Newstrack Special: क्या इंसान जमने के बाद फिर जिंदा हो सकता है? Cryonics का पूरा सच
Can Humans Survive Freezing: क्या कोई इंसान अत्यधिक ठंड में जमने के बाद फिर जिंदा हो सकता है? जानिए हाइपोथर्मिया में शरीर के साथ क्या होता है, क्रायोनिक्स कैसे काम करता है और क्या मृत व्यक्ति को भविष्य में दोबारा जिंदा करना संभव हो सकता है।
Hypothermia Can Humans Survive Freezing Explained in Hindi
Can Humans Survive Freezing: कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति बर्फीले पहाड़ों में कई घंटों तक पड़ा रहा। उसका शरीर इतना ठंडा हो गया कि सांस लगभग महसूस नहीं हो रही, दिल की धड़कन बहुत धीमी पड़ गई और वह पूरी तरह बेहोश है। देखने वाले उसे मृत समझ सकते हैं। लेकिन अस्पताल पहुंचने के बाद डॉक्टर उसके शरीर को धीरे-धीरे गर्म करते हैं और कुछ समय बाद वह फिर से जीवन के संकेत देने लगता है। यह किसी फिल्म की कहानी नहीं है। अत्यधिक ठंड में शरीर का तापमान खतरनाक स्तर तक गिरने के बाद भी कुछ लोगों को बचाया गया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई इंसान पूरी तरह बर्फ बन गया, वर्षों तक जमा रहा और फिर उसे पिघलाकर जिंदा कर दिया गया। असली विज्ञान इससे कहीं ज्यादा जटिल है।
इस बारे में दो बिल्कुल अलग बातें अक्सर आपस में मिला दी जाती हैं। पहली है अत्यधिक ठंड में शरीर का तापमान बहुत नीचे गिर जाना और फिर उचित इलाज से व्यक्ति का बच जाना। दूसरी है किसी कानूनी रूप से मृत व्यक्ति के शरीर को बहुत कम तापमान पर लंबे समय तक सुरक्षित रखना, इस उम्मीद में कि भविष्य में विज्ञान उसे फिर से जीवित कर सकेगा। पहली बात वास्तविक चिकित्सा विज्ञान का हिस्सा है और ऐसे लोगों को बचाया जा चुका है। दूसरी बात अभी भविष्य की संभावना और उम्मीद है। आज तक किसी ऐसे इंसान को फिर से जीवित नहीं किया गया है, जिसे मृत्यु के बाद बहुत कम तापमान पर वर्षों के लिए सुरक्षित रखा गया हो।
अत्यधिक ठंड में शरीर के साथ क्या होता है?
हमारे शरीर का सामान्य अंदरूनी तापमान लगभग 37 डिग्री सेल्सियस होता है। शरीर लगातार इस तापमान को बनाए रखने की कोशिश करता है, लेकिन बहुत ठंडे वातावरण में लंबे समय तक रहने पर शरीर तेजी से गर्मी खोने लगता है। तापमान गिरने की इस स्थिति को हाइपोथर्मिया कहा जाता है। शुरुआत में व्यक्ति कांपता है, हाथ-पैर सुन्न होने लगते हैं और सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। जैसे-जैसे तापमान और नीचे जाता है, शरीर की लगभग हर गतिविधि धीमी होने लगती है। सांस की गति कम हो सकती है, दिल धीरे धड़क सकता है और गंभीर स्थिति में व्यक्ति बेहोश होकर मृत जैसा दिखाई दे सकता है।
यहीं ठंड का एक अजीब पहलू सामने आता है। सामान्य तापमान पर शरीर और खासकर दिमाग को लगातार बड़ी मात्रा में ऊर्जा और ऑक्सीजन चाहिए। अगर दिल बंद हो जाए और दिमाग तक ऑक्सीजन न पहुंचे तो कुछ ही समय में गंभीर नुकसान शुरू हो सकता है। लेकिन शरीर का तापमान बहुत नीचे गिरने पर उसकी रासायनिक गतिविधियां धीमी पड़ जाती हैं और दिमाग की ऊर्जा तथा ऑक्सीजन की जरूरत भी कम हो सकती है। इसका मतलब यह नहीं कि ठंड सुरक्षित है, क्योंकि हाइपोथर्मिया जान भी ले सकता है। लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में ठंड शरीर की गतिविधियों को इतना धीमा कर सकती है कि व्यक्ति को बचाने के लिए डॉक्टरों को सामान्य से ज्यादा समय मिल जाए।
क्या कोई व्यक्ति सचमुच जमकर फिर जिंदा हो सकता है?
