आ गई पृथ्वी की मौत की तारीख, 3650 दिन शेष; जागो और बचा लो, कारगर हैं ये 'छोटी-छोटी मगर मोटी बातें'
छोटी-छोटी मगर मोटी बातें: पृथ्वी ने पार किया पहला क्लाइमेट टिपिंग पॉइंट। जानें ब्रह्मवैवर्त पुराण की सीख और आधुनिक विज्ञान की चेतावनी के बीच बचाने का रास्ता।
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22 अप्रैल को आज पूरी दुनिया 'अर्थ डे' मना रही है। लेकिन अर्थ डे केवल खुशियों का या उत्सव का पर्व है। तो जवाब है नहीं, यह एक गंभीर चेतावनी का दिन है। जैसे कहते हैं कि जब मौत सिर पर खड़ी हो तो जश्न नहीं मनाया जा सकता। जी हां ग्लोबल टिपिंग पॉइंट्स रिपोर्ट 2025 के हालिया आंकड़े चौंकाने वाले हैं। जो यह बताते हैं कि पृथ्वी ने अपना पहला 'क्लाइमेट टिपिंग पॉइंट' पार कर लिया है। यह मौजूदा 1 अप्रैल से शुरू हुआ पृथ्वी माह केवल पृथ्वी का उत्सव नहीं है—यह भविष्य के लिए एक लड़ाई है। यह माह 30 अप्रैल तक चलेगा। इसी माह में बीच का उत्सव है पृथ्वी दिवस। आज हमारी सांसों की हवा, हमारे लिए आवश्यक जल और हमारी प्रिय भूमि एवं वन्यजीवों की सुरक्षा सब कुछ खतरे में है।
क्लाइमेट टिपिंग पॉइंट: जब वापसी का रास्ता बंद हो जाए
क्लाइमेट टिपिंग पॉइंट वह स्थिति है जहां पृथ्वी खुद को मारना शुरू कर देती है और आपकी ये दुनिया धीरे धीरे आपका साथ छोड़ने लगती है हवा से आक्सीजन गायब हो जाती है पीने को पानी नहीं मिलता है प्राकृतिक आपदाएं बढ़ जाती है। और आपके भोजन का मुख्य स्रोत खेती चौपट हो जाती है। फिर जीवन कैसे जिएंगे। खतरा बड़ा है।
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि दुनिया के कोरल रीफ (मूंगा चट्टानें) उस दहलीज को पार कर चुके हैं जहाँ से उनका विनाश अब लगभग अपरिवर्तनीय (Irreversible) हो गया है। 1.5°C की ग्लोबल वार्मिंग की सीमा के हम इतने करीब हैं कि अमेज़न के वर्षावन सवाना (घास के मैदान) में बदल सकते हैं और अटलांटिक महासागर की धाराओं का तंत्र ठप्प हो सकता है।
भारत के लिए क्या है इसके मायने?
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए यह खतरा सीधा और बड़ा इसलिए भी है:
• हिमालयी ग्लेशियर: हमारे ग्लेशियर 'ध्रुवीय बर्फ' की तरह ही संवेदनशील हैं। इनका पिघलना गंगा-यमुना जैसी नदियों के अस्तित्व पर संकट है। इससे पानी का मुख्य स्रोत ही खतरे में पड़ जाएगा और जब मुख्य नदियों पर खतरा आएगा तो सहायक नदियां भी साथ छोड़ देंगी।
• समुद्र तटीय शहर: मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे शहरों पर बढ़ते जलस्तर का सीधा खतरा है। कल्पना करें मुंबई में 50 फुट ऊंचा समुद्र हिलोरें मार रहा हो। तब वहां कैसे रहा जाएगा। या चेन्नई और कोलकाता की क्या स्थिति होगी। बड़ी संख्या में लोगों का पलायन कैसे सम्हाला जाएगा।
• मानसून का चक्र: महासागरीय धाराओं (AMOC) में बदलाव हमारे कृषि प्रधान देश के मानसून को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर सकता है। ये स्थितियां मौसम में बदलाव लाएंगी। रेगिस्तान में पानी बरसेगा। और जहां प्रचुर पानी था वहां सूखा अकाल लाएगा। धरती बंजर होने लगेगी।
यह बात डराने के लिए नहीं अलर्ट करने के लिए कही जा रही है।
संकट के बीच 'उम्मीद की किरण': भारत के प्रयास
जहाँ वैश्विक रिपोर्ट डराती है, वहीं भारत ने इस चुनौती को एक 'मिशन' के रूप में स्वीकार किया है। भारत आज केवल उपदेश नहीं दे रहा, बल्कि समाधान पेश कर रहा है:
1. सरकारी संकल्प: 'पंचामृत' और मिशन LiFE प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'पंचामृत' का संकल्प देकर 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य रखा है। भारत आज दुनिया में नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) के क्षेत्र में चौथे स्थान पर है। 'मिशन LiFE' (Lifestyle for Environment) के जरिए भारत ने दुनिया को बताया है कि पर्यावरण की रक्षा केवल नीतियों से नहीं, बल्कि जीवनशैली बदलने से होगी।
