Shivaram Hari Rajguru Biography: शिवराम हरि राजगुरु! जीवन, शौर्य, शहादत और उसके बाद का प्रभाव

Shivaram Hari Rajguru Biography: शिवराम हरि राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव के साथ उस क्रांतिकारी त्रयी के सदस्य थे, जिन्होंने अपने साहस और बलिदान से आज़ादी की लड़ाई को नई ऊर्जा दी।

Update:2025-08-24 19:04 IST

Shivaram Hari Rajguru (Image Credit-Social Media)

Shivaram Hari Rajguru Biography: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में शिवराम हरि राजगुरु का नाम गर्व और श्रद्धा से लिया जाता है। वे भगत सिंह और सुखदेव के साथ उस क्रांतिकारी त्रयी के सदस्य थे, जिन्होंने अपने साहस और बलिदान से आज़ादी की लड़ाई को नई ऊर्जा दी। मात्र 23 वर्ष की आयु में उन्होंने हँसते-हँसते प्राणों की आहुति देकर यह सिद्ध कर दिया कि स्वतंत्रता और स्वाभिमान के लिए किसी भी सीमा तक जाया जा सकता है।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

राजगुरु का जन्म 24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र के पुणे जिले के खेड़ा (अब राजगुरुनगर) में हुआ। वे एक साधारण मराठी देशस्थ ब्राह्मण परिवार से थे। छह वर्ष की आयु में पिता का निधन हो गया। माँ पार्वती बाई और बड़े भाई ने उनका पालन-पोषण किया। घर की स्थिति सामान्य थी, लेकिन उपेक्षा और तिरस्कार ने उनके भीतर स्वाभिमान और स्वतंत्रता की ज्वाला को और प्रज्वलित किया।


बाल्यकाल से ही वे छत्रपति शिवाजी महाराज और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से प्रभावित थे। इन्हीं महान विभूतियों ने उनके मन में अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध विद्रोह की चिंगारी भरी।

क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत

वाराणसी में शिक्षा के दौरान उनकी मुलाकात उन युवाओं से हुई जो अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष की राह पर चल पड़े थे। यहाँ उनकी भेंट चंद्रशेखर आज़ाद से हुई। आज़ाद के मार्गदर्शन में वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) में शामिल हुए। भगत सिंह, सुखदेव और अन्य साथियों के साथ मिलकर उन्होंने स्वतंत्रता के लिए लड़ने का प्रण लिया।

राजगुरु निशानेबाजी और कुश्ती में निपुण थे। चंद्रशेखर आज़ाद ने उनकी प्रतिभा को और निखारा और यही कौशल आगे चलकर अंग्रेज़ अधिकारियों के खिलाफ निर्णायक साबित हुआ।

सांडर्स हत्याकांड : प्रतिशोध की गूंज

1928 में साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में प्रदर्शन हुआ। पुलिस की बर्बर लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने क्रांतिकारियों को झकझोर दिया।


17 दिसंबर 1928 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक जे.पी. सांडर्स की हत्या कर दी। राजगुरु की अद्वितीय निशानेबाज़ी इस कार्रवाई में निर्णायक रही। यह घटना ब्रिटिश सरकार के लिए चुनौती बन गई और क्रांतिकारियों की तलाश तेज़ कर दी गई।

गिरफ्तारी और लाहौर षड्यंत्र केस

सांडर्स हत्याकांड के बाद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को गिरफ्तार कर लाहौर षड्यंत्र केस में मुकदमे का सामना करना पड़ा।

मुकदमे के दौरान तीनों ने निडर होकर अदालत में अंग्रेज़ी शासन की धज्जियाँ उड़ाईं।

• राजगुरु ने संस्कृत में जज को संबोधित किया, और जब जज कुछ समझ नहीं पाया तो वे हँसते हुए बोले –

“यार भगत, इस जाहिल को अंग्रेज़ी में समझाओ, यह हमारी भाषा क्या समझेगा!”

