शिरडी में हिन्दी साहित्य भारती का पांचवां अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन सम्पन्न
Hindi Sahitya Bharti Convention: शिरडी, महाराष्ट्र में हिन्दी साहित्य भारती का तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन सम्पन्न हुआ। इसमें 15 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और भारतीय संस्कृति, सनातन मूल्य, शिक्षा पद्धति और वैश्विक शांति पर विचार-विमर्श किया गया।
Hindi Sahitya Bharti convention
Hindi Sahitya Bharti Convention: भारतीय जीवन दर्शन, सनातन धर्म की मूल संकल्पना वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे जना:सुखिनः भवन्तु की उदात्त भावना के प्रसार हेतु"मानव बन जाए जग सारा, यह पावन संकल्प हमारा" के सार्थक उद्देश्य के निमित्त वर्ष 2020 से कार्यरत अंतरराष्ट्रीय संस्था " हिन्दी साहित्य भारती"( पंजीकृत न्यास) का तीन दिवसीय वार्षिक अधिवेशन शिरडी स्थित साईं बाबा सांस्कृतिक संकुल के भव्य सभागार में विगत दिनों सम्पन्न हुआ ! अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन में देश भर के विभिन्न राज्यों, केन्द्र शासित प्रदेशों के दो सौ से ज्यादा प्रतिनिधियों ने अपनी सहभागिता दर्ज करायी।15 से ज्यादा विभिन्न देशों के पदाधिकारियों ने ऑनलाइन जुड़कर प्रतिभाग किया!आस्ट्रेलियाई प्रतिनिधि चार्ल्स एस थाॅम्सन ने भौतिक रूप से सहभाग किया! तीन दिवसीय आयोजन में सात विविध सत्रों मे क्रमशः सदस्यता एवं सांगठनिक समीक्षा, युवा शक्ति और सनातन धर्म, महिला सशक्तिकरण और भारतीय दृष्टिकोण, भारतीय सांस्कृतिक चेतना का वैश्विक आयाम, संस्था के विविध आयामों व प्रकोष्ठों की समीक्षा पर सिलसिलेवार विशद विमर्श सम्पन्न हुआ।
सर्व सम्मत तीन प्रस्ताव पारित कर भारत सरकार को प्रेषित करने का अनुमोदन किया गया। पहले प्रस्ताव के अन्तर्गत " शिक्षा का माध्यम सिर्फ भारतीय भाषाएं हों"पर तैयार तथ्यपरक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया। दूसरे प्रस्ताव " साम्प्रदायिक शिक्षा भारत के लिए अभिशाप के तहत मिशनरियों व मदरसों में दी जा रही साम्प्रदायिक और विभेदीकरण शिक्षा को निषिद्ध किये जाने की मांग की गई।तीसरे महत्वपूर्ण प्रस्ताव में देश में नैतिक और सनातन मूल्यों की पक्षधर "गुरूकुल शिक्षा पद्धति को सम्पूर्ण राष्ट्र में कार्यान्वित किए जाने की मांग की गई। अधिवेशन के उद्धघाटन सत्र में मुख्य संबोधन सेवानिवृत्त आई ए एस डाक्टर भाग्येश झा(अध्यक्ष, गुजरात साहित्य अकादमी) ने किया।कहा, मौजूदा कम्प्यूटर चिप को मां सरस्वती के आधुनिक स्वरूप की भांति अंगीकार करना चाहिए। भारतीय भाषाओं की संस्थापना हमारे डी एन ए में होनी चाहिए। हस्ताक्षर अपनी मात्र भाषा में हों।यन्त्र प्रज्ञा को चैतन्य प्रज्ञा पर हावी नहीं होने देना है।
मुख्य अतिथि डॉक्टर अतुलभाई कोठारी राष्ट्रीय सचिव , शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने अपने सारगर्भित संबोधन में कहा किआज विश्व जैसे चौराहे पर खड़ा है 85 से ज्यादा देश तेल संकट व अन्य कठिनाई का सामना कर रहे हैं।भौतिक विकास तो बढ़ रहा है पर समस्याएं भी मुंह बाए खड़ी हैं। आज दुनिया भारत की ओर आशाभरी निगाहों से देख रही है। कि वह समाप्त होते माक्र्सवाद और पनपते पूंजीवाद के बीच भारतीय ज्ञान परंपरा के आदर्श माडल को आत्मसात कर शान्ति और सौहार्द को चरितार्थ कर सके। उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व शिक्षा व कृषि मंत्री तथा हिन्दी साहित्य भारती के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर रवींद्र शुक्ल ने कहा कि भारतीय सनातन धर्म ही निखिल विश्व में एक धर्म है बाकी सभी पन्थ या रिलीजन हैं।
