Human Brain Memory: दिमाग में मेमोरी कहाँ स्टोर होती है? क्या ब्रेन फुल हो सकता है

Human Brain Memory Explained: हमारी यादें दिमाग में आखिर कहाँ स्टोर होती हैं? जानिए हिप्पोकैम्पस, न्यूरॉन्स, मेमोरी, भूलने और न्यूरोप्लास्टिसिटी से जुड़े मानव मस्तिष्क के हैरान करने वाले वैज्ञानिक सच।

Update:2026-08-12 15:59 IST

Human Brain Memory Explained

Human Brain Memory Explained: आपको अपना बचपन याद है। स्कूल का पहला दिन, किसी दोस्त का चेहरा, मां की आवाज, गर्मियों की छुट्टियों में खाया हुआ कोई खास खाना, पहली बार साइकिल चलाने का अनुभव या किसी दुर्घटना के बाद महसूस हुआ डर। लेकिन सवाल यह है कि ये सब आखिर दिमाग में रखा कहाँ है? अगर हमारा दिमाग किसी मोबाइल या कंप्यूटर की तरह काम करता है तो शायद कोई ऐसी जगह होनी चाहिए जहाँ ये सारी यादें जमा होती हों। जैसे फोन में तस्वीरें किसी मेमोरी चिप में सुरक्षित रहती हैं और कंप्यूटर में फाइलें हार्ड डिस्क या एसएसडी में। लेकिन मानव मस्तिष्क ऐसा बिल्कुल नहीं करता।

हमारी यादें किसी एक जगह रखी हुई फाइल नहीं हैं। वे मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों में फैले तंत्रिका नेटवर्क और उनके बीच बदलते संपर्कों में बनती और बनी रहती हैं। किसी व्यक्ति का चेहरा, उसकी आवाज, उससे जुड़ी भावना और उसके साथ बिताई घटना—इन सबकी जानकारी मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरीके से जुड़ी हो सकती है। यानी आपके बचपन की एक याद के लिए दिमाग में कोई एक ‘फोल्डर’ नहीं बना हुआ है।

और इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि जब आप किसी पुरानी घटना को याद करते हैं, तो मस्तिष्क उसे कंप्यूटर की तरह ज्यों का त्यों खोलता नहीं है। वह उस याद को दोबारा बनाता है। यही वजह है कि हमारी यादें मजबूत होने के बावजूद हमेशा पूरी तरह सटीक नहीं होतीं।

क्या दिमाग में कोई ‘मेमोरी बॉक्स’ होता है?

मस्तिष्क में ऐसा कोई एक हिस्सा नहीं है जिसे खोलकर कहा जा सके कि यहां बचपन की यादें हैं, यहां स्कूल की यादें हैं और यहां फोन नंबर रखे हैं। अलग-अलग तरह की स्मृतियों के लिए अलग-अलग तंत्र काम करते हैं। किसी घटना को याद रखने, किसी कौशल को सीखने, किसी डर को याद रखने और किसी तथ्य को याद करने में मस्तिष्क के अलग नेटवर्कों की भूमिका होती है। यही वजह है कि तंत्रिका विज्ञान में स्मृति को किसी वस्तु की तरह नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया की तरह देखा जाता है।

जब हम कुछ नया देखते, सुनते या सीखते हैं तो सबसे पहले उसकी जानकारी मस्तिष्क में दर्ज होती है। इसके बाद वह धीरे-धीरे अधिक स्थिर होती है। इस प्रक्रिया को स्मृति-सुदृढ़ीकरण कहा जाता है। बाद में जब हमें वह जानकारी चाहिए होती है तो मस्तिष्क उससे जुड़े तंत्रिका नेटवर्क को दोबारा सक्रिय करता है। इसका मतलब है कि याद रखना केवल ‘संग्रह’ नहीं है। इसमें जानकारी को दर्ज करना, मजबूत करना और जरूरत पड़ने पर वापस निकालना—तीनों शामिल हैं।

