Female Leaders: 3 स्त्रियों ने राजनीति की धुरी बदल दी, फिर धीरे-धीरे सत्ता के बोझ तले घिरती चली गईं
Indian Female Leaders: भारतीय राजनीति लंबे समय तक पुरुषों के वर्चस्व वाली रही। राष्ट्रीय दलों से लेकर क्षेत्रीय दलों तक लगभग हर जगह पुरुष नेतृत्व का दबदबा था।
Indian Female Leaders Politics: भारतीय राजनीति लंबे समय तक पुरुषों के वर्चस्व वाली रही। राष्ट्रीय दलों से लेकर क्षेत्रीय दलों तक लगभग हर जगह पुरुष नेतृत्व का दबदबा था। लेकिन इसी राजनीति में तीन महिलाएँ ऐसी उभरीं जिन्होंने न केवल अपने-अपने राज्यों की राजनीति बदल दी बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी प्रभावित की। उत्तर प्रदेश में मायावती तमिलनाडु में जे. जयललिता और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी केवल नेता नहीं रहीं। वे अपने दलों की पहचान बन गईं। तीनों ने अपने-अपने राज्यों में लगभग करिश्माई सत्ता स्थापित की। तीनों ने खुद को गरीबों, वंचितों, महिलाओं या क्षेत्रीय अस्मिता की आवाज़ के रूप में प्रस्तुत किया। तीनों ने पुरुष-प्रधान राजनीति को चुनौती दी। लेकिन समय के साथ इन तीनों दलों के भीतर वही संकट पैदा हुए जो अक्सर व्यक्तिवादी राजनीति में दिखाई देते हैं — संगठन का कमजोर होना, उत्तराधिकार संकट, भ्रष्टाचार के आरोप, निर्णयों का केंद्रीकरण और बदलती सामाजिक आकांक्षाओं को समझने में कठिनाई।
मायावती : दलित राजनीति को सत्ता तक पहुँचाने वाली नेता
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांशीराम और मायावती का उदय भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक घटनाओं में गिना जाता है। मायावती का जन्म दिल्ली के एक दलित परिवार में हुआ। वे अध्यापिका थीं। प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर रही थीं। इसी दौरान कांशीराम की नजर उन पर पड़ी। कांशीराम उस समय BAMCEF और DS-4 जैसे संगठनों के जरिए दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों को राजनीतिक रूप से संगठित करने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने मायावती में आक्रामक वक्ता और राजनीतिक नेतृत्व की संभावना देखी।
1984 में कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की। पार्टी का मूल नारा था — ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।’ यह केवल चुनावी दल नहीं था। यह सामाजिक प्रतिनिधित्व का आंदोलन था। शुरुआती वर्षों में BSP ने चुनाव तो लड़े। लेकिन जीत कम मिली। 1984 लोकसभा चुनाव में पार्टी को बहुत कम वोट मिले। 1989 में पार्टी ने लगभग 2 प्रतिशत राष्ट्रीय वोट हासिल किए और कुछ सीटें जीतने लगी। धीरे-धीरे दलित वोटों का ध्रुवीकरण BSP के पक्ष में होने लगा।
1991 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में BSP को लगभग 9.4 प्रतिशत वोट मिले। 1993 में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन हुआ। यही वह चुनाव था जिसने मायावती को सत्ता की दहलीज तक पहुँचाया। भाजपा के राम मंदिर आंदोलन के खिलाफ ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा हो गए जय श्रीराम’ नारा दिया गया। गठबंधन को सफलता मिली। 1995 में मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। वे देश के सबसे बड़े राज्य की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री थीं।
