BJP History in UP: कैसे बदली UP की सियासत? जनसंघ से BJP के शिखर तक का सफर

BJP History in Uttar Pradesh: उत्तर प्रदेश में भाजपा की पूरी राजनीतिक यात्रा जानिए—जनसंघ से 1991 की सत्ता, कल्याण सिंह, राम मंदिर आंदोलन, 2002-12 के हाशिये, मोदी-शाह की वापसी, योगी सरकार और 2024 के लोकसभा झटके तक।

Update:2026-08-09 19:16 IST

पुराने चुनावों में उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा था। लोकसभा सीटों की कुल संख्या वर्तमान 80 से अधिक थी। इसलिए 1999 से पहले की सीटों की सीधी तुलना वर्तमान उत्तर प्रदेश से सावधानीपूर्वक करनी चाहिए। चुनाव आयोग अपनी सांख्यिकीय रिपोर्टों में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के पूर्ण परिणाम उपलब्ध कराता है।

भाजपा ने कब किसके साथ चुनाव लड़ा?

वर्ष/चुनाव सहयोगी या गठबंधन परिणाम

1967 जनसंघ, संयुक्त विधायक दल चरण सिंह सरकार में भागीदारी

1977 जनता पार्टी में विलय उत्तर प्रदेश में 352 सीटें

1980–1993 भाजपा मुख्यतः अकेले 1991 में पूर्ण बहुमत

1995 बसपा को समर्थन मायावती पहली बार मुख्यमंत्री

1997 बसपा से छह-छह महीने का सत्ता समझौता मायावती के बाद कल्याण सिंह मुख्यमंत्री

2002 चुनाव बाद बसपा गठबंधन मायावती सरकार

2007 जदयू और अपना दल भाजपा 51 सीट

2009 सीमित एनडीए सहयोग लोकसभा में दस सीट

2014 अपना दल भाजपा 71, अपना दल दो

2017 अपना दल (सोनेलाल), सुभासपा भाजपा 312; एनडीए 325

2019 अपना दल; निषाद पार्टी का प्रत्याशी भाजपा चिह्न पर भाजपा 62, अपना दल दो

2022 अपना दल (सोनेलाल), निषाद पार्टी भाजपा 255; एनडीए 273

2024 रालोद, अपना दल, सुभासपा, निषाद पार्टी सहित एनडीए भाजपा 33; एनडीए 36

भाजपा की गठबंधन नीति दो अलग चरणों में विकसित हुई। 1990 के दशक में वह बसपा के साथ सरकार बनाने और गिराने वाली अस्थिर सत्ता-साझेदारी करती थी। 2014 के बाद उसने छोटी पिछड़ा वर्ग आधारित पार्टियों को सीटें और सत्ता में प्रतिनिधित्व देकर व्यापक हिंदू सामाजिक गठबंधन बनाया।

भाजपा कब-कब टूटी?

जनता पार्टी से अलगाव—1980

भाजपा का जन्म स्वयं जनता पार्टी के विभाजन से हुआ। पूर्व जनसंघ नेताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उनके संबंध को लेकर हुए विवाद ने जनता पार्टी तोड़ी। इस अर्थ में भाजपा की स्थापना एक विभाजन की परिणति थी।

कल्याण सिंह और राष्ट्रीय क्रांति पार्टी—1999

यह उत्तर प्रदेश भाजपा की सबसे बड़ी टूट थी। कल्याण सिंह ने भाजपा छोड़कर राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बनाई। उनके साथ कुछ विधायक, लोध नेता और कार्यकर्ता गए। 2002 में पार्टी ने चार सीटें जीतीं। वे 2004 में भाजपा लौट आए।

कल्याण सिंह का दूसरा अलगाव—2009

2009 में कल्याण सिंह ने फिर भाजपा छोड़ी, समाजवादी पार्टी से निकटता बनाई और निर्दलीय सांसद बने। बाद में जन क्रांति पार्टी बनी। 2013 में यह धारा भाजपा में वापस मिल गई।

