Undersea Internet Cables: समुद्र के नीचे है इंटरनेट की असली दुनिया, 17 लाख KM केबल का पूरा राज

Undersea Internet Cables: इंटरनेट का 99% से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय डेटा समुद्र के नीचे बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबलों से गुजरता है। जानिए ये केबल कैसे काम करती हैं, कौन बिछाता है और भारत कितना जुड़ा है

Update:2026-08-10 16:02 IST

Undersea Internet Cables Explained in Hindi

Undersea Internet Cables: जब कोई व्यक्ति अपने मोबाइल पर WhatsApp संदेश भेजता है, YouTube का वीडियो देखता है, Google पर खोज करता है, Netflix खोलता है, विदेश में किसी व्यक्ति को वीडियो कॉल करता है या बैंक से अंतरराष्ट्रीय भुगतान करता है, तो उसे लगता है कि पूरी प्रक्रिया ‘वायरलेस’ है। फोन में कोई तार नहीं लगा, घर का Wi-Fi हवा में संकेत भेज रहा है, मोबाइल 5G नेटवर्क से जुड़ा है और आज Starlink जैसे उपग्रह भी इंटरनेट दे रहे हैं; इसलिए स्वाभाविक धारणा बनती है कि आधुनिक इंटरनेट मुख्यतः रेडियो तरंगों और उपग्रहों से चलता होगा। वास्तविकता लगभग उलटी है। आपके हाथ से फोन तक और फोन से मोबाइल टावर या Wi-Fi राउटर तक का अंतिम हिस्सा वायरलेस हो सकता है, लेकिन यदि डेटा को भारत से अमेरिका, यूरोप, सिंगापुर, जापान या किसी दूसरे महाद्वीप तक जाना है, तो उसकी मुख्य यात्रा आम तौर पर समुद्र के तल पर बिछी अत्यंत पतली लेकिन असाधारण क्षमता वाली फाइबर-ऑप्टिक केबलों से होती है। अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ, यानी ITU, इन समुद्री केबलों को वैश्विक संचार की रीढ़ बताता है और उसके अनुसार दुनिया के 99 प्रतिशत से अधिक अंतरराष्ट्रीय डेटा का आदान-प्रदान इन्हीं के माध्यम से होता है। 2025 में ITU ने लगभग 500 समुद्री दूरसंचार केबलों के वैश्विक नेटवर्क की लंबाई 17 लाख किलोमीटर से अधिक बताई थी, जबकि 2026 के TeleGeography मानचित्र में सक्रिय और नियोजित प्रणालियों सहित 694 केबल प्रणालियाँ और 1,893 लैंडिंग स्टेशन दर्ज किए गए। इसलिए इंटरनेट को “क्लाउड” कहने की लोकप्रिय भाषा जितनी हल्की और हवाई लगती है, उसका भौतिक आधार उतना ही भारी और समुद्र के तल से जुड़ा हुआ है।

एक सदी पुराना इतिहास

यह व्यवस्था नई नहीं है। समुद्र के नीचे तार बिछाने का इतिहास इंटरनेट से एक सदी से भी पुराना है। उन्नीसवीं शताब्दी में जब टेलीग्राफ ने संचार क्रांति शुरू की, तब सबसे बड़ी समस्या महाद्वीपों के बीच संदेश पहुँचाने की थी। जहाज से पत्र पहुँचने में कई दिन या सप्ताह लगते थे। 1850 के दशक में यूरोप के आसपास छोटी समुद्री टेलीग्राफ केबलें बिछाई गईं और 1858 में अटलांटिक महासागर के पार पहली टेलीग्राफ केबल स्थापित करने का ऐतिहासिक प्रयास हुआ। शुरुआती केबल तकनीकी समस्याओं के कारण लंबे समय तक नहीं चली, लेकिन 1866 में स्थायी ट्रांस-अटलांटिक टेलीग्राफ संपर्क स्थापित हो गया। इससे पहली बार यूरोप और अमेरिका के बीच संदेश कुछ मिनटों में पहुँचने लगे। आगे चलकर टेलीफोन के लिए समुद्री केबलें आईं और बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में तांबे की जगह प्रकाश-आधारित फाइबर-ऑप्टिक तकनीक ने समुद्री संचार की क्षमता को विस्फोटक रूप से बढ़ा दिया। आज की समुद्री इंटरनेट केबल उसी डेढ़ सौ वर्ष पुराने विचार का अत्याधुनिक रूप है, अंतर केवल इतना है कि पुराने तार पर कुछ शब्दों का टेलीग्राफ संदेश जाता था और आज कुछ ऑप्टिकल फाइबरों से प्रति सेकंड दर्जनों या सैकड़ों टेराबिट डेटा भेजा जा सकता है।