इसके बाद BSP ने उत्तर प्रदेश में कई बार सत्ता साझेदारी की। 1996 चुनाव में पार्टी को लगभग 19 प्रतिशत वोट मिले। 2002 में लगभग 23 प्रतिशत। लेकिन सबसे बड़ा क्षण 2007 में आया। मायावती ने ‘सर्वजन’ सामाजिक इंजीनियरिंग का प्रयोग किया। दलितों के साथ ब्राह्मणों और अन्य जातियों को जोड़ने की कोशिश की गई। ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ जैसे नारे दिए गए। परिणाम ऐतिहासिक रहा। BSP को लगभग 30.4 प्रतिशत वोट मिले और 403 में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत मिला। यह BSP का स्वर्णकाल था।
मुख्यमंत्री के रूप में मायावती ने कई बड़े फैसले लिए। दलित स्मारकों और पार्कों का निर्माण कराया। डॉ भीमराव अंबेडकर मेमोरियल, मान्यवर कांशीराम स्मारक और विशाल हाथी प्रतिमाएँ उसी दौर की पहचान बनीं। उन्होंने कानून-व्यवस्था पर विशेष जोर दिया। उनके समर्थक दावा करते हैं कि उनके शासन में अपराधियों पर कठोर कार्रवाई हुई। दलित अधिकारियों को प्रशासन में अधिक महत्व मिला। लेकिन आलोचकों ने उन पर मूर्तियों और स्मारकों पर अत्यधिक सरकारी खर्च करने का आरोप लगाया। भ्रष्टाचार और व्यक्तिपूजा के आरोप भी लगे।
2012 विधानसभा चुनाव में BSP सत्ता से बाहर हो गई। पार्टी का वोट प्रतिशत लगभग 26 प्रतिशत रहा। लेकिन सीटें घटकर 80 रह गईं। 2014 लोकसभा चुनाव में BSP को लगभग 4 प्रतिशत राष्ट्रीय वोट मिले। लेकिन एक भी सीट नहीं मिली। 2019 में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन से कुछ सफलता मिली और BSP ने 10 सीटें जीतीं। लेकिन 2022 विधानसभा चुनाव में पार्टी का वोट प्रतिशत गिरकर लगभग 12.9 प्रतिशत रह गया और सीटें केवल 1 पर सिमट गईं।
BSP की गिरावट के कई कारण रहे। पहला, दलित राजनीति का बदलता स्वरूप। युवा दलित मतदाता केवल प्रतीकात्मक राजनीति नहीं बल्कि रोजगार और विकास भी चाहता था। दूसरा, संगठन का अत्यधिक केंद्रीकरण। बसपा पूरी तरह मायावती-केंद्रित दल बन गई। तीसरा, भाजपा ने गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों में बड़ी पैठ बना ली। चौथा, बसपा का जमीनी आंदोलन कमजोर पड़ गया। अब पार्टी आंदोलनकारी दल से अधिक चुनावी दल बनकर रह गई।
आज बसपा अस्तित्व के संकट से गुजर रही है। मायावती अभी भी दलित राजनीति का बड़ा चेहरा हैं। लेकिन पार्टी की संगठनात्मक ताकत कमजोर हो चुकी है। भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या बसपा नई पीढ़ी के दलित नेतृत्व को आगे लाती है या नहीं।राजनितिक विश्लेषक मायावती के करिश्मे के समाप्ति का काल मानने लगे हैं।
जयललिता : सिनेमा से सत्ता तक और फिर तमिल राजनीति की “अम्मा”
तमिलनाडु की राजनीति में एम. जी. रामचंद्रन और जयललिता की कहानी लगभग दंतकथा जैसी मानी जाती है। जयललिता मूलतः अभिनेत्री थीं। तमिल फिल्मों की सुपरस्टार। बेहद शिक्षित। अंग्रेजी पर शानदार पकड़। लेकिन राजनीति में उनका प्रवेश फिल्मों के महानायक और तमिलनाडु के लोकप्रिय मुख्यमंत्री MGR के जरिए हुआ।
1972 में एमजीआर ने DMK से अलग होकर एम.जी. रामचंद्रन के नेतृत्व में AIADMK बनाई। पार्टी ने द्रविड़ राजनीति को नए जनकल्याणवादी रूप में पेश किया। 1977 में AIADMK सत्ता में आई।एमजीआर के जीवनकाल में जयललिता धीरे-धीरे पार्टी में उभरीं। MGR की मृत्यु 1987 में हुई और पार्टी दो धड़ों में बंट गई। एक धड़ा उनकी पत्नी जानकी रामचंद्रन के साथ था। दूसरा जयललिता के साथ।