उमा भारती और भारतीय जनशक्ति पार्टी

उमा भारती मध्य प्रदेश की नेता थीं, लेकिन उनका उत्तर प्रदेश की भाजपा राजनीति से भी संबंध रहा। 2005 में उन्होंने भाजपा छोड़कर भारतीय जनशक्ति पार्टी बनाई। उत्तर प्रदेश में इस दल का प्रभाव सीमित रहा। 2011 में उनकी भाजपा में वापसी हुई और 2012 के उत्तर प्रदेश चुनाव में उन्हें चरखारी से उम्मीदवार बनाया गया। वे विधायक बनीं, बाद में झाँसी से सांसद और केंद्र में मंत्री बनीं। यह उत्तर प्रदेश इकाई की मुख्य टूट नहीं थी। लेकिन भाजपा की हिंदुत्व राजनीति में वैकल्पिक नेतृत्व संघर्ष का हिस्सा थी।

व्यक्तिगत विद्रोह, पर स्थायी विभाजन नहीं

भाजपा से अनेक नेता समय-समय पर अलग हुए—कलराज मिश्र या राजनाथ सिंह जैसे प्रमुख नेताओं ने अलग दल नहीं बनाया, जबकि स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान, धर्म सिंह सैनी जैसे नेता 2022 से पहले भाजपा छोड़कर सपा में गए। इनमें कुछ बाद में भाजपा अथवा एनडीए के निकट लौटे। ये चुनावी पलायन थे, मूल पार्टी का औपचारिक विभाजन नहीं।समग्र रूप से भाजपा में कांग्रेस, जनता दल, लोकदल या अपना दल जैसा स्थायी संगठनात्मक विखंडन कम हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक संरचना, मजबूत केंद्रीय नेतृत्व और संगठनात्मक अनुशासन ने बड़े विभाजनों को सीमित रखा।

उत्तर प्रदेश में भाजपा के प्रमुख नेताओं का प्रभाव

पंडित दीनदयाल उपाध्याय

दीनदयाल उपाध्याय चुनावी जननेता से अधिक संगठन और विचार के निर्माता थे। एकात्म मानववाद, अंत्योदय, कैडर आधारित राजनीति और राष्ट्रवाद की उनकी अवधारणाएँ भाजपा की वैचारिक आधारशिला बनीं। उत्तर प्रदेश में जनसंघ के संगठन को स्थायी बनाने का श्रेय उन्हें दिया जाता है।

अटल बिहारी वाजपेयी

वाजपेयी ने बलरामपुर और बाद में लखनऊ से भाजपा तथा जनसंघ को राष्ट्रीय स्वीकार्यता दी। वे मध्यमार्गी, लोकतांत्रिक और गठबंधन-सक्षम चेहरे थे। लखनऊ में उनका व्यक्तिगत प्रभाव भाजपा के कमजोर वर्षों में भी बना रहा। उनके दौर ने भाजपा को केवल आंदोलनकारी नहीं, शासन-सक्षम राष्ट्रीय पार्टी का स्वरूप दिया।

नानाजी देशमुख

नानाजी ने उत्तर प्रदेश में संगठन, कांग्रेस-विरोधी गठबंधन और ग्रामीण कार्य का ढाँचा विकसित किया। 1967 की संविद सरकार और जयप्रकाश आंदोलन में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।

लालकृष्ण आडवाणी

आडवाणी की रथयात्रा ने अयोध्या को भाजपा के राष्ट्रीय अभियान में बदला। उत्तर प्रदेश में 1991 के बहुमत की पृष्ठभूमि इसी आंदोलन ने तैयार की। उनकी भूमिका राज्य से बाहर के नेता की थी, पर उत्तर प्रदेश भाजपा के उत्थान पर उनका प्रभाव अत्यंत गहरा था।

