Fermented Food: सुपरफूड क्यों कहा जाता है? शरीर में क्या करता है?
Fermented Food Benefits in Hindi: फरमेंटेड फूड को सुपरफूड क्यों कहा जाता है? जानिए दही, कांजी, इडली, ढोकला, किमची और केफिर शरीर और गट माइक्रोबायोम पर कैसे असर डालते हैं।
Fermented Food Benefits
Fermented Food Benefits in Hindi: फरमेंटेड फूड यानी किण्वित या खमीरे वाला भोजन वह खाना है, जिसे बैक्टीरिया, यीस्ट या दूसरे सूक्ष्मजीव (Microorganisms) नियंत्रित तरीके से बदलते हैं। दही, छाछ, कांजी, इडली-दोसा का खमीर, ढोकला, कुछ प्रकार के अचार, किमची, सॉअरक्राउट, केफिर और कंबूचा इसके उदाहरण हैं। इन सूक्ष्मजीवों की क्रिया से भोजन के कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और दूसरे घटक टूटते या बदलते हैं और लैक्टिक अम्ल, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अनेक जैव-सक्रिय (Bioactive) पदार्थ बन सकते हैं। इसी कारण स्वाद, बनावट और पाचन क्षमता बदलती है।
क्या इन्हें सुपरफ़ूड कहना चाहिए?
इसे ‘सुपरफूड’ कहना वैज्ञानिक वर्गीकरण नहीं है। ‘सुपरफूड’ कोई आधिकारिक केटेगरी नहीं। बल्कि लोकप्रिय पोषण शब्द है। फरमेंटेड (Fermented) भोजन के बारे में वैज्ञानिक उत्साह इसलिए है क्योंकि कुछ प्रकार के फरमेंटेड खाद्य पदार्थ आंतों के सूक्ष्मजीव समुदाय, पाचन और प्रतिरक्षा से संबंधित प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं। 2021 के एक मानव अध्ययन में दस सप्ताह तक अधिक किण्वित भोजन लेने वाले स्वस्थ वयस्कों में आंतों के सूक्ष्मजीवों की विविधता बढ़ी और कई सूजन-संबंधी संकेतकों में कमी देखी गई। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि हर फरमेंटेड खाद्य पदार्थ हर व्यक्ति के लिए चमत्कारी है।
क्या होता है फर्मेंटेशन में?
फरमेंटेशन प्रोसेस भोजन के बाहर ही बहुत काम कर चुका होता है। उदाहरण के लिए दूध में मौजूद लैक्टोज को दही बनाने वाले बैक्टीरिया आंशिक रूप से लैक्टिक अम्ल में बदल देते हैं। इसी कारण कुछ ऐसे लोग जिन्हें दूध पचाने में कठिनाई होती है, वे दही को अपेक्षाकृत आसानी से सहन कर सकते हैं। अनाज और दाल के घोल को फरमेंट करने पर उसमें मौजूद कुछ जटिल पदार्थ टूटते हैं, अम्लता बदलती है और स्वाद तथा बनावट विकसित होती है। यानी सूक्ष्मजीव भोजन का एक प्रकार से आंशिक पूर्व-पाचन कर चुके होते हैं। लेकिन सबसे रोचक कहानी भोजन निगलने के बाद शुरू होती है।
पेट में पहुँचते ही क्या सारे ‘अच्छे बैक्टीरिया’ जीवित रहते हैं?
पेट अत्यधिक अम्लीय (acidic) वातावरण होता है। बहुत-से सूक्ष्मजीव वहीं नष्ट हो सकते हैं। जो जीवित बचते हैं उनमें से भी सभी आंत में स्थायी रूप से बस नहीं जाते। इसलिए यह धारणा कि “एक कटोरी दही खाई और करोड़ों अच्छे बैक्टीरिया हमेशा के लिए पेट में बस गए” सही नहीं है।
कुछ जीवाणु अस्थायी रूप से आंत से गुजरते हुए वहाँ के वातावरण और पहले से मौजूद सूक्ष्मजीवों को प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा मृत सूक्ष्मजीवों के हिस्से और फरमेंटेशन से पहले ही बने पदार्थ भी जैविक प्रभाव डाल सकते हैं। इसीलिए फरमेंटेड भोजन के लाभ को केवल ‘जीवित प्रोबायोटिक पहुँच गए’से नहीं समझा जा सकता।
क्या हर फरमेंटेड चीज प्रोबायोटिक होती है?
