Shirt Buttons History: लड़कों और लड़कियों की शर्ट में बटन उल्टी तरफ क्यों होते हैं? जानिए पूरी कहानी

Shirt Buttons History: पुरुषों और महिलाओं की शर्ट में बटन अलग-अलग तरफ क्यों लगे होते हैं? जानिए बटन के 5000 साल पुराने इतिहास, फैशन, नौकरानियों, सैनिकों और औद्योगिक क्रांति से जुड़ी रोचक कहानी।

Update:2026-08-14 18:13 IST

Shirt Buttons History: हम रोज़ शर्ट, कुर्ता, कोट, ब्लाउज या जैकेट पहनते हैं और लगभग बिना सोचे बटन बंद कर लेते हैं। लेकिन यदि किसी पुरुष की शर्ट और किसी महिला की शर्ट को सामने रखकर ध्यान से देखें तो एक छोटा लेकिन सदियों पुराना अंतर दिखाई देता है। पुरुषों के कपड़ों में सामान्यतः बटन पहनने वाले व्यक्ति की दाईं ओर और बटन के छेद बाईं ओर होते हैं, जबकि महिलाओं के पारंपरिक पश्चिमी वस्त्रों में इसका उलटा - बटन बाईं ओर और छेद दाईं ओर देखने को मिलता है। यह परंपरा आज भी बहुत-सी कमीज़ों, ब्लाउज और कोटों में चली आ रही है, जबकि आधुनिक जीवन में इसका कोई विशेष व्यावहारिक लाभ नहीं बचा है। सबसे रोचक बात यह है कि इतिहासकार इसके पीछे कोई निश्चित कारण खोज नहीं पाए हैं। इसलिए लोकप्रिय कहानी और प्रमाणित इतिहास को अलग-अलग समझना जरूरी है।

बटन का इतिहास

बटन का इतिहास स्वयं इस पुरुष-महिला अंतर से हजारों वर्ष पुराना है। बटन जैसी छोटी गोल वस्तुएँ मानव सभ्यता में बहुत प्राचीन काल से मिलती हैं। लेकिन शुरुआत में उनका उपयोग कपड़े बंद करने के लिए नहीं बल्कि आभूषण, प्रतिष्ठा और सजावट के रूप में अधिक होता था। पुरातात्त्विक प्रमाण सिंधु घाटी सभ्यता में लगभग तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व तक बटन जैसी छिद्रयुक्त वस्तुओं की ओर संकेत करते हैं। मोहनजोदड़ो से मिले कुछ बटननुमा अवशेष खोल या अन्य पदार्थों से बने थे और उनमें धागा डालने के लिए छेद थे। इसी प्रकार प्राचीन यूरोप, चीन और अन्य क्षेत्रों में भी बटन जैसी वस्तुएँ मिली हैं। लेकिन यह मान लेना गलत होगा कि सिंधु घाटी का व्यक्ति आज की शर्ट की तरह सामने की पंक्ति में बटन लगाकर वस्त्र बंद करता था। बहुत से शुरुआती बटन सजावटी या प्रतीकात्मक थे।

इसका कारण समझना कठिन नहीं है। प्राचीन मनुष्य कपड़ों को बंद करने के लिए गाँठ, रस्सी, कमरबंद, बेल्ट, पिन, फिबुला जैसी धातु की पकड़, हुक या कपड़े की डोरियों का उपयोग करता था। बटन और बटन-छेद की जोड़ी ही वह तकनीकी परिवर्तन था जिसने ढीले कपड़े को शरीर से सटे, आसानी से खोले-बंद किए जा सकने वाले परिधान में बदल दिया। यूरोप में तेरहवीं शताब्दी के आसपास कार्यात्मक बटन-छेदों और बटनों का उपयोग अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इसी दौर में बटन बनाने वाले कारीगरों के संगठित व्यवसाय भी विकसित हुए।

