Navratri Significance: सनातन का उत्सव संस्कृति की ऊष्मा

Navratri Significance: लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने अपने लेख में नवरात्र, मातृशक्ति, लोक परंपराओं और सनातन संस्कृति की एकरूपता को रेखांकित किया है।

Update:2026-06-15 20:31 IST

Navratri Significance

Navratri Significance: संसार में परिवर्तन शाश्वत है और नवागत का स्वागत हमारा धर्म है। पितृपक्ष में पितरों के पुण्य सुमिरन के बाद शारदीय नवरात्र का एक सप्ताह व्यतीत हो चुका है। आज है कन्यापूजन का दिन अर्थात नवरात्र की अष्टमी, जब समस्त लोक को धारण करने और संचालित करने वाली जगतधारिणी मां जगदंबा की आठवीं शक्ति महागौरी का कन्या रूप में स्वागत किया जाता है, शक्तिवंदन के पर्व की यह अ‌द्भुत परंपरा है, यह नवदुर्गा के नौ स्वरूपों वाले नवरात्र का दिव्य अभ्यागत स्वागत है। हमारी सनातन संस्कृति इसी मान्यता पर खड़ी है कि आदिशक्ति ही संसार में सभी घटित क्रियाओं का कारण हैं। यह उनकी ही ऊर्जा है जो सब कुछ संचालित कर रही है, इसी कारण हमारे यहां मातृशक्ति का सम्मान है। स्त्री को शक्ति माना गया है और माता, बहन या बेटी, सबके भीतर हम आदिभवानी का रूप देखते हैं। इसीलिए नवरात्र में कन्या पूजन की परंपरा है। देवी के नौ स्वरूप मातृशक्ति के विभिन्न नौ रूप हैं। यदि नारी मां चंद्रघंटा की सौम्यता का स्वरूप लिए है तो दुष्टों के लिए वह कालरात्रि है, यदि यह ब्रह्मचारिणी जैसी तेजोमयी है तो महिषासुर जैसे राक्षस का वध करने वाली महादुर्गा भी है। वर्ष में दो बार आने वाले नवरात्र की अद्भुत परंपरा है हमारे देश में। नौ दिन देवी के विभिन्न स्वरूपों को समर्पित होकर हम स्त्री की सत्ता की ऊर्जा को अनुभूत करते हैं। अनंत चतुर्दशी से विभिन्न अंचलों में रामलीला आरंभ हो जाती है, नवरात्र भर रामलीलाएं चलती रहती हैं। रामकथा में हम यही देखते हैं कि किस तरह मां जानकी का अपमान रावण के अंत का कारण बना-तून धरि ओट कहति बैदेही।

सुमिरि अवधपति परम सनेही ।।

यही नहीं, रावण ने मंदोदरी की भी बात नहीं सुनी और अंततः उसके पूरे वंश का नाश हुआ। यह स्त्री शक्ति की अवज्ञा का प्रमाणित परिणाम है।

दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी।

मंदोदरी अधिक अकुलानी ॥

संस्कृति की अदृश्य डोर से बंधे हैं हम

नवरात्र शक्ति और मातृशक्ति से कैसे जुड़ा हुआ है, इसका पता देती हैं भारत की इस समय में होने वाली विभिन्न लोककलाएं। गुजरात के गरबा से ही बात आरंभ करें। गरबा का अर्थ है गर्भ का दीप अर्थात जिस गर्भ में सृजन की शक्ति है, उसकी आराधना। इसीलिए मां अंबे की मूर्ति स्थापित कर उसके चारों ओर शीश पर दीपक धारण कर मंडलाकार आवृत्त में नृत्य करती स्त्रियां गरबा आरंभ करती हैं। अपनी कलायात्रा के दीर्घ अनुभव में मैंने यह जाना है कि हमारे देश को वास्तव में संस्कृति की एक अदृश्य डोर ने बांध रखा है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि गरबा की भांति भारतवर्ष के विभिन्न अंचलों में शारदीय नवरात्र पर अनेक शैलियों में लोकनृत्य किए जाने की परंपरा है। गुजरात में मां अंबे के स्वागत में किए जाने वाले गरबा लोकनृत्य जैसी मिलती-जुलती शैली उत्तर प्रदेश और बिहार में भी देखने को मिलती है। यह सब लोकनृत्य प्रस्तुत किए जाने के पीछे की लोककथाएं भिन्न हैं, गीत भिन्न हैं, प्रस्तुतीकरण भिन्न है, किंतु एक समानता भी है। वो यह कि नवरात्र में किए जाने से यह अवश्य प्रतीत होता है कि नृत्य के बहाने देवी का आह्वान या देवी को प्रसन्न करना। जैसे बिहार के प्रसिद्ध लोकनृत्य झिझिया को ही लें। इसमें लड़कियां और महिलाएं अपने सिर पर छिद्र वाला मि‌ट्टी का घड़ा रखती हैं और घड़े में जलते दीपक रखकर गोल घेरा बनाकर गीत गाते हुए नृत्य करती हैं। घेरे के बीच में एक मुख्य नर्तकी और उसके साथ सभी नृत्य करने वाली महिलाओं के सिर पर छिद्र वाले घड़े होते हैं, जिनके भीतर दीप जलता रहता है। घड़े के ऊपर ढक्कन घर भी दीप जलता रहता है। नवरात्र एक प्रकार हसे दीप-उत्सव का शुभारंभ है। विजयदशमी के 20 दिन बाद दीपावली का त्योहार आता है और इसी समय उत्तर प्रदेश के प्रयाग, कौशांबी और कानपुर के विभिन्न अंचलों में कन्याओं व महिलाओं द्वारा इसी प्रकार शीश पर छिद्र वाली मटकी के भीतर और ऊपर दिया रखकर डेडिया लोकनृत्य प्रस्तुत किया जाता है। ऐसी मान्यता है बैंक यह नृत्य भगवान श्रीराम व माता जानकी के स्वागत में किया गया था। 14 वर्ष के वनवास के बाद भगवान श्रीराम जब अयोध्या लौटे तो अवध की महिलाओं ने श्रीराम के स्वागत में मि‌ट्टी के घड़े पर दीपक रखकर नृत्य किया और ये नृत्य कहलाया देदिया। नृत्य के बाद जालीदार देडिया से नजर उतारकर उसे तोड़कर बाहर फेंक दिया जाता है और यह मान लिया जाता है कि वह सब अनिष्ट हर लेगी।