फाइबर ऑप्टिक कोर

आधुनिक समुद्री केबल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसका फाइबर-ऑप्टिक कोर है। इंटरनेट डेटा विद्युत धारा के रूप में हजारों किलोमीटर समुद्र के नीचे नहीं दौड़ता; वह प्रकाश के अत्यंत तेज और नियंत्रित संकेतों में बदलकर बाल से भी पतले काँच के रेशों से गुजरता है। एक ही फाइबर में अलग-अलग तरंगदैर्ध्य, यानी अलग “रंगों” के प्रकाश का उपयोग करके एक साथ अनेक डेटा धाराएँ भेजी जा सकती हैं। इसे तरंगदैर्ध्य विभाजन तकनीक के रूप में समझा जा सकता है। यही कारण है कि अपेक्षाकृत कम संख्या में फाइबर भी असाधारण डेटा क्षमता दे सकते हैं। Google की Curie नामक निजी समुद्री केबल इसका एक उदाहरण है। अमेरिका से चिली तक लगभग 10,500 किलोमीटर लंबी इस केबल में केवल चार फाइबर जोड़े थे, लेकिन Google ने इसके लिए 72 टेराबिट प्रति सेकंड की क्षमता घोषित की थी। आधुनिक प्रणालियाँ इससे कहीं अधिक क्षमता के लिए डिजाइन की जा सकती हैं।

असली केबल बेहद पतली

यदि समुद्री केबल को काटकर देखा जाए तो बाहर से वह मोटी धातु की पाइप जैसी लग सकती है, लेकिन उसका वास्तविक डेटा ले जाने वाला काँच का हिस्सा बहुत छोटा होता है। फाइबर के चारों ओर सुरक्षात्मक परतें, जलरोधी सामग्री, तांबे या अन्य विद्युत चालक की परत और परिस्थितियों के अनुसार स्टील के मजबूत तार लगाए जाते हैं। तट के पास, जहाँ मछली पकड़ने वाले जहाज, लंगर और समुद्री गतिविधि का खतरा अधिक होता है, केबल को अधिक मोटा और कवचयुक्त बनाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय केबल संरक्षण समिति के अनुसार स्टील के कवच वाले तार केबल को यांत्रिक शक्ति और सुरक्षा देते हैं और ऐसी भारी सुरक्षा मुख्यतः उथले समुद्र में इस्तेमाल की जाती है। गहरे महासागर में, जहाँ जहाज का लंगर और अधिकांश मछली पकड़ने के उपकरण नहीं पहुँचते, केबल अपेक्षाकृत पतली हो सकती है क्योंकि वहाँ उसे भारी कवच की उतनी जरूरत नहीं होती।

समुद्र में हजारों किलोमीटर तक प्रकाश भेजने की एक समस्या यह है कि फाइबर में चलते हुए प्रकाश संकेत धीरे-धीरे कमजोर होता जाता है। इसे क्षीणन कहा जाता है। इसलिए लंबी दूरी की समुद्री केबल में नियमित अंतराल पर “रिपीटर” या ऑप्टिकल एम्प्लीफायर लगाए जाते हैं जो कमजोर हो चुके प्रकाश संकेत को पुनः मजबूत करते हैं। ये उपकरण समुद्र के तल पर दशकों तक पड़े रहते हैं और उन्हें बिजली भी चाहिए होती है। इसी कारण समुद्री फाइबर केबल के भीतर केवल काँच के रेशे नहीं होते, बल्कि एक विद्युत चालक भी होता है जिसके माध्यम से तट पर मौजूद पावर-फीडिंग उपकरण हजारों किलोमीटर तक रिपीटरों को विद्युत धारा पहुँचाते हैं। ITU की परिभाषा में आधुनिक समुद्री फाइबर प्रणाली में टर्मिनल उपकरण, बिजली आपूर्ति उपकरण, ऑप्टिकल फाइबर, रिपीटर और आवश्यकता होने पर शाखा इकाइयाँ शामिल होती हैं। शाखा इकाई के माध्यम से एक मुख्य समुद्री केबल से अलग-अलग देशों या द्वीपों की ओर शाखाएँ निकाली जा सकती हैं।

लैंडिंग स्टेशन से आगे बढ़ती है यात्रा

इस पूरी संरचना का एक सिरा किसी समुद्र तट पर समाप्त नहीं हो जाता। जिस स्थान पर समुद्री केबल जमीन तक पहुँचती है, वहाँ एक विशेष “केबल लैंडिंग स्टेशन” बनाया जाता है। यह ऐसा सुरक्षित दूरसंचार केंद्र होता है जहाँ समुद्र से आने वाला ऑप्टिकल संकेत भूमि-आधारित दूरसंचार नेटवर्क, डेटा केंद्र और इंटरनेट बैकबोन में प्रवेश करता है। SubmarineNetworks की परिभाषा के अनुसार लैंडिंग स्टेशन वही स्थल है जहाँ समुद्री केबल समाप्त होकर स्थानीय या स्थलीय नेटवर्क से जुड़ती है और विशेष टर्मिनल उपकरण समुद्री संकेतों को घरेलू दूरसंचार प्रणाली के साथ जोड़ते हैं। इसलिए किसी देश के लिए समुद्री केबल का मूल्य केवल समुद्र में तार होने से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होता है कि उसके पास कितने अलग लैंडिंग स्थल हैं, वे किन नेटवर्कों से जुड़े हैं और किसी एक स्थान पर दुर्घटना होने पर डेटा दूसरे मार्ग से भेजा जा सकता है या नहीं।