बटन ने बदल दी ड्रेस की बनावट

बटन ने वस्त्रों की बनावट ही बदल दी। इसके पहले यदि किसी कपड़े को सिर से पहनना हो या डोरियों से कसना हो तो वह शरीर के आकार से पूरी तरह सटा हुआ बनाना कठिन था। बटन और बटन-छेद ने कपड़े को एक तरफ से खोलने और फिर पहनने के बाद शरीर के अनुरूप कसकर बंद करने की सुविधा दी। चौदहवीं शताब्दी के यूरोपीय पुरुष परिधानों में शरीर से सटे जैकेट और आस्तीनों पर बड़ी संख्या में बटन मिलने लगे। Charles of Blois से जुड़ा चौदहवीं शताब्दी का प्रसिद्ध परिधान उन प्रारंभिक संरक्षित कपड़ों में है जिसमें सामने और आस्तीन पर कार्यात्मक बटनों का उल्लेख मिलता है।

जैसे-जैसे मध्ययुगीन और पुनर्जागरणकालीन यूरोप में शरीर से सटे कपड़ों का चलन बढ़ा, बटन केवल उपयोग की चीज नहीं रहे। वे धन और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन बनने लगे। अमीर लोगों के कपड़ों में सोना, चाँदी, पीतल, काँच, हाथीदाँत, हड्डी, सींग, मोती और कीमती पत्थरों से बने बटन लगाए जाते थे। कभी-कभी कपड़े की कीमत से अधिक मूल्य उसके बटनों का हो सकता था। ऐसे महँगे बटन स्थायी रूप से कपड़े पर सिलने के बजाय एक पोशाक से दूसरी पोशाक में बदले भी जा सकते थे। पुनर्जागरण और बाद के यूरोपीय दरबारों में बटन कई बार छोटे आभूषण की तरह थे, उपयोगी भी और वैभव का प्रदर्शन भी।

सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी आते-आते पुरुषों के कोटों पर लंबी कतार में दर्जनों बटन दिखना सामान्य फैशन बन गया। इनमें से सभी बटन हर समय कार्यात्मक नहीं होते थे। कई केवल सजावट थे। इसका अर्थ है कि आज हम जिस बटन को मामूली वस्तु समझते हैं, वह एक दौर में उतना ही फैशन-प्रतीक था, जितना आज महँगी घड़ी, जूता या डिजाइनर लोगो।

पुरुषों के बटन दाईं ओर कैसे हो गए?

सबसे सामान्य व्याख्या दाएँ हाथ की प्रधानता से जुड़ी है। मानव आबादी में अधिकांश लोग दाएँ हाथ से प्रमुख काम करते हैं। यदि व्यक्ति स्वयं अपना कपड़ा पहन रहा है तो दाईं तरफ लगा बटन दाएँ हाथ से पकड़कर बाईं तरफ के छेद में डालना कई लोगों के लिए स्वाभाविक हो सकता है। लेकिन पुरुषों की दिशा के लिए इससे जुड़ी दूसरी प्रसिद्ध कहानी सैन्य जीवन और तलवार की है। मध्ययुगीन और आरंभिक आधुनिक यूरोप में पुरुष, विशेषकर उच्च वर्ग और सैनिक, सामान्यतः तलवार बाईं ओर रखते थे ताकि उसे दाएँ हाथ से निकाल सकें। एक परिकल्पना यह है कि कपड़े का खुलने वाला किनारा ऐसी दिशा में रखा गया जिससे तलवार निकालते समय हाथ या हथियार कपड़े में न फँसे। यह तर्क बार-बार बताया जाता है। लेकिन इतिहासकारों के पास ऐसा कोई एक दस्तावेज नहीं है जिसमें किसी राजा, सेना या दर्जी संघ ने आदेश दिया हो कि “अब से पुरुषों के बटन दाईं तरफ होंगे क्योंकि तलवार निकालनी है।”

महिलाओं के बटन बाईं ओर क्यों हुए?