हिप्पोकैम्पस: नई यादों का बड़ा केंद्र

हिप्पोकैम्पस मस्तिष्क के अंदर स्थित एक छोटी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण संरचना है। यह नई घटनाओं और अनुभवों से जुड़ी स्मृतियों को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसे आप एक तरह के ‘समन्वय केंद्र’ की तरह समझ सकते हैं। मान लीजिए आपने किसी समुद्र किनारे छुट्टी बिताई। वहां का दृश्य आपकी आंखों से जुड़ी तंत्रिका प्रणालियों में संसाधित होगा, आवाजें सुनने वाले तंत्र से जुड़ेंगी, समुद्र की गंध और हवा का एहसास अलग संवेदनात्मक प्रणालियों से आएगा और उस पूरी घटना के साथ जुड़ी खुशी या उत्साह भावनात्मक नेटवर्क से जुड़ेगा। हिप्पोकैम्पस इन अलग-अलग सूचनाओं को एक घटना के रूप में जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आपकी सारी पुरानी यादें हिप्पोकैम्पस के अंदर रखी रहती हैं। मौजूदा वैज्ञानिक समझ के अनुसार नई यादों के निर्माण में हिप्पोकैम्पस महत्वपूर्ण है, जबकि लंबे समय में स्मृति से जुड़े प्रतिनिधित्व मस्तिष्क के बाहरी हिस्से, खासकर कॉर्टेक्स के विस्तृत नेटवर्कों के साथ अधिक स्थायी रूप से जुड़ सकते हैं। नींद के दौरान हिप्पोकैम्पस और कॉर्टेक्स के बीच होने वाली गतिविधियों को स्मृति-सुदृढ़ीकरण से जोड़ा गया है।

एक मरीज ने बदल दी स्मृति की पूरी समझ

स्मृति विज्ञान के इतिहास में एक व्यक्ति का मामला बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। उसका नाम था हेनरी मोलाइसन। वैज्ञानिक साहित्य में उसे लंबे समय तक केवल एच.एम. के नाम से जाना गया। गंभीर मिर्गी के इलाज के लिए 1953 में उसके मस्तिष्क के दोनों ओर के कुछ हिस्सों की शल्यक्रिया की गई। इस दौरान हिप्पोकैम्पस से जुड़े महत्वपूर्ण हिस्से भी प्रभावित हुए। इसके बाद एक असाधारण स्थिति सामने आई। उसकी कई पुरानी यादें बनी रहीं। उसकी बुद्धि और भाषा जैसी क्षमताएं भी पूरी तरह खत्म नहीं हुईं। लेकिन वह नई घटनाओं की दीर्घकालिक स्मृति बनाने में गंभीर रूप से कठिनाई महसूस करने लगा। वह किसी व्यक्ति से मिल सकता था और कुछ समय बाद उसी व्यक्ति से दोबारा मिलकर उसे पहचान नहीं पाता था। इस मामले ने वैज्ञानिकों को यह समझने में बहुत मदद की कि हिप्पोकैम्पस नई स्मृतियां बनाने में कितना महत्वपूर्ण है। साथ ही इससे यह भी साफ हुआ कि मस्तिष्क की सारी स्मृतियां किसी एक जगह जमा नहीं रहतीं।

साइकिल चलाना याद है या साइकिल चलानी आती है?

ये दोनों बातें सुनने में एक जैसी लग सकती हैं, लेकिन मस्तिष्क के लिए अलग हैं। अगर आप कहते हैं, “मुझे याद है कि मैंने कल साइकिल चलाई थी”, तो यह एक घटना की स्मृति है। लेकिन अगर आप बिना ज्यादा सोचे साइकिल चला लेते हैं, तो यह एक कौशल है। कौशल और आदतों वाली स्मृति के लिए मस्तिष्क की अलग प्रणालियां महत्वपूर्ण होती हैं। बेसल गैन्ग्लिया और सेरिबेलम जैसी संरचनाएं मोटर कौशल और सीखी हुई गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यही कारण है कि किसी व्यक्ति को यह याद न रहे कि उसने किसी कौशल का अभ्यास कब किया था, फिर भी वह कौशल उसके शरीर को आता रह सकता है। यानी “मुझे घटना याद है” और “मुझे काम करना आता है”—मस्तिष्क के लिए एक ही चीज नहीं हैं।

यादें बनती कैसे हैं?

