वंदे मातरम्, 3 मिनट की खामोशी और 11 बिल: संसद के मानसून सत्र से क्या हासिल हुआ?

संसद का मानसून सत्र 2026 खत्म हो गया। 19 बैठकों में लोकसभा ने 11 बिल पास किए, लेकिन हंगामे के कारण उत्पादकता सिर्फ 19% रही। जानिए पूरे सत्र की बड़ी बातें।

Update:2026-08-13 18:35 IST

Parliament Monsoon Session 2026 Ends with Vande Mataram (Photo: The Hindu)

Parliament Monsoon Session 2026: संसद का मानसून सत्र गुरुवार को खत्म हो गया। लोकसभा में सत्र के आखिरी दिन का नजारा पूरे मॉनसून सत्र की तस्वीर जैसा ही रहा। नारेबाजी, सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव और महत्वपूर्ण मुद्दों पर गतिरोध। फर्क सिर्फ इतना था कि अंत में सदन में कुछ मिनटों के लिए ऐसी खामोशी छाई, जो पूरे सत्र की सबसे प्रतीकात्मक तस्वीर बन गई।

गुरुवार सुबह 11 बजे लोकसभा की कार्यवाही शुरू हुई। विपक्षी सांसदों ने 20 जुलाई को दिल्ली में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से जवाब की मांग करते हुए नारेबाजी शुरू कर दी। सत्ता पक्ष की ओर से भी जवाबी नारे लगाए गए।

इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सदन में पहुंचे। राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ की धुन बजाई गई। सांसद अपने स्थान पर खड़े हुए और इसके तुरंत बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित यानी adjourned sine die कर दिया।

करीब 3 मिनट 10 सेकंड की यह खामोशी उस सत्र का असामान्य लेकिन बेहद प्रतीकात्मक अंत थी, जिसमें चर्चा से ज्यादा राजनीतिक टकराव और नारेबाजी सुर्खियों में रही।

19 बैठकें, 11 विधेयक और भारी हंगामा

मानसून सत्र 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चला और इसके लिए कुल 19 बैठकें निर्धारित थीं। सत्र की शुरुआत में PRS Legislative Research के अनुसार करीब 28 विधेयक लंबित थे।

सत्र खत्म होने तक लोकसभा में सरकार 11 विधेयक पारित कराने में सफल रही। लेकिन सिर्फ विधेयकों की संख्या से संसद के कामकाज की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। असली सवाल यह है कि इन कानूनों पर सदन में कितनी गंभीर और विस्तृत चर्चा हुई।

कुछ विधेयकों पर चर्चा के लिए बेहद कम समय मिला और कई विधेयक विपक्षी नारेबाजी के बीच ध्वनिमत से पारित कर दिए गए।

कई विधेयक कुछ ही मिनटों में पारित

परीक्षा में गड़बड़ी और नकल जैसे मामलों पर कार्रवाई को मजबूत करने वाले Public Examination कानून पर करीब 11 घंटे चर्चा हुई। इसके मुकाबले कई अन्य विधेयकों पर चर्चा कुछ ही मिनटों में पूरी हो गई।

  1. MSME Development Amendment Bill — करीब 3 मिनट
  2. Taxation and Other Laws Amendment Bill — करीब 3 मिनट
  3. Registration of Births and Deaths Amendment Bill — करीब 4 मिनट
  4. Supreme Court (Number of Judges) Amendment Bill — करीब 4 मिनट
  5. Kerala (Alteration of Name) Bill — करीब 4 मिनट
  6. Bankers’ Books Evidence Bill — करीब 5 मिनट
  7. Mines and Minerals Amendment Bill — करीब 5 मिनट
  8. Tribunals Reforms Bill — करीब 12 मिनट
  9. Prevention of Insults to National Honour Amendment Bill — करीब 14 मिनट

इनमें से कई विधेयक विपक्षी सदस्यों की नारेबाजी के बीच ध्वनिमत से पारित किए गए।

सबसे ज्यादा नुकसान किसका हुआ? Question Hour का

संसद में Question Hour वह महत्वपूर्ण समय होता है जब सांसद सीधे मंत्रियों से सरकार की नीतियों, योजनाओं और फैसलों को लेकर सवाल पूछ सकते हैं। लेकिन इस सत्र में हंगामे के कारण प्रश्नकाल बार-बार प्रभावित हुआ।

10 अगस्त तक लोकसभा लगातार तीन सप्ताह Question Hour पूरा नहीं कर सकी थी। उस दिन यह 16वां मौका था जब Question Hour पूरा नहीं हो पाया।

