सा दुर्घटना के दौरान नियंत्रित तरीके से दबता है और टक्कर की कुछ ऊर्जा अपने अंदर ले लेता है, ताकि यात्रियों पर पड़ने वाला झटका कम हो। वेस्ना के मामले में विमान का पिछला हिस्सा, पेड़, बर्फ और ढलानदार जमीन ऐसी कई परतों की तरह काम कर सकती थीं। लेकिन यह कोई ऐसा सुरक्षित तरीका नहीं है जिसे किसी दूसरी दुर्घटना पर लागू किया जा सके। इतनी तेज गति से बर्फ या पेड़ों से टकराना भी जानलेवा हो सकता है। वेस्ना का बचना कई दुर्लभ परिस्थितियों के एक साथ अनुकूल होने का नतीजा था।

क्या कम रक्तचाप ने उनकी जान बचाई थी?

वेस्ना की कहानी में अक्सर यह बात कही जाती है कि उनका रक्तचाप सामान्य से कम था और विमान का दबाव घटने पर वह बेहोश हो गई थीं। गिनीज के विस्तृत विवरण में भी इस संभावित चिकित्सकीय व्याख्या का उल्लेख मिलता है। लेकिन इसे वैज्ञानिक रूप से पक्का कारण मानना सही नहीं होगा। कम रक्तचाप के कारण बेहोश हो जाना इतनी ऊंचाई से गिरने पर शरीर को गंभीर चोट से बचाने का कोई स्थापित नियम नहीं है। दुर्घटना के दौरान उनके शरीर में वास्तव में क्या हुआ और किस कारक ने कितनी मदद की, इसे आज पूरी निश्चितता से नहीं बताया जा सकता।

महीनों के इलाज के बाद फिर चलना सीखा

मलबे से जीवित निकलना सिर्फ पहली लड़ाई थी। उसके बाद वेस्ना को गंभीर चोटों से उबरने के लिए लंबे इलाज और पुनर्वास से गुजरना पड़ा। रीढ़ की चोट के कारण उनके शरीर के निचले हिस्से में पक्षाघात हुआ था, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने चलने की क्षमता वापस हासिल की। कुछ विवरणों के अनुसार करीब दस महीने बाद वह फिर चलने लगी थीं। हालांकि उनके शरीर पर दुर्घटना के स्थायी असर रहे और उन्हें लंगड़ाकर चलना पड़ा। दुर्घटना की उनकी अपनी याद भी अधूरी थी। उन्हें कोपेनहेगन से विमान में चढ़ने तक की कुछ बातें याद थीं, लेकिन विस्फोट, विमान के गिरने और बचाव की घटना याद नहीं थी। उनकी अगली स्पष्ट याद अस्पताल से जुड़ी थी। यह एक अजीब स्थिति थी। दुनिया जिस घटना को उनके जीवन की सबसे असाधारण घटना मान रही थी, उसकी सबसे महत्वपूर्ण कड़ियां खुद वेस्ना को याद ही नहीं थीं।

1985 में गिनीज रिकॉर्ड में नाम दर्ज हुआ

वेस्ना की कहानी दुनिया भर में फैल गई। यूगोस्लाविया में उन्हें सम्मान मिला और वह असाधारण रूप से जीवित बचने की मिसाल बन गईं। 1985 में उनका नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया। उनके नाम आधिकारिक रिकॉर्ड बना बिना पैराशूट सबसे अधिक ऊंचाई से गिरने के बाद जीवित बचने का और गिनीज की आधिकारिक सूची में यह रिकॉर्ड आज भी वेस्ना वुलोविच के नाम से दर्ज है।

2009 में अचानक रिकॉर्ड पर सवाल क्यों उठे?

घटना के करीब 37 साल बाद इस कहानी पर गंभीर सवाल उठे। 2009 में खोजी पत्रकार पीटर हॉर्नुंग और पावेल थाइनर ने दावा किया कि दुर्घटना का आधिकारिक विवरण पूरी तरह सही नहीं हो सकता। उनका कहना था कि विमान संभवतः 33 हजार फीट की ऊंचाई पर नहीं था। उनके अनुसार विमान इससे काफी नीचे आ चुका था और करीब 800 मीटर की ऊंचाई पर टूटकर गिरा हो सकता है। उन्होंने यह संभावना भी जताई कि विमान को चेकोस्लोवाकिया की वायुसेना ने गलती से मार गिराया हो और बाद में विस्फोट की कहानी सामने लाई गई हो। इन दावों के समर्थन में उन्होंने मलबे के फैलाव, प्रत्यक्षदर्शियों के विवरण और कुछ पुराने दस्तावेजों का हवाला दिया। इस पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी चर्चा हुई। अगर यह दावा सही होता तो वेस्ना के विश्व रिकॉर्ड की पूरी बुनियाद बदल जाती। लेकिन गिनीज ने आधिकारिक जांच और उपलब्ध उड़ान संबंधी आंकड़ों को आधार मानते हुए रिकॉर्ड को बरकरार रखा। उसके अनुसार आधिकारिक निष्कर्ष को खारिज करने के लिए पर्याप्त प्रमाण सामने नहीं आए।

विमान में विस्फोट किसने कराया था?