हर फरमेंटेड भोजन प्रोबायोटिक नहीं होता। प्रोबायोटिक कहलाने के लिए जीवित सूक्ष्मजीव की पहचान, पर्याप्त मात्रा और स्वास्थ्य लाभ का प्रमाण चाहिए। उदाहरण के लिए बेक की हुई खमीर वाली रोटी फरमेंटेड होती है, लेकिन ओवन की गर्मी अधिकांश जीवों को मार देती है। पाश्चुरीकृत अचार या गर्म किया गया उत्पाद भी फरमेंटेड हो सकता है लेकिन मुमकिन है कि उसमें जीवित सूक्ष्मजीव न बचें।
आंत में पहुँचकर ये करते क्या हैं?
हमारी बड़ी आंत में खरबों सूक्ष्मजीव रहते हैं। इन्हें सामूहिक रूप से गट माइक्रोबायोम, यानी आंत का सूक्ष्मजीव समुदाय कहा जाता है। यह समुदाय भोजन के कुछ हिस्सों को तोड़ता है, अनेक रासायनिक पदार्थ बनाता है और आंत की प्रतिरक्षा प्रणाली के साथ लगातार संवाद करता है। फरमेंटेड भोजन इस समुदाय पर कम-से-कम तीन रास्तों से असर डाल सकता है। पहला, वह स्वयं कुछ जीवित सूक्ष्मजीव लेकर आ सकता है। दूसरा, उसमें फरमेंटेशन के दौरान बने लैक्टिक अम्ल और दूसरे जैव-सक्रिय पदार्थ हो सकते हैं। तीसरा, फरमेंटेशन भोजन की मूल संरचना को बदलकर यह प्रभावित कर सकता है कि आंत के मौजूदा जीवों को कौन-से पोषक पदार्थ उपलब्ध होंगे।
स्टैनफोर्ड के मानव परीक्षण में यही एक दिलचस्प परिणाम मिला। अधिक फरमेंटेड भोजन लेने वाले समूह में समय के साथ आंत के सूक्ष्मजीवों की विविधता बढ़ी। जितना अधिक किण्वित भोजन लिया गया, औसतन उतनी अधिक विविधता देखी गई। लेकिन अधिक विविधता का मतलब ये नहीं कि हमेशा बेहतर स्वास्थ्य। माइक्रोबायोम विज्ञान अभी तेजी से विकसित हो रहा है और केवल प्रजातियों की संख्या देखकर किसी व्यक्ति की आंत को स्वस्थ या अस्वस्थ घोषित नहीं किया जा सकता।
सूजन कम होने की बात कहाँ से आई?
उसी नियंत्रित अध्ययन में शोधकर्ताओं ने रक्त में कई प्रतिरक्षा और सूजन (inflammation) संबंधी संकेत मापे। दस सप्ताह की फरमेंटेड भोजन वाली खुराक के बाद कई सूजन-संबंधी प्रोटीनों के स्तर घटे और कुछ प्रतिरक्षा कोशिकाओं की सक्रियता कम हुई। यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि लगातार हल्की प्रणालीगत सूजन अनेक दीर्घकालीन रोगों से जुड़ी रहती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि दही या किमची ‘सूजन की दवा’ है। शोधकर्ता स्वयं इसे माइक्रोबायोम-प्रतिरक्षा संबंध पर महत्वपूर्ण संकेत मानते हैं, किसी बीमारी का चमत्कारी इलाज नहीं।
आंत और प्रतिरक्षा का संबंध इतना गहरा क्यों है?
हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली का बड़ा हिस्सा आंतों के आसपास सक्रिय रहता है। इसकी वजह साफ है - हर दिन भोजन के साथ बाहरी दुनिया की भारी मात्रा में सामग्री शरीर में आती है। प्रतिरक्षा प्रणाली को लगातार निर्णय करना पड़ता है कि किस चीज को सहन करना है और किस सूक्ष्मजीव के खिलाफ कार्रवाई करनी है।
आंत की भीतरी परत एक प्रकार की जैविक सीमा-दीवार है। स्वस्थ माइक्रोबायोम और उसकी चयापचयी गतिविधियाँ इस अवरोध, स्थानीय प्रतिरक्षा और रोगजनकों से प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकती हैं। कुछ लाभकारी जीव भोजन पचाने में सहायता करते हैं, विटामिन बना सकते हैं या रोग पैदा करने वाले जीवों के लिए वातावरण कम अनुकूल बना सकते हैं। शरीर के कुछ सामान्य लाभकारी बैक्टीरिया भोजन के पाचन, विटामिन निर्माण और रोगजनक कोशिकाओं से रक्षा में योगदान कर सकते हैं।
फरमेंटेशन में बनने वाला लैक्टिक अम्ल भोजन का pH कम करता है। यही कारण है कि दही या किण्वित सब्जियाँ लंबे समय तक टिक सकती हैं, अम्लीय वातावरण कई हानिकारक सूक्ष्मजीवों के लिए प्रतिकूल होता है। यही प्रक्रिया मानव सभ्यता में रेफ्रिजरेटर से हजारों वर्ष पहले भोजन सुरक्षित रखने की एक महत्वपूर्ण तकनीक थी।
क्या फरमेंटेड फूड पाचन को वास्तव में आसान करता है?