यह समस्या केवल इस सत्र तक सीमित नहीं है। संसद के इतिहास में विपक्ष और सरकार के बीच टकराव के कारण प्रश्नकाल और दूसरी संसदीय कार्यवाहियां कई बार बाधित होती रही हैं। लेकिन इस बार लगातार व्यवधान ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया कि राजनीतिक गतिरोध की कीमत आखिरकार संसदीय जवाबदेही को तो नहीं चुकानी पड़ रही।

NEET से लेकर राम मंदिर और छात्र आंदोलन तक, नहीं टूटा गतिरोध

मानसून सत्र की शुरुआत से ही विपक्ष कई मुद्दों पर सरकार को घेरता रहा।

शुरुआत में NEET-UG परीक्षा विवाद प्रमुख मुद्दा रहा। इसके बाद अयोध्या में राम मंदिर से जुड़े कथित दान घोटाले को लेकर विपक्ष ने सरकार पर सवाल उठाए। सत्र के अंतिम दौर में दिल्ली में छात्रों के प्रदर्शन और 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई का मुद्दा सबसे बड़ा राजनीतिक टकराव बन गया।

विपक्ष केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से इस मामले पर जवाब और जिम्मेदारी तय करने की मांग करता रहा।

सरकार का कहना था कि वह छात्रों से जुड़े मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है। बुधवार को अमित शाह ने भी विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए बहस में हिस्सा लेने की पेशकश की। लेकिन विपक्ष ने इसे स्वीकार करने के बजाय गृह मंत्री के इस्तीफे की मांग तेज कर दी।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का तर्क था कि पुलिस कार्रवाई की राजनीतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी अंततः गृह मंत्रालय तक जाती है।

नतीजा यह रहा कि सत्र के अंतिम दिन भी गतिरोध खत्म नहीं हुआ।

उत्पादकता के आंकड़े ने भी दिखाई तस्वीर

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के अनुसार मानसून सत्र में लोकसभा की उत्पादकता करीब 19 प्रतिशत, जबकि राज्यसभा की उत्पादकता 39 प्रतिशत रही।

यानी 19 निर्धारित बैठकों वाले सत्र में संसद की कार्यवाही का बड़ा हिस्सा हंगामे और व्यवधान की भेंट चढ़ गया।

हालांकि यह संसद के इतिहास का सबसे कम उत्पादक सत्र नहीं है, लेकिन इतने कम उत्पादकता आंकड़े यह सवाल जरूर खड़ा करते हैं कि जब सदन में कानून पारित हो रहे हों, लेकिन चर्चा के लिए समय लगातार कम होता जाए, तो संसदीय लोकतंत्र की वास्तविक गुणवत्ता को किस पैमाने पर मापा जाए।

FCRA बिल ने दिखाई दूसरा रास्ता

इसी सत्र में Foreign Contribution Regulation Act यानी FCRA Amendment Bill को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तीखा मतभेद देखने को मिला। विपक्ष ने आरोप लगाया कि प्रस्तावित बदलावों का इस्तेमाल NGOs और अल्पसंख्यक संगठनों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।

लेकिन इस मामले में सरकार ने विधेयक को जल्दबाजी में पारित कराने के बजाय इसे Joint Parliamentary Committee (JPC) के पास भेजने पर सहमति जताई।

यही वह रास्ता था जो संसद में राजनीतिक असहमति के बावजूद विस्तृत जांच और चर्चा की गुंजाइश पैदा करता है—पहले विरोध, फिर समिति में परीक्षण और उसके बाद सदन में दोबारा बहस।

यह उदाहरण यह भी दिखाता है कि सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद होने के बावजूद संसदीय प्रक्रिया के भीतर समाधान का रास्ता मौजूद है।

3 मिनट 10 सेकंड की खामोशी का संदेश

मानसून सत्र का अंतिम दृश्य अपने आप में एक राजनीतिक प्रतीक बन गया। 19 बैठकों के दौरान नारेबाजी, व्यवधान और आरोप-प्रत्यारोप के बीच आखिर में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ बजा और सदन कुछ मिनटों के लिए शांत हो गया।

फिर लोकसभा अध्यक्ष ने कहा—“The House is adjourned sine die.”

सदन की यह आखिरी खामोशी शायद पूरे सत्र का सबसे बड़ा सवाल भी छोड़ गई—क्या संसद में कानून पारित करना ही पर्याप्त है, या उन कानूनों और राष्ट्रीय मुद्दों पर पर्याप्त चर्चा, सवाल-जवाब और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है?

क्योंकि लोकतंत्र में संसद की सफलता सिर्फ इस बात से नहीं मापी जाती कि कितने बिल पास हुए। यह भी देखा जाता है कि जनता के सवालों पर कितनी बहस हुई, सरकार से कितने सवाल पूछे गए और विपक्ष को अपनी बात रखने के लिए कितना समय मिला।

मानसून सत्र खत्म हो गया, लेकिन संसद में शोर बनाम चर्चा की यह बहस अभी खत्म नहीं हुई है।

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