Why Money Chases Rich Countries: अमीर देशों के ब्याज दर बढ़ाते ही गरीब देश क्यों हो जाते हैं कंगाल
Why does money run towards rich countries: वैश्विक संकट के समय विकासशील देशों से पैसा तेजी से निकलकर अमीर देशों में क्यों पहुंचता है? जानिए कैसे अमेरिका और यूरोप की बढ़ती ब्याज दरें पूंजी पलायन को बढ़ावा देती हैं, और क्यों श्रीलंका, पाकिस्तान व घाना जैसे देश आर्थिक संकट के सबसे बड़े शिकार बन जाते हैं।
Why does money run towards rich countries: वैश्विक अर्थव्यवस्था की नसें एक-दूसरे से इस कदर जुड़ी हुई हैं कि जब वॉशिंगटन, लंदन या फ्रैंकफर्ट में कोई आर्थिक बदलाव होता है, तो उसकी गूंज कोलंबो, इस्लामाबाद और अकरा जैसे दूरदराज के शहरों में सुनाई देती है। आज की आधुनिक और अत्यधिक अंतर्संबंधित वित्तीय प्रणाली में पूंजी की गति बिजली से भी तेज है। यह पैसा किसी एक जगह टिकने के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षा और अधिकतम मुनाफे की तलाश में लगातार दौड़ता रहता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब भी वैश्विक बाजार में उथल-पुथल होती है, तो विकासशील देशों से पैसा निकलकर अचानक अमीर देशों की तरफ क्यों भागने लगता है?
ब्याज दरों का चक्रवात और महाशक्तियों के फैसले (Cyclone of interest rates and decisions of global superpowers)
इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए हमें उस मौद्रिक नीति को देखना होगा जो विकसित देशों के केंद्रीय बैंक तय करते हैं। जब अमेरिका या यूरोप जैसे बड़े बाजारों में महंगाई बढ़ती है, तो वहां के केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर देते हैं। ब्याज दरें बढ़ने का सीधा मतलब है कि कर्ज महंगा हो जाता है, जिससे लोग और कंपनियां कम खर्च करती हैं और बाजार में कीमतें नीचे आने लगती हैं।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने मार्च 2022 से जुलाई 2023 के बीच रिकॉर्ड 11 बार ब्याज दरों में इजाफा किया। महज कुछ महीनों के भीतर ब्याज दरें शून्य के करीब से बढ़कर 5.25-5.50 प्रतिशत के दायरे में आ गईं, जो पिछले चार दशकों में सबसे आक्रामक बढ़ोतरी थी। इसी रास्ते पर चलते हुए यूरोपियन सेंट्रल बैंक और बैंक ऑफ इंग्लैंड ने भी अपनी दरों को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया।
जब दुनिया की इन विशाल अर्थव्यवस्थाओं में ब्याज दरें इतनी ऊंची हो जाती हैं, तो वैश्विक निवेशकों के सामने एक सीधा गणित आता है: जब अमेरिका या ब्रिटेन जैसे सुरक्षित देशों में बिना किसी जोखिम के 5 प्रतिशत से ज्यादा का रिटर्न मिल रहा है, तो किसी विकासशील देश के अनिश्चित बाजार में पैसा फंसाने का क्या फायदा? यही वह बिंदु है जहां से पूंजी का पलायन शुरू होता है।
विकासशील देशों के लिए चौतरफा संकट(Developing countries face multi-front crisis)
अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की वैश्विक वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि साल 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से उभरते बाजारों में विदेशी निवेश बहुत तेजी से बढ़ा और यह लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को छू गया। लेकिन इस भारी-भरकम पूंजी की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह वैश्विक जोखिमों को लेकर बेहद संवेदनशील होती है।
जैसे ही फेडरल रिजर्व या अन्य बड़े बैंकों ने सख्ती दिखाई, विकासशील देशों से पैसा अप्रत्याशित रफ्तार से बाहर जाने लगा। इस अचानक आए झटके से इन देशों की तिमाही जीडीपी का लगभग 1 प्रतिशत हिस्सा साफ हो गया। जब सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं एक साथ मौद्रिक नीति को कड़ा करती हैं, तो विकासशील देशों के लिए बचने का कोई रास्ता नहीं बचता। उनके लिए हर दिशा से आर्थिक तूफान एक साथ आता है।
शुरुआती कमजोरी और घरेलू नीतियां (Early vulnerabilities and domestic policy)