कल्याण सिंह

कल्याण सिंह भाजपा के उत्तर प्रदेश इतिहास के सबसे निर्णायक नेताओं में हैं। उन्होंने पार्टी को पूर्ण बहुमत दिलाया, पिछड़ी जातियों तक पहुँच बनाई और अयोध्या आंदोलन में अपनी सरकार दाँव पर लगाई। साथ ही उनका निष्कासन और अलग पार्टी बनाना भाजपा की गिरावट का एक बड़ा कारण भी बना।

कलराज मिश्र

कलराज मिश्र लंबे समय तक प्रदेश संगठन के समन्वयक, अध्यक्ष और ब्राह्मण चेहरे रहे। वे संघ और भाजपा की विभिन्न पीढ़ियों के बीच सेतु माने जाते थे। संकट के वर्षों में संगठन को बनाए रखने में उनका योगदान था।

राजनाथ सिंह

राजनाथ सिंह शिक्षा मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, राष्ट्रीय अध्यक्ष, गृह मंत्री और रक्षा मंत्री तक पहुँचे। उन्होंने भाजपा को प्रशासनिक गंभीरता, किसान संपर्क और संगठनात्मक संतुलन दिया। लखनऊ से सांसद के रूप में उन्होंने वाजपेयी की राजनीतिक विरासत संभाली।

लालजी टंडन

लखनऊ और अवध क्षेत्र में संगठन, नगर राजनीति तथा अटल बिहारी वाजपेयी के स्थानीय सहयोगी के रूप में लालजी टंडन का प्रभाव था। बसपा के साथ भाजपा के संवाद में भी उनकी भूमिका मानी जाती थी।

डॉ मुरली मनोहर जोशी

जोशी ने इलाहाबाद, कानपुर और वाराणसी से भाजपा की बौद्धिक तथा राष्ट्रवादी राजनीति को प्रतिनिधित्व दिया। शिक्षा, स्वदेशी और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद उनकी प्रमुख पहचान रहे।

नरेंद्र मोदी

नरेंद्र मोदी ने 2014 के बाद उत्तर प्रदेश भाजपा को पुनर्गठित किया। वाराणसी से चुनाव लड़ने, पिछड़ा नेतृत्व की पहचान, विकास, हिंदुत्व और राष्ट्रीय शक्ति की छवि ने भाजपा को 2014, 2017 और 2019 के अभूतपूर्व परिणाम दिए।

अमित शाह

अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में बूथ प्रबंधन, जातीय सामाजिक इंजीनियरिंग, टिकट वितरण और छोटे दलों से गठबंधन की रणनीति विकसित की। 2014 की 71 और 2017 की 312 सीटों में उनका संगठनात्मक योगदान केंद्रीय था।

केशव प्रसाद मौर्य

केशव मौर्य ने 2017 से पहले भाजपा के गैर-यादव पिछड़ा विस्तार को चेहरा दिया। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उन्होंने मौर्य–कुशवाहा–शाक्य–सैनी और अन्य पिछड़े समूहों तक पार्टी की पहुँच बढ़ाई। 2022 में स्वयं सिराथू से हारने के बावजूद वे उपमुख्यमंत्री बने रहे।

योगी आदित्यनाथ

योगी आदित्यनाथ ने भाजपा को उत्तर प्रदेश में एक स्पष्ट मुख्यमंत्री चेहरा दिया। उनका आधार हिंदुत्व, कानून-व्यवस्था, धार्मिक नेतृत्व, पूर्वांचल और कल्याणकारी शासन के संयोजन पर बना है। वे 2017 के बाद भाजपा की प्रदेश राजनीति के निर्विवाद केंद्रीय नेता बने और 2022 में लगातार दूसरी सरकार बनवाने में सफल रहे।

भाजपा हाशिये पर किन कारणों और किन लोगों के कारण गई?

