Pickleball क्या है? 1965 में बना बच्चों का खेल आज दुनिया में करोड़ों लोगों तक कैसे पहुंच गया?
Pickleball क्या है और इसकी शुरुआत 1965 में कैसे हुई? जानिए इसके इतिहास, नियम, कोर्ट, स्कोरिंग, ‘Kitchen’ और अमेरिका से भारत तक तेजी से बढ़ती लोकप्रियता की पूरी कहानी।
Pickleball Kya Hai Explained Hindi News
Pickleball Kya Hai: अगर आपने हाल फिलहाल किसी क्लब, जिम या स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में छोटे से कोर्ट पर लोगों को छेद वाली प्लास्टिक की गेंद और चपटे पैडल के साथ खेलते देखा है, तो संभव है कि वह टेनिस नहीं बल्कि पिकलबॉल (pickleball) हो। भारत के बड़े शहरों में इस खेल के कोर्ट तेजी से दिखाई देने लगे हैं और टेनिस, बैडमिंटन या जिम के बाद अब पिकलबॉल भी फिटनेस और मनोरंजन के विकल्प के रूप में जगह बना रहा है। अमेरिका में लोकप्रियता की नई ऊंचाई छूने के बाद पिकलबॉल की लहर भारत तक पहुंच गई है।
दिलचस्प बात यह है कि आज जिस खेल के आसपास क्लब, टूर्नामेंट और कारोबार खड़ा हो रहा है, उसकी शुरुआत किसी बड़े खेल संगठन ने नहीं की थी। इसका जन्म 1965 में अमेरिका के वॉशिंगटन राज्य के बैनब्रिज आइलैंड पर तीन दोस्तों ने यूं ही बोरियत मिटाने के लिए किया था। यही प्रयोग धीरे-धीरे पिकलबॉल में बदल गया।
भारत में पिकलबॉल की एंट्री कैसे हुई?
भारत में पिकलबॉल को संगठित रूप देने के लिए ऑल इंडिया पिकलबॉल एसोसिएशन यानी एआईपीए काम कर रहा है। इसके अलावा देश में निजी क्लब और लीग भी इस खेल को आगे बढ़ा रहे हैं। 2025 में भारत में आयोजित पिकलबॉल टूर्नामेंटों और अंतरराष्ट्रीय स्तर के आयोजनों ने भी इसकी चर्चा बढ़ाई। भारत के लिए इस खेल की एक खास खूबी यह है कि बैडमिंटन और टेनिस दोनों यहां पहले से लोकप्रिय हैं। पिकलबॉल इन दोनों खेलों से कुछ परिचित चीजें लेता है, इसलिए नए खिलाड़ी को इसका अंदाज बिल्कुल अनजान नहीं लगता।
छोटे शहरों में भी क्यों बन सकती है इसकी जगह?
पिकलबॉल के बढ़ने का एक बड़ा कारण इसका कम जगह में खेला जा सकना है। इसका कोर्ट टेनिस कोर्ट से काफी छोटा होता है। यही वजह है कि जहां जमीन महंगी है और बड़े खेल मैदान बनाना मुश्किल है, वहां पिकलबॉल कोर्ट बनाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। भारत के बड़े शहरों में यह खास तौर पर महत्वपूर्ण है। किसी खाली पड़ी व्यावसायिक जगह, क्लब परिसर या इंडोर स्पोर्ट्स सेंटर में पिकलबॉल कोर्ट तैयार किया जा सकता है। इससे जमीन की लागत और बुनियादी ढांचे का दबाव टेनिस जैसे बड़े कोर्ट वाले खेल की तुलना में कम हो सकता है।
अमेरिका में आखिर इतना बड़ा कैसे हो गया?
अमेरिका में पिकलबॉल पहले ही बड़े खेलों की श्रेणी में पहुंच चुका है। 2020 में करीब 42 लाख अमेरिकी पिकलबॉल खेलते थे। 2025 में यह संख्या बढ़कर करीब 2.43 करोड़ हो गई। यानी पांच साल में खिलाड़ियों की संख्या लगभग छह गुना हो गई। इसकी लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह इसकी आसान शुरुआत है। नया खिलाड़ी कुछ बुनियादी नियम सीखकर जल्दी खेलना शुरू कर सकता है। लेकिन जैसे-जैसे उसका स्तर बढ़ता है, स्पिन, प्लेसमेंट, फुटवर्क और रणनीति खेल को काफी चुनौतीपूर्ण बना देते हैं। यही ‘आसान शुरुआत, मुश्किल महारत’ वाला मॉडल पिकलबॉल की सबसे बड़ी ताकत है।
इसकी शुरुआत हुई कैसे?
