कैसे लिखी गई AAP की बर्बादी की पटकथा? एक महीने तक चली तैयारी, समझिए पूरा खेल

AAP Crisis: आम आदमी पार्टी के भीतर मची सियासी हलचल अब खुलकर सामने आ गई है। एक महीने तक चली गुप्त रणनीति, राघव चड्ढा की भूमिका और राज्यसभा सांसदों के बीजेपी में मर्जर की पूरी कहानी अब सामने आ रही है। जानिए कैसे तैयार हुई AAP की बर्बादी की पूरी पटकथा।

Update:2026-04-24 22:53 IST

AAP Crisis: आम आदमी पार्टी के भीतर पिछले एक महीने से जो हलचल दबे सुरों में चल रही थी, वह शुक्रवार सुबह अचानक खुलकर सामने आ गई। पार्टी के दस में से सात राज्यसभा सांसदों ने भारतीय जनता पार्टी में मर्जर के दस्तावेज राज्यसभा चेयरमैन को सौंप दिए। यह सिर्फ दल बदल का मामला नहीं माना जा रहा, बल्कि एक ऐसी राजनीतिक पटकथा है जिसकी तैयारी लंबे समय से पर्दे के पीछे चल रही थी। तो कैसे लिखी गई आम आदमी पार्टी में बिखराव की पूरी पटकथा? आइए समझते हैं पूरी कहानी।

पूरी रणनीति के केंद्र में राघव चड्ढा

रिपोर्ट्स के मुताबिक इस पूरे घटनाक्रम की कमान राघव चड्ढा के हाथ में थी। बताया जा रहा है कि पिछले एक महीने में अलग अलग समय पर एक एक कर सांसदों की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात हुई थी। इन बैठकों को बेहद गोपनीय रखा गया और बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने इन चर्चाओं का स्वागत किया।

जिसके बाद शुक्रवार सुबह ठीक ग्यारह बजे वह अहम क्षण आया जब राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने हस्ताक्षरित दस्तावेज राज्यसभा चेयरमैन को सौंपे। यह सिर्फ एक औपचारिक कदम नहीं था बल्कि आम आदमी पार्टी की संसदीय राजनीति में सबसे बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।

संख्या का गणित बना सबसे बड़ा खेल

दरअसल एंटी डिफेक्शन कानून के तहत किसी भी दल से अलग होने के लिए दो तिहाई सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। आम आदमी पार्टी के कुल दस राज्यसभा सांसद हैं इसलिए कम से कम सात सांसदों का साथ होना अनिवार्य था। यही वजह थी कि पूरी रणनीति में संख्या सबसे बड़ा आधार भी बनी और सबसे बड़ा जोखिम भी।

रिपोर्ट्स के अनुसार अगर इनमें से एक भी सांसद अंतिम समय में पीछे हट जाता तो बाकी छह सांसदों की सदस्यता पर भी खतरा खड़ा हो सकता था। इसी कारण शुरुआत में आठ सांसदों को साथ जोड़ने की कोशिश की गई थी ताकि कोई जोखिम न रहे।

बाबा बलवीर सिंह सीचेवाल पर रही खास नजर

वहीं पंजाब से राज्यसभा सांसद बाबा बलवीर सिंह सीचेवाल को मनाने के लिए कई दौर की कोशिशें हुईं। उन्हें साथ लाने की कोशिश इसलिए भी महत्वपूर्ण थी ताकि संख्या का पूरा जोखिम खत्म हो सके। लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद वे इस बदलाव का हिस्सा बनने के लिए तैयार नहीं हुए।

इसी वजह से अंतिम समय तक स्थिति बेहद तनावपूर्ण बनी रही और जब तक सात सांसदों के हस्ताक्षर पक्के नहीं हो गए तब तक पूरी टीम सतर्क रही।

संदीप पाठक का नाम बना सबसे बड़ा झटका

वहीं इन सात सांसदों में तीन पुराने पार्टी कार्यकर्ता रहे जबकि चार उद्योगपति माने जाते हैं। पुराने कार्यकर्ताओं में राघव चड्ढा और स्वाति मालीवाल के असंतोष की चर्चा पहले से ही थी लेकिन संदीप पाठक का नाम सामने आना पार्टी नेतृत्व के लिए सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है।