कई मामलों में हाँ। उदाहरण के लिए दही में जीवाणुओं द्वारा लैक्टोज के आंशिक विघटन के कारण कुछ लोगों को दूध की तुलना में दही अधिक आसानी से पचता है। अनाज और फलियों के किण्वन से कुछ जटिल कार्बोहाइड्रेट तथा तथाकथित प्रतिपोषक पदार्थों की मात्रा भी बदल सकती है। इससे खनिजों की उपलब्धता या पाचन क्षमता कुछ खाद्य पदार्थों में बेहतर हो सकती है।लेकिन हर व्यक्ति में परिणाम समान नहीं होंगे। किसी को किमची या कांजी से पेट अच्छा लग सकता है, दूसरे को गैस या फूलना बढ़ सकता है। माइक्रोबायोम, आहार, बीमारी और व्यक्ति की सहनशीलता सभी अलग हैं।
इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम जैसी स्थितियों में प्रोबायोटिक्स पर कुछ सकारात्मक प्रमाण हैं, लेकिन परिणाम निर्णायक नहीं हैं और अलग-अलग जीवाणु स्ट्रेन अलग प्रभाव दे सकते हैं। इसलिए “पेट खराब है तो कोई भी प्रोबायोटिक या फरमेंटेड चीज खा लीजिए” वैज्ञानिक सलाह नहीं है।
भारतीय भोजन में फरमेंटेशन बहुत पुराना है
आज किमची, केफिर और कंबूचा आधुनिक स्वास्थ्य-प्रवृत्ति की तरह प्रचारित होते हैं, जबकि भारत में किण्वन हजारों वर्षों से भोजन संस्कृति का हिस्सा रहा है। दही, छाछ, कांजी, इडली, दोसा, ढोकला, अप्पम और अनेक क्षेत्रीय किण्वित खाद्य पदार्थ इसके उदाहरण हैं।
इडली का घोल देखें। चावल और उड़द दाल को भिगोकर पीसा जाता है और कुछ घंटे रखा जाता है। वातावरण और सामग्री में मौजूद सूक्ष्मजीव कार्बोहाइड्रेट का किण्वन करते हैं। अम्ल और गैस बनती है। घोल फूलता है और स्वाद बदलता है। बाद में भाप में पकाने पर अधिकांश जीवित सूक्ष्मजीव मर जाते हैं। इसलिए इडली फरमेंटेड फूड तो है, लेकिन उसे जीवित प्रोबायोटिक भोजन कहना सामान्यतः उचित नहीं। यही फर्क बहुत महत्वपूर्ण है।
दही में जीवित बैक्टीरिया मौजूद हो सकते हैं। लेकिन वही दही अत्यधिक गर्म कर दिया जाए तो वे मर सकते हैं। भोजन की पूरी निर्माण प्रक्रिया तय करती है कि खाने के समय उसमें जीवित सूक्ष्मजीव हैं या केवल उनके बनाए हुए पदार्थ।
क्या अचार भी प्रोबायोटिक है?
कुछ अचार हो सकते हैं, कुछ नहीं। यदि सब्जी को नमक-पानी में प्राकृतिक लैक्टिक अम्ल फर्मेंटेशन से तैयार किया गया है और बाद में उसे इतनी गर्मी नहीं दी गई कि सूक्ष्मजीव मर जाएँ, तो उसमें जीवित सूक्ष्मजीव हो सकते हैं। लेकिन केवल सिरका डालकर बनाया गया अचार जरूरी नहीं कि वास्तव में फरमेंटेड हो। सिर्फ खट्टा स्वाद प्रोबायोटिक होने का प्रमाण नहीं है।
क्या फरमेंटेड भोजन विटामिन बढ़ाता है?
