अमेरिका में कल मध्यावधि चुनाव, 5.4 करोड़ वोट पड़े; ट्रंप बोले- बनूंगा 'मिस्टर वीटो'

New Delhi: अमेरिका में 3 नवंबर को मध्यावधि चुनाव होंगे। 5.4 करोड़ से अधिक मतदाता पहले ही वोट डाल चुके हैं। रिपब्लिकन पार्टी के सामने कांग्रेस के दोनों सदनों में बहुमत बचाने की चुनौती है। ट्रंप ने डेमोक्रेटिक जीत पर 'मिस्टर वीटो' बनने की बात कही है।

Newstrack Network
Published on: 2 Nov 2026 11:23 PM IST
अमेरिका में कल मध्यावधि चुनाव, 5.4 करोड़ वोट पड़े; ट्रंप बोले- बनूंगा मिस्टर वीटो
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फोटो-सोशल मीडिया

New Delhi: अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक परीक्षा शुरू होने में अब कुछ ही घंटे बाकी हैं। मंगलवार, तीन नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव में अमेरिकी मतदाता यह तय करेंगे कि देश की संसद यानी कांग्रेस के दोनों सदनों पर किस पार्टी का नियंत्रण रहेगा। मतदान से पहले ही 5.4 करोड़ से अधिक अमेरिकी मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर चुके हैं। इतनी बड़ी अग्रिम भागीदारी ने इस चुनाव के प्रति लोगों की दिलचस्पी को स्पष्ट कर दिया है। दूसरी तरफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव से ठीक पहले कहा है कि यदि डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस पर नियंत्रण प्राप्त करती है तो वह अपने संवैधानिक वीटो अधिकार का व्यापक इस्तेमाल करेंगे। उन्होंने ऐसी स्थिति में खुद को 'मिस्टर वीटो' बनाने की बात कही है। ट्रंप का यह बयान उस राजनीतिक गतिरोध की संभावना की ओर संकेत करता है, जिसमें राष्ट्रपति एक पार्टी का हो और संसद के एक या दोनों सदनों पर विपक्ष का नियंत्रण हो। 

अग्रिम मतदान में नया रिकॉर्ड, 2022 के मुकाबले लाखों मतदाता अधिक

अमेरिका में मतदान के दिन से पहले मतदान करने की व्यवस्था को 'अर्ली वोटिंग' कहा जाता है। इसमें मतदाता अपने राज्य के नियमों के अनुसार निर्धारित केंद्रों पर पहले जाकर या डाक के माध्यम से मतदान कर सकते हैं। फ्लोरिडा विश्वविद्यालय के इलेक्शन लैब के अनुसार एक नवंबर तक लगभग 5.33 करोड़ मतदाता अग्रिम मतदान कर चुके थे। रविवार दोपहर तक उपलब्ध एक अन्य गणना में यह संख्या 5.36 करोड़ बताई गई, जबकि दो नवंबर की नवीनतम रिपोर्टों में अग्रिम मतदाताओं की संख्या 5.4 करोड़ से अधिक हो चुकी है। इसके मुकाबले 2022 के मध्यावधि चुनाव में लगभग 4.59 करोड़ मतदाताओं ने अग्रिम मतदान किया था। इस प्रकार मतदान के मुख्य दिन से पहले ही पिछली बार का आँकड़ा पार हो चुका है। हालाँकि यह वृद्धि अपने आप में अंतिम कुल मतदान प्रतिशत या किसी पार्टी की जीत का प्रमाण नहीं है। 

रविवार दोपहर तक उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार लगभग 2.98 करोड़ लोगों ने मतदान केंद्रों पर जाकर और 2.39 करोड़ से अधिक लोगों ने डाक के माध्यम से मतदान किया था। जिन 27 राज्यों से मतदाताओं की पार्टी सदस्यता संबंधी जानकारी उपलब्ध थी, वहाँ अग्रिम मतदान करने वालों में लगभग 43 प्रतिशत पंजीकृत डेमोक्रेट, 31.7 प्रतिशत पंजीकृत रिपब्लिकन और शेष निर्दलीय अथवा अन्य श्रेणियों के मतदाता थे। लेकिन अमेरिकी चुनावों में किसी पार्टी के पंजीकृत मतदाता का उसी पार्टी के उम्मीदवार को वोट देना अनिवार्य नहीं है। इसी कारण इन आँकड़ों से वास्तविक मतदान के पक्ष में जाने वाले वोटों का निश्चित अनुमान नहीं लगाया जा सकता। 

क्यों इतने महत्वपूर्ण हैं अमेरिका के मध्यावधि चुनाव?

अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल चार वर्ष का होता है, लेकिन कांग्रेस के निचले सदन प्रतिनिधि सभा के सभी सदस्य प्रत्येक दो वर्ष में चुने जाते हैं। सीनेट के सदस्यों का कार्यकाल छह वर्ष का होता है और लगभग एक-तिहाई सीटों पर प्रत्येक दो वर्ष में चुनाव होता है। इसी कारण राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच आयोजित चुनावों को मध्यावधि चुनाव कहा जाता है। इस बार प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की लगभग एक-तिहाई सीटों पर मतदान होगा। राष्ट्रपति ट्रंप जनवरी 2025 में अपने दूसरे कार्यकाल के लिए सत्ता में लौटे थे। इसलिए तीन नवंबर का चुनाव उनके शेष दो वर्षों के शासन और संसदीय सहयोग की स्थिति को प्रभावित करेगा। 

मौजूदा सदन में रिपब्लिकन पार्टी के पास प्रतिनिधि सभा में 218 और डेमोक्रेटिक पार्टी के पास 214 सीटें हैं। सीनेट में रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक खेमों का अनुपात 53 और 47 है। इस स्थिति में दोनों सदनों के नियंत्रण के लिए मुकाबला महत्वपूर्ण है। प्रतिनिधि सभा से सरकारी बजट, कर संबंधी विधेयक और अनेक नीतिगत प्रस्ताव गुजरते हैं। सीनेट की भूमिका कानून निर्माण के अतिरिक्त राष्ट्रपति द्वारा नामित महत्वपूर्ण अधिकारियों और न्यायाधीशों की नियुक्तियों की पुष्टि में भी होती है। इसलिए कांग्रेस की संरचना बदलने से राष्ट्रपति की नीतियों को लागू करने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। 

ट्रंप ने क्यों कहा कि वह 'मिस्टर वीटो' बन जाएँगे?

राष्ट्रपति ट्रंप ने न्यूयॉर्क पोस्ट की पत्रकार मिरांडा डिवाइन को दिए साक्षात्कार में कहा कि यदि डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस में बहुमत प्राप्त कर लेती है तो वह उसके प्रस्तावित कानूनों को वीटो कर सकते हैं। साक्षात्कार के कुछ अंश रविवार को फॉक्स न्यूज़ पर प्रसारित किए गए। ट्रंप ने कहा, “मुझे लगता है कि तब मैं मिस्टर वीटो बन जाऊँगा।” उन्होंने आगे समझाया कि डेमोक्रेटिक नेतृत्व वाले सदन से विधेयक आएँगे और राष्ट्रपति उन्हें अस्वीकार कर सकते हैं। उनके अनुसार कुछ समय बाद विपक्ष समझौता करने के लिए बातचीत की मेज पर आ सकता है। ट्रंप ने यह भी कहा कि वह नहीं चाहते कि ऐसी परिस्थिति पैदा हो और उनकी अपेक्षा है कि रिपब्लिकन पार्टी कांग्रेस का नियंत्रण बनाए रखे। 

अमेरिकी संविधान में राष्ट्रपति को कांग्रेस द्वारा पारित विधेयकों को वीटो करने का अधिकार है। लेकिन यह अधिकार पूर्णतः निरंकुश नहीं है। यदि प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों में उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत किसी वीटो को खारिज कर दे तो विधेयक राष्ट्रपति की सहमति के बिना भी कानून बन सकता है। सामान्य राजनीतिक परिस्थितियों में इतना बड़ा बहुमत जुटाना कठिन होता है। इसलिए जब कांग्रेस के एक या दोनों सदन राष्ट्रपति की पार्टी के नियंत्रण में नहीं होते, तब वीटो विधायी बातचीत का एक महत्वपूर्ण साधन बन सकता है। इसके विपरीत कांग्रेस भी बजट, सरकारी खर्च, निगरानी समितियों, संसदीय जाँच और नियुक्तियों से संबंधित अपनी संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल कर सकती है। ऐसी परिस्थितियों में अमेरिकी राजनीति में 'डिवाइडेड गवर्नमेंट' अर्थात सत्ता का विभाजित नियंत्रण पैदा होता है।

डेमोक्रेटिक बहुमत की स्थिति में क्या बदलेगा?

