ऑटो ड्राइवरों के लिए ‘मराठी क्यों जरूरी?’ भड़के अखिलेश यादव, महाराष्ट्र सरकार को घेरा, शिवसेना ने दिया करारा जवाब
महाराष्ट्र में टैक्सी और ऑटो ड्राइवरों के लिए मराठी का ज्ञान अनिवार्य किए जाने पर अखिलेश यादव ने सवाल उठाए। शिवसेना नेता प्रताप सरनाईक ने पलटवार किया।
Akhilesh Yadav on Marathi Rule: महाराष्ट्र में टैक्सी और ऑटो ड्राइवरों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य किए जाने को लेकर समाजवादी पार्टी के प्रमुख और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। वहीं, महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री और शिवसेना नेता प्रताप बाबूराव सरनाईक ने अखिलेश यादव पर पलटवार करते हुए उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति के बजाय आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर ध्यान देने की सलाह दी है।
अखिलेश यादव ने मराठी नियम पर क्या कहा?
अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर महाराष्ट्र सरकार के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि हर राज्य की मातृभाषा का सम्मान और प्रचार होना चाहिए, लेकिन भाषा को राजनीति का मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए।
उन्होंने सवाल उठाया कि किसी व्यक्ति के लिए किसी राज्य में काम करने या कारोबार करने के लिए स्थानीय भाषा का ज्ञान अनिवार्य करना क्या संविधान में मिले देशभर में काम और व्यापार करने के अधिकार को प्रभावित नहीं करता?
अखिलेश ने कहा कि भाषा के नाम पर ऐसी शर्तें लगाने से देश की भाषाई और भावनात्मक एकता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने गरीब और कामकाजी वर्ग पर पड़ने वाले संभावित असर को लेकर भी सवाल उठाए।
‘कहीं कमीशन का खेल तो नहीं?’
सपा प्रमुख ने इस नियम के पीछे ऑटो और बड़ी गाड़ियों के कारोबार से जुड़े हितों की संभावना पर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि क्या इस फैसले के पीछे किसी तरह का ‘कमीशन रैकेट’ हो सकता है?
अखिलेश ने आशंका जताई कि यदि ऑटो-रिक्शा चालकों के लिए नियम सख्त होते हैं तो इसका फायदा बड़ी गाड़ियां बेचने वाली कंपनियों को मिल सकता है, जबकि छोटे वाहन चालकों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि अलग-अलग राज्यों में काम करने वाले लोगों पर स्थानीय भाषा सीखने का दबाव बढ़ने से देश में भाषाई आधार पर दूरी पैदा हो सकती है।
शिवसेना ने अखिलेश यादव को दिया जवाब
महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप बाबूराव सरनाईक ने अखिलेश यादव के बयान पर पलटवार किया। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव को महाराष्ट्र की राजनीति में दखल देने के बजाय उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव पर ध्यान देना चाहिए।
सरनाईक ने कहा कि महाराष्ट्र ने पिछले कई दशकों से उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों को रोजगार और आजीविका के अवसर दिए हैं।
उन्होंने अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री कार्यकाल पर भी निशाना साधते हुए कहा कि अगर उत्तर प्रदेश में पर्याप्त रोजगार के अवसर पैदा हुए होते तो बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार की तलाश में महाराष्ट्र नहीं आना पड़ता।
‘महाराष्ट्र की भाषा और संस्कृति का सम्मान जरूरी’
सरनाईक ने स्पष्ट किया कि सरकार का उद्देश्य किसी ड्राइवर की रोजी-रोटी छीनना नहीं है। उनका कहना है कि टैक्सी और ऑटो ड्राइवरों का यात्रियों से रोजाना संवाद होता है, इसलिए उन्हें महाराष्ट्र में यात्रियों से सामान्य बातचीत करने लायक मराठी का ज्ञान होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि राज्य में गैर-मराठी भाषी ड्राइवरों को मराठी सिखाने के लिए करीब 180 स्थानों पर 1,600 से 1,800 शिक्षक लगाए गए हैं।
सरकार ने ड्राइवरों को भाषा सीखने के लिए समय देने की बात भी कही है। हालांकि, नियम पूरा नहीं करने वाले ड्राइवरों के बैज रद्द किए जाने की कार्रवाई हो सकती है।
1.65 लाख ड्राइवरों ने पूरी की मराठी ट्रेनिंग
महाराष्ट्र सरकार के अनुसार, गैर-मराठी भाषी टैक्सी और ऑटो-रिक्शा ड्राइवरों के लिए मराठी भाषा प्रशिक्षण अभियान चलाया गया है। सरकार का दावा है कि 105 दिनों के अभियान के दौरान 1.65 लाख ड्राइवरों ने प्रशिक्षण पूरा कर प्रमाणपत्र हासिल किया।
क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों (RTO) की ओर से उन ड्राइवरों को नोटिस भी जारी किए जा रहे हैं, जिनके पास मराठी का पर्याप्त कार्यसाधक ज्ञान नहीं है।
16 सवालों की परीक्षा, 30 सितंबर तक जारी रहेगा अभियान
ड्राइवरों को रोजमर्रा की परिस्थितियों पर आधारित 16 सवालों की परीक्षा देनी होगी। इसमें यात्रियों से गंतव्य, रास्ते, किराया, मीटर, रूट और स्टैंड जैसी सामान्य जानकारी से जुड़े सवाल शामिल हैं।
सरकार की ओर से चलाया जा रहा यह प्रवर्तन अभियान 30 सितंबर तक जारी रहने वाला है।
भाषा बनाम रोजगार की राजनीति
महाराष्ट्र का यह फैसला अब सिर्फ भाषा के नियम तक सीमित नहीं रह गया है। अखिलेश यादव ने इसे संवैधानिक अधिकार और देश की भाषाई एकता से जोड़ दिया है, जबकि शिवसेना ने इसे महाराष्ट्र की भाषा और संस्कृति के सम्मान का मामला बताया है।
सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह है कि क्या स्थानीय भाषा का ज्ञान किसी राज्य में सार्वजनिक परिवहन से जुड़े रोजगार के लिए जरूरी शर्त होनी चाहिए या इससे दूसरे राज्यों से आने वाले कामगारों के अधिकार प्रभावित होंगे। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर महाराष्ट्र के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी बयानबाजी तेज हो सकती है।