खेल-प्रसंगों से होती प्रार्थना

इसी तरह बुंदेलखंड में नवरात्र आरंभ होते ही सुआटा की तैयारियां आरंभ हो जाती हैं। सुआटा या नौरता कुमारी कन्याओं द्वारा खेला जाने वाला एक अनुष्ठानपरक खेल है, जो अश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नौ दिन तक चलता रहता है। नवरात्र में खेले जाने के कारण और शक्ति से जुड़े होने से उसे नौरता कहा गया है। बुंदेलखंड के इस लोकपर्व में बालिकाएं घरों के दरवाजों पर सुआटा राक्षस का पुतला बनाती हैं। सुआटा के पुतलों के सामने गोबर से चौक बनाकर आकर्षक रंगोली बनाई जाती है और उसके दोनों ओर सूर्य और चंद्रमा बनाए जाते हैं। प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, आज अष्टमी व कल नवमी तक इन चौकों की संख्या बढ़ती जाती है। नवमी-दशमी को सुआटा की पूजा की जाती है और बेला, चंपा, तुरइया के फूल चढ़ाए जाते हैं। इसके साथ ही देवी पार्वती से. प्रार्थना की जाती है कि वे राक्षस का वध करें तथा इसके बाद सबके मिश्रित स्वर में गीत आरंभ हो जाते हैं-

पूछत-पूछत आए हैं नारे सुआटा,

कौन है भैया री तोर पौर।।

इसी तरह बुंदेलखंड में नवरात्र पर मामुलिया खेलने की परंपरा है। यह पंचमी पर खेला जाता है और औरतें गाती हैं-

मामुलिया के आए लिवऊआ छमक चली मौरी मामुलिया,

बेला, चंपा, तुरड्या के फूल ल्याओ, सजाओ मेरी मामुलिया ।।

यह गीत गाते हुए औरतें घर-घर जाती हैं। फिर आज अष्टमी पर झिंझिया खेला जाता है। इसमें मिट्टी के मटके में दीपक रखा जाता है। इसे भी बालिकाएं घर-घर ले जाती है। नवरात्र पर दुर्गा पूजन के साथ ही घरों में जवारे बोने की भी परंपरा है। मिट्टी के कलश अथवा खप्पर में जवारे बोते हैं। इनकी विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। जवारों से आगामी अच्छी फसल का अनुमान भी लगाया जाता है।

नवरात्र की सांस्कृतिक यात्रा बंगाल की दुर्गा पूजा के बिना अपूर्ण है। बंगाल की दुर्गा पूजा की कल्पना करते ही आंखों के सामने नजर आने लगते हैं भव्य पंडाल, पूजा की पवित्रता, रंगों की छटा, तेजस्वी चेहरों वाली देवियां, सिंदूर खेला, धुनुची नृत्य और भी बहुत कुछ ऐसा दिव्य और अलौकिक जो शब्दों में बांधा नहीं जा सकता। बंगाल में दुर्गा पूजा उत्सव नवरात्र के छठे दिन से शुरू होता नवरात्र के दसवें दिन तक चलता है। इन दिनों के दौरान बंगाल में महिलाएं पारंपरिक साड़ी पहनकर ढाक की धुन पर धुनुची नृत्य करती हैं। धुनुची नृत्य दुर्गा पूजा का एक अभिन्न अंग है और अब त्योहार का पर्याय बन गया है। धुनुची साल के पेड़ों की राल से बनी धूप का एक रूप है। इसकी गंध को सौभाग्य लाने वाला माना जाता है और इसके साथ नृत्य करना देवी की भक्ति का सर्वोच्च रूप माना गया है। बंगाल में ऐसी मान्यता है कि जब देवी दुर्गा नौ दिनों तक महिषासुर से युद्ध कर रही थीं, तब देवी के भक्त उनको अधिक शक्ति व ऊर्जा प्रदान करने के लिए यह नृत्य कर रहे थे, इसीलिए दुर्गा पूजा उत्सव में मां के समक्ष धुनुची नृत्य किया जाता है। अष्टमी-नवमी के साथ ही विसर्जन के समय भी धुनुची से मां को प्रणाम किया जाता है।

यह संयोग नहीं है कि नवरात्र की नवमी को शक्ति पूजा करके ही दशमी को भगवान श्रीराम रावण का वध कर अधर्म का नाश करते हैं। नवरात्र या शक्ति पर्व अथवा दुर्गा पूजा.. नाम चाहे जो पुकारें, सभी में भारत की सांस्कृतिक एकरूपता दिखाई देती है, जहां सनातन के मूल में शक्ति है और कलाएं शक्ति के विस्तार की अमर बेल।

( साभार ‘दैनिक जागरण ‘। लेखिका प्रख्यात लोक गायिका हैं।) 

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