1989 तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में जयललिता ने खुद को MGR की राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित करना शुरू किया। 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद पैदा हुई सहानुभूति लहर और कांग्रेस गठबंधन के सहारे AIADMK को भारी जीत मिली। पार्टी ने लगभग 44 प्रतिशत वोट हासिल किए और 225 में से 164 सीटें जीतीं। जयललिता पहली बार मुख्यमंत्री बनीं।
जयललिता ने अपने शासन में कई लोककल्याणकारी योजनाएँ शुरू कीं। बाद में ‘अम्मा कैंटीन’, ‘अम्मा वाटर’, ‘अम्मा फार्मेसी’ जैसी योजनाएँ गरीबों के बीच बेहद लोकप्रिय हुईं। महिलाओं के लिए कई योजनाएँ शुरू हुईं। तमिल पहचान और क्षेत्रीय गर्व को मजबूत किया गया। लेकिन उनके शासन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगातार लगे। 1996 चुनाव में जनता ने AIADMK को बुरी तरह हरा दिया। पार्टी केवल 4 सीटें जीत सकी। जयललिता पर आय से अधिक संपत्ति का केस चला।
जयललिता की राजनीतिक वापसी की क्षमता असाधारण थी। 2001 में वे फिर सत्ता में लौटीं। 2011 चुनाव में AIADMK गठबंधन ने भारी जीत हासिल की। 2016 में लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटकर उन्होंने तमिलनाडु की राजनीति का इतिहास बदल दिया। क्योंकि लंबे समय तक तमिलनाडु में DMK और AIADMK बारी-बारी से सत्ता में आते रहे थे।
लोकसभा चुनावों में भी AIADMK लंबे समय तक प्रभावशाली रही। 1998 और 1999 में पार्टी राष्ट्रीय गठबंधन राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी। 2014 लोकसभा चुनाव में AIADMK ने तमिलनाडु में 37 सीटें जीतकर राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा प्रभाव दिखाया।
लेकिन जयललिता की राजनीति अत्यधिक व्यक्ति केंद्रित थी। पार्टी संगठन पूरी तरह उन्हीं पर निर्भर था। 2016 में उनकी मृत्यु के बाद AIADMK तेजी से कमजोर होने लगी। एडप्पादी के. पलानीस्वामी (Edappadi K. Palaniswami )और ओ. पन्नीरसेल्वम ( O. Panneerselvam) के बीच संघर्ष शुरू हुआ। पार्टी का करिश्माई चेहरा खत्म हो गया। भाजपा के साथ समीकरणों ने भी पार्टी की पारंपरिक द्रविड़ पहचान को कमजोर किया।
आज AIADMK अभी भी तमिलनाडु की बड़ी पार्टी है।लेकिन वह जयललिता के दौर वाली जनभावना पैदा नहीं कर पा रही। DMK मजबूत स्थिति में है। नई चुनौतियों में विजय की TVK जैसी ताकतें भी उभर रही हैं। AIADMK का भविष्य इस पर निर्भर करेगा कि क्या वह जयललिता के बाद नई वैचारिक और संगठनात्मक दिशा बना पाती है या नहीं।
ममता बनर्जी : सड़क की लड़ाई से बंगाल की सत्ता तक
ममता बनर्जी ( Mamta Banarji ) भारतीय राजनीति की सबसे आक्रामक जननेताओं में गिनी जाती हैं। वे कांग्रेस से निकलीं। छात्र राजनीति से उभरीं। बेहद साधारण जीवनशैली। तीखी भाषण शैली। संघर्षशील छवि। 1984 में उन्होंने जादवपुर से CPI(M) के दिग्गज सोमनाथ चटर्जी को हराकर पहली बार राष्ट्रीय पहचान बनाई।
लेकिन कांग्रेस में रहते हुए उन्हें लगा कि पश्चिम बंगाल में वामपंथ के खिलाफ प्रभावी लड़ाई नहीं लड़ी जा रही। 1998 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर अपने नेतृत्व में All India Trinamool Congress बनाई। शुरुआती दौर में पार्टी ने भाजपा के साथ गठबंधन किया। 1999 लोकसभा चुनाव में TMC ने अच्छा प्रदर्शन किया।
