फर्जी डिग्री से वकालत पर हाई कोर्ट सख्त, 12 अधिवक्ताओं पर FIR; प्रदेश में 105 संदिग्ध नामांकन पहले ही चिन्हित
Allahabad High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्ती के बाद यूपी में फर्जी शैक्षणिक डिग्री के आधार पर वकालत करने के आरोप में 12 अधिवक्ताओं पर FIR दर्ज हुई है। 105 फर्जी नामांकन सामने आने के बाद जांच तेज हो गई है।
Allahabad High Court
Allahabad High Court: फर्जी शैक्षणिक डिग्री के आधार पर बार काउंसिल में पंजीकरण कराकर वकालत करने वालों के खिलाफ उत्तर प्रदेश में कानूनी कार्रवाई तेज हो गई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्ती के बाद बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश की ओर से शिकायत दिए जाने पर अलग-अलग जिलों के 12 अधिवक्ताओं के खिलाफ प्रयागराज के सिविल लाइंस थाने में मुकदमा दर्ज किया गया है। इन अधिवक्ताओं पर आरोप है कि उन्होंने अलग-अलग विश्वविद्यालयों से प्राप्त कथित फर्जी या अप्रमाणित डिग्रियों के आधार पर अधिवक्ता के रूप में नामांकन कराया। पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर दस्तावेजों और विश्वविद्यालय रिकॉर्ड का सत्यापन शुरू कर दिया है।
यह कार्रवाई किसी एक शिकायत तक सीमित नहीं है। इलाहाबाद हाई कोर्ट में Mohammad Kafeel बनाम State of U.P. मामले की सुनवाई के दौरान प्रदेश में अधिवक्ताओं के नामांकन, आपराधिक पृष्ठभूमि और शैक्षणिक प्रमाणपत्रों की जांच का व्यापक मुद्दा सामने आया था। 3 जून 2026 के आदेश में अदालत के सामने रखे रिकॉर्ड के अनुसार सत्यापन प्रक्रिया में 105 अधिवक्ताओं के नामांकन फर्जी पाए गए थे। हाई कोर्ट ने इस स्थिति को गंभीर मानते हुए बार काउंसिल से कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा।
बार काउंसिल सचिव की शिकायत पर दर्ज हुआ मामला
बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के सचिव आर.के. शुक्ला की तहरीर पर सिविल लाइंस पुलिस ने 12 अधिवक्ताओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। अब पुलिस इस बात की जांच करेगी कि संबंधित डिग्रियां वास्तव में संबंधित विश्वविद्यालयों से जारी हुई थीं या नहीं, नामांकन के समय कौन-कौन से दस्तावेज जमा किए गए थे और यदि कोई प्रमाणपत्र फर्जी पाया गया तो उसे तैयार या उपलब्ध कराने में किन लोगों की भूमिका रही।इस तरह के मामलों में जांच केवल अधिवक्ता तक सीमित नहीं रहती। यदि दस्तावेज जाली पाए जाते हैं तो पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर सकती है कि वे किसी संगठित नेटवर्क, दलाल, फर्जी शिक्षण संस्थान या दस्तावेज तैयार करने वाले गिरोह के माध्यम से उपलब्ध कराए गए थे या नहीं।
इन 12 अधिवक्ताओं के खिलाफ दर्ज हुई FIR
बार काउंसिल की शिकायत में जिन नामों का उल्लेख किया गया है, उनमें सुनील कुमार अवस्थी, नफीजुल हसन सिद्दीकी, शोभित कुमार यादव, पंकज कुमार, जय नारायण कटियार, नफीस अहमद, देवेश कुमार, श्याम सिंघल, पवन हिंडोल, दीपक कश्यप, अभय सक्सेना और सत्यम मिश्रा शामिल हैं।इनमें लखनऊ, हरदोई, कानपुर, गौतमबुद्धनगर, गोरखपुर, मथुरा, सहारनपुर, गाजियाबाद और प्रतापगढ़ समेत विभिन्न जिलों के अधिवक्ता शामिल बताए गए हैं।
शिकायत में कुछ अधिवक्ताओं द्वारा प्रस्तुत डिग्रियों के विश्वविद्यालय और वर्ष का भी उल्लेख है। मसलन लखनऊ निवासी सुनील कुमार अवस्थी की वर्ष 2013 में राजस्थान के श्रीधर विश्वविद्यालय से प्राप्त डिग्री, लखनऊ के नफीजुल हसन सिद्दीकी की वर्ष 2017 में हरियाणा के SGT विश्वविद्यालय से प्राप्त डिग्री तथा हरदोई के शोभित कुमार यादव की वर्ष 2022 में स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय, मेरठ से प्राप्त डिग्री सत्यापन के दायरे में बताई गई है।फिलहाल इन सभी नामों को आरोपी के रूप में ही देखा जाना चाहिए। किसी डिग्री को फर्जी साबित करने और आपराधिक जिम्मेदारी तय करने का अंतिम निर्णय जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।
