इतिहास, प्रेम और बेजोड़ इंजीनियरिंग का संगम: जानिए क्यों बेहद खास है बुरहानपुर का सफर
Burhanpur Tourism: मध्य प्रदेश का बुरहानपुर इतिहास, रोमांच और स्वाद का अनोखा संगम है। कुंडी भंडारा की भूमिगत जल प्रणाली, शाही किला और मावा जलेबी इस शहर की खास पहचान हैं।
Madhya Pradesh
Burhanpur Tourism: इंदौर से दक्षिण की ओर बढ़ते हुए सतपुड़ा की हरी-भरी पहाड़ियों की तलहटी में जब आप दाखिल होते हैं, तो ताप्ती नदी के किनारे बसा एक ऐसा ऐतिहासिक शहर अंगड़ाई लेता दिखता है, जहां हर पत्थर और सुरंग के पास अपनी एक दास्तान है। महाराष्ट्र की सीमा से सटा मध्य प्रदेश का बुरहानपुर उन घुमक्कड़ों के लिए एक मुकम्मल ठिकाना है, जो एक ही सफर में रोमांच, नायाब स्थापत्य, समृद्ध विरासत और लजीज खानपान का लुत्फ उठाना चाहते हैं। इंदौर से महज 180 किलोमीटर की दूरी पर बसा यह शहर आज भी मुगल दौर की भव्यता और दास्तान-ए-इश्क को समेटे हुए है।
कुंडी भंडारा: 400 साल पुरानी भूमिगत जल इंजीनियरिंग का करिश्मा
बुरहानपुर के सफर की सबसे रोमांचक शुरुआत शहर के विश्वप्रसिद्ध ‘कुंडी भंडारा’ से होती है। वर्ष 1615 में विकसित की गई यह मुगलकालीन जल प्रबंधन प्रणाली भारत के प्राचीन इंजीनियरिंग कौशल का बेजोड़ नमूना है। जमीन के नीचे करीब चार किलोमीटर लंबी सुरंगों और आपस में जुड़ी कुंडियों के नेटवर्क के जरिए पहाड़ियों से रिसने वाले प्राकृतिक पानी को पूरे शहर तक पहुंचाया जाता था। इस तकनीकी और ऐतिहासिक विशिष्टता के चलते ही कुंडी भंडारा यूनेस्को की विश्व धरोहरों की अस्थायी सूची में अपनी जगह बना चुका है। सैलानियों के लिए यहां लगाई गई कैप्सूल लिफ्ट के जरिए जमीन के कई फीट नीचे उतरकर बहती जलधारा और सुरंगों को करीब से देखना बेहद अनोखा और रोमांचकारी अनुभव साबित होता है।
शाही किला, हमाम और शाहजहां-मुमताज की दास्तान
इंजीनियरिंग के इस अजूबे को देखने के बाद कदम बढ़ते हैं ताप्ती के तट पर खड़े भव्य शाही किले की ओर। यह किला सिर्फ पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि मुगल सल्तनत के कई उतार-चढ़ावों और मोहब्बत के अफसानों का गवाह रहा है। किले के भीतर बना ‘शाही हमाम’ खास तौर पर बेगम मुमताज महल के लिए तैयार किया गया था, जिसकी नक्काशी और बनावट आज भी हैरान करती है। इतिहास के पन्नों के अनुसार, आगरा में ताजमहल के निर्माण से पूर्व मुमताज महल के पार्थिव शरीर को कुछ समय के लिए इसी बुरहानपुर की सरजमीं पर अमानत के तौर पर रखा गया था। शाम ढलते ही किले के प्राचीर से ताप्ती नदी पर डूबते सूरज का नजारा मन मोह लेता है।
दरबारी मिठास: मावा जलेबी और 'दराबा' का लाजवाब स्वाद
बुरहानपुर की यह ऐतिहासिक यात्रा तब तक मुकम्मल नहीं होती, जब तक कि यहां के पारंपरिक जायके का लुत्फ न लिया जाए। शहर की पहचान बन चुकी गाढ़ी रबड़ी या गरम दूध के साथ परोसी जाने वाली मावा जलेबी का स्वाद हर किसी को अपना दीवाना बना लेता है। इसके साथ ही खोपरा पाक, पोहा-सेव और खास 'दराबा' मिठाई का स्वाद चखना एक अलग ही अनुभव है। कहा जाता है कि दराबा कभी मुगलों के शाही दरबार की खास दावतों में परोसी जाती थी, और इसी ‘दरबार’ शब्द से इसका नाम ‘दराबा’ पड़ा।
जमीन के नीचे कल-कल बहता पानी, पहाड़ियों की छांव में खड़े किले, ताप्ती की लहरें और मुगलों के शाही किस्से-बुरहानपुर का हर कोना सैलानियों को वक्त के एक खूबसूरत सफर पर ले जाने के लिए तैयार रहता है।