Muslim Women Rights: मुस्लिम महिलाओं के तीन तलाक, हलाला और फतवों पर आखिर कब होगा बड़ा बदलाव?

Muslim Women Rights: तीन तलाक और फतवों पर मुस्लिम महिलाओं की आवाज, बदलाव की मांग क्यों तेज हुई?

Update:2026-07-17 17:12 IST

Muslim Women Rights Triple Talaq

Muslim Women Rights: जब पूरी दुनिया में स्त्री के सशक्तीकरण को लेकर बढ़-चढ़कर दावे किये जा रहे हों। हालात यह हो कि महिला मुक्ति आंदोलन के इस दौर में कुछ महिलाएं ही पुरुष सुरक्षा के सवाल उठाने लगी हों। कहने लगी हों कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए देश में बनाए जा रहे कानून स्त्री-पुरुष को अलग करने, बांटने का काम कर रहे हैं। वर्चस्व की जंग में कभी पुरुष आगे था। अब महिलाओं को बनाया जा रहा है। ऐसे दौर में किसी समाज की औरतों को सुरक्षा के लिए सर्वोच्च अदालत की शरण लेनी पड़े। संसद को अपना समय देना पड़े। उस समाज के अंदर से बदलाव की कोई व्यापक आवाज न उठे तो यह मान लिया जाना चाहिए कि समाज का विचार प्रवाह ठहर गया है। विचार प्रवाह का ठहरना कम खतरनाक नहीं होता।

तीन तलाक, हलाला और फतवा दर फतवा यह बताता है कि सारी कोशिश इस समाज में सिर्फ महिलाओं को बेड़ियां पहनाने की हैं। यह भी हैरतंगेज है कि जिन नियम, कानून और रीति-रिवाज को इस्लामी देश नहीं मानते।उन्हें यहां मनवाने और मानने की लामबंदी जारी है। इस समाज में फतवा तो कुछ ऐसा हो गया है कि हर फतवा महिलाओं को नाथने का काम करता दिखता है।

परफ्यूम लगाकर मत निकलें। सामूहिक शादियां न करें, मुस्लिम महिलाएं चुनाव न लड़ें। मंगेतर से फोन पर बात न करें। महिलाएं ब्यूटी पॉर्लर न जाएं, वैक्सीन न लगवाएं, बालों में खिजाब की जगह मेंहदी लगाएं। कैमरा युक्त मोबाइल फोन इस्तेमाल न करें। सोशल साइट पर फोटो अपलोड न करें। जींस न पहनें, छोटे कपड़े न पहनें। सानिया मिर्जा के टेनिस खेलने पर फतवा। तुर्रा यह कि औरत को मर्द के साथ नहीं खेलना चाहिए। आलिया नाम की लड़की कृष्ण के रूप में गीता का श्लोक पढ़ देती है तो उसके खिलाफ फतवा। असम की सोलह साल की गायिका नाहिद आफरीन स्टेज पर गाना क्या गा देती हैं, धर्म खतरे में पड़ जाता है। 46 फतवे जारी हो जाते हैं। पोकमेन गो खेल के खिलाफ फतवा। मुलायम सिंह यादव भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी की तारीफ कर देते हैं, फतवा जारी हो जाता है। सिर्फ पति तलाक दे सकता है, दारूल उलूम इसका फतवा जारी हो जाता है। आबकारी और बैंक की नौकरी करने वालों से निकाह न करें इसका फतवा। शतरंज न खेलने के खिलाफ फतवा, स्वास्थ्य बीमा के खिलाफ फतवा। शादी की सालगिरह और जन्मदिन मनाने के खिलाफ फतवा।

केरल की रायना ने जींस-शर्ट पहना तो उसका जीना ऐसा हराम हुआ कि उसे सुरक्षा की गुहार करनी पड़ी। गुड़िया और शबाना के दूसरे शौहरों को लेकर जो फतवा आया वह काबिले कुबूल बिल्कुल नहीं था। इमराना पर देवबंद जो कुछ कह रहा था, वह खारिज करने लायक था।

