झुग्गी से सत्ता तक: संघर्षों की आग में तपकर ममता बनीं 'दीदी'

Mamata Banerjee Political Career: सड़क की लड़ाई से मुख्यमंत्री तक: ममता बनर्जी के संघर्ष की कहानी...

Update:2026-05-07 13:46 IST

Mamata Banerjee Political Career: पश्चिम बंगाल की राजनीति में आखिरकार वह दिन आ ही गया, जिसकी चर्चा सालों से सियासी गलियारों में हो रही थी। 15 साल तक सत्ता के शिखर पर बैठीं ममता बनर्जी अब सत्ता से बाहर हो गई हैं। कभी वामपंथ के अभेद्य किले को ढहाने वाली “दीदी” इस बार खुद सत्ता विरोधी लहर में बह गईं।

बीजेपी ने तृणमूल कांग्रेस को मात देकर पहली बार बंगाल में अपना मुख्यमंत्री बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। बंगाल की राजनीति, जो दशकों तक लाल सलाम और फिर 'दीदी राज' के इर्द-गिर्द घूमती रही, अब नए मोड़ पर खड़ी है।

सड़क से सत्ता तक… और फिर सत्ता से बाहर

ममता बनर्जी की कहानी भारतीय राजनीति की सबसे संघर्षशील कहानियों में गिनी जाती है। कोलकाता की तंग गलियों से निकलकर दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने वाली ममता को यूं ही 'स्ट्रीट फाइटर' नहीं कहा जाता। छात्र राजनीति से शुरुआत करने वाली यह नेता तीन दशक तक सड़क पर संघर्ष करती रही और फिर अपने दम पर तृणमूल कांग्रेस खड़ी कर वाम मोर्चे के 34 साल पुराने साम्राज्य को उखाड़ फेंका।

1984 में जब कांग्रेस ने युवा ममता को दिग्गज वामपंथी नेता सोमनाथ चटर्जी के खिलाफ मैदान में उतारा था, तब इसे राजनीतिक आत्महत्या माना गया था। लेकिन नतीजे आए तो पूरा देश चौंक गया. ममता ने सोमनाथ चटर्जी को हराकर खुद को 'जायंट किलर' साबित कर दिया।

झुग्गी की लड़की से बंगाल की 'दीदी' तक

ममता का शुरुआती जीवन संघर्षों से भरा रहा। कम उम्र में पिता का साया उठ गया और परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। भाई-बहनों को स्कूल पहुंचाने से लेकर घर संभालने तक, ममता ने बचपन से ही लड़ना सीखा। कॉलेज के दिनों में उन्होंने सीपीएम के गढ़ में कांग्रेस की छात्र इकाई खड़ी की। यहीं से उनकी राजनीति की बुनियाद पड़ी। फिर संसद पहुंचीं, सड़क पर लाठियां खाईं, धरने दिए, रेल मंत्री बनीं और अंततः बंगाल की मुख्यमंत्री।

'दीदी' की राजनीति: संघर्ष, जिद और सत्ता

1990 में सीपीएम कार्यकर्ताओं के हमले में घायल हुईं ममता की तस्वीरें पूरे देश में चर्चा का विषय बनीं। यही वह दौर था जब उनकी 'फाइटर' छवि मजबूत हुई। 1998 में कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने तृणमूल कांग्रेस बनाई। राजनीति की विडंबना देखिए आज जिस बीजेपी को ममता अपना सबसे बड़ा दुश्मन बताती हैं, उसी बीजेपी के साथ उन्होंने शुरुआती दौर में हाथ मिलाया था। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वह मंत्री भी रहीं और रेलवे मंत्रालय भी संभाला।

हार से वापसी और फिर बंगाल फतह

2004 का चुनाव ममता के लिए सबसे बुरा दौर लेकर आया। तृणमूल कांग्रेस महज एक सीट पर सिमट गई। राजनीतिक पंडितों ने उनके करियर का अंत मान लिया था। लेकिन ममता ने हार नहीं मानी। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन ने उन्हें फिर से बंगाल की राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया। किसानों की जमीन के मुद्दे पर उन्होंने वाम सरकार को घेरा और 2011 में 34 साल पुराने लेफ्ट शासन को उखाड़ फेंका। बंगाल में परिवर्तन का नारा गूंजा और ममता मुख्यमंत्री बन गईं।

लेकिन 15 साल बाद क्यों टूटा “दीदी मॉडल”?

सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने खुद को एक जमीनी नेता के रूप में बनाए रखने की कोशिश की। कभी धरने पर बैठीं, कभी व्हीलचेयर पर चुनाव प्रचार किया, तो कभी कविता और पेंटिंग के जरिए अपनी अलग छवि गढ़ी। लेकिन समय के साथ तृणमूल सरकार पर भ्रष्टाचार, कट मनी, राजनीतिक हिंसा और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सवाल बढ़ते गए। विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा कि 'परिवर्तन' का सपना धीरे-धीरे 'सत्ता के अहंकार' में बदल गया। बीजेपी ने इन्हीं मुद्दों को हथियार बनाया और बंगाल की राजनीति में अपनी जड़ें मजबूत कीं। नतीजा, जिस ममता ने कभी वाम मोर्चे को सत्ता से बेदखल किया था, अब वही खुद सत्ता से बाहर हो गई हैं।

बंगाल की राजनीति का नया अध्याय

ममता बनर्जी की हार सिर्फ एक चुनावी हार नहीं मानी जा रही बल्कि इसे बंगाल की राजनीति में एक बड़े युग के अंत के तौर पर देखा जा रहा है। सवाल अब यह है कि क्या 'दीदी' विपक्ष में रहकर फिर कोई नई लड़ाई लड़ेंगी या बंगाल की राजनीति अब पूरी तरह नए रंग में रंगने जा रही है? फिलहाल इतना तय है कि बंगाल की सियासत में 'दीदी युग' को चुनौती मिल चुकी है और बीजेपी अब इतिहास लिखने की दहलीज पर खड़ी है।

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