वैश्विक मंदी या ब्याज दरों के इस चक्रवात में कौन सा देश कितना बिखरेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि संकट आने से पहले उस देश की आंतरिक आर्थिक स्थिति कैसी थी। घाना, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देशों का उदाहरण हमारे सामने है। इन तीनों देशों के संकट में फंसने के पीछे अलग-अलग घरेलू कारण थे, लेकिन उनकी बुनियादी कमजोरी एक जैसी थी: बहुत अधिक विदेशी कर्ज, नाममात्र का विदेशी मुद्रा भंडार और विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के लिए वित्तीय लचीलेपन की कमी। इन देशों ने उस दौर में अंधाधुंध कर्ज लिया जब वैश्विक ब्याज दरें शून्य के करीब थीं और महामारी के समय उसे तेजी से खर्च कर दिया।
घाना ने अपनी क्षमता और राजस्व से कहीं अधिक खर्च करने की आदत की वजह से खुद को संकट में डाला। श्रीलंका का संकट लंबे समय से घटते निर्यात और बढ़ते आयात की वजह से गहरा रहा था, जिसे 2021 में रासायनिक उर्वरकों पर लगाए गए अचानक प्रतिबंध ने पूरी तरह तबाह कर दिया। इससे वहां फसलों का उत्पादन गिरा, निर्यात ठप हुआ और देश खाद्य व विदेशी मुद्रा संकट के जाल में फंस गया।
वहीं पाकिस्तान की कहानी संरचनात्मक और दीर्घकालिक रही है, जहां सरकार का कुल सालाना राजस्व जितना नहीं था, उससे कहीं ज्यादा उसे केवल कर्ज के ब्याज भुगतान पर खर्च करना पड़ रहा था। ऐसे में जब वैश्विक स्तर पर स्थितियां कठिन हुईं, तो इन कमजोर देशों की मुद्राएं ताश के पत्तों की तरह ढह गईं।
विषमता और नियंत्रण की वैश्विक प्रणाली (Disparity and global control mechanisms)
मौजूदा वित्तीय व्यवस्था की सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि इसके नियम और बनावट ही कुछ इस तरह है कि फैसले अमीर देश लेते हैं और उनकी कीमत गरीब देशों को चुकानी पड़ती है। पश्चिम और मध्य अफ्रीका के 14 ऐसे देश हैं जो सीएफए फ्रैंक मुद्रा का उपयोग करते हैं, जो सीधे तौर पर यूरो से लिंक है। इसका नतीजा यह है कि यूरोपियन सेंट्रल बैंक के फैसलों में इन अफ्रीकी देशों की कोई भूमिका नहीं होती, फिर भी उनकी पूरी अर्थव्यवस्था इस बैंक की उंगलियों पर नाचती है। यही स्थिति उन देशों की भी है जिन्होंने ब्रिटिश पाउंड या अमेरिकी डॉलर में भारी कर्ज ले रखा है।
अमीर देशों के केंद्रीय बैंक अपनी घरेलू सीमाओं को ध्यान में रखकर नीतियां बनाते हैं, उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं होता कि उनके एक फैसले से दुनिया के दूसरे कोने में बैठा कोई देश कंगाल हो जाएगा। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की चेतावनियों के बावजूद, जब विपरीत परिस्थितियों में उभरते बाजारों से पूंजी बाहर निकलती है, तो वहां की परिसंपत्तियों के दाम गिर जाते हैं और स्थानीय मुद्राएं पूरी तरह टूट जाती हैं।
संकट प्रबंधन बनाम दीर्घकालिक सुधार (Crisis management versus long-term reform)
जब कोई विकासशील देश इस दुष्चक्र में फंसकर दिवालिया होने की कगार पर पहुंचता है, तो वह सहायता के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की तरफ देखता है। लेकिन विडंबना यह है कि जो संस्थान इन देशों को बेलआउट पैकेज या आर्थिक मदद देते हैं, वही अपनी शर्तों पर वसूली का खाका भी तैयार करते हैं। श्रीलंका को संकट से उबारने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 2.9 अरब डॉलर की विस्तारित कोष सुविधा को मंजूरी तो दी, लेकिन इसके साथ आने वाली कठोर वित्तीय अनुशासन की शर्तें अक्सर उन देशों की बची-कुची आंतरिक क्षमता को भी निचोड़ देती हैं।
आज वैश्विक मौद्रिक नीति की सीमाएं भौगोलिक सरहदों को पार कर चुकी हैं, लेकिन वैश्विक शासन प्रणाली अभी भी पुरानी दुनिया के नियमों से बंधी हुई है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में निर्णय लेने की शक्ति या वोटिंग राइट्स आज भी उन्हीं हाथों में केंद्रित हैं जिनके पास सबसे ज्यादा पैसा है और जो इन संकटों से सबसे कम प्रभावित होते हैं। यह इस व्यवस्था की कोई अनजानी खामी नहीं है, बल्कि इस पूरी प्रणाली को डिजाइन ही इसी तरह किया गया है कि पूंजी का अंतिम ठिकाना हमेशा अमीर देश ही बने रहें। जब तक इस बुनियादी ढांचे में सुधार नहीं होगा, तब तक विकासशील देश हर नए वैश्विक झटके के सामने असहाय बने रहेंगे।