चौसठ कलाएं और आज का जीवन
Importance of 64 Arts: ‘चौसठ कलाएं’ भारतीय संस्कृति की वह समृद्ध परंपरा हैं जो जीवन को सौंदर्य, संतुलन और समग्र विकास की दिशा देती हैं—आधुनिक संदर्भ में इनके महत्व को समझिए।
Importance of 64 Arts: भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में ‘चौसठ कलाएं’ केवल कौशलों का संग्रह नहीं बल्कि जीवन को सौंदर्य, संतुलन और सार्थकता प्रदान करने वाली एक व्यापक शिक्षण-पद्धति के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इन कलाओं का उल्लेख कामसूत्र तथा यजुर्वेद जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है जो यह सिद्ध करता है कि भारतीय चिंतन में ज्ञान का अर्थ मात्र बौद्धिक उन्नति नहींबल्कि व्यक्तित्व के बहुआयामी विकास से है। ‘कला’ यहाँ केवल सृजन की अभिव्यक्ति नहीं बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षण को सजग, सुंदर और समन्वित ढंग से जीने की क्षमता का नाम है। चौसठ कलाओं का मूल उद्देश्य मनुष्य को इस प्रकार शिक्षित करना है कि वह जीवन के विविध आयामों में दक्ष, संवेदनशील और सृजनशील बन सके। इन कलाओं में गायन, वादन, नृत्य और नाट्य जैसी प्रदर्शन कलाएं न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि भावों की अभिव्यक्ति और आत्मानुभूति के माध्यम भी हैं। चित्रकारी और अलंकरण की कलाएं मनुष्य की सौंदर्य-दृष्टि को परिष्कृत करती हैं जबकि बेल-बूटों और रूपांकन की सूक्ष्मता प्रकृति के साथ उसके अंतर्संबंध को प्रगाढ़ बनाती है। इसी प्रकार सौंदर्य और श्रृंगार से संबंधित कलाएं केवल बाह्य सज्जा तक सीमित नहीं हैं अपितु वे जीवन में माधुर्य और संतुलन का संचार करती हैं। पुष्प-शय्या की रचना, केश-विन्यास, अंग-रंग और वस्त्राभूषण की कला व्यक्ति के भीतर सौंदर्यबोध को जाग्रत करती है जिससे उसका आचरण भी सौम्य और आकर्षक बनता है। यहाँ सौंदर्य केवल देखने की वस्तु नहीं बल्कि अनुभव करने की प्रक्रिया है।
भारतीय ज्ञान परंपरा में ये ‘चौसठ कलाएं’ जीवन के विविध आयामों को परिष्कृत करने वाली समग्र विधाएं मानी गई हैं जो केवल मनोरंजन या शिल्प तक सीमित नहीं बल्कि व्यक्तित्व के सौंदर्य, बौद्धिकता, व्यावहारिकता और सामाजिक दक्षता को विकसित करने वाली विधाएं हैंजो इस प्रकार हैं - गीतम्, वाद्यम्, नृत्यम्, नाट्यम्, आलेख्यम्, विशेषकच्छेद्यम्, तण्डुलकुसुमबलिविकारः, पुष्पास्तरणम्, दशनवासनाङ्गरागः, मणिभूमिकाकर्म, शयनरचनम्, उदकवाद्यं, उदकघातः, चित्रयोगः, माल्यग्रथनविकल्पः, शेखरपीडायोजनम्, नेपथ्ययोगः, कर्णपत्रभङ्गः, गन्धानुलेपनम्, भूषणयोजनम्, ऐन्द्रजालम्, कूटकर्म, हस्तलाघवम्, चित्रशाकापूपभक्ष्यविकारक्रिया, पानकरसरागासवयोजनम्, सूचिकर्म, सूत्रकर्म, प्रहेलिका, प्रतिमाला, दुर्वाचकयोगः, पुस्तकवाचनम्, नाटकाख्यायिकादर्शनम्, काव्यसमस्यापूरणम्, पट्टिकावेत्रवाणविकल्पः, तन्तुवायः, तक्षककर्म, वास्तुविद्या, रूप्यरत्नपरीक्षा, धातुवादः, मणिरागज्ञानम्, आकरज्ञानम्, वृक्षायुर्वेदयोगः, मेषकुक्कुटलावकयुद्धविद्या, शुकसारिकाप्रलापनम्, उत्सादनम्, केशमार्जनकौशलम्, अक्षरमुष्टिकाकथनम्, म्लेच्छितविकल्पः, देशभाषाज्ञानम्, पुष्पशकटिका, यन्त्रकर्म, धारणा मातृका, संपाठ्य, मानसीकाव्यक्रिया, अभिधानकोशज्ञानम्, छन्दोज्ञानम्, क्रियाविकल्पः, छलितकयोगः, वस्त्रगोपनानि, द्यूतविशेषः, आकर्षणक्रीडा, बालक्रीडनकानि, वैनायिकीविद्या, वैजयिकीविद्या तथा व्यायामिकीविद्या।