इस सवाल का एक महत्वपूर्ण उत्तर है -सिनैप्स। न्यूरॉन यानी तंत्रिका कोशिकाएं एक-दूसरे से सीधे चिपकी नहीं रहतीं। उनके बीच संपर्क के विशेष स्थान होते हैं जिन्हें सिनैप्स कहा जाता है। जब हम कुछ सीखते हैं तो इन संपर्कों की ताकत और गतिविधि बदल सकती है। कुछ संपर्क मजबूत हो सकते हैं, कुछ कमजोर और कुछ नए संपर्क भी विकसित हो सकते हैं। इसी बदलाव को तंत्रिका लचीलेपन यानी न्यूरोप्लास्टिसिटी के व्यापक विचार से जोड़ा जाता है।

सीखने के दौरान होने वाले ऐसे बदलावों में दीर्घकालिक प्रबलन एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अवधारणा है। इसका मतलब है कि कुछ तंत्रिका संपर्क बार-बार सक्रिय होने के बाद लंबे समय तक अधिक प्रभावी हो सकते हैं। सरल शब्दों में कहें तो सीखना केवल जानकारी ‘डालना’ नहीं है। सीखने के साथ मस्तिष्क के नेटवर्क खुद बदलते हैं।

‘एंग्राम’ क्या है?

स्मृति विज्ञान में एक बेहद दिलचस्प शब्द है - एंग्राम। इसे किसी स्मृति के जैविक निशान के रूप में समझा जा सकता है। किसी अनुभव के दौरान सक्रिय हुए कुछ तंत्रिका समूह और उनके बीच हुए बदलाव उस अनुभव की स्मृति से जुड़े हो सकते हैं। पशु-अध्ययनों में वैज्ञानिकों ने ऐसे तंत्रिका समूहों की पहचान की है जो किसी विशेष अनुभव के दौरान सक्रिय होते हैं और बाद में उस स्मृति को याद करने पर दोबारा सक्रिय हो सकते हैं। लेकिन एंग्राम को किसी स्थिर ‘मेमोरी चिप’ की तरह समझना गलत होगा। एक स्मृति से जुड़े तंत्रिका समूह कई क्षेत्रों में फैले हो सकते हैं और समय के साथ उनमें बदलाव भी हो सकता है। यानी स्मृति का जैविक निशान भी जीवित, बदलते हुए नेटवर्क का हिस्सा है।

क्या दिमाग की मेमोरी फुल हो सकती है?

यहीं कंप्यूटर और इंसानी दिमाग के बीच सबसे बड़ा फर्क सामने आता है। आप मोबाइल में देख सकते हैं कि 128 जीबी में से 110 जीबी भर चुकी है। कंप्यूटर में भी स्टोरेज की सीमा साफ दिखाई देती है। लेकिन मानव मस्तिष्क के लिए ऐसी कोई स्वीकृत ‘मेमोरी सीमा’ नहीं है। विज्ञान यह नहीं कहता कि इंसान के दिमाग में इतनी निश्चित संख्या में गीगाबाइट या पेटाबाइट की जगह है और उसके बाद नई यादें बननी बंद हो जाएंगी। इंटरनेट पर अक्सर दावा किया जाता है कि मानव मस्तिष्क की क्षमता करीब 2.5 पेटाबाइट है। लेकिन इसे दिमाग की वास्तविक, मापी हुई स्टोरेज क्षमता समझना सही नहीं है। मस्तिष्क किसी डिजिटल हार्ड डिस्क की तरह काम नहीं करता। एक सिनैप्स सिर्फ शून्य या एक नहीं होता। उसकी ताकत और गतिविधि कई स्तरों पर बदल सकती है। एक ही तंत्रिका नेटवर्क अलग-अलग यादों में योगदान दे सकता है और यादें एक-दूसरे से जुड़ी भी होती हैं। इसलिए मस्तिष्क की स्मृति क्षमता को सीधे गीगाबाइट में बदलना वैज्ञानिक रूप से बहुत सरल बना देना होगा। आज तक स्वस्थ मानव मस्तिष्क के लिए ऐसी कोई ज्ञात सीमा नहीं है जिस पर वैज्ञानिक कह सकें कि “अब इसकी मेमोरी पूरी भर गई है।”