भारत की स्थिति

भारत इस वैश्विक जाल का महत्वपूर्ण हिस्सा है। देश की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वह यूरोप और मध्य पूर्व से पूर्वी तथा दक्षिण-पूर्व एशिया जाने वाले समुद्री मार्गों के बीच स्वाभाविक संपर्क बिंदु बन सकता है। भारत में मुंबई और चेन्नई ऐतिहासिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण समुद्री केबल केंद्र रहे हैं, जबकि कोच्चि, तूतीकोरिन और तिरुवनंतपुरम जैसे तटीय क्षेत्र भी लैंडिंग नेटवर्क का हिस्सा बन रहे हैं। 2025 की उद्योग रिपोर्टों में भारत में लगभग 17 अंतरराष्ट्रीय समुद्री केबल प्रणालियाँ और 14 अलग लैंडिंग स्टेशन बताए गए थे। टाटा कम्युनिकेशंस के मुंबई में तीन और चेन्नई तथा कोच्चि में एक-एक लैंडिंग स्टेशन दर्ज हैं। हाल के वर्षों में रिलायंस जियो, एयरटेल, टाटा कम्युनिकेशंस तथा अन्य कंपनियाँ नई प्रणालियों में निवेश कर रही हैं।

भारत से जुड़ी नई पीढ़ी की महत्वपूर्ण प्रणालियों में India-Asia-Xpress यानी IAX है, जो मुंबई और चेन्नई को सिंगापुर तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के दूसरे स्थानों से जोड़ती है और मुंबई में India-Europe-Xpress से जुड़कर मध्य पूर्व, अफ्रीका और यूरोप की दिशा में संपर्क बढ़ाती है। जुलाई 2026 में India-Southeast Asia, यानी I-2SEA नामक लगभग 3,600 किलोमीटर लंबी नई समुद्री केबल परियोजना के निर्माण समझौते भी हुए, जिसमें Lightstorm, Microsoft, Singtel और Tata Communications साझेदार हैं। इससे एक महत्वपूर्ण बात समझ में आती है—इन केबलों का मालिक कोई एक “विश्व इंटरनेट प्राधिकरण” नहीं होता। अलग-अलग केबलों की मालिकाना संरचना अलग होती है। कुछ एक कंपनी की होती हैं, कुछ कई दूरसंचार कंपनियों के संयुक्त संघ की, और कुछ में तकनीकी कंपनियाँ, क्लाउड सेवा कंपनियाँ तथा दूरसंचार समूह मिलकर निवेश करते हैं।

कौन कई समुद्री केबल का मालिक?

समुद्री केबलों के स्वामित्व का इतिहास भी इंटरनेट अर्थव्यवस्था के बदलने की कहानी है। पहले मुख्य निवेशक राष्ट्रीय टेलीफोन कंपनियाँ और दूरसंचार ऑपरेटर होते थे। उदाहरण के लिए अलग-अलग देशों की दूरसंचार कंपनियाँ एक संघ बनाकर लागत बाँटती थीं और प्रत्येक कंपनी को केबल की निश्चित क्षमता मिलती थी। लेकिन Google, Meta, Microsoft और Amazon जैसी विशाल इंटरनेट और क्लाउड कंपनियों के उभार के बाद समीकरण बदल गया। ये कंपनियाँ इतनी बड़ी मात्रा में डेटा अपने डेटा केंद्रों के बीच भेजती हैं कि केवल दूरसंचार कंपनियों से क्षमता किराए पर लेना हमेशा पर्याप्त या आर्थिक रूप से सर्वोत्तम नहीं रहा। इसलिए उन्होंने स्वयं समुद्री केबलों में प्रत्यक्ष निवेश शुरू किया। Google ने 2018 में बताया था कि वह उस समय 11 समुद्री केबलों में प्रत्यक्ष निवेश कर चुका था और अनेक अन्य केबलों पर क्षमता किराए पर लेता था; Curie के साथ वह निजी अंतरमहाद्वीपीय समुद्री केबल बनाने वाली पहली बड़ी गैर-दूरसंचार कंपनी बनी।

इस बदलाव के पीछे केवल लागत नहीं, नियंत्रण और विश्वसनीयता भी है। यदि Google को YouTube, Gmail, Search और Google Cloud का डेटा अमेरिका, यूरोप, दक्षिण अमेरिका और एशिया के डेटा केंद्रों में लगातार स्थानांतरित करना है, तो अपनी केबल या उसमें प्रत्यक्ष हिस्सेदारी होने से वह मार्ग, क्षमता और अतिरिक्त वैकल्पिक रास्ते बेहतर ढंग से नियोजित कर सकता है। Grace Hopper, Curie, Sol, Nuvem और अन्य Google निवेश इसी बड़ी रणनीति का हिस्सा हैं। 2025 में Google ने Sol नामक नई ट्रांस-अटलांटिक केबल की घोषणा की जो अमेरिका को Bermuda, Azores और Spain से जोड़ेगी और दूसरी प्रणालियों के साथ वैकल्पिक संपर्क बनाएगी। आज समुद्री केबल इसलिए केवल दूरसंचार कंपनियों की संपत्ति नहीं रह गई हैं; वे क्लाउड और कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थव्यवस्था की रणनीतिक पूँजी बन चुकी हैं।

कैसे बिछाई जाती है केबल?