इसकी सबसे लोकप्रिय कहानी और भी दिलचस्प है। यूरोप में जब बटन बहुत महँगे थे, तब बटन वाले जटिल वस्त्र मुख्यतः संपन्न महिलाओं के पास होते थे। ऐसी महिलाओं को अक्सर नौकरानी या निजी सहायक कपड़े पहनाती थी। यदि नौकरानी सामने खड़ी होकर किसी महिला के कपड़े बंद कर रही है और वह दाएँ हाथ से काम करती है, तो पहनने वाली महिला की बाईं तरफ लगे बटन नौकरानी के लिए ठीक उसी दिशा में पड़ते हैं जैसे पुरुष स्वयं अपनी दाईं तरफ के बटन लगाता है। इसलिए एक प्रचलित धारणा है कि महिला वस्त्रों में बटन उल्टी तरफ इसलिए लगाए जाने लगे क्योंकि उन्हें पहनाने वाली दाएँ हाथ की नौकरानियों के लिए यह सुविधाजनक था। लेकिन यहाँ भी किसी एक निर्णायक ऐतिहासिक दस्तावेज का अभाव है।

एक धारणा है कि महिलाएँ बच्चे को बाएँ हाथ में पकड़ती थीं और दाएँ हाथ से कपड़ा खोलती थीं, इसलिए बटन की उलटी दिशा उपयोगी हुई। एक दूसरी कहानी घुड़सवारी से जुड़ी है - यूरोपीय उच्चवर्गीय महिलाएँ परंपरागत रूप से घोड़े पर दोनों पैर एक तरफ रखकर बैठती थीं और कपड़े का ओवरलैप ऐसी दिशा में रखने से हवा भीतर कम प्रवेश करती थी।

सबसे विश्वसनीय व्यापक निष्कर्ष शायद यह है कि बाएं-दायें का अंतर अमीर यूरोपीय वस्त्र परंपरा में डेवलप हुआ और उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान बड़े पैमाने के वस्त्र उत्पादन के साथ मानक बन गया। जब हर कपड़ा स्थानीय दर्जी हाथ से बनाता था, तो छोटी भिन्नताएँ आसानी से बनी रह सकती थीं। लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद कपड़ों का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू हुआ, सिलाई मशीनों का प्रसार हुआ और कारखानों ने ‘पुरुषों का पैटर्न’ तथा ‘ महिलाओं का पैटर्न’ तय किया। जो सामाजिक परंपरा पहले उच्च वर्ग के वस्त्रों में थी, वह औद्योगिक उत्पादन के कारण लाखों सामान्य लोगों के कपड़ों में भी स्थायी हो गई।

फैशन की विशेषता

यही फैशन की एक अद्भुत विशेषता है, किसी व्यवहार का मूल कारण समाप्त हो सकता है। लेकिन उसका रूप बचा रहता है। आज अधिकांश महिलाएँ स्वयं अपनी शर्ट पहनती हैं, उनके पीछे नौकरानी खड़ी नहीं होती। अधिकांश पुरुष तलवार लेकर नहीं चलते। फिर भी कपड़ा उद्योग पुराने ढाँचे को दोहराता है।क्योंकि ग्राहक उसी को पुरुष और महिला शर्ट की ‘सामान्य बनावट’ के रूप में पहचानते हैं। फैशन में इस तरह के अवशेष बहुत मिलते हैं, आज उपयोग न होने पर भी कोट की आस्तीन पर बटन, जैकेट के कुछ नकली जेब, सैन्य वर्दी से निकले कंधे के पट्टे और अनेक सजावटी तत्व बने रहते हैं।