अगर दिमाग की मेमोरी फुल नहीं होती तो हम चीजें भूलते क्यों हैं? क्योंकि भूलना केवल खराबी नहीं है। यह मस्तिष्क की सामान्य और कई बार उपयोगी प्रक्रिया है। सोचिए अगर आपको जीवन के हर दिन की हर बातचीत, हर सड़क, हर चेहरे, हर आवाज और हर छोटी घटना का पूरा विवरण याद रहता। क्या यह उपयोगी होता - शायद नहीं। इतनी सारी जानकारी के बीच जरूरी चीजों को पहचानना बेहद मुश्किल हो जाता। मस्तिष्क इसलिए हर चीज को समान महत्व नहीं देता। वह ध्यान, अर्थ, भावनात्मक महत्व और उपयोगिता के आधार पर जानकारी को अलग-अलग तरीके से संभालता है। इस अर्थ में भूलना मस्तिष्क की कमजोरी ही नहीं, उसकी कार्यक्षमता का हिस्सा भी है।

कई बार याददाश्त गई नहीं होती, बस रास्ता नहीं मिल रहा होता

कभी ऐसा हुआ है कि किसी व्यक्ति का नाम याद नहीं आ रहा, लेकिन कुछ देर बाद अचानक याद आ गया? इसका मतलब जरूरी नहीं कि वह जानकारी दिमाग से मिट गई थी। हो सकता है जानकारी मौजूद थी, लेकिन उसे बाहर निकालने के लिए सही संकेत नहीं मिल रहा था। इसीलिए कोई पुराना गाना सुनते ही अचानक बचपन की पूरी घटना याद आ जाती है। गंध भी ऐसा कर सकती है। किसी पुराने घर की खुशबू, किसी खास इत्र की महक या बचपन में खाए गए भोजन की गंध अचानक वर्षों पुरानी याद को सामने ला सकती है। मस्तिष्क में यादें अलग-अलग सूचनाओं के बीच संबंधों के रूप में जुड़ी होती हैं। एक संकेत दूसरे तक पहुंचने का रास्ता खोल सकता है।

क्या याद करते समय याददाश्त बदल जाती है?

यह स्मृति विज्ञान की सबसे दिलचस्प बातों में से एक है। हम आम तौर पर सोचते हैं कि कोई पुरानी याद दिमाग में सुरक्षित पड़ी है और जब भी उसे याद करेंगे, वही पुरानी फाइल खुल जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं है। जब हम किसी स्मृति को याद करते हैं तो वह दोबारा सक्रिय होती है। इस दौरान उसमें कुछ बदलाव की संभावना रहती है। बाद में वह फिर स्थिर हो सकती है। इस प्रक्रिया को पुनर्सुदृढ़ीकरण कहा जाता है। इसी वजह से परिवार में किसी पुरानी घटना को कई बार सुनाते-सुनाते उसके विवरण बदल सकते हैं। और सबसे दिलचस्प बात यह है कि व्यक्ति को अपनी बदली हुई याद पर भी पूरा भरोसा हो सकता है। इसलिए “मुझे बिल्कुल साफ याद है” और “घटना बिल्कुल वैसी ही हुई थी”—ये दो अलग बातें हैं।

क्या हमारी यादें झूठी हो सकती हैं?