लेकिन इतनी लंबी केबल आखिर समुद्र के तल पर बिछाई कैसे जाती है? यह प्रक्रिया किसी जहाज से साधारण तार खोलते हुए आगे बढ़ जाने जितनी सरल नहीं है। सबसे पहले वर्षों पहले संभावित मार्ग का विस्तृत सर्वेक्षण किया जाता है। समुद्र की गहराई, तल की मिट्टी, चट्टानें, भूकंपीय क्षेत्र, पानी के भीतर पहाड़, ज्वालामुखीय क्षेत्र, दूसरे केबल मार्ग, पाइपलाइन, समुद्री संरक्षित क्षेत्र, बंदरगाह, मछली पकड़ने वाले क्षेत्र और लंगर डालने वाली जगहें देखी जाती हैं। ITU के अनुसार केबल बिछाने से पहले मार्ग सर्वेक्षण किया जाता है ताकि उपयुक्त रास्ता और सुरक्षा विधि तय हो सके। फिर केबल को विशेष केबल जहाज में विशाल गोल टैंकों में हजारों किलोमीटर लंबाई में सावधानी से लपेटकर रखा जाता है। जहाज में ऐसे उपकरण होते हैं जो उसकी गति और केबल छोड़ने की गति को बिल्कुल समन्वित रखते हैं, ताकि समुद्र के तल पर केबल न अत्यधिक खिंचे और न इतनी ढीली पड़े कि बाद में समस्या हो।

तट के पास सबसे कठिन काम होता है, क्योंकि यहीं जहाज, मछली पकड़ना, बंदरगाह, लहरें और मानव गतिविधि सबसे अधिक होती हैं। किनारे के निकट केबल को कई मामलों में समुद्र तल की मिट्टी के अंदर दबाया जाता है। विशेष समुद्री हल या पानी के तेज जेट से तल में खाई बनाई जाती है और केबल उसमें डाल दी जाती है। International Cable Protection Committee के दिशानिर्देशों के अनुसार जोखिम वाले उथले क्षेत्रों में केबल लगभग आधा मीटर से तीन मीटर तक दबाई जा सकती है, जहाँ समुद्र तल की स्थिति इसकी अनुमति दे। गहरे समुद्र में अक्सर केवल जहाज से नियंत्रित तरीके से केबल को तल पर रखा जाता है। हजारों मीटर गहराई में वह समुद्र तल पर लगभग बिना किसी मानवीय संपर्क के दशकों तक रह सकती है।

इस काम में विशेष “केबल जहाज” अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। ये सामान्य मालवाहक जहाज नहीं हैं। इनके अंदर विशाल केबल टैंक, केबल नियंत्रित करने वाली मशीनें, समुद्र में केबल छोड़ने और वापस खींचने वाले बड़े पहिये, जोड़ बनाने की प्रयोगशाला, गहरे समुद्र के उपकरण और प्रशिक्षित इंजीनियर होते हैं। ITU के तकनीकी मानक बताते हैं कि यही जहाज नई ऑप्टिकल केबल बिछाने के साथ खराब केबलों की मरम्मत भी करते हैं। जहाज की मशीन इस बात को नियंत्रित करती है कि जितनी गति से जहाज आगे बढ़ रहा है, उसी अनुपात में केबल बाहर निकले। समुद्र की गहराई कई किलोमीटर हो सकती है, इसलिए जहाज का स्थान और केबल का तनाव अत्यंत सटीक रखना पड़ता है।

अरबों रुपये की लागत

किसी समुद्री केबल के निर्माण की लागत अरबों रुपये हो सकती है और लंबा अंतरमहाद्वीपीय तंत्र कई सौ मिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है। इसी कारण एक कंपनी के बजाय कई कंपनियाँ “कंसोर्टियम” बनाकर इसे विकसित करती रही हैं। प्रत्येक साझेदार पूँजी देता है और बदले में निश्चित फाइबर जोड़ी या डेटा क्षमता का अधिकार प्राप्त कर सकता है। कुछ कंपनियाँ पूरी केबल की मालिक नहीं होतीं, बल्कि दीर्घकालीन उपयोग अधिकार खरीदती हैं। दूरसंचार जगत में इसे Indefeasible Right of Use जैसे अनुबंधों के माध्यम से व्यवस्थित किया जा सकता है। इसलिए “इस केबल का मालिक कौन है?” का उत्तर कई बार एक कंपनी का नाम नहीं, बल्कि दस-पंद्रह साझेदारों की सूची होता है। दूसरे मामलों में Google जैसी कंपनी पूरी निजी केबल की मुख्य मालिक हो सकती है, जबकि लैंडिंग वाले देशों में स्थानीय साझेदार और नियामकीय व्यवस्था अलग होती है।

