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कौन हैं गादी आइजनकोट, जो बनेंगे इजरायल के नए प्रधानमंत्री? नेतन्याहू को बड़ा झटका
इजरायल में सत्ता परिवर्तन की आहट तेज हो गई है। राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग ने पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट को सरकार बनाने का न्योता दिया है। जानिए कौन हैं नेतन्याहू के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी और क्या है उनकी राजनीतिक रणनीति।
Israel Election 2026: इजरायल की राजनीति में बड़ा उलटफेर होता दिखाई दे रहा है। लंबे समय से सत्ता पर काबिज प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की कुर्सी अब खतरे में है। राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग ने विपक्षी नेता और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट को नई सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया है। 27 अक्टूबर को हुए आम चुनाव में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था, लेकिन राष्ट्रपति के सामने सरकार बनाने का दावा पेश करने के मामले में आइजनकोट ने नेतन्याहू को पीछे छोड़ दिया है। उन्हें 120 सदस्यीय संसद के 67 सांसदों का समर्थन मिला है, जबकि नेतन्याहू के पक्ष में 46 सांसदों ने समर्थन जताया है। हालांकि, 67 सांसदों का समर्थन मिलना सरकार का गठन सुनिश्चित नहीं करता। आइजनकोट के सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग विचारधारा वाले दलों को एक साथ लाने की होगी।
कौन हैं गादी आइजनकोट?
66 वर्षीय गादी आइजनकोट इजरायल के पूर्व सेना प्रमुख और वर्तमान में याशर (Yashar) पार्टी के नेता हैं। उनका जन्म मोरक्को से आए यहूदी प्रवासी परिवार में हुआ था। वह नौ भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर हैं और पांच बच्चों के पिता हैं।
आइजनकोट का राजनीतिक सफर नेतन्याहू से बिल्कुल अलग रहा है। नेतन्याहू जहां राजनीतिक और प्रभावशाली परिवारों के बीच यरुशलम में पले-बढ़े, वहीं आइजनकोट ने तिबेरियास और इलात जैसे शहरों में अपना बचपन बिताया। उनका परिवार मोरक्को से इजरायल आया था।
वह इजरायल के मिजराही यहूदी समुदाय से आते हैं। इस समुदाय के बड़े हिस्से का पारंपरिक रूप से नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को समर्थन मिलता रहा है। ऐसे में आइजनकोट का उभार इजरायल की राजनीति में एक नए सामाजिक और राजनीतिक समीकरण के रूप में देखा जा रहा है। अगर वह प्रधानमंत्री बनते हैं तो इजरायल के इतिहास में पहले मिजराही प्रधानमंत्री होंगे।
सेना में 40 साल का अनुभव, 2015 से 2019 तक रहे सेना प्रमुख
गादी आइजनकोट ने 1978 में इजरायली सेना की गोलानी ब्रिगेड से अपने सैन्य करियर की शुरुआत की थी। करीब चार दशक तक सेना में सेवाएं देने के बाद वह 2015 में इजरायल डिफेंस फोर्सेज (IDF) के चीफ ऑफ स्टाफ बने। इस पद पर वह 2019 तक रहे।
उनके सैन्य करियर का एक चर्चित मामला 2016 का है। उस समय इजरायली सैनिक एलोर अजरिया ने हेब्रोन में एक घायल फिलिस्तीनी हमलावर को गोली मारकर मार डाला था। इस घटना के बाद दक्षिणपंथी नेताओं ने सैनिक का समर्थन किया था। यहां तक कि नेतन्याहू ने भी उसके पक्ष में बयान दिया था।
लेकिन आइजनकोट ने सेना की अनुशासन व्यवस्था और नैतिकता का हवाला देते हुए मामले की जांच और सैन्य मुकदमे का समर्थन किया। इस फैसले ने उन्हें सेना के भीतर एक अनुशासित और नियमों को प्राथमिकता देने वाले अधिकारी के रूप में पहचान दिलाई।