हां, और इसके लिए झूठ बोलना जरूरी नहीं। मानव स्मृति पुनर्निर्माण करती है। किसी घटना के कुछ हिस्से वास्तविक हो सकते हैं, कुछ विवरण बाद में जुड़ सकते हैं और कुछ बातें दूसरे लोगों की बातों से हमारी स्मृति में शामिल हो सकती हैं। इसी वजह से प्रत्यक्षदर्शी की गवाही महत्वपूर्ण होने के बावजूद हमेशा पूरी तरह अचूक नहीं मानी जाती। किसी घटना को लेकर बहुत अधिक आत्मविश्वास भी उसकी शत-प्रतिशत सटीकता की गारंटी नहीं है। यह मानव मस्तिष्क की कमी नहीं, बल्कि स्मृति के काम करने के तरीके का हिस्सा है।

क्या चार-पांच चीजों से ज्यादा एक साथ याद रखना मुश्किल है?

दीर्घकालिक स्मृति और काम करने वाली स्मृति यानी कार्यशील स्मृति एक ही चीज नहीं हैं। कार्यशील स्मृति वह छोटी मानसिक जगह है जिसमें हम इस समय किसी जानकारी को सक्रिय रखकर उसके साथ काम करते हैं। जैसे किसी ने आपको एक पता बताया और आप कुछ सेकंड तक उसे मन में दोहराते रहे। यह क्षमता सीमित होती है। आधुनिक शोध ने पुराने “सात चीजों” वाले लोकप्रिय नियम को काफी चुनौती दी है और कई परिस्थितियों में कुछ ही सार्थक इकाइयों को एक साथ सक्रिय रखने की क्षमता दिखाई जाती है। इसलिए जब हमें लगता है कि “दिमाग में बहुत कुछ भर गया है”, तो कई बार समस्या लंबी अवधि की मेमोरी की नहीं बल्कि ध्यान और कार्यशील स्मृति की होती है।

परीक्षा के समय सब कुछ क्यों भूल जाता है दिमाग?

कई बार हम पढ़ते बहुत हैं लेकिन परीक्षा में उत्तर याद नहीं आता। इसका मतलब यह नहीं कि दिमाग की जगह खत्म हो गई। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं—जानकारी ठीक से दर्ज न होना, समान जानकारियों का आपस में हस्तक्षेप, तनाव, नींद की कमी या सही संकेत न मिलना। इसीलिए पढ़ाई में केवल बार-बार पढ़ना पर्याप्त नहीं होता। खुद से उत्तर याद करने की कोशिश करना, अलग-अलग दिनों में दोहराना, जानकारी को पुराने ज्ञान से जोड़ना और पर्याप्त नींद लेना स्मृति के लिए ज्यादा उपयोगी हो सकता है।

नींद के दौरान दिमाग क्या करता है?

नींद को हम अक्सर ‘बंद हो जाना’ समझते हैं, लेकिन दिमाग नींद में भी सक्रिय रहता है। विशेषकर नींद के कुछ चरणों में दिन के दौरान सीखी गई जानकारी से जुड़े तंत्रिका पैटर्न दोबारा सक्रिय हो सकते हैं। हिप्पोकैम्पस और कॉर्टेक्स के बीच होने वाली गतिविधि को स्मृति-सुदृढ़ीकरण से जोड़ा गया है। यही वजह है कि परीक्षा से पहले पूरी रात जागकर पढ़ना हमेशा अच्छा विचार नहीं है। आपने पढ़ने के लिए ज्यादा घंटे जरूर दिए, लेकिन अगर नींद कम हो गई तो नई जानकारी को मजबूत करने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। नींद इसलिए केवल शरीर को आराम देने के लिए नहीं है। यह सीखने और स्मृति की जैविक प्रक्रिया का भी हिस्सा है।

क्या सपने और याददाश्त का भी संबंध है?