उपग्रह से भी ज्यादा तेज समुद्री केबल

यहाँ यह प्रश्न बहुत स्वाभाविक है कि जब 5G, Wi-Fi और उपग्रह इंटरनेट मौजूद हैं तो इतनी महँगी केबलों की जरूरत आखिर क्यों है। पहला कारण क्षमता है। फाइबर की डेटा क्षमता उपग्रह संपर्क से बहुत अधिक हो सकती है। एक आधुनिक समुद्री केबल प्रणाली अनेक टेराबिट प्रति सेकंड डेटा ले जा सकती है और नई प्रणालियाँ बढ़ती तकनीक के साथ और अधिक क्षमता प्राप्त करती रहती हैं। दूसरा कारण लागत है। एक बार केबल बिछ जाने के बाद विशाल मात्रा का डेटा प्रति बिट बहुत कम लागत में भेजा जा सकता है। तीसरा कारण विलंब है—डेटा को समुद्र के नीचे फाइबर से भेजना कई अंतरमहाद्वीपीय मार्गों पर उपग्रह की तुलना में बहुत कम समय ले सकता है, विशेष रूप से पुराने भूस्थिर उपग्रहों के मुकाबले। चौथा कारण स्थिरता और निरंतर क्षमता है। यही वजह है कि ITU आज भी बताता है कि अंतरराष्ट्रीय डेटा का 99 प्रतिशत से अधिक समुद्री दूरसंचार केबलों से गुजरता है और सामान्य अंतरराष्ट्रीय संचार में उपग्रहों की हिस्सेदारी बहुत छोटी है।

लो-अर्थ-ऑर्बिट उपग्रह प्रणालियाँ, जैसे Starlink, इस तुलना को कुछ हद तक बदल रही हैं क्योंकि वे भूस्थिर उपग्रहों की तुलना में पृथ्वी के बहुत करीब होते हैं और कम विलंब दे सकते हैं। वे दूरदराज, पहाड़ी, द्वीपीय या आपदा-प्रभावित क्षेत्रों में असाधारण रूप से उपयोगी हो सकती हैं जहाँ फाइबर पहुँचाना कठिन है। लेकिन यदि मुंबई, लंदन, न्यूयॉर्क, सिंगापुर और टोक्यो जैसे डेटा केंद्रों के बीच प्रतिदिन विशाल मात्रा में क्लाउड, वीडियो, बैंक और AI डेटा भेजना हो, तो समुद्री फाइबर का प्रति बिट अर्थशास्त्र और क्षमता अभी कहीं अधिक अनुकूल है। इसलिए उपग्रह समुद्री केबल का पूर्ण विकल्प नहीं, बल्कि कई मामलों में उसका पूरक है। उपग्रह अंतिम या दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँच देता है; वैश्विक डेटा महासागर का अधिकांश भारी प्रवाह अब भी भौतिक फाइबर से गुजरता है।

हिफाज़त की चुनौती

समुद्री केबल इतनी महत्वपूर्ण होने के बावजूद आश्चर्यजनक रूप से पतली और असुरक्षित दिख सकती है। गहरे समुद्र में कई केबल बगीचे की मोटी नली के आसपास के व्यास की हो सकती हैं; किनारे के पास कवच के कारण वे अधिक मोटी होती हैं। फिर उन्हें कोई जानवर क्यों नहीं खा जाता और समुद्र का दबाव क्यों नहीं कुचल देता? फाइबर और सुरक्षात्मक परतें दबाव के लिए डिजाइन की जाती हैं और समुद्र की गहराई में स्वयं केबल के भीतर बड़े खाली स्थान नहीं होते जिन्हें पानी का दबाव सामान्य पाइप की तरह कुचल दे। शार्क द्वारा केबल काटने की कहानियाँ लोकप्रिय हैं, लेकिन आधुनिक समुद्री केबलों की वास्तविक सबसे बड़ी समस्या शार्क नहीं, मनुष्य है। ITU के अनुसार दुनिया भर में औसतन 150 से 200 समुद्री केबल खराबियाँ हर वर्ष रिपोर्ट होती हैं। International Cable Protection Committee के लंबे अध्ययन बताते हैं कि अधिकांश दोष मछली पकड़ने के उपकरण और जहाजों के लंगर के कारण होते हैं।

यह सुनना आश्चर्यजनक लग सकता है कि महासागर के तल पर पड़ी तकनीक के लिए जहाज का लंगर इतना बड़ा खतरा है, लेकिन अधिकांश नुकसान गहरे महासागर में नहीं बल्कि तट के पास होता है। बंदरगाह क्षेत्र में जहाज का भारी लंगर कई मीटर समुद्री तल में धँस सकता है और यदि वह केबल पर गिरकर घिसट जाए तो स्टील कवच भी टूट सकता है। इसी तरह समुद्र तल पर खिंचने वाले मछली पकड़ने के भारी जाल और ट्रॉल उपकरण केबल में फँस सकते हैं। International Cable Protection Committee के अनुसार ऐतिहासिक रूप से लगभग दो-तिहाई या उससे अधिक केबल खराबियाँ मछली पकड़ने और लंगर से जुड़ी रही हैं। इसी वजह से उथले जल में केबल को जमीन के भीतर दबाना और उसके ऊपर कवच लगाना इतना महत्वपूर्ण है।

