Ebola Outbreak in Congo: कांगो में इबोला का कहर, 4,381 संक्रमित और 2,011 मौतें

Ebola Outbreak in Congo: कांगो में इबोला का प्रकोप तेजी से फैल रहा है। 4,381 मामलों की पुष्टि और 2,011 मौतों के बीच जानें Bundibugyo वायरस, संक्रमण के कारण, लक्षण, बचाव और इलाज से जुड़ी अहम बातें।

Update:2026-08-12 15:08 IST

Ebola Outbreak in Congo: 4,381 Cases and 2,011 Deaths

Ebola Outbreak in Congo: कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) में इबोला वायरस का प्रकोप अब बेहद गंभीर स्थिति में पहुंच गया है। महज कुछ ही हफ्तों में मौतों का आंकड़ा दोगुना होने से स्वास्थ्य एजेंसियों की चिंता बढ़ गई है। ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में इबोला से 2,011 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 4,381 मामलों की पुष्टि हुई है। अधिकारियों ने इसे अब तक का सबसे तेजी से बढ़ने वाला इबोला प्रकोप बताया है।

तीन हफ्तों में चली गईं 1,000 और जानें

कांगो में इस प्रकोप की रफ्तार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शुरुआती 1,000 मौतें दर्ज होने में करीब नौ सप्ताह लगे थे। इसके बाद मौतों का अगला 1,000 का आंकड़ा महज करीब तीन सप्ताह में पार हो गया। यानी वायरस जितनी तेजी से फैल रहा है, उसके मुकाबले संक्रमित लोगों की पहचान, संपर्कों की निगरानी और इलाज की व्यवस्था पीछे छूट रही है।

मौजूदा प्रकोप कांगो के पांच प्रांतों तक पहुंच चुका है। देश में यह 1976 के बाद 17वां इबोला प्रकोप है। पड़ोसी युगांडा में भी मई में Bundibugyo वायरस के मामले सामने आए थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 17 मई को इस प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल (PHEIC) घोषित किया था।

इस बार कौन सा वायरस बना मुसीबत?

इस प्रकोप के पीछे Bundibugyo virus है। यह इबोला वायरस की एक दुर्लभ प्रजाति है, जिसे Bundibugyo virus disease (BVD) कहा जाता है। WHO के अनुसार, पिछले Bundibugyo प्रकोपों में मृत्यु दर लगभग 30 से 50 प्रतिशत तक रही है। इस वायरस की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके खिलाफ फिलहाल कोई स्वीकृत वैक्सीन या विशिष्ट उपचार उपलब्ध नहीं है। संभावित वैक्सीन और उपचारों पर शोध और क्लिनिकल परीक्षण किए जा रहे हैं।

संक्रमण इतनी तेजी से क्यों फैल रहा है?

इस बार सबसे बड़ी समस्या केवल वायरस नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों का पूरा जाल है जिसमें यह फैल रहा है। कांगो के प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं और कई क्षेत्र बेहद दूर-दराज के हैं। इसके अलावा संघर्ष और असुरक्षा के कारण स्वास्थ्यकर्मियों की आवाजाही और संक्रमित लोगों तक पहुंच प्रभावित हो रही है।

सबसे गंभीर बात यह है कि वायरस के फैलने की शुरुआत आधिकारिक घोषणा से काफी पहले हो चुकी थी। सरकारी और वैज्ञानिक आकलनों के मुताबिक, संक्रमण फरवरी या उससे भी पहले फैलना शुरू हो गया था। जबकि आधिकारिक तौर पर प्रकोप की घोषणा 15 मई को हुई। इस देरी का मतलब है कि इस दौरान संक्रमित लोग अपने परिवार और समुदाय के संपर्क में आते रहे और संक्रमण की कड़ियां बनती चली गईं।

इसके अलावा, कई शुरुआती लक्षण मलेरिया, टाइफाइड और दूसरी सामान्य बीमारियों जैसे दिखाई देते हैं। इससे शुरुआती स्तर पर इबोला की पहचान मुश्किल हो सकती है और मरीज के अलग रखने में देरी हो सकती है।

इबोला कैसे फैलता है?