इनसे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय शिक्षा-पद्धति मनुष्य को केवल ज्ञानवान ही नहीं बल्कि कुशल, सृजनशील, व्यावहारिक और सौंदर्यबोध से संपन्न बनाने का उद्देश्य रखती थी। यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण के संदर्भ में इन कलाओं में पारंगत होने की कथा आदर्श मानव के निर्माण की प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत की जाती है। हिंदी भाषा में इन्हें - गायन कला, वादन कला, नृत्य कला, नाट्य कला, चित्रांकन की कला, अलंकरण एवं रूप-सज्जा की कला, चावल और पुष्पों से आकृतियाँ बनाने की कला, पुष्प-शय्या एवं सजावट की कला, दाँत, वस्त्र और अंगों को रंगने-सजाने की कला, रत्नों और पत्थरों से भूमि सजाने की कला, शयन (बिस्तर) की रचना की कला, जल-वाद्य बजाने की कला, जल-क्रीड़ा की कला, चित्रों का संयोजन और प्रयोग की कला, माला गूँथने की विविध विधियाँ, सिर के आभूषण (मुकुट आदि) बनाने की कला, वेशभूषा और रंगमंचीय सज्जा की कला, कर्णाभूषण (कान के आभूषण) बनाने की कला, सुगंधित लेप एवं इत्र बनाने की कला, आभूषण धारण एवं निर्माण की कला, जादू या मायाजाल की कला, गुप्त या कूट-कर्म करने की कला, हाथ की सफाई (जादूगरी) की कला, विविध प्रकार के पकवान एवं व्यंजन बनाने की कला, पेय पदार्थों एवं आसव बनाने की कला, सुई-धागे का काम (सिलाई) की कला, धागा एवं बुनाई का कार्य, पहेलियाँ बनाने और बुझाने की कला, शब्द-रचना या काव्य-शृंखला की कला, कठिन शब्दों के प्रयोग और व्याख्या की कला, पुस्तक पढ़ने और समझने की कला, नाटक और कथाओं का अवलोकन एवं प्रस्तुति की कला, काव्य की समस्याओं को पूरा करने की कला, बेंत, पट्टिका आदि बनाने की कला, वस्त्र बुनने की कला, बढ़ईगीरी की कला, वास्तु-विद्या (गृह-निर्माण) की कला, चाँदी और रत्नों की परीक्षा की कला, धातु-विद्या (धातुओं का ज्ञान) की कला, रत्नों के रंग और गुणों की पहचान की कला, खनिजों और खानों का ज्ञान, वृक्षों और वनस्पतियों की चिकित्सा की कला, पशु-पक्षियों के युद्ध (जैसे मेढ़ा, मुर्गा) की विद्या, तोता-मैना आदि पक्षियों को बोलना सिखाने की कला, शरीर की मालिश और सौंदर्य-वर्धन की कला, केश-सज्जा और देखभाल की कला, संकेतों या उँगलियों के माध्यम से संवाद की कला, गुप्त भाषा या संकेत-लिपि का ज्ञान, विभिन्न देशों और भाषाओं का ज्ञान, पुष्पों से छोटी-छोटी रचनाएँ बनाने की कला, यंत्रों और उपकरणों के निर्माण की कला, स्मरण-शक्ति विकसित करने की विधि, पाठ को कंठस्थ करने की कला, मन में ही काव्य रचना करने की क्षमता, शब्दकोश और पर्यायवाची ज्ञान की कला, छंदों का ज्ञान, विविध क्रियाओं और विधियों का ज्ञान, छल या चतुराई की कला, वस्त्रों को छिपाने या सुरक्षित रखने की कला, द्यूत (जुआ/खेल) की विशेष विधियाँ, आकर्षण और मनोविनोद की कला, बालकों के खेल और खिलौने बनाने की कला, विनय और शिष्टाचार की विद्या, विजय प्राप्त करने की नीति और विद्या तथा व्यायाम और शारीरिक अभ्यास की कला के रूप में जानते हैं।