2. गैर-सरकारी और सामाजिक नवाचार देश के कई NGO और स्टार्टअप्स 'पॉजिटिव टिपिंग पॉइंट्स' पर काम कर रहे हैं। सौर ऊर्जा को घर-घर पहुँचाने से लेकर, इजरायल की 'ड्रिप इरिगेशन' तकनीक को भारतीय खेतों तक पहुँचाने तक, गैर-सरकारी संस्थाएं एक सेतु का काम कर रही हैं।
3. जन-भागीदारी: लोक सेवा से 'लोक आंदोलन' तक जैसा कि हम शास्त्री जी और योगी जी के प्रशासनिक चरित्र की बात करते हैं, पर्यावरण के क्षेत्र में भी 'जन-भागीदारी' ही असली ताकत है। चाहे वह चिपको आंदोलन की विरासत हो या आज के युवाओं द्वारा चलाया जा रहा 'प्लास्टिक मुक्त भारत' अभियान। जब तक पर्यावरण संरक्षण एक सरकारी कार्यक्रम से बदलकर एक 'पारिवारिक संस्कार' नहीं बनेगा, तब तक हम इन टिपिंग पॉइंट्स को नहीं रोक पाएंगे।
यहां एक बात उल्लेखनीय है उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य सरकार ने पिछले 9 वर्षों में वृक्षारोपण के मामले में ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाए हैं, जिसमें एक ही दिन में सबसे ज्यादा पौधे लगाने का विश्व रिकॉर्ड भी शामिल है।
प्रमुख वृक्षारोपण रिकॉर्ड और उपलब्धियां:
• ऐतिहासिक लक्ष्य (2025): योगी सरकार ने 'एक पेड़ मां के नाम 2.0' अभियान के तहत 9 जुलाई 2025 को एक ही दिन में 37 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य निर्धारित कर रिकॉर्ड बनाया।
• लगातार रिकॉर्ड तोड़ अभियान: सरकार ने वर्ष 2019-20 में 22.59 करोड़ का, फिर 2023-24 में 36 करोड़ से अधिक पौधे लगाकर लगातार अपने ही पिछले रिकॉर्ड को तोड़ा है।
• 9 वर्षों में 241 करोड़ से अधिक वृक्षारोपण: पिछले 9 वर्षों के अंदर यूपी में 241 करोड़ से अधिक वृक्षारोपण के कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। यह जनभागीदारी को बढ़ावा देने की मिसाल है।
• वन क्षेत्र में वृद्धि: वृक्षारोपण अभियानों के कारण यूपी में 5 लाख एकड़ से अधिक क्षेत्रफल में वन आच्छादन बढ़ा है।
• 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान: इस पहल के तहत राज्य में बड़े पैमाने पर पौधारोपण किया जा रहा है, जिसमें हरियाली बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण का लक्ष्य रखा गया है।
योगी सरकार का उद्देश्य 2026-27 तक राज्य के हरित क्षेत्र (Green Cover) को 9% से बढ़ाकर 15% करना है। इन अभियानों के तहत पौधे न केवल सड़कों और एक्सप्रेसवे के किनारे लगाए जा रहे हैं, बल्कि उन्हें वन के रूप में विकसित भी किया जा रहा है, जैसे अयोध्या में 'किष्किंधा वन' की स्थापना।
पृथ्वी के साथ हमारा साझा भविष्य
हमें यह समझना होगा कि 'ग्लोबल टिपिंग पॉइंट्स रिपोर्ट 2025' हमें डराती नहीं, बल्कि जगाती है। यह हमें बताती है कि हमारे पास 'पॉजिटिव टिपिंग पॉइंट्स' बनाने का भी मौका है—जैसे इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाना, सौर ऊर्जा का प्रयोग और सादगीपूर्ण जीवन।
हमें यह समझना होगा कि पृथ्वी हमारे पूर्वजों की विरासत नहीं, बल्कि हमारे बच्चों का कर्ज है। और इस कर्ज को उतारने का समय अब है।
बुजुर्गों के वह तौर-तरीके जो आज 'क्लाइमेट सॉल्यूशन' हैं:
• संसाधनों का सम्मान (रिपेयर कल्चर): हमारे यहाँ चीज़ें फेंकी नहीं जाती थीं, ठीक कराई जाती थीं। फटे कपड़ों से पायदान बनाना या कांच की बोतलों को अनाज रखने के लिए इस्तेमाल करना—यह आज का 'Recycle' ही तो था।
• प्रकृति के साथ आध्यात्मिक नाता: पीपल और बरगद की पूजा, परिंदों के लिए मिट्टी के सकोरे में पानी रखना और चींटियों को आटा डालना। यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि 'इकोसिस्टम' को बचाए रखने का उनका तरीका था।
• किफायत ही सुरक्षा है: "जितनी चादर हो उतने पैर पसारना"—बिजली, पानी और खाने की बर्बादी को हमारे बुजुर्ग पाप मानते थे। आज की 'कंज्यूमर कल्चर' (खरीदना और फेंकना) ही क्लाइमेट संकट की असली जड़ है।
• मौसम के अनुसार जीवन: बिना AC के खस की टट्टियां लगाना, मिट्टी के घड़े का पानी पीना और मौसमी फल-सब्जियां खाना।
कितना वक्त बचा है?