भाजपा की 2002–2012 की गिरावट के लिए केवल विरोधी दल जिम्मेदार नहीं थे। पार्टी के अपने निर्णय भी उतने ही महत्वपूर्ण थे। कल्याण सिंह को हटाने और उनके सामाजिक आधार की उपेक्षा ने गैर-यादव पिछड़ा विस्तार को रोक दिया। मुख्यमंत्री बार-बार बदलने से शासन की विश्वसनीयता कमजोर हुई। रामप्रकाश गुप्त का चयन नेतृत्व संकट का प्रतीक बना। बसपा के साथ बार-बार गठबंधन और फिर संघर्ष से भाजपा के मतदाताओं में दिशा को लेकर भ्रम पैदा हुआ।

प्रदेश संगठन में ब्राह्मण, ठाकुर और पिछड़ा नेतृत्व के बीच गुटबाजी थी। राष्ट्रीय स्तर पर वाजपेयी की लोकप्रियता के बावजूद राज्य में संगठन स्थानीय मुद्दों और जातीय समीकरणों से पीछे रह गया। सपा ने मुसलमान–यादव और बसपा ने दलित–ब्राह्मण गठबंधन बनाया, जबकि भाजपा के पास एक सीमित सवर्ण–शहरी आधार बचा।

कल्याण सिंह का अलग होना व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और पार्टी नेतृत्व की रणनीतिक भूल—दोनों का परिणाम था। यदि भाजपा उस समय अपने पहले बड़े पिछड़ा नेता को सम्मानजनक स्थान देकर साथ रखती, तो संभव है कि उसका सामाजिक पतन इतना तीव्र न होता।

भाजपा फिर शिखर पर कैसे आई?

भाजपा की वापसी एक ही घटना से नहीं हुई। उसने अपने संगठन, नेतृत्व, सामाजिक आधार और चुनावी भाषा—चारों को बदला। नरेंद्र मोदी ने नेतृत्व और आकांक्षा दी; अमित शाह ने संगठन और चुनावी गणित दिया।संघ ने बूथ और कार्यकर्ता नेटवर्क दिया। गैर-यादव पिछड़ा नेताओं तथा अपना दल, सुभासपा और निषाद पार्टी ने सामाजिक विस्तार दिया। हिंदुत्व ने विविध हिंदू जातियों को साझा पहचान दी। और कल्याणकारी योजनाओं ने गरीब तथा महिला मतदाताओं का नया लाभार्थी वर्ग बनाया।

पार्टी ने 1990 के दशक की तुलना में टिकटों का जातीय वितरण व्यापक किया। वह केवल ठाकुर–ब्राह्मण नेतृत्व पर निर्भर नहीं रही। राष्ट्रपति, राज्यपाल, मंत्री, संगठन अध्यक्ष और उम्मीदवार स्तर पर पिछड़े तथा दलित चेहरों को प्रमुखता दी गई। इसी के साथ राष्ट्रवाद, पाकिस्तान, सुरक्षा, राम मंदिर, काशी, मथुरा और धार्मिक पहचान की राजनीति जारी रही।

सपा सरकार के कथित यादववाद और बसपा के कमजोर होते संगठन ने भाजपा को गैर-यादव पिछड़ों तथा गैर-जाटव दलितों के लिए मुख्य विकल्प बनाया। मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता ने स्थानीय जातीय दूरी को कुछ हद तक पार किया।

भाजपा का आज का जनाधार क्या है?