कुछ प्रकार के फरमेंटेशन में सूक्ष्मजीव विटामिन और दूसरे जैव-सक्रिय पदार्थ बना सकते हैं या भोजन में पहले मौजूद पोषक तत्वों की उपलब्धता बदल सकते हैं। लेकिन यह हर खाद्य पदार्थ और हर किण्वन में समान नहीं होता। इसलिए यह कहना कि “फरमेंटेशन हर चीज का पोषण कई गुना बढ़ा देता है” अतिशयोक्ति है। वास्तविक लाभ भोजन-विशिष्ट है। दही का पोषण अलग है, किमची का अलग, इडली का अलग और केफिर का अलग। ‘फरमेंटेड’ शब्द उन सभी को एक जैविक प्रक्रिया से जोड़ता है, उन्हें पोषण की दृष्टि से समान नहीं बना देता।
फरमेंटेड भोजन और दिमाग का संबंध भी है?
आंत और मस्तिष्क के बीच तंत्रिकाओं, हार्मोन, प्रतिरक्षा संकेतों और सूक्ष्मजीवों द्वारा बनाए जाने वाले पदार्थों के माध्यम से दोतरफा संवाद होता है। इसे सामान्यतः गट-ब्रेन एक्सिस कहा जाता है। इससे यह संभावना जरूर बनती है कि माइक्रोबायोम में बदलाव मानसिक स्वास्थ्य या मस्तिष्कीय कार्य को भी प्रभावित कर सकता है। लेकिन अभी पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।
स्टैनफोर्ड के शोधकर्ताओं ने भी हाल में स्पष्ट किया है कि माइक्रोबायोम और मस्तिष्क का संबंध महत्वपूर्ण है, लेकिन हम अभी उस अवस्था में नहीं पहुँचे हैं जहाँ किसी खास माइक्रोबायोम परिवर्तन को लक्ष्य बनाकर विश्वसनीय रूप से मस्तिष्कीय कार्य सुधारा जा सके।
क्या रोज फरमेंटेड फूड खाना चाहिए?
स्वस्थ व्यक्ति के लिए विविध संतुलित भोजन के हिस्से के रूप में उचित मात्रा में किण्वित खाद्य पदार्थ शामिल करना अच्छा विकल्प हो सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि जितना ज्यादा, उतना बेहतर। कुछ किण्वित खाद्य पदार्थों में नमक बहुत अधिक हो सकता है, जैसे कुछ अचार, किमची और सॉअरक्राउट। अधिक नमक उच्च रक्तचाप वाले लोगों के लिए समस्या बन सकता है। कुछ उत्पादों में चीनी अधिक हो सकती है। कुछ पेयों में अल्कोहल की थोड़ी मात्रा हो सकती है। और कुछ लोगों में किण्वित भोजन गैस, पेट फूलना या असुविधा पैदा कर सकता है।
इसलिए ‘फरमेंटेड मायने स्वस्थ’ समीकरण अपने-आप सही नहीं होता। किसी बहुत मीठे या बहुत नमकीन औद्योगिक उत्पाद को केवल इसलिए स्वास्थ्यवर्धक नहीं कहा जा सकता कि वह किण्वित है।
घर का बना फरमेंटेड भोजन हमेशा अच्छा है?
नियंत्रित फरमेंटेशन और भोजन का सड़ना दो अलग चीजें हैं। सही फरमेंटेशन में लाभकारी या अपेक्षित सूक्ष्मजीव नियंत्रित परिस्थिति में बढ़ते हैं और भोजन की अम्लता तथा संरचना बदलते हैं। गलत तापमान, गंदे बर्तन, अनुचित नमक मात्रा या दूषित सामग्री में हानिकारक सूक्ष्मजीव भी बढ़ सकते हैं। इसलिए पारंपरिक फरमेंटेशन विधियों में साफ-सफाई, सही तापमान और उचित नमक-अम्लता के नियम केवल स्वाद के लिए नहीं बने, वे भोजन सुरक्षा से भी जुड़े हैं। फफूंद, असामान्य दुर्गंध, विचित्र रंग या कंटेनर में संदिग्ध परिवर्तन दिखें तो ‘प्रोबायोटिक बन गया होगा’ सोचकर खाना जोखिमपूर्ण है।
एंटीबायोटिक लेने के बाद क्या दही आंत को तुरंत ‘रीसेट’ कर देता है?