डेमोक्रेटिक पार्टी यदि प्रतिनिधि सभा अथवा सीनेट में बहुमत हासिल करती है तो ट्रंप प्रशासन के सामने कानून बनाने की प्रक्रिया में अधिक राजनीतिक बातचीत की आवश्यकता पड़ सकती है। प्रतिनिधि सभा में विपक्षी बहुमत की स्थिति में संसदीय समितियों की अध्यक्षता और जाँच की प्राथमिकताएँ बदल सकती हैं। सरकारी खर्च तथा वित्तीय प्रस्तावों पर मतभेद बढ़ सकते हैं। सीनेट का नियंत्रण बदलने पर राष्ट्रपति की ओर से प्रस्तावित कुछ नियुक्तियों और अन्य महत्वपूर्ण निर्णयों पर भी असर संभव है। लेकिन इस स्थिति का अर्थ यह नहीं होगा कि राष्ट्रपति अपने सभी संवैधानिक अधिकार खो देंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति के पास कार्यकारी आदेश जारी करने, प्रशासनिक विभागों को निर्देश देने, विदेश नीति संचालित करने और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित अनेक अधिकार बने रहते हैं। इन अधिकारों की सीमाएँ संविधान, संघीय कानूनों और न्यायालयों द्वारा निर्धारित होती हैं। 

रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप प्रशासन पिछले कई महीनों से ऐसी परिस्थितियों के लिए तैयारी कर रहा है जिनमें डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस के किसी सदन का नियंत्रण हासिल कर सकती है। व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारियों और कानूनी सलाहकारों ने आव्रजन, आयात शुल्क, आवास, संघीय खर्च और सरकारी अनुदान जैसी नीतियों को कार्यकारी अधिकारों के माध्यम से संचालित करने के विकल्पों का अध्ययन किया है। इस तैयारी का एक कारण यह है कि राष्ट्रपति को अपनी घोषित नीतियों पर आगे बढ़ने के लिए हमेशा नए कानून की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन यदि कोई कार्यकारी निर्णय मौजूदा कानूनों या संविधान के विरुद्ध पाया जाता है तो उसे न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। इसीलिए चुनाव के बाद असली प्रश्न केवल कांग्रेस के बहुमत का नहीं, बल्कि राष्ट्रपति, संसद और न्यायपालिका के अधिकारों के बीच संतुलन का भी होगा। 

मिशिगन में डेमोक्रेट नेता ने रिपब्लिकन उम्मीदवार का समर्थन किया, पार्टी के भीतर विवाद

चुनाव से ठीक पहले मिशिगन में एक असाधारण राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। डेमोक्रेटिक पार्टी की नेता और अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की सदस्य हेली स्टीवंस ने अपने ही दल के सीनेट उम्मीदवार अब्दुल अल-सैयद के बजाय रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स का समर्थन कर दिया है। स्टीवंस इससे पहले डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रारंभिक चुनाव में अल-सैयद से हार गई थीं। रविवार को वह डेट्रॉयट क्षेत्र के एक चर्च में रोजर्स के साथ दिखाई दीं। उनके इस कदम ने डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर विवाद पैदा कर दिया है। सीनेट में डेमोक्रेटिक नेता चक शूमर और मिशिगन के पार्टी नेतृत्व ने इस फैसले की तीखी आलोचना की है। दूसरी ओर राष्ट्रपति ट्रंप और रिपब्लिकन नेताओं ने स्टीवंस के समर्थन का स्वागत किया है। 

मिशिगन की सीनेट सीट वर्तमान डेमोक्रेटिक सांसद गैरी पीटर्स के सेवानिवृत्त होने के कारण खाली हो रही है। अल-सैयद और रोजर्स इसी सीट के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। स्टीवंस ने अपने निर्णय के पीछे पार्टी के भीतर चुनाव अभियान संबंधी मतभेदों का उल्लेख किया है। अल-सैयद ने कहा है कि उनका ध्यान मतदाताओं की समस्याओं, विशेष रूप से जीवनयापन की बढ़ती लागत पर केंद्रित है। इस राजनीतिक विवाद का वास्तविक चुनावी प्रभाव मतदान और मतगणना के बाद ही स्पष्ट होगा। किसी प्रमुख नेता का विरोधी उम्मीदवार का समर्थन करना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि उस उम्मीदवार को संबंधित पार्टी के अधिकांश मतदाताओं का समर्थन भी मिल जाएगा। 