यहीं सबसे बड़ा भ्रम पैदा होता है। जब किसी खबर में कहा जाता है कि कोई व्यक्ति जम गया था और फिर जिंदा हो गया, तो आमतौर पर इसका मतलब यह नहीं होता कि उसका पूरा शरीर बर्फ के ठोस टुकड़े में बदल गया था। व्यक्ति का शरीर बहुत ठंडा हो सकता है, उसकी सांस और दिल की धड़कन लगभग बंद हो सकती है, लेकिन शरीर की हर कोशिका जरूरी नहीं कि बर्फ बन चुकी हो। यही अंतर जीवन और अपूरणीय नुकसान के बीच बहुत महत्वपूर्ण है।
अगर इंसानी शरीर के भीतर मौजूद पानी सामान्य तरीके से जमने लगे तो बर्फ के कण बन सकते हैं। शरीर का बड़ा हिस्सा पानी से बना है और पानी केवल खून या शरीर के लिक्विड हिस्सों में ही नहीं, बल्कि हमारे सेल्स के अंदर भी मौजूद है। जमने के दौरान बनने वाले बर्फीले कण सेल्स की बेहद नाजुक दीवारों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। यही कारण है कि किसी इंसान को साधारण तरीके से जमाने वाली मशीन में रखकर बाद में पिघलाने से उसे जिंदा नहीं किया जा सकता। शरीर को ठंडा करना और शरीर को इस तरह जमा देना कि उसकी कोशिकाएं नष्ट न हों, दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं।
फिर मृत लोगों को बहुत कम तापमान पर क्यों रखा जाता है?
यहीं से उस विचार (Cryonics) की शुरुआत होती है जिसे आम तौर पर मृत्यु के बाद शरीर को बहुत कम तापमान पर सुरक्षित रखने की कोशिश के रूप में जाना जाता है। इसका मूल विचार यह है कि आज किसी बीमारी से मरने वाले व्यक्ति को भविष्य की उस दुनिया तक पहुंचाया जाए जहां शायद उस बीमारी का इलाज मौजूद हो। मान लीजिए किसी व्यक्ति की मृत्यु ऐसी बीमारी से हुई है जिसका इलाज आज संभव नहीं है। उसके शरीर या दिमाग को मृत्यु के तुरंत बाद इस तरह सुरक्षित करने की कोशिश की जाए कि उसकी महत्वपूर्ण संरचना भविष्य तक बची रहे। समर्थकों को उम्मीद है कि आने वाले समय में चिकित्सा विज्ञान इतना आगे बढ़ सकता है कि बीमारी, उम्र बढ़ने और शरीर को हुए नुकसान को ठीक किया जा सके।
लेकिन यहां एक तथ्य बिल्कुल साफ है। आज तक किसी मृत इंसान को बहुत कम तापमान पर वर्षों तक सुरक्षित रखने के बाद फिर से जीवित नहीं किया गया है। इसलिए इसे आज की प्रमाणित चिकित्सा पद्धति नहीं कहा जा सकता। यह भविष्य के विज्ञान पर आधारित एक संभावना है, जिसके सफल होने की गारंटी किसी के पास नहीं है।
शरीर को साधारण बर्फ की तरह नहीं जमाया जाता
जो संस्थाएं इस तरह के शरीर संरक्षण का काम करती हैं, वे केवल शरीर को किसी बड़े जमाने वाले कमरे में नहीं रख देतीं। उनकी कोशिश होती है कि शरीर के भीतर बड़े पैमाने पर बर्फ के कण न बनें, क्योंकि वही कोशिकाओं को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसके लिए विशेष रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है, जिनका उद्देश्य शरीर में मौजूद पानी के जमने के तरीके को बदलना और कोशिकाओं को होने वाले नुकसान को कम करना होता है। इसके बाद शरीर का तापमान धीरे-धीरे बहुत नीचे ले जाया जाता है।
लक्ष्य यह होता है कि शरीर के ऊतक साधारण बर्फ बनने के बजाय एक ऐसी ठोस अवस्था में पहुंचें जिसमें बड़े बर्फीले कण कम से कम बनें। इसे सरल भाषा में कांच जैसी ठोस अवस्था कहा जा सकता है। यह तरीका सुनने में भले आसान लगे, लेकिन शरीर जैसे जटिल ढांचे के लिए इसे सुरक्षित तरीके से करना बेहद कठिन है। किसी ऊतक को बहुत कम तापमान पर संरक्षित कर लेना और पूरे इंसान को भविष्य में फिर से जिंदा कर देना, दोनों के बीच बहुत बड़ा अंतर है।
मृत्यु के बाद शरीर के साथ क्या किया जाता है?