शरई की आड़ लेकर सानिया पर मर्दों के सामने खेलने का जिक्र जो भी करे वह एक बड़ी प्रतिभा को मारने की साजिश है। शायर वशीर बद्र पैगंबरों की ऐक्टिंग करते हैं तो भी फतवा। समझ में नहीं आता इतने फतवों के बीच दुश्वार जिंदगी कैसे गुजारती हैं मुस्लिम महिलाएं। कैसे जीते हैं वो प्रगतिशील लोग जो दुनिया में एक सुंदर बदलाव देखना चाहते हैं। कितना मुश्किल होता है उन्हें जो टर्की, इजिप्ट सरीखे मुस्लिम देशों की तरह जीने की ख्वाहिश संजोये हों। हिंदू, बौद्ध, जैन, ईसाई और पारसी धर्मां में इतनी बंदिश नहीं है। फिर भी इनसे कोई सबक नहीं।

फतवे के मार्फत लगातार एक नई बेड़ी डालने में जुटे लोगों को यह सोचना चाहिए कि हमारे धर्म की महिलाओं को भी दूसरे धर्मों के लोगों के मानिंद जीने और पंख लगाकर उड़ने की ख्वाहिश होती होगी। हर धर्म के अंदर से समय-समय पर विरोध के ऐसे स्वर फूटे जिसने उस धर्म में पसरे हुए अंध विश्वास और कुरीतियों के खिलाफ खड़े होने वाली जमात दिखी। बौद्ध में महायान और हीनयान हुए। जैन में दिगंबर और श्वेतांबर हुए। ईसाई में प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक हुए। सभी धर्मों में पूजा-पद्धति, जीवन जीने का आचार-विचार देशकाल और परिस्थितियों के हिसाब से बदले। मुस्लिम धर्म में शिया-सुन्नी तो हुए पर कोई बदलाव न हो इसके लिए कठमुल्ले धर्म को इस कदर पकड़ कर बैठ गए हैं मानो वो सब कुछ अपनी मुट्ठी में भींच लेना चाहते हैं।

देश भले लोकतांत्रिक हो पर अपनी जाति और जमात के लोगों को संचालित करने का उनका तरीका अधिनायकवादी है। इस अधिनायकत्व के मूल में है उनका अपना धर्म। आपद धर्म नहीं। राजधर्म नहीं। जीवन धर्म नहीं। समाज धर्म नहीं। तभी तो वे लोकतंत्र में शरई अदालतें खोलने की मुहिम चला देते हैं। उन्हीं में अपने मामले निपटाने की कोशिश करते हैं क्योंकि मुस्लिम महिलाओं ने उनके धर्मसत्ता की जड़ों को हिलाना शुरू कर दिया है।

औरतों के मानवाधिकार को ये कठमुल्ले जगह देने को तैयार नहीं हैं। इनकी कोशिश महिलाओं को समाज के हवाले करने की है, संविधान के हवाले नहीं। किसी भी सरकार का यह दायित्व है कि वह समाज पर संविधान को तरजीह दे। जिस देश में नीचे से लेकर ऊपर तक तमाम अदालतें हो। उस देश में यह समाज दारूल कजा से न्याय की बात करता है। वह भी यह कि इस अदालत के खिलाफ कहीं अपील नहीं होती। पंचायतों के फरमान को बेमानी और गैरकानूनी मान लिया गया है। फिर इनकी पंचायत कानूनी मानी जाए यह तुर्रा। लखनऊ के महिला संगठन तहरीक ने 2005-06 में 35 सौ मुस्लिम महिला और पुरुषों से कई सवाल पूछे।

दिलचस्प तथ्य यह था कि अस्सी फीसदी लोग दारूल कजा की जगह पुलिस और न्यायालय में जाने को सही मानते थे। सिर्फ एक फीसदी लोग दारूल कजा यानि शरई अदालतों का नाम जानते थे। दो फीसदी लोग ऑल इंडिया मुस्लिम पर्शनल लॉ बोर्ड से वाकिब थे। दुनिया के सौ बेहतरीन विश्वविद्यालय में से एक भी अरब देशों में नहीं है। कोई नया आविष्कार इनके हिस्से नहीं आया। फिर भी आंख का न खुलना बताता है कि अब इस समाज के लोगों को अपने यहां के कठमुल्लों की जगह नये रोल मॉडल चुनने चाहिए। यह बेहद सुखकर है कि इसकी अगुवाई इस समाज की आधी आबादी ने अपने हाथ ली है। उनकी सफलता के लिए आमीन।

(मूलरूप से दिनांक 18.08.2018 को प्रकाशित।) 

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