महँगाई, आव्रजन और ईरान युद्ध चुनाव के प्रमुख मुद्दे

इस बार अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में महँगाई और जीवनयापन की लागत महत्वपूर्ण विषय हैं। खाद्य पदार्थों, आवास, ऊर्जा और दूसरी आवश्यक सेवाओं पर होने वाला खर्च आम नागरिकों की आर्थिक चिंताओं का हिस्सा बना हुआ है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने इन मुद्दों पर ट्रंप प्रशासन की नीतियों की आलोचना की है। दूसरी ओर रिपब्लिकन पार्टी करों, सीमा सुरक्षा, आव्रजन नियंत्रण और आर्थिक विकास संबंधी अपनी नीतियों को प्रमुखता दे रही है। दोनों दलों के बीच सरकारी खर्च, स्वास्थ्य सेवाओं और व्यापार नीति को लेकर भी मतभेद हैं। 

ईरान के साथ अमेरिका का सैन्य संघर्ष भी चुनावी बहस से जुड़ा हुआ है। युद्ध पर होने वाला सरकारी खर्च, ऊर्जा कीमतों पर प्रभाव और अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा से जुड़े प्रश्न मतदाताओं के सामने हैं। ट्रंप प्रशासन अपनी नीति को ईरान की परमाणु क्षमताओं तथा पश्चिम एशिया में अमेरिकी सुरक्षा हितों से जोड़ता है। दूसरी तरफ युद्ध जारी रखने की आर्थिक और मानवीय लागत पर सवाल उठाए जा रहे हैं। यह विषय चुनाव के बाद भी महत्वपूर्ण रहेगा, क्योंकि सैन्य अभियानों के लिए धन उपलब्ध कराने और प्रशासन की विदेश नीति की निगरानी करने में कांग्रेस की संवैधानिक भूमिका होती है। हालाँकि अमेरिकी राष्ट्रपति के पास सैन्य और विदेश नीति से संबंधित स्वतंत्र अधिकार भी हैं। इसलिए कांग्रेस में किसी राजनीतिक परिवर्तन से युद्ध की नीति अपने आप नहीं बदल जाएगी। 

चुनाव परिणाम का भारत पर क्या असर पड़ सकता है?

भारत के लिए अमेरिकी मध्यावधि चुनाव का महत्व मुख्यतः व्यापार, आयात शुल्क, प्रौद्योगिकी, आव्रजन, रक्षा सहयोग और पश्चिम एशिया की सुरक्षा से जुड़ा है। अमेरिका भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में शामिल है। ट्रंप प्रशासन की व्यापार नीति में शुल्क और बाजार पहुँच महत्वपूर्ण विषय रहे हैं। यदि कांग्रेस की संरचना बदलती है तो कुछ व्यापार संबंधी विधायी प्रस्तावों, संसदीय निगरानी और प्रशासनिक निर्णयों पर राजनीतिक मतभेद अधिक स्पष्ट हो सकते हैं। लेकिन अमेरिका के आयात शुल्क संबंधी अनेक अधिकार राष्ट्रपति और कार्यकारी एजेंसियों के पास भी होते हैं। इसलिए केवल प्रतिनिधि सभा में बहुमत बदलने से भारत पर लागू सभी व्यापारिक शुल्क समाप्त हो जाएँगे, ऐसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।

भारतीय छात्रों और पेशेवरों के लिए अमेरिकी आव्रजन नीति भी महत्वपूर्ण है। एच-1बी जैसे रोजगार वीजा, विदेशी विद्यार्थियों के प्रवेश और स्थायी निवास की प्रक्रियाओं से संबंधित नीतिगत बदलावों का सीधा असर भारतीय नागरिकों पर पड़ सकता है। कांग्रेस की भूमिका कुछ आव्रजन कानूनों में महत्वपूर्ण है, लेकिन वीजा संबंधी अनेक प्रशासनिक नियम कार्यकारी एजेंसियाँ भी लागू करती हैं। इसी प्रकार रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा से संबंधित भारत-अमेरिका संबंधों पर चुनाव का संभावित प्रभाव विभिन्न नीति क्षेत्रों के अनुसार अलग-अलग होगा। अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था में राष्ट्रपति और कांग्रेस की भूमिका को ध्यान में रखे बिना इन प्रभावों का आकलन करना अधूरा होगा।

चुनाव के बाद ट्रंप के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?