बटन की औद्योगिक कहानी

जब तक बटन हाथ से बनते थे, वे अपेक्षाकृत महँगे थे। औद्योगिक क्रांति ने धातु, हड्डी, सींग और दूसरे पदार्थों के बटनों का बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव बनाया। उन्नीसवीं शताब्दी में कारखानों ने एक जैसे हजारों बटन बनाने शुरू किए और वे आम आदमी के कपड़ों का सामान्य हिस्सा बन गए। बाद में काँच, चीनी-मिट्टी, शंख और विभिन्न मिश्रित पदार्थों के बटन भी बड़े पैमाने पर बने। बीसवीं शताब्दी में कृत्रिम पदार्थों ने बटन उद्योग बदल दिया। शुरुआती कृत्रिम पदार्थों से लेकर बाद के प्लास्टिक तक ने ऐसे बटन बनाना संभव किया जो बहुत सस्ते, हल्के, लगभग किसी भी रंग के और हजारों आकारों में तैयार किए जा सकते थे। आज शर्ट का सामान्य चार छेद वाला प्लास्टिक बटन इतना मामूली और सस्ता है कि हम उसकी ओर ध्यान ही नहीं देते, जबकि कभी यही वस्तु धन और प्रतिष्ठा का प्रतीक हुआ करती थी। बटन और बटन-छेद की दिशा सिलाई विज्ञान से भी जुड़ी है। कपड़े के सामने के दोनों किनारे एक-दूसरे पर थोड़ा चढ़ते हैं। जिस तरफ बटन लगे हैं और जिस तरफ छेद हैं, उसी से तय होता है कि कौन-सा कपड़ा ऊपर आएगा। इसलिए बटन की दिशा बदलना केवल पाँच बटन दूसरी तरफ सिल देने जितना साधारण नहीं। कमीज़ के सामने वाले पट्टे, किनारे की तह, कॉलर के जुड़ाव और कभी-कभी जेब तथा डिजाइन भी उसी अनुसार तैयार किए जाते हैं।

बटन की बनावट

सबसे कॉमन चार छेद या दो छेद वाला सपाट बटन होता है जिसमें धागा सीधे छेदों से गुजरता है। दूसरा प्रकार शैंक बटन है, जिसके पीछे छोटी धातु या प्लास्टिक की अंगूठी होती है और सामने कोई छेद दिखाई नहीं देता। कोट, ब्लेजर और सजावटी परिधानों में यह प्रकार सामान्य है। इसके अलावा कपड़े से ढके बटन, प्रेस बटन, स्नैप फास्टनर, धातु के जीन्स बटन और विशेष वर्दी बटन विकसित हुए।

समय के साथ बटन को दूसरी तकनीकों से प्रतिस्पर्धा भी मिली। हुक और आँख वाले बंद, प्रेस बटन, ज़िप, वेल्क्रो और आधुनिक चुंबकीय बंद विकसित हुए। बीसवीं शताब्दी में ज़िप विशेष रूप से पैंट, जैकेट, बैग और जूतों में बहुत सफल हुआ क्योंकि वह बटनों की पूरी पंक्ति की तुलना में एक ही गति में कपड़ा बंद कर सकता था। फिर भी बटन समाप्त नहीं हुआ। इसका कारण केवल परंपरा नहीं, उसकी व्यावहारिकता है कि वह सस्ता है, खराब होने पर एक बटन आसानी से बदला जा सकता है, विभिन्न आकारों और पदार्थों में बनाया जा सकता है और कपड़े की सुंदरता का हिस्सा भी बन सकता है।

बटन से जुदा भाषाई इतिहास

बटन से एक भाषाई इतिहास भी जुड़ा है। ‘Button’ शब्द यूरोपीय भाषाओं में पुराने फ्रांसीसी शब्दों से विकसित हुआ, जिनका अर्थ उभार, कली या छोटी गोल संरचना से जुड़ा था। यह स्वयं बताता है कि बटन की प्रारंभिक पहचान कार्यात्मक यंत्र से उतनी नहीं, छोटी उभरी सजावटी वस्तु से अधिक रही होगी। समय के साथ उसी सजावटी वस्तु ने आधुनिक कपड़ों का सबसे सर्वव्यापी यांत्रिक बंद बनना शुरू किया।

एक समय बटन पर कानून तक बने। यूरोप में विभिन्न कारीगर संघ अपने-अपने पदार्थों से बटन बनाने का अधिकार बचाते थे। धातु बटन बनाने वाले, कपड़े से ढके बटन बनाने वाले और दूसरे कारीगरों के बीच प्रतिस्पर्धा आर्थिक मुद्दा थी। कुछ क्षेत्रों में कपड़े के बटन पर प्रतिबंध या नियम इसलिए बने क्योंकि दर्जी अपने बचे कपड़े से स्वयं बटन बनाकर स्वतंत्र बटन-निर्माताओं का व्यवसाय प्रभावित कर सकते थे। यह छोटी वस्तु उस समय एक वास्तविक उद्योग और रोजगार का स्रोत थी।