ममता का वास्तविक राजनीतिक उभार सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों से हुआ। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के आंदोलन ने उन्हें ग्रामीण बंगाल की आवाज़ बना दिया। 2009 लोकसभा चुनाव में TMC-कांग्रेस गठबंधन ने बड़ी सफलता हासिल की। 2011 विधानसभा चुनाव में 34 वर्षों से सत्ता में बैठी CPI(M)-नीत वाम सरकार को हटाकर TMC सत्ता में आई। यह बंगाल की राजनीति का ऐतिहासिक परिवर्तन था।
2011 चुनाव में TMC गठबंधन को लगभग 48 प्रतिशत वोट मिले और 294 में से 227 सीटें मिलीं। 2016 में पार्टी ने और बड़ी जीत हासिल की। 2021 में भाजपा की भारी चुनौती के बावजूद ममता ने सत्ता बचाई। TMC को लगभग 48 प्रतिशत वोट मिले और 213 सीटें मिलीं।
मुख्यमंत्री के रूप में ममता ने कई जनकल्याणकारी योजनाएँ शुरू कीं। ‘कन्याश्री’ योजना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराही गई। ‘सबुज साथी’, ‘स्वास्थ्य साथी’, अल्पसंख्यक छात्रवृत्ति और ग्रामीण योजनाओं ने उन्हें मजबूत जनाधार दिया। बंगाली अस्मिता को उन्होंने राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया।
लेकिन समय के साथ TMC पर भी वही आरोप लगने लगे जो लंबे शासन वाले दलों पर लगते हैं। भ्रष्टाचार। कटमनी। स्थानीय नेताओं की दबंगई। शिक्षक भर्ती घोटाला। पार्टी में परिवारवाद के आरोप। हिंसक राजनीति। भाजपा ने हिंदुत्व और भ्रष्टाचार विरोधी राजनीति के सहारे बंगाल में तेजी से विस्तार किया।
फिर भी BSP और AIADMK की तुलना में TMC अभी अधिक मजबूत स्थिति में है। ममता अभी भी पार्टी की सबसे बड़ी ताकत हैं। लेकिन चुनौती यह है कि क्या उनके बाद पार्टी वैसी ही बनी रहेगी। पार्टी का अत्यधिक व्यक्तिकेंद्रित ढाँचा भविष्य में संकट पैदा कर सकता है।
तीनों नेताओं की समानता और अंतर
मायावती, जयललिता और ममता — तीनों अलग सामाजिक पृष्ठभूमि से आईं। लेकिन तीनों में कुछ समानताएँ स्पष्ट हैं। तीनों ने पुरुष-प्रधान राजनीति को चुनौती दी। तीनों ने खुद को वंचित वर्गों की आवाज़ के रूप में पेश किया। तीनों ने करिश्माई व्यक्तित्व के बल पर दल खड़े किए। तीनों के दल उनके व्यक्तित्व पर अत्यधिक निर्भर हो गए।
लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बनी। संगठनात्मक लोकतंत्र कमजोर हुआ। उत्तराधिकार की स्पष्ट व्यवस्था नहीं बनी। दल आंदोलन से अधिक नेता-केंद्रित होते गए। समय बदलता गया। मतदाता बदलता गया। लेकिन दलों की संरचना उतनी तेजी से नहीं बदली।
आज BSP अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। AIADMK नेतृत्व संकट से जूझ रही है। TMC अभी मजबूत है। लेकिन भविष्य को लेकर प्रश्न बने हुए हैं। फिर भी इन तीनों नेताओं का भारतीय राजनीति में योगदान ऐतिहासिक रहेगा। मायावती ने दलित राजनीति को सत्ता तक पहुँचाया। जयललिता ने पुरुष वर्चस्व वाली द्रविड़ राजनीति में अपना साम्राज्य बनाया। ममता ने तीन दशक पुरानी वाम सत्ता को उखाड़ फेंका।
भारतीय लोकतंत्र की कहानी लिखी जाएगी तो इन तीनों महिलाओं का नाम केवल नेताओं की तरह नहीं। बल्कि ऐसे राजनीतिक प्रतीकों की तरह लिया जाएगा, जिन्होंने अपने समय की राजनीति को बदल दिया।