1972 की आधिकारिक जांच में विमान के सामान वाले हिस्से में रखे विस्फोटक को दुर्घटना का कारण माना गया। घटना के बाद एक व्यक्ति ने खुद को क्रोएशियाई राष्ट्रवादी बताते हुए विमान को नष्ट करने की जिम्मेदारी लेने का दावा किया था। यूगोस्लाव अधिकारियों ने क्रोएशियाई उग्र राष्ट्रवादी संगठनों पर संदेह भी जताया।

लेकिन किसी एक व्यक्ति या संगठन को इस घटना का निर्णायक अपराधी साबित करने वाली ऐसी आपराधिक कार्रवाई नहीं हुई, जिसे आधार बनाकर आज निश्चित रूप से दोषी बताया जा सके। इसलिए इस हिस्से को भी सावधानी से देखना चाहिए। उस समय यूगोस्लाविया राजनीतिक और जातीय तनावों से गुजर रहा था। अलगाववादी हिंसा, सुरक्षा एजेंसियों की गतिविधियां और शीतयुद्ध की राजनीति इस पूरे दौर की पृष्ठभूमि थी। यही वजह है कि बाद में दुर्घटना को लेकर कई वैकल्पिक दावे सामने आए, लेकिन राजनीतिक माहौल अपने आप किसी दावे को सच साबित नहीं करता।

क्या वेस्ना का बाद का जीवन सुखद रहा?

वेस्ना की कहानी अक्सर मौत को हरा देने वाली कहानी के रूप में सुनाई जाती है। लेकिन उनके लिए यह दुर्घटना जिंदगी भर का शारीरिक और मानसिक अनुभव थी।

उनके शरीर पर चोटों के स्थायी असर रहे। इलाज के बाद उन्होंने विमान कंपनी में दोबारा काम किया, लेकिन उनका काम मुख्यतः कार्यालय से जुड़ा था। बाद के वर्षों में उन्होंने स्लोबोदान मिलोशेविच के शासन के खिलाफ प्रदर्शनों में हिस्सा लिया और अपनी राजनीतिक असहमति जाहिर की। इसके बाद उनकी नौकरी चली गई। दिलचस्प बात यह है कि इतनी भयानक दुर्घटना में बचने के बावजूद उन्होंने उड़ने से बहुत ज्यादा डरने की बात नहीं कही। दुर्घटना की याददाश्त न होना इसका एक संभावित कारण माना गया, हालांकि किसी व्यक्ति के डर या उसके न होने को सिर्फ एक कारण से समझना मुश्किल है। वेस्ना ने एक बार यह भी कहा था कि लोग उन्हें भाग्यशाली समझते हैं, लेकिन अगर वह सचमुच भाग्यशाली होतीं तो वह दुर्घटना कभी होती ही नहीं। इस एक विचार से उनकी पूरी कहानी का दूसरा पहलू सामने आता है। जीवित बच जाना बड़ी बात थी, लेकिन इसके पीछे एक ऐसी त्रासदी थी जिसमें बाकी 27 लोगों की जान चली गई थी।

2016 में खत्म हुआ एक असाधारण जीवन

23 दिसंबर 2016 को वेस्ना वुलोविच का 66 वर्ष की उम्र में बेलग्रेड में निधन हो गया। उनकी मौत के बाद दुनिया में एक बार फिर उस विमान दुर्घटना की चर्चा हुई जिसमें 28 लोगों में से केवल वही जीवित बची थीं।

वेस्ना की कहानी में दो बातें अलग-अलग समझना जरूरी है। पहली, इतने बड़े विमान हादसे में उनका बचना वास्तव में बेहद दुर्लभ और असाधारण था। दूसरी, यह घटना इस बात का प्रमाण नहीं है कि इंसान सामान्य तौर पर इतनी ऊंचाई से गिरकर बच सकता है। उनकी जान बचने में विमान के मलबे में फंसा होना, मलबे की संरचना, पेड़, बर्फ, जमीन की ढलान, टक्कर की दिशा और उस समय की दूसरी परिस्थितियां शामिल रही होंगी। इनमें से कुछ चीजों को भौतिक विज्ञान से समझा जा सकता है, लेकिन पूरी घटना को किसी एक सूत्र से समझा पाना संभव नहीं है।

और शायद इस कहानी का सबसे मानवीय पहलू यही है। वेस्ना उस दिन किसी रिकॉर्ड के लिए विमान में नहीं चढ़ी थीं। वह एक सामान्य नौकरी कर रही थीं और बाकी यात्रियों की तरह अपने गंतव्य तक पहुंचना चाहती थीं। लेकिन कुछ ही मिनटों में उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई।

दुनिया के लिए वह 33,333 फीट से गिरकर बचने वाली महिला बन गईं। उनकी अपनी जिंदगी में यह घटना टूटी हड्डियों, लंबे इलाज, पुनर्वास और ऐसी प्रसिद्धि लेकर आई जिसे वह खुद उस दुर्घटना की पूरी याद के बिना जी रही थीं। वेस्ना वुलोविच की कहानी इसलिए खास है क्योंकि इसमें सिर्फ एक विश्व रिकॉर्ड नहीं है। इसमें भौतिक विज्ञान है, चिकित्सा है, विमानन इतिहास है, राजनीतिक विवाद है और सबसे बढ़कर एक इंसान की असाधारण जीवित बचने की कहानी है। यह हमें याद दिलाती है कि किसी दुर्घटना से बच जाना और उस दुर्घटना से पूरी तरह मुक्त हो जाना, दो बिल्कुल अलग बातें हैं।

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Yogesh Mishra

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Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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