प्राकृतिक आपदाएँ दूसरा महत्वपूर्ण जोखिम हैं। भूकंप, समुद्र तल के भूस्खलन, ज्वालामुखी और शक्तिशाली समुद्री धाराएँ एक ही क्षेत्र में कई केबलें तोड़ सकती हैं। यह अकेले एक केबल टूटने से अधिक गंभीर स्थिति है, क्योंकि इंटरनेट की विश्वसनीयता इस सिद्धांत पर बनी है कि यदि एक मार्ग बंद हो तो डेटा दूसरे मार्ग से भेज दिया जाए। सामान्यतः किसी एक समुद्री केबल के कट जाने पर पूरा देश ऑफलाइन नहीं हो जाता; इंटरनेट राउटिंग प्रणाली ट्रैफिक को वैकल्पिक केबलों पर स्थानांतरित कर सकती है। समस्या तब होती है जब किसी देश के पास बहुत कम लैंडिंग मार्ग हों या एक भूकंप, जहाज दुर्घटना या संघर्ष एक साथ कई महत्वपूर्ण मार्गों को प्रभावित कर दे। इसी कारण ITU ने समुद्री केबलों की संकट सहने की क्षमता, को वैश्विक नीति का महत्वपूर्ण विषय बनाया है और 2024 में एक अंतरराष्ट्रीय सलाहकारी निकाय भी बनाया गया।

केबल की मरम्मत कैसे होती है?

जब केबल टूटती है तो समुद्र के भीतर जाकर कोई गोताखोर सामान्यतः उसे जोड़ने नहीं जाता, क्योंकि खराबी हजारों मीटर गहराई पर हो सकती है। पहले नेटवर्क निगरानी उपकरण विद्युत और ऑप्टिकल परीक्षणों से खराब हिस्से की स्थिति का अनुमान लगाते हैं। फिर निकटतम मरम्मत जहाज उस क्षेत्र तक पहुँचता है। जहाज विशेष ग्रैपल उपकरण से समुद्र तल से केबल को पकड़कर ऊपर खींच सकता है। खराब हिस्सा काटा जाता है, नया केबल खंड जोड़ा जाता है, जोड़ का परीक्षण होता है और फिर पूरी संरचना वापस समुद्र में छोड़ दी जाती है। ITU समुद्री केबल डिजाइन में ही यह शर्त रखता है कि केबल और उसके जोड़ जहाज से पुनः उठाए और मरम्मत किए जा सकें। यह प्रक्रिया मौसम, दूरी और जहाज उपलब्धता पर निर्भर होने के कारण कई दिन या सप्ताह ले सकती है।

इंटरनेट के लिए सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा तकनीक इसलिए “केबल कभी न टूटे” नहीं, बल्कि मार्गों की बहुलता है। बड़ी तकनीकी और दूरसंचार कंपनियाँ एक ही महाद्वीप के बीच कई अलग समुद्री रास्तों में निवेश करती हैं। यदि एक केबल मिस्र या लाल सागर के रास्ते जाती है, दूसरी किसी दूसरे भूगोल से जा सकती है। यदि एक ट्रांस-अटलांटिक केबल ब्रिटेन में उतरती है तो दूसरी स्पेन या पुर्तगाल में उतर सकती है। Google ने अपनी नई केबलों के संदर्भ में खुलकर कहा है कि अलग मार्गों का उद्देश्य “resiliency” बढ़ाना है। इंटरनेट का वैश्विक नेटवर्क इसीलिए जाल की तरह बनाया जाता है, न कि एक सीधी तार की तरह।

रणनीतिक चिंता का विषय

समुद्री केबल इसलिए भू-राजनीति का विषय भी बन चुकी है। बीसवीं शताब्दी में तेल पाइपलाइन और समुद्री व्यापार मार्ग रणनीतिक संपत्ति थे; इक्कीसवीं शताब्दी में डेटा के समुद्री रास्ते भी उसी स्तर की रणनीतिक चिंता बन रहे हैं। किस देश में केबल उतरती है, उसका निर्माण किस कंपनी ने किया, कौन-सी दूरसंचार कंपनी उसका संचालन करती है, डेटा किस मार्ग से जाता है और युद्ध या राजनीतिक तनाव में कौन-सा रास्ता बंद हो सकता है—ये प्रश्न अब राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हैं। ITU ने भी समुद्री केबलों को वित्तीय लेनदेन, क्लाउड कम्प्यूटिंग और सरकारी संचार जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं के आधार के रूप में वर्णित हैं।