ऐसी प्रक्रिया व्यक्ति के जीवित रहते शुरू नहीं की जाती। आम तौर पर कानूनी रूप से मृत्यु घोषित होने के बाद ही शरीर को संरक्षित करने की कोशिश शुरू होती है। इसके बाद समय बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि मृत्यु के बाद शरीर और खासकर दिमाग की कोशिकाओं में धीरे-धीरे नुकसान शुरू हो सकता है। इसलिए कोशिश की जाती है कि शरीर को जल्द से जल्द ठंडा किया जाए और विशेष तरल पदार्थों की मदद से उसके ऊतकों को लंबे समय तक संरक्षण के लिए तैयार किया जाए।
इसके बाद शरीर का तापमान धीरे-धीरे बेहद कम स्तर तक ले जाया जाता है। लंबे समय तक संरक्षण के लिए तरल नाइट्रोजन का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिसका तापमान लगभग शून्य से 196 डिग्री सेल्सियस नीचे होता है। इतने कम तापमान पर सामान्य जैविक गतिविधियां लगभग रुक जाती हैं। यही इस विचार की बुनियाद है कि अगर शरीर की महत्वपूर्ण संरचना को नुकसान से बचाया जा सके तो वह भविष्य तक बनी रह सकती है।
कुछ लोग सिर्फ दिमाग को सुरक्षित क्यों रखना चाहते हैं?
इस विचार का सबसे अजीब लेकिन दिलचस्प हिस्सा यह है कि कुछ लोग पूरे शरीर की बजाय सिर्फ दिमाग को सुरक्षित रखने की बात करते हैं। इसके पीछे सोच यह है कि इंसान की यादें, अनुभव, व्यक्तित्व और पहचान मुख्य रूप से दिमाग से जुड़े हैं। शरीर के दूसरे अंगों को भविष्य में बदला या बनाया जा सकता है, लेकिन अगर दिमाग की वह संरचना नष्ट हो गई जिसमें व्यक्ति की यादें और व्यक्तित्व मौजूद हैं, तो शायद उस व्यक्ति को वापस लाना संभव नहीं होगा।
समर्थकों की कल्पना है कि भविष्य में विज्ञान इतना आगे बढ़ सकता है कि दिमाग की क्षतिग्रस्त संरचना की मरम्मत की जा सके या उसे किसी नए जैविक अथवा कृत्रिम शरीर से जोड़ा जा सके। लेकिन यह अभी कल्पना से आगे नहीं बढ़ पाया है। आज विज्ञान के पास ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे किसी मृत और बहुत कम तापमान पर रखे गए दिमाग को पूरी चेतना और यादों के साथ फिर से सक्रिय किया जा सके।
क्या शरीर को सैकड़ों साल तक सुरक्षित रखा जा सकता है?