व्यावहारिक जीवन में इनके महत्त्व को देखें तो पाक-कला और आतिथ्य की परंपरा भारतीय संस्कृति में विशेष महत्त्व रखती है। स्वादिष्ट भोजन का निर्माण और पेय पदार्थों की तैयारी केवल इंद्रिय-सुख का विषय नहींबल्कि प्रेम, सेवा और समर्पण का प्रतीक है। अतिथि का सत्कार, ‘अतिथि देवो भवः’ की भावना के साथ, इन कलाओं के माध्यम से साकार होता है, जिससे सामाजिक संबंधों में आत्मीयता और सौहार्द की वृद्धि होती है।विज्ञान और तकनीकी से संबंधित कलाएं यह दर्शाती हैं कि प्राचीन भारतीय समाज केवल आध्यात्मिक उन्नति तक सीमित नहीं था बल्कि वह व्यावहारिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत विकसित था। वास्तु विद्या के माध्यम से भवन-निर्माण की सम्यक् योजना, रत्न-परीक्षा द्वारा पदार्थों की पहचान, वृक्ष-चिकित्सा के द्वारा प्रकृति का संरक्षण और धातुविज्ञान की कला से धातुओं का परिष्कार—ये सभी उस समय के उन्नत ज्ञान-विज्ञान के प्रमाण हैं। यहाँ विज्ञान और कला का अद्भुत समन्वय दृष्टिगोचर होता है। मनोरंजन और चतुरता से संबंधित कलाएं मनुष्य की बुद्धि और कौशल को तीक्ष्ण बनाती हैं। जादूगरी, कठपुतली-नृत्य, पहेलियों का समाधान, कूटनीति, शतरंज और हस्त-कौशल जैसी विधाएं न केवल मानसिक चपलता को बढ़ाती हैं बल्कि जीवन की जटिल परिस्थितियों में विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता भी प्रदान करती हैं। ये कलाएं जीवन को केवल गंभीरता से नहीं बल्कि सहजता और विनोद के साथ जीने की प्रेरणा देती हैं। अन्य कलाओं में सिलाई-बुनाई, ग्रंथ-पठन, देशभाषाओं का ज्ञान और समस्यापूर्ति जैसी विधाएं व्यक्ति को आत्मनिर्भर और विद्वान बनाती हैं। ये कलाएं यह सिखाती हैं कि ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य केवल अर्जन नहीं, बल्कि उसका सृजनात्मक और सामाजिक उपयोग है।
मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने सांदीपनि मुनि के आश्रम में अत्यल्प समय में ही चौसठ कलाओं तथा चौदह विद्याओं में पारंगत होकर यह सिद्ध किया कि समर्पण, अनुशासन और जिज्ञासा के संयोग से मनुष्य अपनी सीमाओं का अतिक्रमण कर सकता है। यह प्रसंग केवल एक दैवी कथा नहीं बल्कि भारतीय शिक्षा-दर्शन की उस उच्चतम अवधारणा का द्योतक हैजिसमें ज्ञान अर्जन को साधना, तप और आत्मानुशासन के साथ जोड़ा गया है। गुरुकुल की पद्धति में शिक्षा केवल बौद्धिक जानकारी का संचय नहीं थी बल्कि वह जीवन की समग्र साधना थी। वहाँ शिष्य प्रकृति के सान्निध्य में, गुरु के संरक्षण में, आत्मसंयम, श्रम, सेवा और स्वाध्याय के माध्यम से अपने व्यक्तित्व का निर्माण करता था। इस परिप्रेक्ष्य में श्रीकृष्ण का अल्पावधि में इन समस्त कलाओं