आपको बताते चलें कि संदीप पाठक दिल्ली चुनाव में संगठन के बेहद अहम चेहरे रहे थे लेकिन चुनाव हारने के बाद उन्हें अपेक्षित भूमिका नहीं मिली। इसी दौरान उनकी नाराजगी लगातार बढ़ती गई और बाद में उन्हें बंगला आवंटित किया गया। इसी समय उनकी बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात की भी चर्चा सामने आई।

अशोक मित्तल और ईडी रेड का घटनाक्रम

वहीं अशोक मित्तल का नाम भी इस पूरे घटनाक्रम में काफी अहम रहा है। लगभग दस दिन पहले उनके घर और प्रतिष्ठानों पर ईडी की छापेमारी हुई थी। दिलचस्प बात यह रही कि इससे कुछ दिन पहले ही उन्हें राघव चड्ढा की जगह राज्यसभा में पार्टी का उपनेता बनाया गया था।

राजनीतिक गलियारों में इन घटनाओं को महज संयोग नहीं बल्कि बड़े संकेत के रूप में देखा गया और अब वही अशोक मित्तल इस बड़े राजनीतिक बदलाव का हिस्सा बन गए हैं।

राघव चड्ढा और पार्टी के बीच बढ़ती दूरी

राघव चड्ढा और पार्टी नेतृत्व के बीच दरार की शुरुआत दो हजार चौबीस से मानी जा रही है। जब अरविंद केजरीवाल शराब नीति मामले में गिरफ्तार हुए तब राघव चड्ढा की चुप्पी ने सबसे पहले सवाल खड़े किए।

उन्होंने लंदन में मेडिकल चेकअप का हवाला दिया लेकिन पार्टी के भीतर इसे अलग नजर से देखा गया। इसके बाद पार्टी के कई आंदोलनों से उनकी दूरी लगातार चर्चा का विषय बनी रही। लंदन से लौटने के बाद उनकी अरविंद केजरीवाल से मुलाकात ने कुछ समय के लिए अटकलों को शांत किया लेकिन यह स्थिति ज्यादा दिनों तक नहीं चली।

चुनाव और संगठन से दूरी ने बढ़ाई खाई

वहीं दो हजार पच्चीस के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी राघव चड्ढा की सक्रियता बेहद सीमित रही। पार्टी की हार और सत्ता से बाहर होने के बाद उनके और नेतृत्व के बीच दूरी और स्पष्ट हो गई।

जब अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जेल से बाहर आए तब भी राघव चड्ढा की चुप्पी ने यह संकेत दे दिया कि अंदर कुछ बड़ा बदलाव चल रहा है।

आखिरी दरार और खुला टकराव

जिसके बाद इस महीने की शुरुआत में पार्टी ने राघव चड्ढा को राज्यसभा में उपनेता पद से हटाकर अशोक मित्तल को जिम्मेदारी सौंप दी। इसके साथ ही सदन में उनकी भूमिका भी सीमित कर दी गई।

इसके बाद राघव चड्ढा ने सोशल मीडिया पर लिखा साइलेंसड बट नॉट डिफिटिड और पार्टी पर कई आरोप लगाए। यही वह मोड़ था जब अंदरूनी मतभेद खुलकर सामने आ गए।

आप के लिए बड़ा संकट

वहीं यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ सात सांसदों के दल बदल तक सीमित नहीं है बल्कि आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। जिस पार्टी ने खुद को वैकल्पिक राजनीति का चेहरा बताया था उसके भीतर की असहमति अब खुलकर सामने आ गई है।

ऐसा माना जा रहा है कि लंबे समय से चल रही नाराजगी गुप्त बैठकें कानूनी गणित और सत्ता के समीकरण मिलकर उस राजनीतिक कहानी का हिस्सा बने जिसने शुक्रवार को भारतीय राजनीति में एक नया मोड़ दे दिया। 

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