अगस्त 2026 तक भाजपा का उत्तर प्रदेश में मूल जनाधार पाँच बड़े हिस्सों में देखा जा सकता है।

पहला, सवर्ण मतदाता—ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य, कायस्थ और अन्य उच्च जातियों का बड़ा हिस्सा अभी भी भाजपा का सबसे स्थिर आधार है। टिकट या स्थानीय असंतोष के बावजूद राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर इन समुदायों का बहुमत भाजपा की ओर झुकता रहा है।

दूसरा, गैर-यादव पिछड़ा वर्ग—कुर्मी, लोध, मौर्य, शाक्य, सैनी, कुशवाहा, निषाद, राजभर, पाल, प्रजापति और अन्य समुदायों में भाजपा ने व्यापक आधार बनाया है। लेकिन 2024 में इस समूह का एक हिस्सा सपा के पीडीए अभियान की ओर गया। अपना दल, निषाद पार्टी, सुभासपा और रालोद जैसे सहयोगियों की भूमिका इसी आधार को बनाए रखने में है।

तीसरा, गैर-जाटव दलित मतदाता—पासी, वाल्मीकि, कोरी, खटीक, धोबी और दूसरे दलित समूहों में भाजपा ने बसपा के कमजोर होने का लाभ लिया। सरकारी योजनाएँ, हिंदू पहचान और स्थानीय प्रतिनिधित्व इसके साधन रहे। 2024 में संविधान और आरक्षण की आशंका से इस आधार में कुछ दरार आई।

चौथा, महिला और लाभार्थी मतदाता—राशन, उज्ज्वला, आवास, शौचालय, प्रत्यक्ष लाभ और कानून-व्यवस्था की धारणा ने महिलाओं में भाजपा के लिए स्वतंत्र समर्थन तैयार किया है। यह समर्थन पूरी तरह जाति से मुक्त नहीं है, पर कई चुनावों में जातीय सीमाओं को पार करता दिखाई दिया।

पाँचवाँ, शहरी मध्यवर्ग, व्यापारी और राष्ट्रवादी मतदाता—व्यापारी, पेशेवर, मध्यम वर्ग, धार्मिक–राष्ट्रवादी और मजबूत नेतृत्व को प्राथमिकता देने वाला वर्ग भाजपा के साथ बना हुआ है।

भाजपा की कमजोरी मुस्लिम मतदाताओं, यादवों और जाटवों में बनी हुई है। किसानों, बेरोजगार युवाओं, प्रतियोगी छात्रों, संविदा कर्मचारियों और छोटे व्यापारियों में असंतोष का स्तर निर्वाचन क्षेत्र के अनुसार अलग है। 2024 ने दिखाया कि गैर-यादव पिछड़ा और गैर-जाटव दलित आधार स्थायी रूप से सुरक्षित नहीं है।

लोकसभा में कितने भाजपा प्रतिनिधि पहुँचे?

1980 से 2024 तक उत्तर प्रदेश में भाजपा की आम चुनावों की सीट-विजयों का मोटा योग—वर्तमान और पुराने उत्तर प्रदेश की सीमाओं की सावधानी के साथ—इस प्रकार है: 0 + 0 + 8 + 51 + 52 + 57 + 29 + 10 + 10 + 71 + 62 + 33 = 383 लोकसभा सीट-विजय।

यह 383 अलग-अलग व्यक्तियों की संख्या नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी, राजनाथ सिंह, नरेंद्र मोदी, मुरली मनोहर जोशी, योगी आदित्यनाथ और कई नेता एक से अधिक बार निर्वाचित हुए। पुराने चुनावों में उत्तराखंड की सीटें भी उत्तर प्रदेश में शामिल थीं, इसलिए वर्तमान भौगोलिक उत्तर प्रदेश का शुद्ध योग अलग होगा।2024 में उत्तर प्रदेश से भाजपा के 33 सांसद निर्वाचित हुए। पार्टी का राज्यव्यापी मत 41.37 प्रतिशत था।

विधानसभा में कुल चुनावी प्रतिनिधित्व

1980 से 2022 तक भाजपा द्वारा आम विधानसभा चुनावों में जीती सीटों का योग:

11 + 16 + 57 + 221 + 177 + 174 + 88 + 51 + 47 + 312 + 255 = 1,409 विधानसभा सीट-विजय।यह 1,409 अलग-अलग विधायकों की संख्या नहीं है। अनेक नेता कई चुनावों में निर्वाचित हुए। इसमें उपचुनाव शामिल नहीं हैं।वर्तमान अठारहवीं विधानसभा की आधिकारिक संरचना में भाजपा के 255 सदस्य हैं, जो 403 सदस्यीय सदन का लगभग 63.3 प्रतिशत है।

राज्यसभा में उत्तर प्रदेश भाजपा

राज्यसभा के सदस्य उत्तर प्रदेश विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व से चुने जाते हैं। 1991 के बहुमत के बाद भाजपा ने उत्तर प्रदेश से अनेक राज्यसभा सदस्य भेजे, लेकिन 2002–2012 के कमजोर दौर में उसकी संख्या सीमित रही। 2017 और 2022 के बड़े विधानसभा बहुमत ने राज्यसभा में भाजपा को उत्तर प्रदेश से व्यापक प्रतिनिधित्व दिलाया।

उत्तर प्रदेश से अलग-अलग समय में भाजपा के राज्यसभा सदस्यों में राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र, मुख्तार अब्बास नकवी, अरुण जेटली, विनय कटियार, कुसुम राय, शिव प्रताप शुक्ल, हरनाथ सिंह यादव, अशोक बाजपेयी, विजयपाल सिंह तोमर, सीमा द्विवेदी, गीता शाक्य, बाबूराम निषाद, सुधांशु त्रिवेदी, लक्ष्मीकांत वाजपेयी, संगीता बलवंत बिंद, आरपीएन सिंह और अमरपाल मौर्य जैसे नाम शामिल रहे हैं।

राज्यसभा में “अब तक कुल अलग-अलग कितने व्यक्ति” का सरल दलवार आधिकारिक योग उपलब्ध नहीं है, क्योंकि कुछ सदस्य दूसरे राज्यों से चुने गए, कुछ ने दल बदला और अनेक ने एक से अधिक कार्यकाल पूरे किए। संसद की वर्तमान सदस्य सूची पार्टी और राज्य के अनुसार सदस्यों को दर्ज करती है।

विधान परिषद में भाजपा

उत्तर प्रदेश विधान परिषद में भाजपा का प्रभाव विधानसभा से कुछ वर्षों की देरी से बढ़ा। परिषद के सदस्य छह वर्ष के लिए चुने जाते हैं और स्थानीय निकाय, शिक्षक, स्नातक, विधानसभा तथा मनोनयन के अलग-अलग मार्ग हैं। इसलिए 2017 में विधानसभा बहुमत के बावजूद परिषद में आरंभ में सपा का प्रभाव बना रहा।

स्थानीय निकाय चुनावों, विधानसभा कोटे और मनोनयन के माध्यम से भाजपा ने धीरे-धीरे परिषद में भी भारी बहुमत प्राप्त किया। अगस्त 2026 की आधिकारिक पार्टी स्थिति के अनुसार विधान परिषद में भाजपा के 79 सदस्य हैं, समाजवादी पार्टी के दस और अपना दल (सोनेलाल) का एक सदस्य है। परिषद में भाजपा के नेता उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य हैं। इस प्रकार भाजपा इस समय उत्तर प्रदेश विधानमंडल के दोनों सदनों में प्रमुख और बहुमत वाली शक्ति है।