में प्रवीण होना यह संकेत देता है कि जब जिज्ञासा प्रखर हो, मन एकाग्र हो और लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण हो, तब समय की सीमाएँ भी गौण हो जाती हैं। यह शिक्षा का वह आदर्श है, जिसमें मात्रा से अधिक गुणवत्ता का महत्त्व है और अवधि से अधिक साधना की तीव्रता का। इस कथा का एक अन्य गूढ़ पक्ष यह भी है कि ज्ञान को विभाजित खंडों में नहीं बल्कि एक अखंड चेतना के रूप में देखा गया है। चौसठ कलाएं और चौदह विद्याएं मिलकर जीवन के भौतिक, बौद्धिक, कलात्मक और आध्यात्मिक सभी पक्षों का समन्वय करती हैं। श्रीकृष्ण का इन सभी में पारंगत होना इस तथ्य को पुष्ट करता है कि आदर्श शिक्षित व्यक्ति वही है जिसमें विचार की गहराई, भाव की कोमलता, कर्म की दक्षता और आत्मा की निर्मलता एक साथ विद्यमान हों। अतः यह प्रसंग केवल एक अलौकिक उपलब्धि का वर्णन नहीं बल्कि यह संदेश भी देता है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति को ‘सम्पूर्ण मनुष्य’ बनाना है। जब शिक्षा साधना बन जाती है तब ज्ञान केवल सूचना नहीं रहता बल्कि वह व्यक्तित्व का प्रकाश बनकर जीवन को आलोकित करता है। यही कारण है कि यह कथा आज भी प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है और हमें यह स्मरण कराती है कि सही दृष्टि, समर्पण और अनुशासन के साथ मनुष्य अपने भीतर निहित अनंत संभावनाओं को साकार कर सकता है।
भारतीय ज्ञान-परंपरा में वर्णित ‘चौसठ कलाएं’, जिनका सुविस्तृत निरूपण कामसूत्र में मिलता है, आज के समय में भी प्रासंगिक हैं और आधुनिक जीवन की जटिलताओं के बीच संतुलन और समग्रता का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं। वर्तमान युग, जो तीव्र गति, तकनीकी विस्तार और विशेषज्ञता की अंधी दौड़ से चिह्नित है, वहाँ मनुष्य का व्यक्तित्व प्रायः एकांगी होता जा रहा है। ऐसे समय में चौसठ कलाओं की अवधारणा हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन की पूर्णता बहुआयामी विकास में निहित है। आज की शिक्षा प्रणाली मुख्यतः व्यावसायिक दक्षता पर केंद्रित हो गई है, जहाँ कला, सौंदर्यबोध और जीवन-कौशल की उपेक्षा स्पष्ट दिखाई देती है। चौसठ कलाएं इस असंतुलन को दूर करने का एक सशक्त आधार प्रस्तुत करती हैं। गायन, वादन और नृत्य जैसी कलाएं मानसिक तनाव को कम करने, भावनात्मक संतुलन स्थापित करने और रचनात्मकता को प्रोत्साहित करने में अत्यंत सहायक हैं। आधुनिक मनोविज्ञान भी अब इस तथ्य को स्वीकार करता है कि कला के माध्यम से आत्म-अभिव्यक्ति व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। इसी प्रकार चित्रकला, अलंकरण और शिल्पकला जैसी विधाएं आज ‘डिज़ाइन’, ‘विज़ुअल कम्युनिकेशन’ और ‘क्रिएटिव इंडस्ट्री’ के रूप में नए आयाम प्राप्त कर चुकी हैं। जो कलाएं कभी व्यक्तिगत सौंदर्यबोध का हिस्सा थीं, वे आज वैश्विक अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुकी हैं। फैशन, इंटीरियर डेकोरेशन, ग्राफिक डिज़ाइन और डिजिटल आर्ट—ये सभी उसी परंपरा के आधुनिक रूप हैं। पाक-कला और