रिसर्च के अनुसार, हमारे पास 'सबकुछ' खत्म होने में अभी वक्त है, लेकिन 'अपरिवर्तनीय नुकसान' शुरू हो चुका है। रिपोर्ट कहती है कि अगर नहीं जागे तो अगले कुछ ही वर्षों में वैश्विक औसत तापमान 1.5°C की सीमा को पार कर जाएगा। एक सिस्टम का गिरना (जैसे बर्फ का पिघलना) दूसरे सिस्टम (जैसे समुद्री धाराएं) को गिराने की रफ्तार तेज कर देगा। इसे ही 'कैस्केडिंग फेलियर' कहा जाता है।
4. समाधान: क्या किया जाना चाहिए?
रिसर्च केवल निराशा नहीं देती, वह 'पॉजिटिव टिपिंग पॉइंट्स' की बात भी करती है:
• जीवाश्म ईंधन का त्याग: कोयला, पेट्रोल और डीजल को तुरंत छोड़कर नवीकरणीय ऊर्जा (Solar/Wind) की ओर मुड़ना होगा।
• तकनीक और समाज का मेल: जिस तरह इलेक्ट्रिक गाड़ियां अब पेट्रोल गाड़ियों की जगह ले रही हैं, वैसे ही समाज को 'मांस के कम सेवन' और 'सादगीपूर्ण जीवन' को एक आंदोलन बनाना होगा।
• 1°C का लक्ष्य: कोरल रीफ जैसी प्रणालियों को बचाने के लिए केवल तापमान स्थिर करना काफी नहीं है, बल्कि भविष्य में तकनीक के जरिए तापमान को वापस 1°C से नीचे लाना होगा।
रिपोर्ट का 'पॉजिटिव सोशल टिपिंग पॉइंट' समाज में बदलाव की लहर की बात करता है, जिसमें हमें अपने बाबा दादी नाना नानी की सीख को जीवन में उतारना होगा। जीवन में 'सादगी' और 'किफायत' का मंत्र अपनाना होगा। दिखावे के कल्चर और संस्कृति से बचना होगा।अंत में यही है कि प्रकृति का अलार्म बज चुका है। अगर हमने 1.5°C की लक्ष्मण रेखा पार कर ली, तो फिर धरती खुद को बचाने के बजाय खुद को नष्ट करने की दिशा में बढ़ जाएगी। वक्त बहुत कम है, शायद एक दशक से भी कम, जिसमें हमें बड़े बदलाव करने होंगे।
अगर हम भारत की प्राचीन परंपराओं की बात करते हैं तो ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रमुख है जिसकी रचना का काल खण्ड चार सौ सै पांच सौ वर्ष पूर्व का माना जाता है इसमें पृथ्वी की आराधना करते हुए यह बात कही गई है कि पृथ्वी सब कुछ देती भी है और सब कुछ ले भी लेती है।
पृथ्वीस्तोत्रम्
विष्णुरुवाच -
यज्ञसूकरजाया त्वं जयं देहि जयावहे । जयेऽजये जयाधारे जयशीले जयप्रदे ॥ १॥
सर्वाधारे सर्वबीजे सर्वशक्तिसमन्विते । सर्वकामप्रदे देवि सर्वेष्टं देहि मे भवे ॥ २॥
सर्वशस्यालये सर्वशस्याढ्ये सर्वशस्यदे । सर्वशस्यहरे काले सर्वशस्यात्मिके भवे ॥ ३॥
मङ्गले मङ्गलाधारे मङ्गल्ये मङ्गलप्रदे । मङ्गलार्थे मङ्गलेशे मङ्गलं देहि मे भवे ॥ ४॥
भूमे भूमिपसर्वस्वे भूमिपालपरायणे । भूमिपाहङ्काररूपे भूमिं देहि च भूमिदे ॥ ५॥
इदं स्तोत्रं महापुण्यं तां सम्पूज्य च यः पठेत् । कोटिकोटि जन्मजन्म स भवेद् भूमिपेश्वरः ॥ ६॥
भूमिदानकृतं पुण्यं लभते पठनाज्जनः । भूमिदानहरात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः ॥ ७॥
भूमौ वीर्यत्यागपापाद् भूमौ दीपादिस्थापनात् । पापेन मुच्यते प्राज्ञः स्तोत्रस्य पाठनान्मुने ।
अश्वमेधशतं पुण्यं लभते नात्र संशयः ॥ ८॥
इति श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराणे प्रकृतिखण्डे विष्णुकृतं पृथ्वीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