नींद के दौरान स्मृतियों से जुड़े तंत्रिका नेटवर्क सक्रिय हो सकते हैं और इसी दौरान सपने भी आ सकते हैं। सपनों में हाल के अनुभवों के टुकड़े दिखाई देना इसलिए असामान्य नहीं है। लेकिन विज्ञान अभी यह नहीं कहता कि हर सपना स्मृति को मजबूत करने के लिए जरूरी है। यानी यह कहना सही होगा कि नींद, स्मृति-सुदृढ़ीकरण और सपनों के बीच संबंध है; लेकिन सपना स्वयं स्मृति मजबूत करने का अनिवार्य कारण है, यह अभी सिद्ध नहीं हुआ है।

क्या इंसान अपने दिमाग का सिर्फ 10 प्रतिशत इस्तेमाल करता है?

यह सबसे लोकप्रिय और सबसे पुराने दिमागी मिथकों में से एक है। हमारे दिमाग के अलग-अलग हिस्से अलग-अलग समय पर अलग काम करते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि हर न्यूरॉन हर सेकंड सक्रिय रहता है। लेकिन यह दावा कि हमारा 90 प्रतिशत दिमाग बेकार पड़ा रहता है और हम केवल 10 प्रतिशत का इस्तेमाल करते हैं, वैज्ञानिक प्रमाणों से समर्थित नहीं है। मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों के अलग-अलग कार्य हैं और वे व्यापक नेटवर्कों के साथ मिलकर काम करते हैं।

दिमाग में 86 अरब न्यूरॉन होते हैं, क्या यह संख्या बिल्कुल सही है?

2024 में प्रकाशित एक विश्लेषण ने बताया कि मानव मस्तिष्क में न्यूरॉनों की सही संख्या को लेकर इतनी निश्चितता नहीं है जितनी लोकप्रिय लेखों में दिखाई जाती है। उपलब्ध अनुमानों में काफी अंतर है और एक विश्लेषण में लगभग 61 से 99 अरब तक के अनुमान सामने आए। इसलिए “मस्तिष्क में ठीक 86 अरब न्यूरॉन होते हैं” कहने के बजाय यह कहना ज्यादा वैज्ञानिक है कि मानव मस्तिष्क में अरबों न्यूरॉन होते हैं और करीब 86 अरब का आंकड़ा एक व्यापक रूप से उद्धृत अनुमान है। यही विज्ञान की खूबसूरती है—वह अपने पुराने आंकड़ों को भी नए प्रमाण आने पर दोबारा जांचता है।

हम अक्सर मस्तिष्क की बात करते समय केवल न्यूरॉन के बारे में सोचते हैं। लेकिन मस्तिष्क में ग्लिया नाम की कोशिकाएं भी होती हैं। ये न्यूरॉनों को सहारा देने, पोषण, विद्युत व्यवस्था, रासायनिक संतुलन और कई दूसरी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में भूमिका निभाती हैं। पुरानी किताबों में अक्सर कहा जाता था कि ग्लिया न्यूरॉनों से दस गुना ज्यादा होती हैं। आज यह आंकड़ा वैज्ञानिक रूप से भरोसेमंद सामान्य नियम नहीं माना जाता। यानी मस्तिष्क के बारे में जो तथ्य हमें बचपन में याद कराए गए थे, उनमें से कुछ समय के साथ बदल भी चुके हैं।

दिमाग खुद दर्द महसूस करता है या नहीं?

मस्तिष्क के ऊतक में त्वचा की तरह दर्द महसूस कराने वाले सामान्य दर्द-संवेदक नहीं होते। इसलिए सिरदर्द का मतलब यह नहीं कि मस्तिष्क का ऊतक खुद दर्द कर रहा है। सिरदर्द में सिर के आसपास की झिल्लियां, रक्त वाहिकाएं, नसें और दूसरे संवेदनशील ऊतक भूमिका निभा सकते हैं। इसी कारण कुछ विशेष प्रकार की मस्तिष्क शल्यक्रिया में रोगी को जागृत रखा जाना संभव होता है, जबकि खोपड़ी और आसपास के हिस्सों को सुन्न किया जाता है।

क्या बायां दिमाग तार्किक और दायां रचनात्मक होता है?

