विश्व विज्ञान की नई जंग; विज्ञान, शिक्षा और उद्योग—भारत में तीनों का एकीकरण कैसे हो?
India Science Education: भारत सुपरपावर कैसे बनेगा? जवाब सिर्फ AI नहीं, विज्ञान-शिक्षा-उद्योग के इस फॉर्मूले में छिपा है
India Science Education
India Science Education: किसी भी राष्ट्र की वैज्ञानिक शक्ति केवल उसकी प्रयोगशालाओं, वैज्ञानिकों या शोध-पत्रों की संख्या से निर्धारित नहीं होती। वास्तविक शक्ति तब बनती है जब शिक्षा नई प्रतिभा तैयार करे, विज्ञान उस प्रतिभा को ज्ञान और तकनीक में बदले और उद्योग उस ज्ञान को उत्पादन, रोजगार, निर्यात तथा राष्ट्रीय सामर्थ्य में रूपांतरित करे। जहाँ ये तीनों क्षेत्र अलग-अलग दिशाओं में काम करते हैं, वहाँ उपलब्धियाँ बिखरी रहती हैं।कुछ उत्कृष्ट वैज्ञानिक बनते हैं, कुछ सफल कंपनियाँ उभरती हैं और कुछ विश्वविद्यालय अच्छा कार्य करते हैं। लेकिन राष्ट्र के स्तर पर कोई सतत वैज्ञानिक-औद्योगिक शक्ति नहीं बन पाती। भारत की सबसे बड़ी समस्या भी यही है। हमारे पास प्रतिभा है, विश्वविद्यालय हैं, सरकारी प्रयोगशालाएँ हैं, उद्योग हैं और विशाल बाजार भी है। लेकिन इनके बीच वह जीवंत और संस्थागत संबंध अभी तक नहीं बन पाया है जो ज्ञान को आर्थिक तथा सामरिक शक्ति में बदल सके। यदि विश्वविद्यालय केवल डिग्री दें, वैज्ञानिक संस्थान केवल शोध-पत्र प्रकाशित करें और उद्योग विदेशी तकनीक खरीदकर उत्पादन करे, तो देश की अर्थव्यवस्था बढ़ सकती है, पर उसकी तकनीकी संप्रभुता सीमित ही रहेगी। भारत को इस बिखराव से बाहर निकलकर ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें विद्यालय से निकला विद्यार्थी विश्वविद्यालय में जिज्ञासु शोधकर्ता बने, शोधकर्ता प्रयोगशाला में उपयोगी ज्ञान पैदा करे, उद्योग उस ज्ञान को उत्पाद में बदले और बाजार से प्राप्त लाभ का एक हिस्सा फिर से अनुसंधान और शिक्षा में निवेश किया जाए। यही वह चक्र है जिसने अमेरिका, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया और बाद में चीन को वैज्ञानिक-औद्योगिक शक्ति बनाया।
भारतीय शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से अंकों, परीक्षाओं और डिग्रियों पर केंद्रित रही है। इस व्यवस्था ने बड़ी संख्या में अनुशासित और परिश्रमी विद्यार्थी अवश्य तैयार किए। लेकिन उनमें स्वतंत्र प्रयोग, असफलता का साहस और मौलिक प्रश्न पूछने की क्षमता पर्याप्त रूप से विकसित नहीं की। विद्यालय में विज्ञान पढ़ाने का अर्थ अक्सर सूत्र याद करना, परिभाषाएँ लिखना और निर्धारित प्रयोगों को यांत्रिक ढंग से दोहराना रह गया। विश्वविद्यालय में भी अनेक विद्यार्थी प्रयोगशाला तक पहुँचने से पहले ही नौकरी की तैयारी में लग जाते हैं। इस प्रवृत्ति को बदलना होगा। वैज्ञानिक शिक्षा की शुरुआत महँगी प्रयोगशाला से नहीं, जिज्ञासा से होती है।
बच्चे को यह समझाया जाना चाहिए कि विज्ञान किसी पुस्तक में बंद अंतिम सत्य नहीं बल्कि प्रकृति और समाज से प्रश्न पूछने की एक पद्धति है। उसे चीजें खोलने, बनाने, बिगाड़ने, फिर से जोड़ने, तुलना करने और अपने निष्कर्ष प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। विद्यालयों में स्थानीय समस्याओं पर आधारित विज्ञान परियोजनाएँ कराई जा सकती हैं—गाँव के जल की गुणवत्ता, आसपास की मिट्टी, ऊर्जा की खपत, प्रदूषण, स्थानीय वनस्पति, कचरे का प्रबंधन और स्वास्थ्य से जुड़े सामान्य आँकड़े विद्यार्थियों के लिए वास्तविक प्रयोगशाला बन सकते हैं। इससे विज्ञान जीवन से जुड़ता है और विद्यार्थी यह समझने लगता है कि ज्ञान केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं बल्कि समस्या हल करने के लिए है।