इसी कारण समुद्री केबल को काटना केवल किसी टेलीफोन लाइन को नुकसान पहुँचाना नहीं है। यदि किसी छोटे द्वीपीय देश की दो ही अंतरराष्ट्रीय केबलें हों और दोनों टूट जाएँ तो बैंकिंग, विमान सेवा, सरकारी व्यवस्था, क्लाउड सेवाएँ और सामान्य इंटरनेट गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं। बड़े देशों के पास अधिक वैकल्पिक मार्ग होते हैं, फिर भी किसी महत्वपूर्ण क्षेत्र में कई केबलों की एक साथ विफलता से गति और क्षमता पर बड़ा असर पड़ सकता है। फरवरी 2024 में लाल सागर क्षेत्र की कई समुद्री केबलों के नुकसान जैसी घटनाओं ने फिर यह दिखाया कि दुनिया के डेटा मार्ग कुछ सीमित समुद्री गलियारों पर कितने निर्भर हैं। यही वजह है कि कंपनियाँ केवल अधिक क्षमता ही नहीं, भौगोलिक रूप से अलग-अलग मार्गों पर भी पैसा खर्च करती हैं।

सरकारें भी कर रहीं निवेश

कई देशों में सरकारी दूरसंचार कंपनियों और राष्ट्रीय ऑपरेटरों ने समुद्री केबलों में निवेश किया है, लेकिन इंटरनेट की वैश्विक प्रकृति के कारण निजी क्षेत्र की भूमिका बहुत बड़ी है। एक समुद्री केबल कई देशों को जोड़ती है, इसलिए उसे अनेक कानूनी अनुमतियाँ, समुद्री सर्वेक्षण, लैंडिंग लाइसेंस और दूरसंचार समझौते चाहिए होते हैं। एक अंतरराष्ट्रीय कंसोर्टियम लागत और जोखिम बाँट सकता है। पिछले दशक में क्लाउड कंपनियों का निवेश इसलिए बढ़ा क्योंकि इंटरनेट ट्रैफिक का बड़ा भाग अब स्वयं उनकी सेवाओं से पैदा होता है। Google, Meta, Microsoft और Amazon के डेटा केंद्र दुनिया भर में फैले हैं और AI ने डेटा केंद्रों के बीच विशाल क्षमता की मांग और बढ़ा दी है। TeleGeography के 2026 पूर्वानुमान के अनुसार 2026 से 2029 के बीच सेवा में आने वाली नियोजित नई समुद्री केबलों में 16 अरब डॉलर से अधिक का निवेश अपेक्षित है।

और यह विस्तार रुकने वाला नहीं है। TeleGeography ने जुलाई 2026 में अनुमान लगाया कि 2026 से 2035 के बीच दुनिया में लगभग 10.1 लाख किलोमीटर नई समुद्री केबलें जोड़ी जा सकती हैं। यानी अगले दस वर्षों में जितनी नई केबल बिछने की संभावना है, वह पृथ्वी से चंद्रमा तक आने-जाने की दूरी से भी अधिक होगी। यह विरोधाभास ध्यान देने योग्य है—दुनिया जितनी अधिक वायरलेस हो रही है, उतनी ही अधिक तारें समुद्र के नीचे बिछाई जा रही हैं। कारण यह है कि वायरलेस उपकरणों की संख्या बढ़ने से कुल डेटा कम नहीं, बल्कि बहुत अधिक बढ़ता है। हर नया 5G फोन, स्मार्ट टीवी, AI सेवा और क्लाउड एप्लिकेशन अंततः बैकबोन पर और अधिक फाइबर क्षमता की मांग पैदा करता है। वीडियो इस मांग का सबसे बड़ा स्रोतों में से एक रहा है। एक टेक्स्ट संदेश में कुछ किलोबाइट डेटा हो सकता है, लेकिन 4K वीडियो लगातार करोड़ों बिट प्रति सेकंड माँग सकता है। अब AI मॉडल, क्लाउड गेमिंग, वीडियो सम्मेलन और विशाल डेटा केंद्रों के बीच मशीन-से-मशीन ट्रैफिक नई मांग पैदा कर रहे हैं।

दो-ढाई दशक तक ही चलती है केबल

समुद्री केबलों का सामान्य जीवन लगभग दो से ढाई दशक माना जाता है, हालांकि कुछ इससे अधिक समय भी काम कर सकती हैं। कई बार पुरानी केबल तकनीकी रूप से पूरी तरह खराब नहीं होती, लेकिन नई प्रणालियाँ इतनी अधिक क्षमता देती हैं कि पुरानी केबल आर्थिक रूप से अप्रभावी हो जाती है। तब उसे सेवा से हटाया जा सकता है। कुछ परित्यक्त केबल समुद्र में रह जाती हैं, जबकि कुछ को निकालकर धातु और अन्य सामग्री पुनर्चक्रित की जाती है। उद्योग में ऐसी कंपनियाँ भी मौजूद हैं जो निष्क्रिय समुद्री केबलों को निकालने और पुनर्चक्रण का काम करती हैं।