एंटीबायोटिक आंत के माइक्रोबायोम को बदल सकते हैं और कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में कुछ प्रोबायोटिक्स उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन एक कटोरी दही पूरे माइक्रोबायोम को तुरंत पुराने रूप में वापस नहीं करती। माइक्रोबायोम अत्यंत जटिल पारिस्थितिकी है। उसकी बहाली व्यक्ति, एंटीबायोटिक, आहार और पहले से मौजूद जीवों पर निर्भर करती है।इसीलिए प्रोबायोटिक सप्लीमेंट और प्राकृतिक किण्वित भोजन को भी एक ही चीज नहीं समझना चाहिए। सप्लीमेंट में कुछ चुने हुए स्ट्रेन होते हैं; भोजन में सूक्ष्मजीवों के साथ पोषक तत्व और फरमेंटेशन उत्पाद भी होते हैं।
फाइबर और फरमेंटेड फूड में कौन बेहतर है?
दोनों अलग तरीके से आंत को प्रभावित कर सकते हैं। फाइबर का बड़ा हिस्सा हमारी छोटी आंत में नहीं पचता और बड़ी आंत में मौजूद सूक्ष्मजीव उसका फरमेंटेशन करते हैं। इससे शॉर्ट-चेन फैटी एसिड जैसे पदार्थ बन सकते हैं, जो आंत की कोशिकाओं और प्रतिरक्षा में भूमिका निभाते हैं।
फरमेंटेशन वाला भोजन दूसरी ओर पहले से ही सूक्ष्मजीवों और उनके बनाए पदार्थों को भोजन के साथ लाता है। दिलचस्प रूप से 2021 के स्टैनफोर्ड अध्ययन में उच्च फाइबर और उच्च फरमेंटेड भोजन वाले समूहों ने अलग-अलग माइक्रोबायोम और प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाएँ दिखाईं। शोधकर्ताओं का निष्कर्ष यह नहीं था कि फाइबर बेकार और फरमेंटेड भोजन श्रेष्ठ है; बल्कि दोनों के प्रभाव अलग हो सकते हैं। व्यावहारिक रूप से स्वस्थ आंत के लिए विविध पौध-आधारित फाइबर और उपयुक्त फरमेंटेशन भोजन दोनों अधिक समझदारी का रास्ता हैं।
फरमेंटेड भोजन के पक्ष में विज्ञान निश्चित रूप से रोचक है। कुछ मानव अध्ययनों में माइक्रोबायोम विविधता और प्रतिरक्षा संबंधी संकेतों में लाभ दिखाई दिए हैं। कई पारंपरिक किण्वित खाद्य पदार्थ पौष्टिक हैं और पाचन में उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन इसे चमत्कारी श्रेणी में रखना उचित नहीं। कोई अकेला भोजन अच्छे स्वास्थ्य का विकल्प नहीं हो सकता। यदि पूरा आहार अत्यधिक प्रसंस्कृत, कम फाइबर, अधिक नमक-चीनी वाला है तो रोज एक बोतल कंबूचा पीने से वह अचानक स्वस्थ नहीं बन जाएगा।इसलिए ‘सुपरफूड’ की जगह वैज्ञानिक रूप से बेहतर शब्द होगा “कुछ प्रकार के किण्वित खाद्य पदार्थ स्वास्थ्य के लिए उपयोगी कार्यात्मक भोजन हो सकते हैं।”
और शरीर में पहुँचकर इनका काम सबसे सरल तरीके से समझें तो प्रक्रिया यह है: फरमेंटेशन पहले ही भोजन का कुछ हिस्सा बदल चुका होता है; पेट और आंत में पहुँचने पर जीवित बचे सूक्ष्मजीव तथा उनके बनाए पदार्थ आंत के मौजूदा माइक्रोबायोम से संपर्क करते हैं; पाचन, स्थानीय वातावरण और प्रतिरक्षा संकेतों को प्रभावित कर सकते हैं; और नियमित सेवन से कुछ लोगों में माइक्रोबायोम की संरचना तथा सूजन-संबंधी संकेत बदल सकते हैं।
यानी फरमेंटेड भोजन की असली खूबी यह नहीं कि उसमें कोई रहस्यमय ‘सुपर’ तत्व है। उसकी खासियत यह है कि हम भोजन अकेले नहीं खाते—हम भोजन के साथ सूक्ष्मजीवों की बनाई हुई एक पूरी रासायनिक दुनिया भी खाते हैं। और वह दुनिया हमारी आंत में पहले से मौजूद खरबों सूक्ष्मजीवों के साथ मिलकर शरीर की अनेक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकती है।