बहुत कम तापमान पर शरीर में होने वाली सामान्य रासायनिक गतिविधियां बेहद धीमी हो जाती हैं। इसी सिद्धांत का इस्तेमाल आज कई जैविक चीजों को सुरक्षित रखने में किया जाता है। शुक्राणु, अंडाणु और भ्रूणों को बहुत कम तापमान पर रखा जा सकता है और बाद में चिकित्सा में उनका उपयोग किया जा सकता है। कई तरह की कोशिकाओं को भी लंबे समय तक संरक्षित किया जाता है।
लेकिन एक कोशिका और पूरे इंसान के बीच जमीन-आसमान का अंतर है। इंसानी शरीर अरबों कोशिकाओं, अलग-अलग अंगों, रक्तवाहिकाओं और अत्यंत जटिल दिमाग से मिलकर बना है। दिमाग में अरबों तंत्रिका कोशिकाएं और उनके बीच अनगिनत संबंध होते हैं। हमारी यादें और व्यक्तित्व इसी जटिल व्यवस्था से जुड़े हो सकते हैं। इस पूरी व्यवस्था को बिना नुकसान पहुंचाए संरक्षित करना और फिर उसे सामान्य रूप से काम करने लायक बनाना आज की तकनीक के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती है।
सबसे कठिन काम शरीर को फिर से गर्म करना है
लोग आमतौर पर सोचते हैं कि शरीर को बहुत कम तापमान तक पहुंचाना सबसे मुश्किल काम होगा, लेकिन उसे वापस सामान्य तापमान तक लाना भी उतना ही कठिन है। अगर शरीर के अलग-अलग हिस्से अलग-अलग गति से गर्म हों तो उनमें तनाव पैदा हो सकता है और ऊतकों को नुकसान पहुंच सकता है। संरक्षण के लिए इस्तेमाल किए गए विशेष रसायनों को भी सुरक्षित तरीके से हटाना होगा।
लेकिन मान लीजिए भविष्य में वैज्ञानिक शरीर को बिना नुकसान पहुंचाए फिर से गर्म करने में सफल हो जाते हैं। तब भी सबसे बड़ा सवाल दिमाग का रहेगा। क्या व्यक्ति की यादें बची हैं? क्या उसका व्यक्तित्व बचा है? क्या उसकी चेतना फिर से शुरू हो सकती है? शरीर को चलाना शायद भविष्य में किसी दिन संभव हो, लेकिन उस शरीर के भीतर उसी व्यक्ति को वापस लाना कहीं ज्यादा कठिन सवाल है।
क्या भविष्य में यह संभव हो सकता है?
इसका ईमानदार जवाब है कि कोई नहीं जानता। इतिहास बताता है कि कई ऐसी चीजें जो कभी असंभव लगती थीं, बाद में चिकित्सा और विज्ञान की प्रगति के साथ सामान्य हो गईं। दिल का प्रत्यारोपण, कृत्रिम अंग और शरीर के भीतर जटिल इलाज कभी कल्पना जैसे लगते थे। इसलिए भविष्य में विज्ञान कितना आगे जाएगा, इसका अनुमान लगाना आसान नहीं है।
इसी तर्क पर शरीर को बहुत कम तापमान पर सुरक्षित रखने के समर्थक कहते हैं कि अगर भविष्य में किसी व्यक्ति को बचाने की थोड़ी भी संभावना हो सकती है तो उसे पूरी तरह नष्ट होने देने के बजाय सुरक्षित रखना बेहतर है। दूसरी तरफ आलोचकों का कहना है कि भविष्य की उस तकनीक के लिए आज पैसा और उम्मीद लगाना उचित नहीं है जो अभी बनी ही नहीं है।
सच यह है कि दोनों पक्ष भविष्य के बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकते। लेकिन वर्तमान स्थिति बिल्कुल साफ है। आज किसी कानूनी रूप से मृत व्यक्ति को वर्षों तक बहुत कम तापमान पर रखने के बाद फिर से जीवित करने की तकनीक मौजूद नहीं है।
अगर कोई व्यक्ति भविष्य में जिंदा हो गया तो क्या वह वही इंसान होगा?
यह सवाल विज्ञान से आगे बढ़कर दर्शन की दुनिया में पहुंच जाता है। मान लीजिए भविष्य में किसी व्यक्ति के शरीर की पूरी मरम्मत कर दी गई, उसका दिमाग भी सक्रिय हो गया और उसे अपना बचपन, परिवार और पुराने जीवन की बातें याद हैं। तब भी सवाल रहेगा कि क्या वह वास्तव में वही व्यक्ति है जो सैकड़ों साल पहले मरा था?
हम आज भी पूरी तरह नहीं जानते कि चेतना क्या है। हमारी यह भावना कि हम एक अलग व्यक्ति हैं, आखिर दिमाग में कैसे पैदा होती है, इसका पूरा जवाब विज्ञान के पास नहीं है। इसलिए मृत लोगों को भविष्य के लिए सुरक्षित रखने की कोशिश केवल शरीर को बचाने का मामला नहीं है। यह इंसानी पहचान, यादों और चेतना से जुड़ा एक बहुत गहरा सवाल भी है।
क्या यह सिर्फ अमीर लोगों का भविष्य पर लगाया गया दांव है?