हिन्दी भावार्थ - भगवान् विष्णु बोले -- विजयकी प्राप्ति करानेवाली वसुधे ! मुझे विजय दो । तुम भगवान् यज्ञवराहकी पत्नी हो । जये! तुम्हारी कभी पराजय नहीं होती है । तुम विजयका आधार, विजयशील और विजयदायिनी हो ॥ १॥
देवि! तुम्हीं सबकी आधारभूमि हो । सर्वबीजस्वरूपिणी तथा सम्पूर्ण शक्तियों से सम्पन्न हो । समस्त कामनाओं को देनेवाली देवि! तुम इस संसारमे मुझे सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तु प्रदान करो ॥ २॥
तुम सब प्रकारके शस्यों का घर हो । सब तरह के शस्यों से सम्पन्न हो । सभी शस्यों को देनेवाली हो तथा समयविशेषमें समस्त शस्यों का अपहरण भी कर लेती हो । इस संसार में तुम सर्वशस्यस्वरूपिणी हो ॥ ३॥
मङ्गलमयी देवि! तुम मंगलका आधार हो । मङ्गलके योग्य हो । मङ्गलदायिनी हो । मङ्गलमय पदार्थ तुम्हारे स्वरूप हैं । मंगलेश्वरि ! तुम जगत्मे मुझे मङ्गल प्रदान करो ॥ ४॥
भूमे ! तुम भूमिपालों का सर्वस्व हो, भूमिपालपरायण हो तथा भूमिपालों के अहंकार का मूर्तरूप हो । भूमिदायिनी देवि ! मुझे भूमि दो ॥ ५॥
नारद! यह स्तोत्र परम पवित्र है । जो पुरुष पृथ्वी का पूजन करके इसका पाठ करता है, उसे अनेक जन्मों तक भूपाल –सम्राट् होनेका सौभाग्य प्राप्त होता है ॥ ६॥
इसे पढनेसे मनुष्य पृथ्वी के दान से उत्पन्न पुण्यका अधिकारी बन जाता है । पृथ्वी -दानके अपहरणसे जो पाप होता है, इस स्तोत्रका पाठ करनेपर मनुष्य उससे छुटकारा पा जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ७॥
मुने ! पृथ्वीपर वीर्य त्यागने तथा दीपक रखने से जो पाप होता है, उससे भी, बुद्धिमान् पुरुष इस स्तोत्र का पाठ करने से मुक्त हो जाता है और सौ अश्वमेधयज्ञोंके करनेका पुण्यफल प्राप्त करता है,
इसमें संशय नहीं है ॥ ८॥
इस प्रकार श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराणके प्रकृतिखण्ड में विष्णुकृत पृथ्वीस्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ।
अंत में
हमारे पूर्वज वनस्पतियों के प्रति अनुराग रखते थे। सुबह उठते ही पृथ्वी को प्रणाम कर क्षमा याचना के साथ पृथ्वी पर पहला पैर रखते थे। कहते हैं न कि मानो तो देवता न मानो तो पत्थर। हम सब जिस धरती की गोद में रहते हैं उसका कलेजा छलनी कर रहे हैं। हमें गो पालन की ओर कदम बढ़ाना होगा। हर घर में एक कच्चा आंगन जरूर रखना होगा। मिट्टी की कीमत समझनी होगी। वर्षा जल को संरक्षित रखने के प्रबंध हर घर में करने होंगे समर सेबल का उपयोग सख्ती से बंद करना होगा। चिड़ियों को दाना पानी हर घर को देना होगा क्योंकि चिड़िया प्रकृति को बेहतर बनाने में अहम योगदान करती है। एसी का प्रयोग सीमित करना होगा। ताकि वातावरण में जहरीली गैसें न घुलें। पहले लोग छतों पर खुले में सोते थे। बेशक पंखा लगाकर सोएं लेकिन एसी से बचाव करें। अनाज में जहरीले कीटनाशकों का छिड़काव बंद करें। सबसे जरूरी है पेट्रोल और डीजल चालित वाहनों का इस्तेमाल सीमित करना ताकि पर्यावरण शुद्ध रहे। सप्ताह में एक दिन संभव हो तो सभी तरह की इलेक्ट्रानिक वस्तुओं से दूरी बनाकर रखें। आपका एक छोटा सा प्रयास धरती को हरा भरा बना सकता है।