2022 में राजनीति में आए, नेतन्याहू की सरकार में भी रहे
लगभग चार दशक सेना में बिताने के बाद आइजनकोट ने 2022 में राजनीति में कदम रखा। उन्होंने पूर्व सेना प्रमुख बेनी गैंट्ज के साथ मिलकर राजनीति में अपनी नई पारी शुरू की।
7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजरायल में आपातकालीन युद्ध मंत्रिमंडल का गठन हुआ। आइजनकोट और गैंट्ज भी नेतन्याहू के साथ इस मंत्रिमंडल में शामिल हुए।
हालांकि, गाजा युद्ध को लेकर नेतन्याहू से उनके मतभेद लगातार बढ़ते गए। आइजनकोट का आरोप था कि सरकार के पास युद्ध खत्म करने की कोई स्पष्ट रणनीति नहीं है। उन्होंने नेतन्याहू पर राजनीतिक फायदे के लिए युद्ध को लंबा खींचने और बंधकों की जान खतरे में डालने का आरोप लगाया।
आखिरकार जून 2024 में उन्होंने बेनी गैंट्ज के साथ युद्ध मंत्रिमंडल छोड़ दिया। इसके बाद वह नेतन्याहू के सबसे प्रमुख राजनीतिक विरोधियों में शामिल हो गए।
गाजा युद्ध में बेटे और दो भतीजों को खोया
गादी आइजनकोट की राजनीतिक और सैन्य जिंदगी का सबसे दर्दनाक अध्याय उनके परिवार से जुड़ा है। गाजा युद्ध के दौरान दिसंबर 2023 में उनके 25 वर्षीय सबसे छोटे बेटे गैल आइजनकोट की लड़ाई में मौत हो गई थी। इसके अलावा उनके दो भतीजे भी युद्ध में मारे गए।
बेटे की मौत ने आइजनकोट को व्यक्तिगत रूप से झकझोर दिया। अप्रैल 2026 में उन्होंने इजरायली अखबार येदियोथ अहरोनोथ में लिखे एक लेख में कहा था कि उन्होंने अपने बेटे की कब्र पर यह संकल्प लिया था कि उसकी और उसके साथियों की कुर्बानी बेकार नहीं जाने देंगे।
उनका कहना है कि यह संकल्प ही उनके राजनीतिक मिशन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
कैसे नेतन्याहू को सत्ता से बाहर कर सकते हैं आइजनकोट?
इजरायल की 120 सदस्यीय संसद में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। 27 अक्टूबर को हुए चुनाव में नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को 53 सीटें मिलीं, जबकि आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें हासिल हुईं।
वहीं, अरब बहुल राजनीतिक दलों ने रिकॉर्ड 19 सीटों पर जीत दर्ज की। इन दलों के समर्थन से आइजनकोट के पक्ष में राष्ट्रपति के सामने 67 सांसदों ने सरकार बनाने की सिफारिश की।
राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग ने 7 नवंबर को आइजनकोट को सरकार बनाने का पहला मौका देने का फैसला किया। उन्हें औपचारिक रूप से 8 नवंबर को राष्ट्रपति भवन में सरकार गठन का जनादेश सौंपा जाना है।
आइजनकोट के पास सरकार बनाने के लिए 28 दिन होंगे। जरूरत पड़ने पर राष्ट्रपति उन्हें 14 दिन का अतिरिक्त समय भी दे सकते हैं। लेकिन यहां सबसे बड़ा पेंच अरब दलों का समर्थन है। आइजनकोट को जिन 67 सांसदों का समर्थन मिला है, उसमें अरब पार्टियों के सांसद भी शामिल हैं। हालांकि, उनके गठबंधन के कई नेता इन दलों को सरकार में शामिल करने के पक्ष में नहीं हैं।
ऐसे में अरब दलों के बाहरी समर्थन से अल्पमत सरकार बनाने या अति-रूढ़िवादी यहूदी दलों को साथ लाने जैसे विकल्पों पर विचार हो सकता है। नेतन्याहू की पूर्व सहयोगी यूनाइटेड टोरा जूडिज्म के पास सात सीटें हैं और उसने किसी भी नेता के पक्ष में सिफारिश नहीं की थी। आइजनकोट के लिए यह एक कठिन राजनीतिक परीक्षा होगी।
नेतन्याहू से कितने अलग हैं गादी आइजनकोट?