यह उनकी निर्भीकता और हाजिरजवाबी का परिचायक था।

7 अक्टूबर 1930 को अदालत ने तीनों को फाँसी की सज़ा सुनाई।

फाँसी से पहले के दो दिन

21 मार्च 1931 – अंतिम मुलाकातें

फाँसी से दो दिन पहले परिवारजन जेल में मिले।

• भगत सिंह ने माँ से कहा – “माँ, तुम्हारा बेटा मौत से नहीं डरता। यह बलिदान भारत माता की गोद में अमरता है।”

• सुखदेव ने अपनी वृद्ध माता को समझाया – “माँ, यह रोने का समय नहीं है। मेरा बलिदान देश की आने वाली पीढ़ियों को रास्ता दिखाएगा।”

• राजगुरु ने हँसते हुए अपनी माँ से कहा – “माँ, हम हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़ेंगे।”

22 मार्च 1931 – अंतिम रात्रि

तीनों ने रातभर नींद नहीं ली।

• भगत सिंह किताबें पढ़ते रहे।

• सुखदेव मौन ध्यान में डूबे रहे।

• राजगुरु मज़ाक करते रहे ताकि माहौल हल्का बना रहे।

जेल अधिकारी भी यह देखकर दंग रह गए कि मृत्यु के साए में भी उनके चेहरों पर भय नहीं बल्कि संतोष और गर्व था।

फाँसी का दिन – 23 मार्च 1931

नियमानुसार फाँसी 24 मार्च को दी जानी थी, लेकिन जनता के गुस्से से डरकर अंग्रेज़ सरकार ने इसे एक दिन पहले ही कर दिया।

शाम 7 बजे लाहौर सेंट्रल जेल में तीनों को फाँसी दी गई।

• फाँसी स्थल पर पहुँचते ही तीनों ने गगनभेदी नारे लगाए –

“इंकलाब ज़िंदाबाद!”

“भारत माता की जय!”

• राजगुरु ने रस्सी देखकर मुस्कुराते हुए कहा – “देखो, यह रस्सी कितनी प्यारी लग रही है।”

• भगत सिंह ने गर्व से कहा – “मुझे गर्व है कि मैं भारत के लिए मर रहा हूँ।”

ब्रिटिश अधिकारियों ने जनाक्रोश से बचने के लिए उनके शवों को गुप्त रूप से फिरोज़पुर (हुसैनीवाला) ले जाकर अंतिम संस्कार कर दिया।

फाँसी के बाद का प्रभाव


1. देशव्यापी आक्रोश

पूरे देश में स्वतःस्फूर्त हड़तालें, जुलूस और प्रदर्शन हुए। पंजाब, बंगाल, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में लोग सड़कों पर उतर आए। तीनों की शहादत ने उन्हें रातों-रात राष्ट्रीय नायक बना दिया।

2. युवाओं के लिए प्रेरणा

इनकी शहादत ने युवाओं को सिखाया कि स्वतंत्रता भीख माँगकर नहीं, बल्कि संघर्ष और बलिदान से मिलती है। कॉलेज छोड़कर, खेत-खलिहान और फैक्ट्री से निकलकर अनेक युवा स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।

3. राजनीतिक असर

यह घटना ऐसे समय घटी जब महात्मा गांधी अंग्रेज़ों से समझौते की राह पर थे। तीनों की फाँसी ने आम जनता को निराश किया और क्रांतिकारी आंदोलनों को नई लोकप्रियता दी।

4. वैश्विक प्रतिक्रिया

अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने उनकी शहादत को प्रमुखता से प्रकाशित किया। कई विदेशी नेताओं और विचारकों ने ब्रिटिश हुकूमत की बर्बरता की निंदा की।

5. अमर विरासत

तीनों की शहादत ने राष्ट्रीय चेतना को नई दिशा दी। आज भी 23 मार्च को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है।

• भगत सिंह विचार और वैचारिक क्रांति के प्रतीक बने।

• सुखदेव अनुशासन और संगठन के प्रतीक बने।

• राजगुरु साहस और हंसी-खुशी के साथ बलिदान के प्रतीक बने।

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