आतिथ्य से संबंधित विधाएं आज ‘हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री’ के रूप में विकसित होकर रोजगार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रमुख माध्यम बन गई हैं। भोजन की विविधता और प्रस्तुति की कला न केवल स्वाद की तृप्ति करती है, बल्कि यह किसी संस्कृति की पहचान भी बनती है। इसी प्रकार शारीरिक व्यायाम और स्वास्थ्य से जुड़ी कलाएं आज ‘फिटनेस’ और ‘वेलनेस’ के रूप में वैश्विक महत्व प्राप्त कर चुकी हैं। वास्तु, धातुविज्ञान और वनस्पति ज्ञान जैसी कलाएं आज के विज्ञान और तकनीकी क्षेत्रों से गहराई से जुड़ी हुई हैं। पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास और जैविक जीवनशैली की ओर बढ़ते वैश्विक झुकाव के संदर्भ में वृक्षायुर्वेद और प्रकृति-आधारित ज्ञान की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। यह स्पष्ट करता है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान केवल अतीत का गौरव नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा भी है।मनोरंजन और बौद्धिक चातुर्य से संबंधित कलाएं, जैसे पहेलियाँ, कूटनीति और खेल, आज के ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ और ‘प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल्स’ के रूप में पुनर्परिभाषित हो रही हैं। डिजिटल युग में, जहाँ सूचना का प्रवाह अत्यधिक है, वहाँ विवेकपूर्ण चयन और विश्लेषण की क्षमता अत्यंत आवश्यक हो गई है—जो इन कलाओं के अभ्यास से सहज ही विकसित होती है।
चौसठ कलाओं की सबसे बड़ी प्रासंगिकता इस तथ्य में निहित है कि वे मनुष्य को केवल ‘उत्पादक’ नहीं बल्कि ‘संवेदनशील’ और ‘संतुलित’ बनाती हैं। वे जीवन को केवल उपयोगिता की दृष्टि से नहीं बल्कि सौंदर्य और आनंद की दृष्टि से भी देखने की प्रेरणा देती हैं। आज जब जीवन यांत्रिकता और प्रतिस्पर्धा के दबाव में जकड़ा हुआ है तब ये कलाएं हमें पुनः मानवता, सृजनशीलता और आत्मिक संतुलन की ओर लौटने का मार्ग दिखाती हैं। यदि इन्हें समकालीन शिक्षा और जीवनशैली में समुचित स्थान दिया जाए तो वे न केवल व्यक्तित्व का समग्र विकास करेंगी बल्कि समाज को अधिक संवेदनशील, रचनात्मक और संतुलित बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
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डॉ लीना मिश्र प्रख्यात शिक्षाविद, कला-लेखिका एवं अनुवादक हैं। ‘कला दीर्घा’ अंतर्राष्ट्रीय दृश्यकला पत्रिका की प्रकाशक डॉ मिश्र ने अनेक समसामयिक साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिकाओं और समाचार-पत्रों में शिक्षा, कला, साहित्य और संस्कृति को समर्पित दस्तावेजी और प्रेरक आलेखों द्वारा नियमित अवदान दिया है। ‘कला दीर्घा’ अंतर्राष्ट्रीय दृश्यकला पत्रिका के बैनर तले अनेक महत्त्वपूर्ण कला-गतिविधियों का नियमित आयोजन उल्लेखनीय उपलब्धि रही है। सम्प्रति - बालिका विद्यालय इंटरमीडिएट कॉलेज, मोतीनगर, लखनऊ की प्रधानाचार्य हैं। ब्लॉग : drleenamisra.blogspot.com और मोबाइल नंबर : 9839126836