इस चुनाव की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि राष्ट्रपति ट्रंप स्वयं मतपत्र पर उम्मीदवार नहीं हैं, लेकिन उनके प्रशासन की नीतियाँ राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। मध्यावधि चुनाव अक्सर मौजूदा सरकार के कार्यकाल की परिस्थितियों पर मतदाताओं की प्रतिक्रिया को समझने का अवसर देते हैं। हालाँकि प्रत्येक राज्य और निर्वाचन क्षेत्र में स्थानीय उम्मीदवार, सामाजिक प्रश्न, आर्थिक समस्याएँ और राज्य की राजनीति भी परिणामों को प्रभावित करती हैं। इसलिए पूरे चुनाव को केवल राष्ट्रपति के समर्थन या विरोध के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।

मतदान से पहले कराए गए कुछ राष्ट्रीय सर्वेक्षणों में प्रतिनिधि सभा के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में रुझान दर्ज हुए हैं, जबकि सीनेट को लेकर सर्वेक्षणों में अधिक प्रतिस्पर्धा दिखाई गई है। इन सर्वेक्षणों को वास्तविक चुनाव परिणाम नहीं माना जा सकता। अलग-अलग राज्यों में उम्मीदवारों की स्थिति और मतदान में भागीदारी अंतिम परिणाम को प्रभावित करेगी। फिलहाल यह निश्चित है कि तीन नवंबर को मतदान होगा और उसके बाद सामने आने वाले परिणाम कांग्रेस की नई संरचना तय करेंगे। 

तीन नवंबर को मतदान, लेकिन सभी परिणाम उसी दिन आना जरूरी नहीं

अमेरिका के विभिन्न राज्यों में मतदान केंद्र अलग-अलग स्थानीय समय पर बंद होंगे। देश में कई समय क्षेत्र होने के कारण मतगणना की शुरुआती जानकारी भारतीय समयानुसार चार नवंबर की सुबह से प्रमुखता से सामने आ सकती है। डाक मतपत्रों की गणना, करीबी मुकाबले और राज्यों के चुनाव संबंधी नियमों के कारण कुछ सीटों के परिणाम घोषित होने में अधिक समय भी लग सकता है। अग्रिम मतदान में 5.4 करोड़ से अधिक लोगों की भागीदारी ने चुनाव के प्रति उल्लेखनीय दिलचस्पी दिखाई है, लेकिन मतदान के अंतिम आँकड़े और उम्मीदवारों की जीत की पुष्टि संबंधित राज्य चुनाव अधिकारियों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होगी।

अमेरिकी राष्ट्रपति का यह कहना कि डेमोक्रेटिक बहुमत की स्थिति में वह 'मिस्टर वीटो' बन सकते हैं, चुनाव के बाद संभावित राजनीतिक टकराव की ओर संकेत करता है। लेकिन अमेरिकी शासन व्यवस्था में टकराव के साथ समझौते की संस्थागत व्यवस्था भी मौजूद है। राष्ट्रपति के वीटो अधिकार, कांग्रेस की विधायी और वित्तीय शक्तियों तथा न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका के बीच ही अगले दो वर्षों की राजनीति आगे बढ़ेगी। इस दृष्टि से तीन नवंबर का मतदान केवल प्रतिनिधि सभा और सीनेट के सदस्यों का चुनाव नहीं है, बल्कि अमेरिका के शेष राष्ट्रपति कार्यकाल में शासन संचालन की परिस्थितियों को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम है।

अमेरिकी मतदाताओं का निर्णय चाहे जो हो, उसका प्रभाव वॉशिंगटन की घरेलू राजनीति से आगे व्यापार, वैश्विक अर्थव्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और भारत जैसे महत्वपूर्ण साझेदार देशों के साथ अमेरिकी संबंधों तक महसूस किया जा सकता है।

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