भारत के लिए आने वाले वर्षों में समुद्री केबलों का महत्व और बढ़ेगा। देश जितना अधिक क्लाउड, डिजिटल भुगतान, डेटा केंद्र, AI, सॉफ्टवेयर निर्यात और वैश्विक डिजिटल सेवाओं का केंद्र बनेगा, उतना ही अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क क्षमता और वैकल्पिक मार्ग महत्वपूर्ण होंगे। केवल अधिक केबल होना पर्याप्त नहीं; अलग-अलग तटों पर लैंडिंग, अलग समुद्री मार्ग और देश के भीतर मजबूत फाइबर बैकहॉल भी जरूरी है। यदि सारी क्षमता मुंबई के कुछ स्थानों पर केंद्रित हो तो वह भौगोलिक जोखिम पैदा करती है। इसी कारण चेन्नई, कोच्चि, तिरुवनंतपुरम और दूसरे तटीय क्षेत्रों में नए लैंडिंग मार्ग रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं।

समुद्री इंटरनेट केबलों की सबसे असाधारण बात शायद यह है कि वे दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण अवसंरचनाओं में शामिल हैं, लेकिन आम आदमी उन्हें कभी देखता नहीं। हम हवाई अड्डे देखते हैं, राजमार्ग देखते हैं, बिजली के टावर देखते हैं, रेल लाइनें देखते हैं और मोबाइल टावर देखते हैं; लेकिन जिस प्रणाली पर अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग, शेयर बाजार, सरकारी संचार, सोशल मीडिया, वीडियो कॉल, ई-कॉमर्स और क्लाउड कम्प्यूटिंग निर्भर हैं, उसका अधिकांश हिस्सा कई हजार मीटर पानी के नीचे पड़ा है। समुद्र के उस अंधेरे तल पर कोई स्क्रीन, सर्वर रूम या विशाल मशीन नहीं होती,केवल अपेक्षाकृत पतली फाइबर केबल और बीच-बीच में ऑप्टिकल एम्प्लीफायर होते हैं। और उन्हीं काँच के रेशों के भीतर प्रकाश की छोटी-छोटी धड़कनों के रूप में हमारी आधुनिक सभ्यता की बातचीत चलती रहती है।

वायरलेस इन्टरनेट की रीढ़ है केबल

इसलिए “वायरलेस का जमाना है, फिर केबल क्यों?” का सबसे सरल उत्तर यह है कि वायरलेस इंटरनेट अंतिम कड़ी है, फाइबर उसका मेरुदंड है। मोबाइल फोन से टावर तक हवा है, लेकिन टावरों को आपस में और देशों को देशों से जोड़ने के लिए भारी मात्रा में डेटा को किसी अधिक क्षमता वाले माध्यम की आवश्यकता होती है। फाइबर-ऑप्टिक केबल आज उस काम का सबसे प्रभावी माध्यम है। उपग्रह महत्वपूर्ण हैं लेकिन वैश्विक डेटा का विशाल बहुमत अभी भी समुद्री फाइबर पर चलता है। ITU का 99 प्रतिशत से अधिक अंतरराष्ट्रीय डेटा वाला आँकड़ा इसी वास्तविकता को संक्षेप में दिखाता है।

अंततः इंटरनेट का सबसे बड़ा भ्रम शायद यही है कि उसे हम अदृश्य समझते हैं। हमें स्क्रीन पर केवल एक चिन्ह दिखाई देता है—Wi-Fi, 5G या cloud—लेकिन उसके पीछे पृथ्वी का विशाल भौतिक ढाँचा खड़ा है: डेटा केंद्र, बिजलीघर, स्थलीय फाइबर, समुद्री लैंडिंग स्टेशन, विशेष केबल जहाज, महासागर के तल पर बिछी लाखों किलोमीटर की काँच की नसें और उन्हें जोड़ने वाले हजारों रिपीटर। कोई एक कंपनी इस पूरे नेटवर्क की मालिक नहीं है। कुछ केबल दूरसंचार कंपनियों के समूहों की हैं, कुछ Google जैसी तकनीकी कंपनियों की निजी प्रणालियाँ हैं, कुछ में Microsoft, Tata Communications, Singtel या अन्य साझेदार निवेश करते हैं और कुछ की क्षमता अलग कंपनियाँ किराए पर लेती हैं। यही विकेंद्रीकृत मालिकाना और अनेक मार्ग इंटरनेट को एक साथ विशाल भी बनाते हैं और अपेक्षाकृत लचीला भी।

और शायद आधुनिक डिजिटल युग की सबसे सुंदर विडंबना यही है—हमारी दुनिया जितनी अधिक “वायरलेस” दिखाई देती है, उसके पीछे उतनी ही अधिक फाइबर बिछती जा रही है। आपका मोबाइल हवा में संकेत भेजता है, लेकिन दुनिया से उसकी असली बातचीत समुद्र के अंधेरे तल में पड़े काँच के बाल से भी पतले रेशों के भीतर प्रकाश की गति से होती है। इसलिए इंटरनेट का वास्तविक वैश्विक राजमार्ग आकाश में नहीं, समुद्र के नीचे है।

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