राजनीतिक पहचान वाले नाम भी सूची में
मुकदमे में शामिल नामों में मथुरा के श्याम सिंघल और पवन हिंडोल भी हैं। उपलब्ध शिकायत में श्याम सिंघल को भाजपा के पूर्व महानगर उपाध्यक्ष और पवन हिंडोल को भाजपा युवा मोर्चा से जुड़ा बताया गया है। लेकिन इस मामले में उनकी राजनीतिक पहचान से अलग मुख्य प्रश्न उनके कथित शैक्षणिक दस्तावेजों की सत्यता का है।जांच एजेंसियों को यह साबित करना होगा कि संबंधित व्यक्ति ने जानबूझकर फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया था या दस्तावेज की प्रामाणिकता के संबंध में कोई अन्य परिस्थिति थी।
2015 के नियमों के तहत चल रहा डिग्री सत्यापन
इस पूरी कार्रवाई की एक महत्वपूर्ण कानूनी पृष्ठभूमि Bar Council of India Certificate and Place of Practice (Verification) Rules, 2015 हैं। इन नियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अधिवक्ता के रूप में नामांकित व्यक्ति की शैक्षणिक योग्यता और वास्तविक प्रैक्टिस का सत्यापन हो सके। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इन नियमों को 13 जनवरी 2015 की अधिसूचना के जरिए लागू किया था। इसके तहत राज्य बार काउंसिलों को अधिवक्ताओं के शैक्षणिक प्रमाणपत्रों और नामांकन से जुड़े रिकॉर्ड की जांच करनी होती है। विश्वविद्यालयों और परीक्षा बोर्डों से डिग्री तथा प्रमाणपत्रों का सत्यापन कराया जा सकता है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने 2024 में विश्वविद्यालयों और परीक्षा बोर्डों को प्रमाणपत्र सत्यापन में सहयोग देने संबंधी निर्देश भी जारी किए थे।
हाई कोर्ट ने क्यों अपनाया इतना कड़ा रुख?
अदालत की चिंता केवल इतनी नहीं है कि किसी व्यक्ति ने नौकरी पाने के लिए फर्जी डिग्री लगा दी। वकालत सीधे न्याय व्यवस्था से जुड़ा पेशा है। अधिवक्ता अदालत के अधिकारी माने जाते हैं और वे नागरिकों के संवैधानिक, संपत्ति, स्वतंत्रता और आपराधिक मामलों में उनका प्रतिनिधित्व करते हैं।यदि किसी व्यक्ति ने फर्जी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर अधिवक्ता का दर्जा हासिल किया है तो इसका असर केवल बार काउंसिल के रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रहता। वह वर्षों तक अदालतों में मुकदमे लड़ सकता है, वकालतनामा दाखिल कर सकता है, कानूनी सलाह दे सकता है और न्यायिक प्रक्रिया में भाग ले सकता है।
इसीलिए इलाहाबाद हाई कोर्ट पहले भी फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के आधार पर वकालत के मामलों को न्याय व्यवस्था के प्रति गंभीर धोखाधड़ी के रूप में देख चुका है। फरवरी 2026 में एक अन्य मामले में अदालत ने कथित फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के आधार पर नामांकन कराने वाले अधिवक्ता की जमानत याचिका खारिज करते हुए इस तरह की धोखाधड़ी को न्याय व्यवस्था के विश्वास से जुड़ा गंभीर विषय माना था।
105 फर्जी नामांकन का आंकड़ा बढ़ाता है चिंता
हाई कोर्ट के सामने प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में लगभग 5.14 लाख अधिवक्ता नामांकित थे, जबकि करीब 2.49 लाख को Certificate of Practice जारी किया गया था। सत्यापन के दौरान 105 नामांकन फर्जी पाए जाने की जानकारी अदालत को दी गई। यह आंकड़ा बताता है कि 12 लोगों पर दर्ज एफआईआर संभवतः व्यापक सत्यापन अभियान की शुरुआती कार्रवाइयों में से एक है। यदि बाकी मामलों में भी प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाते हैं तो आने वाले समय में और मुकदमे दर्ज हो सकते हैं तथा बार काउंसिल स्तर पर नामांकन रद्द करने या अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
फर्जी डिग्री पकड़ी कैसे जाती है?