उच्च शिक्षा में यह परिवर्तन और भी गहरा होना चाहिए। भारत में अधिकांश विश्वविद्यालय अध्यापन संस्थान हैं, शोध संस्थान नहीं। प्रोफेसर पर प्रशासन, परीक्षा, मूल्यांकन और अनेक औपचारिक कार्यों का इतना बोझ होता है कि गंभीर शोध के लिए समय सीमित रह जाता है। प्रयोगशालाएँ कई स्थानों पर पुरानी हैं, उपकरणों का रखरखाव कमजोर है और उद्योग से संपर्क लगभग प्रतीकात्मक है। इस स्थिति में विश्वविद्यालय वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था में प्रभावी भूमिका नहीं निभा सकते। प्रत्येक विश्वविद्यालय को हर विषय में उत्कृष्ट बनने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन उसे अपने क्षेत्र, स्थानीय अर्थव्यवस्था और उपलब्ध प्रतिभा के अनुसार कुछ शोध प्राथमिकताएँ निर्धारित करनी चाहिए। किसी कृषि प्रधान राज्य का विश्वविद्यालय जल, बीज, मृदा, खाद्य प्रसंस्करण और ग्रामीण मशीनरी में विशेषज्ञता विकसित कर सकता है। समुद्र तट पर स्थित संस्थान समुद्री जीव-विज्ञान, मत्स्य प्रौद्योगिकी, बंदरगाह और तटीय जलवायु पर काम कर सकता है। औद्योगिक क्षेत्र का विश्वविद्यालय रोबोटिक्स, सामग्री विज्ञान, प्रदूषण नियंत्रण और औद्योगिक सुरक्षा में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार राष्ट्रीय वैज्ञानिक शक्ति केवल कुछ महानगरों तक सीमित नहीं रहेगी। बल्कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों की वास्तविक समस्याओं और आर्थिक संभावनाओं से जुड़े ज्ञान केंद्र विकसित होंगे।
शिक्षा और विज्ञान का संबंध तभी मजबूत होगा जब विद्यार्थियों को शोध की प्रक्रिया से प्रारंभिक अवस्था में जोड़ा जाए। वर्तमान व्यवस्था में अनेक विद्यार्थी पीएचडी तक पहुँचने के बाद पहली बार वास्तविक शोध का अनुभव करते हैं। यह बहुत देर है। स्नातक स्तर पर ही विद्यार्थियों को छोटे शोध प्रश्न, डेटा विश्लेषण, प्रयोगशाला प्रशिक्षण, क्षेत्र अध्ययन और उद्योग समस्याओं पर काम करने का अवसर मिलना चाहिए। हर विद्यार्थी महान वैज्ञानिक नहीं बनेगा। लेकिन शोध-आधारित शिक्षा से वह बेहतर इंजीनियर, चिकित्सक, प्रशासक, उद्यमी और नागरिक अवश्य बनेगा। वह प्रमाण, तर्क और परिणाम की संस्कृति को समझेगा। भारत को ऐसी राष्ट्रीय स्नातक शोध योजना विकसित करनी चाहिए जिसमें विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी गर्मी की छुट्टियों में राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं, उद्योगों, अस्पतालों, कृषि केंद्रों और तकनीकी स्टार्टअपों के साथ काम करें। इससे प्रतिभा की पहचान जल्दी होगी और विद्यार्थी शिक्षा को रोजगार से नहीं, सृजन से जोड़कर देखेगा।
विश्वविद्यालय और उद्योग के बीच भारत में जो दूरी है, वह केवल दृष्टिकोण की नहीं बल्कि संरचना की भी समस्या है। उद्योगों का एक बड़ा हिस्सा विश्वविद्यालयी शोध को धीमा, सैद्धांतिक और व्यावसायिक आवश्यकताओं से दूर मानता है। दूसरी ओर विश्वविद्यालयों के अनेक वैज्ञानिक उद्योग को केवल लाभ कमाने वाली संस्था समझते हैं, जिसे दीर्घकालिक ज्ञान या मौलिक शोध में रुचि नहीं होती। दोनों धारणाओं में कुछ सत्य है। लेकिन इसी अविश्वास ने सहयोग को कमजोर किया है। उद्योग को त्वरित समाधान चाहिए, जबकि विज्ञान को कभी-कभी वर्षों तक प्रयोग करने की स्वतंत्रता चाहिए। एक प्रभावी व्यवस्था में इन दोनों समय-सीमाओं के बीच संतुलन बनाया जाता है।
