KGMU News: प्रदूषण से बचाएगा KGMU का अनोखा मास्क, सांस लेने से खुद होगा चार्ज

KGMU News: KGMU के डॉक्टरों ने प्राकृतिक कपड़ों से सेल्फ-चार्जिंग मास्क तैयार किया है। यह सांस और चेहरे की हलचल से सक्रिय होकर PM 2.5, धूल, बैक्टीरिया और वायरस के कणों को रोकने में मदद करेगा।

Update:2026-08-19 16:03 IST

KGMU News (Image Credit-Social Media)

लखनऊ: लगातार बढ़ते वायु प्रदूषण और संक्रामक बीमारियों के खतरे के बीच किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) के डॉक्टरों ने एक अनूठा और क्रांतिकारी स्वदेशी आविष्कार किया है। केजीएमयू के कार्डियोलॉजी विभाग के प्रो. गौरव चौधरी के नेतृत्व में डॉक्टरों की टीम ने प्राकृतिक कपड़ों से बना 'रीयूजेबल ट्राइबोइलेक्ट्रिक सेल्फ-चार्जिंग मल्टी-लेयर मास्क' तैयार किया है। सांस लेने और चेहरे की सामान्य हलचल से खुद चार्ज होने वाले इस विशेष मास्क के लिए भारतीय पेटेंट का प्रकाशन भी हो चुका है।

इस शोध दल में प्रो. गौरव चौधरी के साथ डॉ. देवांश मिश्रा और डॉ. अहमद रुशान शामिल हैं। विशेषज्ञों का दावा है कि यह नया मास्क पारंपरिक और सर्जिकल मास्क की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी सुरक्षा देता है और हवा में मौजूद PM 2.5 के साथ-साथ उससे भी छोटे व घातक नैनो-प्रदूषक कणों को फेफड़ों में जाने से रोकने में पूरी तरह सक्षम है।

कैसे काम करता है यह सेल्फ-चार्जिंग ट्राइबोइलेक्ट्रिक मास्क

प्रो. गौरव चौधरी के अनुसार, इस मास्क की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे चार्ज करने के लिए किसी बाहरी बैटरी या बिजली की जरूरत नहीं पड़ती। मास्क के निर्माण में अलग-अलग ट्राइबोइलेक्ट्रिक गुणों वाले प्राकृतिक टेक्सटाइल फैब्रिक की कई परतें लगाई गई हैं। जब व्यक्ति सांस लेता है, बोलता है या चेहरे पर कोई सामान्य हलचल होती है, तो इन परतों के आपस में रगड़ने से हल्का स्थिर विद्युत आवेश (इलेक्ट्रोस्टैटिक चार्ज) पैदा होता है। इसे ही ट्राइबोइलेक्ट्रिक प्रभाव कहते हैं। यह चार्ज हवा में तैरने वाले अतिसूक्ष्म धूल, धुएं, बैक्टीरिया और वायरस के कणों को चुंबक की तरह अपनी ओर खींचकर फिल्टर की सतह पर ही रोक लेता है, जिससे शुद्ध हवा ही अंदर पहुंचती है।

प्लास्टिक कचरे से मुक्ति और N-95 से भी सस्ता विकल्प

शोध दल के सदस्य डॉ. देवांश मिश्रा ने बताया कि कोरोना महामारी के बाद से डिस्पोजेबल सर्जिकल मास्क के इस्तेमाल में बेतहाशा वृद्धि हुई है, जिससे बड़े पैमाने पर नॉन-बायोडिग्रेडेबल (प्लास्टिक) मेडिकल कचरा पर्यावरण के लिए संकट बन रहा था। इस समस्या के स्थाई समाधान के रूप में इस रीयूजेबल मास्क को प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल कपड़ों से तैयार किया गया है, जिसे धोकर बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा, इसकी कीमत बाजार में मिलने वाले N-95 मास्क की तुलना में काफी कम होगी।

केजीएमयू की कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद ने इस उपलब्धि की सराहना करते हुए कहा कि यह नवाचार 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' विजन को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। पेटेंट प्रक्रिया पूरी होने के बाद इसका व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने से देश को बेहद किफायती, उच्च गुणवत्ता वाला और पर्यावरण-हितैषी सुरक्षा कवच मिल सकेगा, जिससे विदेशी उत्पादों पर निर्भरता घटेगी।

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