बटन सामाजिक वर्ग का संकेत भी था। आज प्लास्टिक बटन लगभग मुफ्त जैसा लगता है। लेकिन जब प्रत्येक बटन हाथ से धातु, हाथीदाँत, काँच या कीमती पत्थर में बनाया जाता था तो कपड़े पर तीस चमकदार बटन पहनना यह घोषणा करना था कि पहनने वाला धनवान है। इसलिए कई पुराने वस्त्रों पर जरूरत से कहीं अधिक बटन मिलते हैं। वे उतने ही ‘दिखाने’ के लिए थे जितने बंद करने के लिए।

बटन के सामने नया दौर

आज बटन के सामने नया दौर भी आ रहा है। चुंबकीय बंद, छिपे स्नैप, स्वचालित फास्टनर और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए अनुकूल कपड़ों में आसान बंद विकसित हो रहे हैं। जिन लोगों को गठिया, हाथों में कंपन या उँगलियों की गतिशीलता की समस्या है, उनके लिए छोटे पारंपरिक बटन कठिन हो सकते हैं। इसलिए अनुकूल वस्त्र उद्योग ऐसे बटन विकसित कर रहा है, जो बाहर से पारंपरिक दिखाई दें। लेकिन भीतर चुंबक या दूसरी सरल व्यवस्था से बंद हों। बटन का इतिहास इसलिए समाप्त नहीं हुआ।उसका रूप अभी भी बदल रहा है।

फिर भी साधारण चार छेद वाला बटन अपनी मूल सफलता के कारण शायद लंबे समय तक रहेगा। उसे बिजली नहीं चाहिए। जटिल यंत्र नहीं चाहिए।उसका वजन नगण्य है। उत्पादन बहुत सस्ता है और टूटने पर एक सुई-धागे से बदला जा सकता है। मानव तकनीक में कई बार सबसे टिकाऊ आविष्कार वही होते हैं जो अत्यंत सरल हों।

बटन का पूरा इतिहास देखें तो लगभग पाँच हजार वर्ष पहले की सजावटी छोटी वस्तु से लेकर आज की मशीन से बनी प्लास्टिक डिस्क तक एक असाधारण यात्रा दिखाई देती है। सिंधु घाटी जैसी प्राचीन संस्कृतियों में बटननुमा वस्तुएँ थीं। मध्यकालीन यूरोप में बटन और बटन-छेद ने शरीर से सटे वस्त्रों को बदल दिया। पुनर्जागरण और दरबारी संस्कृति ने उसे आभूषण बनाया। सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में दर्जनों सजावटी बटन प्रतिष्ठा बने। औद्योगिक क्रांति ने उसे आम जनता तक पहुँचाया। आधुनिक प्लास्टिक ने उसे अत्यंत सस्ता बनाया और आज भी वही छोटी वस्तु अरबों कपड़ों को रोज बंद करती है।

और पुरुष तथा महिला शर्ट के उलटे बटन इसी लंबे इतिहास का जीवित अवशेष हैं। आज न पुरुष तलवार लेकर शर्ट पहनता है, न सामान्य महिला को नौकरानी कपड़े पहनाती है, फिर भी सदियों पुराना अंतर हमारे कपड़ों में बचा हुआ है। यह जीवविज्ञान का नियम नहीं, फैशन और सामाजिक इतिहास की विरासत है।

इसलिए यदि कोई पूछे कि लड़कों और लड़कियों की शर्ट में बटन उल्टी तरफ ‘क्यों’ हैं, तो सबसे सही उत्तर यह होगा कि निश्चित कारण पूरी तरह सिद्ध नहीं है। पुरुषों की दाईं दिशा को दाएँ हाथ की सुविधा और संभवतः हथियारों की परंपरा से जोड़ा जाता है।महिलाओं की बाईं दिशा को उच्चवर्गीय महिलाओं को नौकरानियों द्वारा कपड़े पहनाए जाने से जोड़ने वाली व्याख्या सबसे प्रसिद्ध है। लेकिन संभवतः यह अंतर कई सामाजिक और वस्त्र-संबंधी कारणों से विकसित हुआ और औद्योगिक कपड़ा उत्पादन ने उसे स्थायी मानक बना दिया।

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