ऐसी व्यवस्था महंगी हो सकती है, क्योंकि शरीर को मृत्यु के तुरंत बाद सुरक्षित करने के लिए विशेष व्यवस्था, प्रशिक्षित लोग, उपकरण और लंबे समय तक बहुत कम तापमान बनाए रखने की जरूरत होती है। इसके अलावा व्यक्ति को इस बात पर भी भरोसा करना पड़ता है कि जिस संस्था को उसने अपना शरीर सौंपा है, वह आने वाले कई दशकों या शायद सदियों तक मौजूद रहेगी।
यहीं इस विचार की एक दूसरी समस्या सामने आती है। अगर संस्था बंद हो गई तो क्या होगा? अगर आर्थिक संकट आया तो? अगर युद्ध या प्राकृतिक आपदा हुई तो? क्या आने वाली पीढ़ियां इन संरक्षित शरीरों को संभालती रहेंगी? इसलिए यह केवल भविष्य के विज्ञान पर भरोसा नहीं है। यह भविष्य के समाज और उन संस्थाओं पर भी भरोसा है जिनके जिम्मे यह काम होगा।
मौत आखिर होती कब है?
इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल शायद यही है। कभी सांस और दिल की धड़कन बंद होना ही मृत्यु का अंतिम संकेत माना जाता था। आधुनिक चिकित्सा ने इस सोच को काफी बदल दिया है। आज कई ऐसे लोगों को बचाया जा सकता है जिनका दिल कुछ समय के लिए बंद हो गया था। सही समय पर इलाज मिलने पर शरीर की कई प्रक्रियाएं फिर से शुरू की जा सकती हैं।
अत्यधिक ठंड के मामलों ने भी दिखाया है कि कुछ परिस्थितियों में शरीर सामान्य से अधिक समय तक बचाव की संभावना बनाए रख सकता है। इसका मतलब यह है कि मृत्यु हमेशा एक स्विच की तरह एक ही पल में होने वाली घटना नहीं है। कई स्थितियों में यह एक प्रक्रिया होती है। लेकिन एक सीमा के बाद शरीर और खासकर दिमाग को इतना नुकसान हो जाता है कि वर्तमान विज्ञान उसे ठीक नहीं कर सकता।
मृत व्यक्ति को बहुत कम तापमान पर सुरक्षित रखने का विचार इसी सीमा को भविष्य की तकनीक के भरोसे आगे बढ़ाने की कोशिश है।
तो क्या कोई इंसान ठंड में जमने के बाद फिर जिंदा हो सकता है? अगर बात गंभीर हाइपोथर्मिया की है तो जवाब है, हां। कुछ लोग अत्यधिक ठंड के कारण शरीर का तापमान बहुत नीचे गिर जाने के बाद भी उचित इलाज से बचाए गए हैं। ठंड शरीर की गतिविधियों को धीमा कर सकती है और कुछ परिस्थितियों में दिमाग को बचाने के लिए डॉक्टरों को अधिक समय दे सकती है।
लेकिन अगर सवाल यह है कि किसी मृत व्यक्ति को वर्षों या सदियों तक शून्य से 196 डिग्री नीचे तापमान पर रखा जाए और फिर भविष्य में उसे जिंदा कर दिया जाए, तो इसका जवाब फिलहाल नहीं है। ऐसा आज तक किसी इंसान के साथ सफलतापूर्वक नहीं हुआ है।
मृत लोगों को बहुत कम तापमान पर सुरक्षित रखने का विचार वास्तव में समय को रोकने की इंसानी कोशिश है। उम्मीद यह है कि जिस बीमारी से आज किसी व्यक्ति की जान नहीं बचाई जा सकती, शायद भविष्य में उसका इलाज हो। जिस दिमागी क्षति को आज ठीक नहीं किया जा सकता, शायद भविष्य की तकनीक उसे ठीक कर दे। जिस शरीर के अंग आज काम करना बंद कर देते हैं, शायद भविष्य में उन्हें फिर से बनाया या बदला जा सके।
क्या ऐसा कभी होगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। लेकिन दुनिया में ऐसे लोग जरूर हैं जिन्होंने अपने शरीर या दिमाग को भविष्य के लिए बहुत कम तापमान पर सुरक्षित रखने का फैसला किया है। उनका फैसला सही साबित होगा या गलत, यह शायद आने वाली सदियां ही बता सकेंगी।
आज की सच्चाई इतनी ही है कि अत्यधिक ठंड कभी-कभी जीवित इंसान की जान बचा सकती है, लेकिन मृत इंसान को जमा करके भविष्य में फिर से जिंदा करना अभी तक संभव नहीं हुआ है। बाकी सब भविष्य के विज्ञान पर टिकी हुई उम्मीद है।