कुछ कामों में मस्तिष्क के दोनों हिस्सों के बीच विशेष प्रकार का विभाजन जरूर पाया जाता है। उदाहरण के लिए अधिकांश लोगों में भाषा से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्य बाएं हिस्से में अधिक प्रमुख होते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कोई व्यक्ति पूरी तरह “बाएं दिमाग वाला” या “दाएं दिमाग वाला” है। रचनात्मकता, संगीत, गणित, भाषा, निर्णय और व्यक्तित्व जैसे जटिल कार्य पूरे मस्तिष्क के कई नेटवर्कों की संयुक्त गतिविधि से बनते हैं। इसलिए “मैं दाएं दिमाग वाला हूं, इसलिए मैं रचनात्मक हूं” जैसी श्रेणियां वैज्ञानिक वास्तविकता को जरूरत से ज्यादा सरल कर देती हैं।

क्या उम्र बढ़ने पर मेमोरी खत्म होना सामान्य है?

उम्र बढ़ने के साथ कुछ बदलाव सामान्य हो सकते हैं। किसी व्यक्ति का नाम याद करने में पहले से थोड़ा अधिक समय लगना, कभी-कभी चीजें भूल जाना या नई जानकारी सीखने में अधिक समय लगना उम्र के साथ हो सकता है। लेकिन रोजमर्रा के जरूरी काम भूलना, परिचित जगहों पर रास्ता भूलना या लगातार हाल की घटनाओं को याद न रख पाना केवल सामान्य उम्र बढ़ने का हिस्सा मानकर छोड़ना ठीक नहीं है। यानी हर भूलने को बीमारी समझना भी गलत है और हर गंभीर भूलने को उम्र का असर मानना भी।

दिमाग खुद को बदल सकता है

मस्तिष्क की सबसे अद्भुत क्षमताओं में से एक है न्यूरोप्लास्टिसिटी। सरल भाषा में इसका मतलब है कि अनुभव और अभ्यास के साथ मस्तिष्क के तंत्रिका नेटवर्क बदल सकते हैं। नई भाषा सीखना, संगीत का अभ्यास करना, कोई खेल सीखना, नई जगहों पर जाना या किसी कौशल को लगातार दोहराना मस्तिष्क के नेटवर्क में बदलाव ला सकता है। यही क्षमता चोट के बाद मस्तिष्क के पुनर्गठन में भी भूमिका निभा सकती है। इसका मतलब यह नहीं कि मस्तिष्क किसी मांसपेशी की तरह हर स्थिति में एक ही तरीके से बड़ा होता जाएगा। लेकिन यह जरूर है कि वयस्क मस्तिष्क भी पूरी तरह स्थिर नहीं है।

क्या इंसान के पास ‘फोटोग्राफिक मेमोरी’ होती है?

ऐसी कहानियां खूब मिलती हैं कि कोई व्यक्ति किताब का पूरा पन्ना एक बार देखकर हमेशा के लिए याद कर लेता है। वास्तविक विज्ञान में ऐसी पूर्ण और स्थायी ‘फोटोग्राफिक मेमोरी’ के लिए मजबूत प्रमाण नहीं हैं। हां, कुछ लोग व्यक्तिगत घटनाओं को असाधारण विस्तार से याद कर सकते हैं। अत्यंत दुर्लभ स्थिति को अत्यधिक श्रेष्ठ आत्मकथात्मक स्मृति कहा जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि व्यक्ति हर किताब, हर चेहरा, हर संख्या और हर दृश्य को कैमरे की तरह हूबहू याद रखता है।