भाजपा की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ

श्रेणी प्रदर्शन

जनसंघ का विधानसभा शिखर 98 सीटें, 1967

भाजपा की पहली पूर्ण बहुमत सरकार 221 सीटें, 1991

सर्वाधिक विधानसभा सीटें 312, वर्ष 2017

सर्वाधिक विधानसभा वोट प्रतिशत 41.29%, वर्ष 2022

लोकसभा में सर्वाधिक सीटें 71, वर्ष 2014

लोकसभा में सर्वाधिक वोट प्रतिशत 49.98%, वर्ष 2019

लगातार दूसरी पूर्ण बहुमत सरकार 2022

पहला भाजपा मुख्यमंत्री कल्याण सिंह

वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

वर्तमान लोकसभा सीटें—उत्तर प्रदेश 33

वर्तमान विधानसभा सदस्य 255

वर्तमान विधान परिषद सदस्य 79

भाजपा के इतिहास का सबसे बड़ा विरोधाभास

भाजपा का पहला बड़ा विरोधाभास यह है कि वह कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के परिवारवाद की आलोचना करती रही। लेकिन उसने भी अनेक राजनीतिक परिवारों के सदस्यों को टिकट और पद दिए। फिर भी संगठनात्मक नेतृत्व पर किसी एक परिवार का औपचारिक अधिकार स्थापित नहीं हुआ।

दूसरा विरोधाभास सामाजिक न्याय और हिंदू एकता के बीच है। भाजपा जाति-मुक्त हिंदू पहचान की बात करती है, लेकिन उसकी चुनावी सफलता अत्यंत सूक्ष्म जातीय प्रतिनिधित्व, टिकट वितरण और छोटे जाति-आधारित दलों के गठबंधन पर निर्भर रही है।

तीसरा विरोधाभास राम मंदिर और फैजाबाद की हार है। दशकों के आंदोलन के बाद मंदिर निर्माण हुआ, लेकिन 2024 में मंदिर वाले संसदीय क्षेत्र में पार्टी पराजित हो गई। इससे सिद्ध होता है कि धार्मिक उपलब्धि और स्थानीय चुनावी संतोष दो अलग प्रश्न हैं।

चौथा विरोधाभास 2022 और 2024 के बीच है। 2022 में भाजपा 41.29 प्रतिशत वोट पर 255 विधानसभा सीटें जीत गई; 2024 में लगभग समान 41.37 प्रतिशत वोट पर केवल 33 लोकसभा सीटें मिलीं। विपक्षी एकता और मतों का निर्वाचन क्षेत्रवार वितरण सीट परिणाम को पूरी तरह बदल सकता है।

जनसंघ के सीमित नगर आधार से चालीस प्रतिशत स्थायी वोट तक

उत्तर प्रदेश में भाजपा की यात्रा को सात चरणों में समझा जा सकता है।

पहला चरण—1951 से 1977: जनसंघ का संगठन, शहरी–व्यापारी–उच्च जाति आधार और कांग्रेस-विरोधी शक्ति के रूप में विकास।

दूसरा चरण—1977 से 1985: जनता पार्टी प्रयोग, दोहरी सदस्यता विवाद, भाजपा का गठन और शुरुआती चुनावी विफलता।

तीसरा चरण—1986 से 1992: राम जन्मभूमि आंदोलन, आडवाणी की रथयात्रा, कल्याण सिंह का उभार और पहली पूर्ण बहुमत सरकार।

चौथा चरण—1993 से 2002: सपा–बसपा सामाजिक चुनौती, भाजपा–बसपा गठबंधन, कल्याण सिंह विवाद और अस्थिर सरकारें।

पाँचवाँ चरण—2002 से 2012: सपा–बसपा के बीच भाजपा का हाशिये पर जाना, मत और सीटों में लगातार गिरावट तथा नेतृत्व संकट।

छठा चरण—2014 से 2022: नरेंद्र मोदी और अमित शाह की चुनावी रणनीति, गैर-यादव पिछड़ा तथा गैर-जाटव दलित विस्तार, छोटे दलों से गठबंधन, योगी आदित्यनाथ का नेतृत्व और लगातार दो बहुमत सरकारें।

सातवाँ चरण—2024 से वर्तमान: लोकसभा में 62 से 33 सीटों की गिरावट, पीडीए और कांग्रेस–सपा गठबंधन की चुनौती, संघ–भाजपा समन्वय की समीक्षा और 2027 के लिए सामाजिक गठबंधन को फिर मजबूत करने का प्रयास।