उद्योग को विश्वविद्यालय में केवल तैयार उत्पाद खोजने के बजाय दीर्घकालिक अनुसंधान में निवेश करना चाहिए। और विश्वविद्यालय को भी ऐसे तंत्र बनाने चाहिए जो वैज्ञानिक खोज को प्रयोगशाला से बाहर लाकर बाजार तक पहुँचाएँ। इसके लिए प्रत्येक प्रमुख विश्वविद्यालय में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यालय, पेटेंट विशेषज्ञ, उद्योग संपर्क इकाई और स्टार्टअप सहायता केंद्र होना चाहिए। वैज्ञानिक से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह एक साथ शोधकर्ता, वकील, विपणन विशेषज्ञ और निवेश प्रबंधक भी बने। उसे ऐसे पेशेवर सहयोगियों की आवश्यकता है जो उसकी खोज को पेटेंट, लाइसेंस, कंपनी या सार्वजनिक उपयोग की तकनीक में बदलने में सहायता करें।
भारत में उद्योग द्वारा अनुसंधान पर अपेक्षाकृत कम खर्च करने का एक कारण यह है कि अधिकांश कंपनियाँ तकनीक खरीदने को तकनीक विकसित करने से अधिक सुरक्षित मानती हैं। विदेश से तैयार मशीन, लाइसेंस या डिजाइन खरीदना कम जोखिम वाला रास्ता है। लेकिन यह मॉडल किसी देश को लंबे समय तक उच्च मूल्य वाली अर्थव्यवस्था नहीं बना सकता। विदेशी तकनीक खरीदने वाला उद्योग उत्पादन तो कर सकता है, किंतु अगली तकनीकी पीढ़ी पर उसका नियंत्रण नहीं होता। जब वैश्विक आपूर्ति शृंखला बाधित होती है, निर्यात प्रतिबंध लगते हैं या पेटेंट की शर्तें बदलती हैं, तब उसकी निर्भरता स्पष्ट हो जाती है। भारत को उद्योगों के लिए अनुसंधान निवेश को कर प्रोत्साहन, सह-वित्तपोषण, सरकारी खरीद और दीर्घकालिक ऋण से बढ़ावा देना चाहिए। लेकिन केवल प्रोत्साहन पर्याप्त नहीं होगा। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि अनुसंधान के नाम पर सामान्य व्यावसायिक खर्च को लाभ प्राप्त करने का साधन न बनाया जाए। वास्तविक शोध, पेटेंट, प्रोटोटाइप, प्रयोगशाला सहयोग और प्रशिक्षित मानव संसाधन के आधार पर ही सहायता दी जानी चाहिए।
सरकारी खरीद वैज्ञानिक-औद्योगिक विकास का अत्यंत शक्तिशाली साधन बन सकती है। अमेरिका में रक्षा, अंतरिक्ष और स्वास्थ्य क्षेत्र की सरकारी खरीद ने अनेक नई कंपनियों और तकनीकों को जन्म दिया। चीन ने भी राज्य की विशाल खरीद क्षमता का उपयोग घरेलू उद्योगों को प्रारंभिक बाजार देने के लिए किया। भारत में कई घरेलू तकनीकें केवल इसलिए विकसित नहीं हो पातीं क्योंकि सरकारी विभाग पहली बार उपयोग की जा रही तकनीक का जोखिम लेने से बचते हैं और स्थापित विदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं। किसी स्टार्टअप या भारतीय शोध संस्थान द्वारा विकसित उपकरण से वही कार्यक्षमता और विश्वसनीयता पहले दिन अपेक्षित की जाती है, जो किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी ने दशकों के अनुभव से प्राप्त की है। यह दृष्टिकोण नवाचार को जन्म लेने से पहले ही समाप्त कर देता है। सरकार को परीक्षण, सीमित खरीद और चरणबद्ध विस्तार का मॉडल अपनाना चाहिए। अस्पतालों, रेलवे, रक्षा, कृषि, ऊर्जा, नगर प्रशासन और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में घरेलू तकनीकों के लिए नियंत्रित प्रयोग क्षेत्र बनाए जा सकते हैं। इससे नई तकनीक को वास्तविक परिस्थितियों में सुधारने का अवसर मिलेगा और देश के भीतर प्रारंभिक बाजार तैयार होगा।