आंखें दुनिया की तस्वीरें लेती हैं और दिमाग उन्हें वीडियो की तरह रिकॉर्ड करता है—ऐसा नहीं है। मस्तिष्क लगातार तय करता है कि किस चीज पर ध्यान देना है, किस जानकारी का अर्थ क्या है और किन चीजों को आगे उपयोग किया जा सकता है। इसलिए हम किसी कमरे से बाहर निकलने के बाद भी यह नहीं बता पाते कि दीवार पर लगी छोटी-सी तस्वीर किस तरफ थी। हमने उसे देखा जरूर था, लेकिन शायद पर्याप्त ध्यान से दर्ज नहीं किया। मस्तिष्क हर चीज रिकॉर्ड नहीं करता। वह दुनिया का एक उपयोगी मानसिक मॉडल बनाता है।

एक गाना पूरा बचपन वापस ला सकता है

स्मृति की असली ताकत केवल जानकारी रखने में नहीं, बल्कि जानकारी के बीच संबंध बनाने में है। एक गीत किसी व्यक्ति की याद दिला सकता है। किसी सड़क को देखकर वर्षों पुरानी घटना याद आ सकती है। किसी खाने की खुशबू से बचपन का घर याद आ सकता है। किसी शब्द से पूरी बातचीत याद आ सकती है। यह इसलिए संभव है क्योंकि स्मृतियां अलग-अलग बंद डिब्बों में नहीं रखी जातीं। वे आपस में जुड़ी होती हैं। एक याद दूसरी याद तक पहुंचने का रास्ता बन सकती है।

इसलिए पढ़ाई में भी संबंध बनाना ज्यादा जरूरी है, अगर किसी तथ्य को केवल दस बार पढ़ा जाए तो वह जरूरी नहीं कि लंबे समय तक याद रहे। लेकिन अगर आप समझें कि वह तथ्य सही क्यों है, उसे किसी उदाहरण से जोड़ें, अपने शब्दों में समझाएं और बाद में किताब बंद करके उसे याद करने की कोशिश करें, तो जानकारी के कई रास्ते बनते हैं। मस्तिष्क के लिए अर्थ अक्सर केवल रटने से ज्यादा शक्तिशाली होता है। यही कारण है कि किसी विषय के विशेषज्ञ को नई जानकारी याद रखने में कई बार फायदा होता है। उसके पास पहले से एक बड़ा ज्ञान-जाल मौजूद होता है जिसमें नई जानकारी जुड़ सकती है।

सबसे बड़ा रहस्य अभी भी बाकी है

विज्ञान आज यह काफी हद तक समझ चुका है कि स्मृति बनाने में हिप्पोकैम्पस, कॉर्टेक्स, अमिग्डाला और दूसरी तंत्रिका प्रणालियां किस तरह योगदान देती हैं। हमें यह भी पता है कि नींद स्मृति-सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और सीखने के बाद मस्तिष्क की गतिविधि में बदलाव आता है। लेकिन एक बड़ा सवाल अभी भी बाकी है। आखिर विद्युत और रासायनिक गतिविधियों से हमारी व्यक्तिगत याद का अनुभव पैदा कैसे होता है? किसी प्रिय व्यक्ति का चेहरा याद आते ही उससे जुड़ी भावना क्यों लौट आती है? किसी पुराने गीत से अचानक बीस साल पुराना दिन कैसे सामने आ जाता है? और सबसे बड़ा सवाल—हम खुद को ‘मैं’ के रूप में क्यों अनुभव करते हैं? इन सवालों के जवाब चेतना के उस रहस्य से जुड़े हैं जिसे विज्ञान अभी पूरी तरह हल नहीं कर पाया है।

मानव मस्तिष्क का लक्ष्य हर चीज को हमेशा के लिए जमा करना नहीं है। उसका लक्ष्य है, जानकारी से अर्थ बनाना, जरूरी चीजों को पहचानना, पुराने अनुभवों से नई चीजें सीखना और जरूरत पड़ने पर सही याद को वापस निकाल पाना। शायद यही वजह है कि मानव मस्तिष्क किसी हार्ड डिस्क से कहीं ज्यादा दिलचस्प है। हार्ड डिस्क फाइल बचाती है। मस्तिष्क अनुभव बनाता है।

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