भाजपा को उत्तर प्रदेश में शिखर तक पहुँचाने वाले तीन सबसे निर्णायक मोड़ थे—राम जन्मभूमि आंदोलन, नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय नेतृत्व और गैर-यादव पिछड़ों तथा गैर-जाटव दलितों को जोड़ने वाली सामाजिक इंजीनियरिंग। कल्याण सिंह ने पहली बार इस विस्तार की संभावना दिखाई; अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने इसे व्यापक चुनावी गठबंधन में बदला; योगी आदित्यनाथ ने इसे शासन, कानून-व्यवस्था, हिंदुत्व और लाभार्थी राजनीति से स्थायी बनाने का प्रयास किया।

पार्टी के हाशिये पर जाने का सबसे बड़ा कारण अपने पिछड़ा विस्तार को खोना, कल्याण सिंह जैसे नेता को अलग करना, नेतृत्व की गुटबाजी और सपा–बसपा के स्पष्ट सामाजिक गठबंधनों के सामने वैकल्पिक रणनीति का अभाव था। उसकी वापसी इसलिए हुई क्योंकि उसने इन्हीं कमजोरियों को पहचाना—पिछड़ा नेतृत्व बनाया, छोटे दल जोड़े, बूथ संगठन सक्रिय किया, राष्ट्रीय नेतृत्व को राज्य की राजनीति से जोड़ा और कल्याणकारी योजनाओं को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साथ मिलाया।

आज भाजपा का उत्तर प्रदेश में लगभग 40–42 प्रतिशत का मजबूत आधार है। लेकिन यह आधार एकसमान और अपरिवर्तनीय नहीं है। सवर्ण और शहरी मत अपेक्षाकृत स्थिर हैं; गैर-यादव पिछड़े, गैर-जाटव दलित, किसान, युवा और लाभार्थी मतदाता चुनावी परिस्थितियों के अनुसार बदल सकते हैं। 2024 ने दिखाया कि सामाजिक प्रतिनिधित्व, संविधान–आरक्षण की आशंका, बेरोजगारी, स्थानीय उम्मीदवार और विपक्षी एकता इस गठबंधन में दरार डाल सकते हैं।

2027 का विधानसभा चुनाव इसलिए भाजपा के लिए केवल सत्ता बचाने का चुनाव नहीं होगा। वह यह तय करेगा कि 2024 की गिरावट एक अस्थायी लोकसभा झटका थी या उत्तर प्रदेश के सामाजिक समीकरण में स्थायी बदलाव की शुरुआत। भाजपा की सबसे बड़ी शक्ति उसका संगठन, नेतृत्व और चालीस प्रतिशत के आसपास का आधार है; उसकी सबसे बड़ी चुनौती उसी आधार के भीतर पिछड़ों, दलितों, युवाओं और सहयोगी दलों की अपेक्षाओं को संतुलित रखना है।

आँकड़ों संबंधी सावधानी

भारतीय जनसंघ और भाजपा की राजनीतिक यात्रा को निरंतर धारा के रूप में समझना उचित है, लेकिन दोनों अलग राजनीतिक दल थे। 1977 में जनसंघ जनता पार्टी में विलीन हो गया और 1980 में भाजपा नई पार्टी के रूप में बनी। वर्ष 2000 तक उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, इसलिए पुराने लोकसभा और विधानसभा परिणामों की वर्तमान उत्तर प्रदेश से सीधी तुलना सावधानी से करनी चाहिए। 1993 और 1996 की सीटों को कुछ ऑनलाइन संकलनों में उलटकर प्रस्तुत किया जाता है; सही क्रम 1993 में 177 और 1996 में लगभग 174 सीटों का है। राज्यसभा में अलग-अलग व्यक्तियों का दलवार ऐतिहासिक कुल उपलब्ध नहीं है।इसलिए वहाँ प्रमुख सदस्य और वर्तमान संस्थागत स्थिति अलग से दी गई है।

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