1965 में वॉशिंगटन राज्य के बैनब्रिज आइलैंड पर जोएल प्रिचर्ड, बिल बेल और बार्नी मैक्कलम अपने परिवारों के साथ थे। बच्चे बोर हो रहे थे। घर पर बैडमिंटन का कोर्ट था, लेकिन पूरा सामान नहीं था। उन्होंने टेबल टेनिस के पैडल, प्लास्टिक की छेद वाली गेंद और बैडमिंटन का जाल इस्तेमाल किया। शुरुआत में जाल को ऊंचा रखा गया और फिर धीरे-धीरे खेल के नियम बदले गए। कुछ ही समय में यह नया खेल परिवार और दोस्तों के बीच लोकप्रिय हो गया। पहला स्थायी कोर्ट 1967 में जोएल प्रिचर्ड के घर के पीछे बनाया गया। लगभग एक दशक बाद 1976 में पहला पिकलबॉल टूर्नामेंट आयोजित हुआ।
इसका नाम पिकलबॉल क्यों पड़ा?
इसका जवाब भी पूरी तरह सीधा नहीं है। एक लोकप्रिय कहानी इसे ‘पिकल बोट’ से जोड़ती है। रोइंग में ऐसी नाव को पिकल बोट (pickle boat) कहा जाता था जिसमें अलग-अलग जगहों से आए नाविकों को एक साथ रखा जाता था। चूंकि पिकलबॉल कई खेलों के तत्वों से बना था, इसलिए इसे इसी नाम से जोड़ने की कहानी सामने आती है। दूसरी कहानी परिवार के कुत्ते ‘पिकल्स’ की है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह खेल के दौरान गेंद के पीछे भागता था। लेकिन प्रिचर्ड परिवार के मुताबिक कुत्ते का नाम खेल के नाम के बाद रखा गया था। इसलिए पिकल बोट वाली कहानी को ज्यादा विश्वसनीय माना जाता है।
पिकलबॉल खेलते कैसे हैं?
बुनियादी तौर पर खेल सरल है। खिलाड़ी पैडल से गेंद को नेट के ऊपर से विरोधी के कोर्ट में मारता है। कोशिश यह होती है कि सामने वाला खिलाड़ी गेंद वापस न कर पाए। कोर्ट टेनिस कोर्ट से छोटा होता है और गेंद हल्की प्लास्टिक की होती है जिसमें छोटे-छोटे छेद होते हैं। इसमें सिंगल्स और डबल्स दोनों खेले जाते हैं, लेकिन डबल्स काफी लोकप्रिय है। पिकलबॉल के दो नियम इसे खास बनाते हैं। पहला है टू-बाउंस नियम, जिसके तहत सर्व के बाद गेंद को दोनों तरफ कम से कम एक बार जमीन पर उछलना होता है। दूसरा है नेट के पास का नॉन-वॉली जोन, जिसे आम बोलचाल में “किचन” कहा जाता है। इस हिस्से में खड़े होकर हवा में गेंद को सीधे वॉली नहीं किया जा सकता। यही नियम खेल की गति और रणनीति को टेनिस से अलग बनाते हैं।
पिकलबॉल इतना मजेदार क्यों है?
इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि इसमें खेल शुरू करने के लिए आपको प्रोफेशनल खिलाड़ी होने की जरूरत नहीं है। टेनिस की तरह बड़े कोर्ट में लंबी दौड़ नहीं लगानी पड़ती। गेंद भी अपेक्षाकृत धीमी होती है। इसलिए शुरुआती खिलाड़ी जल्दी रैली शुरू कर सकता है। लेकिन जब खिलाड़ी बेहतर होने लगता है तो खेल अचानक ज्यादा रणनीतिक हो जाता है। गेंद को सिर्फ जोर से मारना काफी नहीं होता। उसे कहां गिराना है, कितनी ऊंचाई पर मारना है, स्पिन कितना देना है और विरोधी को कहां खड़ा करना है, ये सब महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यानी पिकलबॉल में ताकत से ज्यादा कई बार दिमाग काम करता है।
पिकलबॉल में अब बड़ा कारोबार भी है
अमेरिका में इसकी लोकप्रियता ने खेल के आसपास पूरा कारोबार खड़ा कर दिया है। कोर्ट, क्लब, पैडल, जूते, कपड़े, प्रशिक्षण, टूर्नामेंट और पेशेवर लीग, हर क्षेत्र में बाजार बन रहा है। भारत में भी इसी वजह से कारोबारी संभावनाएं पैदा हो रही हैं। बड़े शहरों में निजी क्लब और इंडोर स्पोर्ट्स सेंटर पिकलबॉल कोर्ट जोड़ रहे हैं।
शहरी युवाओं का नया फिटनेस गेम
पिकलबॉल की पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प बात यही है कि इसे किसी ने भविष्य का बड़ा खेल बनाने के लिए नहीं बनाया था। 1965 में तीन दोस्तों ने सिर्फ इतना सोचा था कि बच्चों के पास खेलने के लिए कुछ होना चाहिए। आज वही खेल अमेरिका में करोड़ों लोगों तक पहुंच चुका है और भारत में भी तेजी से अपनी जगह बना रहा है। इसकी सफलता का फॉर्मूला बहुत जटिल नहीं है - कम जगह, कम शुरुआती मुश्किल, चार लोगों के साथ खेलने का मजा, फिटनेस और सोशल कनेक्शन। और शायद यही वजह है कि पिकलबॉल सिर्फ एक नया खेल नहीं रह गया है। यह शहरी जिंदगी में फिटनेस और मनोरंजन के बीच की उस जगह को भर रहा है, जहां लोगों को ऐसा खेल चाहिए जिसे खेलने के लिए न तो प्रोफेशनल खिलाड़ी होना जरूरी हो और न ही दो घंटे का समय निकालना पड़े।
पिकलबॉल स्कोरिंग टेनिस से कैसे अलग है?
पिकलबॉल में स्कोरिंग के अलग-अलग प्रारूप इस्तेमाल किए जाते हैं और आधिकारिक नियम समय के साथ अपडेट भी होते रहते हैं। पारंपरिक खेल में आम तौर पर गेम 11 अंकों का होता है और जीतने के लिए कम से कम दो अंकों की बढ़त चाहिए होती है। डबल्स में सर्विस की व्यवस्था भी टेनिस से अलग है। पारंपरिक स्कोरिंग में आम तौर पर सिर्फ सर्व करने वाली टीम अंक हासिल करती है। सर्विस और खिलाड़ियों की स्थिति के नियम भी अलग होते हैं, इसलिए पहली बार खेलने वाले व्यक्ति को पिकलबॉल का स्कोरिंग सिस्टम थोड़ा अजीब लग सकता है। इसलिए अगर कोई पहली बार पिकलबॉल खेल रहा है तो उसे शुरुआत में सिर्फ तीन चीजें समझनी चाहिए - सर्व कैसे करना है, टू-बाउंस नियम क्या है और किचन में क्या किया जा सकता है। बाकी नियम खेलते-खेलते आसानी से समझ में आने लगते हैं।
कोरोना के बाद पिकलबॉल को और रफ्तार मिली
पिकलबॉल के बढ़ने की एक वजह कोरोना महामारी के दौरान लोगों की खेल संबंधी आदतों में आया बदलाव भी माना जाता है। छोटे समूहों में बाहर खेलना, खुले स्थानों में गतिविधियां करना और ऐसे खेलों की तलाश जिनमें बड़ी टीम की जरूरत न हो—इन सबने पिकलबॉल को फायदा पहुंचाया। इसके बाद सोशल मीडिया और सेलिब्रिटी संस्कृति ने इसकी पहुंच और बढ़ाई। पिकलबॉल अब सिर्फ स्थानीय पार्क का खेल नहीं रहा। पेशेवर प्रतियोगिताएं, लीग, टूर्नामेंट और बड़े निवेशक इसके साथ जुड़ने लगे हैं। लेब्रॉन जेम्स, ड्रेमंड ग्रीन और केविन लव जैसे अमेरिकी बास्केटबॉल सितारों ने भी पेशेवर पिकलबॉल में निवेश किया है। जहां करोड़ों लोग खेल रहे हों, वहां खेल से जुड़ा कारोबार भी तेजी से बढ़ता है। कोर्ट बनाने से लेकर पैडल, गेंद, जूते, कपड़े, क्लब, प्रशिक्षण और टूर्नामेंट तक एक पूरा उद्योग तैयार हो रहा है। अमेरिका में नए इंडोर पिकलबॉल केंद्र भी बन रहे हैं। एक उदाहरण के तौर पर कनेक्टिकट में 2026 में खुलने वाली एक बड़ी इंडोर सुविधा में 18 इनडोर पिकलबॉल कोर्ट समेत कुल 21 कोर्ट की योजना बनाई गई थी। यह दिखाता है कि पिकलबॉल अब सिर्फ पार्क में खेला जाने वाला शौक नहीं रह गया है, बल्कि इसके आसपास व्यावसायिक ढांचा भी विकसित हो रहा है।