आइजनकोट ने अपने चुनाव अभियान में खुद को एक योद्धा, नेता और एकजुट करने वाले चेहरे के रूप में पेश किया। उनकी पार्टी का नाम याशर है, जिसका हिब्रू में अर्थ सीधा या सही रास्ता होता है।
उनके चुनावी वादों में सबसे प्रमुख 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के दौरान हुई सुरक्षा चूक की जांच के लिए स्वतंत्र सरकारी आयोग का गठन है। नेतन्याहू लंबे समय से ऐसी जांच की मांग का विरोध करते रहे हैं।
इसके अलावा आइजनकोट सभी नागरिकों के लिए अनिवार्य सैन्य सेवा या राष्ट्रीय सेवा लागू करने के पक्षधर हैं। यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नेतन्याहू की सरकार में शामिल अति-रूढ़िवादी यहूदी दल अपने समुदाय को सैन्य सेवा से छूट देने की मांग करते रहे हैं।
हालांकि, फिलिस्तीन और ईरान के मुद्दे पर आइजनकोट का रुख बहुत नरम नहीं है। वह इजरायल की सुरक्षा को लेकर सख्त रवैया रखते हैं। गाजा, लेबनान और ईरान में इजरायली सैन्य अभियानों का उन्होंने व्यापक समर्थन किया है।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना और तेहरान के सहयोगी संगठनों की ताकत कमजोर करना उनकी सुरक्षा नीति के प्रमुख लक्ष्य हैं। हालांकि, उन्होंने सैन्य कार्रवाई के साथ कूटनीतिक रणनीति को भी जरूरी बताया है।
फिलिस्तीनियों को लेकर क्या होगी आइजनकोट की नीति?
गाजा को लेकर आइजनकोट ने हमास का शासन 18 महीने के भीतर समाप्त करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की युद्धविराम योजना लागू करने या जरूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई का रास्ता अपनाने की बात कही है।
दिलचस्प बात यह है कि हमास को सत्ता से हटाने का लक्ष्य नेतन्याहू की नीति से भी काफी हद तक मेल खाता है। हालांकि, आइजनकोट का आरोप है कि नेतन्याहू के सत्ता में बने रहने तक हमास का शासन खत्म नहीं हो सकता।
वह नेतन्याहू पर गाजा युद्ध को राजनीतिक लाभ के लिए जारी रखने का आरोप लगाते रहे हैं। फिलिस्तीन के मुद्दे पर उनके संभावित गठबंधन के दक्षिणपंथी सहयोगियों का प्रभाव भी उनकी नीतियों को प्रभावित कर सकता है।
डोनाल्ड ट्रंप के साथ कैसे होंगे रिश्ते?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुले तौर पर बेंजामिन नेतन्याहू का समर्थन कर चुके हैं। अक्टूबर में ट्रंप ने नेतन्याहू को अपना पूर्ण समर्थन देते हुए उन्हें एक महान युद्धकालीन प्रधानमंत्री बताया था।
ऐसे में आइजनकोट के प्रधानमंत्री बनने की स्थिति में अमेरिका और इजरायल के रिश्तों की दिशा पर भी दुनिया की नजर रहेगी।
हालांकि, आइजनकोट भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने और इजरायल की सुरक्षा मजबूत करने के पक्षधर हैं। इसलिए दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग जारी रहने की संभावना है, लेकिन नेतन्याहू और ट्रंप के बीच जैसी राजनीतिक निकटता है, वैसी ही निकटता आइजनकोट के साथ होगी या नहीं, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या गादी आइजनकोट 67 सांसदों के समर्थन को वास्तविक संसदीय बहुमत में बदल पाएंगे? राष्ट्रपति का न्योता मिलना नेतन्याहू के लिए बड़ा राजनीतिक झटका जरूर है, लेकिन इजरायल की सत्ता का अंतिम फैसला अब गठबंधन की बातचीत और संसद में बहुमत साबित करने पर निर्भर करेगा।


