TMC-UBT बागियों पर स्पीकर ओम बिरला कब लेंगे फैसला? खतरे में 26 सांसदों की सदस्यता!
UBT-TMC Rebellion Row: मॉनसून सत्र से पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला टीएमसी और शिवसेना (UBT) के बागी सांसदों की अयोग्यता पर बड़ा फैसला ले सकते हैं। जानें दल-बदल विरोधी कानून का गणित।
UBT-TMC Rebellion Row: देश की राजनीति में इन दिनों एक बहुत बड़ा सियासी घमासान मचा हुआ है. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला जल्द ही तृणमूल कांग्रेस (TMC) और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के बागी सांसदों के दल-बदल मामले पर अपना अंतिम फैसला सुना सकते हैं. सूत्रों के हवाले से खबर है कि जुलाई के तीसरे हफ्ते में शुरू होने वाले संसद के मॉनसून सत्र से पहले ही स्पीकर इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर कोई बड़ा निर्णय ले सकते हैं. इस फैसले को लेकर दोनों मूल राजनीतिक दल और उनके बागी गुट काफी घबराए हुए हैं. इस संबंध में लोकसभा अध्यक्ष पहले ही दोनों पक्षों के प्रतिनिधिमंडलों से मिलकर उनकी दलीलें सुन चुके हैं.
कानूनी दिग्गजों से मशविरा
इस पूरे मामले को कानूनी रूप से पूरी तरह फूलप्रूफ बनाने के लिए संसद के बड़े कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञ बारीकी से पड़ताल कर रहे हैं. कोई भी फैसला लेने से पहले दल-बदल विरोधी कानून के पुराने फैसलों और उदाहरणों की गहरी समीक्षा की जा रही है ताकि स्पीकर का निर्णय अदालत में भी पूरी तरह सही साबित हो सके.
TMC के भीतर बड़ी फूट
साल 2024 के आम चुनाव में टीएमसी ने लोकसभा की कुल 29 सीटों पर शानदार जीत हासिल की थी. वर्तमान में एक सांसद के असमय निधन के कारण वहाँ 1 सीट खाली चल रही है. अब पार्टी के 20 सांसदों ने बगावत का झंडा बुलंद करते हुए पश्चिम बंगाल के हावड़ा की एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी 'नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) का दामन थाम लिया है. इन बागी सांसदों ने लोकसभा में अपने बैठने के लिए अलग जगह मांगी है. साथ ही इन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को समर्थन देने और एनडीए में जाने की इच्छा जताई है. दूसरी तरफ, टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने बागी गुट के खिलाफ स्पीकर से मिलकर इन 20 बागियों को अयोग्य ठहराने के लिए अलग-अलग याचिकाएं सौंप दी हैं.
शिवसेना का अंदरूनी कलह
महाराष्ट्र में भी सियासत का पारा बहुत गर्म है. यहाँ शिवसेना (यूबीटी) के चुनाव चिह्न पर 9 सांसद जीतकर संसद पहुंचे थे, जिनमें से 6 सांसदों ने पाला बदलकर एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना का हाथ पकड़ लिया है. इस बगावत के खिलाफ उद्धव गुट के बड़े नेता अनिल देसाई और अरविंद सावंत ने बुधवार को स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात कर संविधान की मर्यादा बचाने की गुहार लगाई है. उद्धव गुट ने बागी सांसदों के पत्रों की कॉपियां भी मांगी हैं, जिस पर स्पीकर ने स्पष्ट किया कि उन्हें अभी तक बागी सांसदों की तरफ से लिखित में कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ है.
क्या कहता है कानून?
टीएमसी और उद्धव गुट दोनों ही अपने बागी सांसदों की सदस्यता रद्द कराने पर अड़े हैं. दोनों पार्टियों का कहना है कि दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से बचने का सिर्फ एक ही रास्ता है, जब पूरी राजनीतिक पार्टी के कम से कम दो-तिहाई हिस्से का किसी अन्य दल में पूर्ण विलय हो जाए. अभिषेक बनर्जी और अनिल देसाई ने तर्क दिया कि सिर्फ सांसदों या विधायकों का कोई समूह अपनी मर्जी से किसी अन्य दल में शामिल नहीं हो सकता, भले ही उनके पास दो-तिहाई बहुमत ही क्यों न हो.
बैठने की नई व्यवस्था
संसद के आगामी सत्र को देखते हुए लोकसभा सचिवालय सीटों की नई व्यवस्था तैयार करने में जुट गया है. खास बात यह है कि इन बागी गुटों के अलावा, डीएमके (DMK) ने भी अब सदन में कांग्रेस से अलग बैठने की मांग रख दी है. डीएमके ने कांग्रेस से अपना पुराना नाता तोड़कर अब मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की नई पार्टी 'टीवीके' (TVK) से हाथ मिला लिया है, जिससे संसद का पूरा नजारा बदलने वाला है.