इबोला हवा से फैलने वाली बीमारी नहीं है। यह फ्लू या कोविड-19 की तरह केवल पास खड़े होने या सामान्य बातचीत से नहीं फैलता। संक्रमित व्यक्ति में लक्षण शुरू होने के बाद उसके खून, उल्टी, मल, पेशाब, लार, पसीना, स्तन दूध, वीर्य या अन्य शारीरिक तरल पदार्थों के संपर्क में आने से संक्रमण फैल सकता है। संक्रमित व्यक्ति की ऐसी वस्तुएं या सतहें भी संक्रमण का स्रोत बन सकती हैं जिन पर शरीर का तरल पदार्थ लगा हो।

मृत व्यक्ति के शरीर के सीधे संपर्क वाली पारंपरिक अंतिम संस्कार की प्रक्रियाएं भी संक्रमण फैलने का बड़ा कारण बन सकती हैं। स्वास्थ्यकर्मी और परिवार के सदस्य, यदि उचित सुरक्षा उपायों के बिना मरीज की देखभाल करते हैं, तो उनमें संक्रमण का जोखिम अधिक रहता है।

इबोला के लक्षण क्या हैं?

इबोला के लक्षण संक्रमण के 2 से 21 दिन के भीतर दिखाई दे सकते हैं। शुरुआत में लक्षण सामान्य बुखार या वायरल संक्रमण जैसे लग सकते हैं। प्रमुख शुरुआती लक्षणों में तेज बुखार, कमजोरी, अत्यधिक थकान, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द, सिरदर्द और गले में खराश शामिल हैं।

बीमारी बढ़ने पर उल्टी, दस्त, पेट दर्द, भूख कम लगना और त्वचा पर चकत्ते जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। गंभीर मामलों में किडनी और लिवर की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है तथा कुछ मरीजों में अंदरूनी या बाहरी रक्तस्राव भी हो सकता है। हर मरीज में खून आना जरूरी नहीं है।

बचाव कैसे करें?

हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक इबोला प्रभावित क्षेत्र में सबसे जरूरी है कि संक्रमित व्यक्ति के शरीर के तरल पदार्थों के सीधे संपर्क से बचा जाए। संदिग्ध या संक्रमित मरीज की देखभाल करते समय स्वास्थ्यकर्मियों को उचित व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) का इस्तेमाल करना चाहिए। मरीज के कपड़े, बिस्तर, सुई, मेडिकल उपकरण या संक्रमित शरीर के तरल पदार्थ से दूषित वस्तुओं को बिना सुरक्षा के नहीं छूना चाहिए।

मृत व्यक्ति के शरीर को सीधे छूने से भी बचना जरूरी है। प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षित अंतिम संस्कार की व्यवस्था संक्रमण रोकने का अहम हिस्सा है। इसके अलावा चमगादड़, संक्रमित जंगली जानवरों और उनके कच्चे मांस या शरीर के तरल पदार्थों के संपर्क से बचने की सलाह दी जाती है।

इलाज में सबसे अहम है जल्दी पहचान

Bundibugyo वायरस के लिए फिलहाल कोई स्वीकृत विशिष्ट दवा या वैक्सीन नहीं है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मरीज का इलाज संभव नहीं है। WHO के अनुसार, जल्दी पहचान, मरीज को अलग रखना, पर्याप्त पानी और इलेक्ट्रोलाइट देना तथा लक्षणों के अनुसार गहन सहायक उपचार मरीज के बचने की संभावना बढ़ा सकता है। संक्रमण की पुष्टि के लिए प्रयोगशाला जांच, जैसे PCR आधारित परीक्षण, महत्वपूर्ण है। WHO और स्थानीय स्वास्थ्य एजेंसियां फिलहाल निगरानी, संपर्कों की पहचान, संक्रमित मरीजों को अलग रखने, स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा, सुरक्षित अंतिम संस्कार और समुदाय के बीच जागरूकता बढ़ाने पर जोर दे रही हैं। लेकिन कांगो में जारी संघर्ष, कमजोर स्वास्थ्य ढांचा और लोगों की आवाजाही के कारण वायरस पर नियंत्रण पाना बड़ी चुनौती बना हुआ है।

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