दुनिया के सारे चिंतन एकांगी हैंजबकि भारतीय सांस्कृतिक सोच व्यापक और वसुधैव कुटुंबकम और कल्याणप्रद भावना से ओतप्रोत है।सृष्टि के सृजन के साथ ही सनातन का अवतरण हुआ। श्रद्धा व समर्पण की नगरी शिरडी की पावन भूमि पर हिन्दी साहित्य भारती ने नव जागरण का शंखनाद किया है।भारत का आशय है भा यानि ज्ञान और रत यानि प्रतीक। देश का नाम भारत हो न कि इंडिया ! इंडिया का कोई शब्दार्थ तक नहीं है। डिक्शनरी में नहीं है।ओम उच्चारण के ध्वनी मत से यह संकल्प भी पारित किया गया कि देश का नाम सिर्फ भारत हो।
ज्ञातव्य हो कि इस मांग को लेकर देशभर से प्रबुद्ध वर्ग के 21000 संकल्प पत्र हस्ताक्षरित करवाकर शीघ्रातिशीघ्र राष्ट्रपति महोदया को हस्तगत कराया जाना प्रस्तावित है।दुनिया में आज सनातन धर्म का संदेश ही सुख शान्ति और सद्भाव ला सकने का माध्यम है।भौतिक विकास के साथ ही आध्यात्मिक विकास भी पूरक सदृश्य परिलक्षित है।इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठतम प्रचारक श्री लक्ष्मी नारायण भाला ने संग संगठन विस्तार के कौशल पर विस्तार पूर्वक अपने सूत्र प्रस्तुत किए। तीनों दिन पूर्व निर्धारित सत्रों के समापन के उपरान्त आयोजित काव्य मंच के अन्तर्गत गणमान्य सुस्थापित कवियों/ कवयित्रियों ने ओजस्वी काव्यपाठ कर शमा बांध दिया। तीसरे दिन असम राज्य के महामहिम राज्यपाल श्री लक्ष्मण आचार्य ने ऑनलाइन जुड़कर अपना समसामयिक संभाषण प्रस्तुत कर तालियां बटोरीं।
15 से ज्यादा देशों यथा नेपाल, कनाडा,ब्रिटेन,श्री लंका,तंजानिया, फिजी, भूटान,ताजिकिस्तान, जर्मनी आदि से ऑनलाइन जुड़कर प्रतिभाग कर रहे पदाधिकारियों नेअपने विचार व्यक्त किए। सभी ने एकमत से स्वीकार किया कि मौजूदा वैश्विक झंझावात के विषम काल में भारतीय सनातन मूल्य ही विश्व शान्ति व सौहार्द का स्थाई समाधान बन सकने में सक्षम हैं।भारतीय सांस्कृतिक चेतना का यही वैश्विक आयाम है। विदेशी प्रतिनिधियों ने यह मत स्थिर किया कि जहां पाश्चात्य दुनिया बाजार दिखती है वहीं भारतीय चिंतन सम्पूर्ण विश्व को परिवार के स्वरूप में देखता है।यही भारतीय चिंतन परम्परा है।हिन्दी भाषा को राष्ट्रीय विमर्श हेतु राष्ट्र भाषा के रूप में वैधानिक दर्जा प्रदान करने की पुरजोर मांग कर औपचारिक प्रस्ताव पारित किया गया।यह माना गया कि प्रवासी भारतीय संबंधित देशों में सांस्कृतिक राजदूत हैं। फिजी में मौजूद 2000 रामायण मंडलियों और तुलसीदास रचित श्री राम चरित मानस ने भारतीय जीवन दर्शन से जोड़कर रखा है।
हिन्दी साहित्य भारती के सूत्र वाक्य "मानव बन जाए जग सारा, यह पावन संकल्प हमारा!" वसुधैव कुटुंबकम का मूल आधार है।तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन में संस्था के अंतर्राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ख्यातिलब्ध साहित्यकार आचार्य देवेंद्र देव,मुम्बई विश्व विद्यालय के डॉक्टर करूणा शंकर उपाध्याय,राम निवास शुक्ल, वागीश दिनकर , प्रोफेसर दयानंद तिवारी,डॉक्टर रमा शर्मा ( दिल्ली विश्वविद्यालय),अपर पुलिस महानिदेशक, महाराष्ट्र श्री कृष्ण प्रकाश,प्रोफेसर बलभद्र त्रिपाठी, प्रोफेसर विनोद मिश्र ( त्रिपुरा विश्व विद्यालय), डाक्टर आलोक सिंह ( मेघालय विश्व विद्यालय) ने भी संबोधित किया।
इस अवसर पर हिन्दी साहित्य भारती की विवरणात्मक परिचायिका का भी विमोचन किया गया। सभी आगन्तुक अतिथियों का स्वागत शाल, स्मृति चिन्ह और संस्था के अंगवस्त्र व पुष्प गुच्छ के साथ किया गया।अधिवेशन में आए समस्त प्रतिभागियों को भी स्मृति चिन्ह और प्रमाणपत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। अंतर्राष्ट्रीय संस्था हिन्दी साहित्य भारती के केन्द्रीय मीडिया संयोजक आनन्द उपाध्याय ने एक प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से यह जानकारी दी है।