अधिवक्ता के रूप में नामांकन के समय सामान्यतः विद्यालय, स्नातक और विधि की डिग्री समेत विभिन्न प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए जाते हैं। सत्यापन प्रक्रिया में इन दस्तावेजों को संबंधित विश्वविद्यालय या बोर्ड के मूल रिकॉर्ड से मिलाया जाता है।यदि विश्वविद्यालय कहता है कि संबंधित रोल नंबर, पंजीकरण संख्या या डिग्री उसके रिकॉर्ड में मौजूद ही नहीं है, या नाम और अंक मेल नहीं खाते, तो दस्तावेज संदिग्ध माना जाता है।
आगे जांच में माइग्रेशन सर्टिफिकेट, अंकपत्र, कॉलेज में उपस्थिति, परीक्षा रिकॉर्ड, नामांकन रजिस्टर और डिजिटल विश्वविद्यालय डेटा तक देखा जा सकता है।इस प्रकार केवल कागज पर छपी डिग्री देखकर निर्णय नहीं होता, बल्कि उसके पीछे मौजूद पूरे शैक्षणिक रिकॉर्ड की श्रृंखला की जांच की जाती है।
फर्जी डिग्री रैकेट पहले भी बने हैं चुनौती
उत्तर प्रदेश में फर्जी शैक्षणिक दस्तावेज बनाने वाले गिरोह पहले भी सामने आते रहे हैं। वर्ष 2026 में ही प्रयागराज साइबर पुलिस ने एक ऐसे गिरोह का खुलासा किया था, जिस पर यूपी बोर्ड जैसी नकली वेबसाइट बनाकर अंकपत्र और शैक्षणिक प्रमाणपत्र तैयार करने का आरोप था। पुलिस जांच में हजारों कथित फर्जी डिग्रियों और प्रमाणपत्रों के निर्माण की बात सामने आई थी। कानपुर में एक अन्य जांच के दौरान भी विभिन्न विश्वविद्यालयों और बोर्डों से संबंधित बड़ी संख्या में संदिग्ध अंकपत्र और डिग्रियां मिलने की बात सामने आई। इस पृष्ठभूमि में अधिवक्ताओं की डिग्रियों का सत्यापन केवल पेशेवर अनुशासन का मामला नहीं रह जाता, बल्कि फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के संभावित नेटवर्क तक भी पहुंच सकता है।
डिग्री फर्जी निकली तो वकालत पर क्या असर?
यदि किसी अधिवक्ता का नामांकन ही फर्जी योग्यता के आधार पर हुआ पाया जाता है तो बार काउंसिल उसके पंजीकरण और प्रैक्टिस के अधिकार पर कार्रवाई कर सकती है। आपराधिक जांच अलग से चलेगी।बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश अधिवक्ताओं का नामांकन करने, राज्य रोल बनाए रखने और पेशेवर कदाचार के मामलों में कार्रवाई करने वाली वैधानिक संस्था है।
इसके अलावा वकालत की वास्तविक पात्रता के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया की व्यवस्था के तहत All India Bar Examination और Certificate of Practice भी महत्वपूर्ण हैं। लेकिन यदि मूल विधि डिग्री ही जाली साबित हो जाए तो बाद की प्रक्रियाएं स्वयं सवालों के घेरे में आ सकती हैं।
मुवक्किलों के मामलों पर भी उठ सकता है सवाल
सबसे जटिल कानूनी प्रश्न यह हो सकता है कि यदि कोई व्यक्ति वर्षों तक फर्जी डिग्री के आधार पर अधिवक्ता बनकर मुकदमे लड़ता रहा तो उसके द्वारा किए गए कानूनी कार्यों का क्या होगा।सामान्य तौर पर किसी अधिवक्ता की पात्रता में बाद में खामी मिलने से हर पुराने मुकदमे का फैसला स्वतः समाप्त नहीं हो जाता। अदालतें प्रत्येक मामले की परिस्थितियों और कानून के आधार पर निर्णय करेंगी। लेकिन ऐसे मामलों से संबंधित मुवक्किलों के अधिकार, वकालतनामा और पेशेवर जिम्मेदारी जैसे प्रश्न उठना स्वाभाविक है।इसीलिए समय रहते अधिवक्ताओं के प्रमाणपत्रों का सत्यापन न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए महत्वपूर्ण है।
अब विश्वविद्यालय रिकॉर्ड से होगा आरोपों का असली परीक्षण
प्रयागराज पुलिस द्वारा दर्ज 12 मुकदमों में अब सबसे महत्वपूर्ण चरण विश्वविद्यालयों से मूल रिकॉर्ड जुटाना होगा। आरोपपत्र तक पहुंचने से पहले जांच एजेंसी को दस्तावेजी तौर पर यह स्थापित करना होगा कि संबंधित डिग्री या अंकपत्र किस स्तर पर गलत है।
यदि रिकॉर्ड फर्जी पाया जाता है तो अगला प्रश्न होगा—दस्तावेज किसने बनाया, कहां से मिला, इसके लिए पैसा किसे दिया गया और क्या ऐसे अन्य लाभार्थी भी हैं?
इसी जांच से पता चलेगा कि ये अलग-अलग व्यक्तिगत मामले हैं या इनके पीछे कोई बड़ा फर्जी डिग्री नेटवर्क काम कर रहा था।
इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्ती का प्रभाव अब जमीन पर दिखाई देने लगा है। 12 अधिवक्ताओं पर दर्ज एफआईआर इस कार्रवाई की शुरुआत भर हो सकती है, क्योंकि हाई कोर्ट के सामने प्रस्तुत सत्यापन रिकॉर्ड में 105 फर्जी नामांकन पहले ही चिन्हित किए जा चुके हैं। यदि सत्यापन और पुलिस जांच उसी रफ्तार से आगे बढ़ती है तो आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की वकालत व्यवस्था में फर्जी प्रमाणपत्रों के खिलाफ कहीं व्यापक सफाई अभियान देखने को मिल सकता है।