Lucknow News: एक चक्कर और टूट गया रक्तदान से रिश्ता, पहली बार खून देने वालों को संभालना बड़ी चुनौती
Lucknow News: KGMU के अध्ययन में सामने आया मनोवैज्ञानिक असर; 73 हजार से अधिक रक्तदान में सिर्फ 0.36% को हुई प्रतिक्रिया, फिर भी खराब अनुभव दोबारा रक्तदान की राह रोक सकता है।
एक चक्कर और टूट गया रक्तदान से रिश्ता, पहली बार खून देने वालों को संभालना बड़ी चुनौती (Photo- Social Media)
Lucknow News: रक्तदान के बाद कुछ मिनट का चक्कर, पसीना या घबराहट चिकित्सकीय दृष्टि से आमतौर पर मामूली और अस्थायी प्रतिक्रिया है, लेकिन पहली बार रक्तदान करने वाले व्यक्ति के मन पर इसका असर कहीं अधिक लंबा हो सकता है। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) के रक्ताधान चिकित्सा विभाग के अध्ययन ने रक्तदान अभियान की इसी महत्वपूर्ण चुनौती की ओर ध्यान खींचा है। वर्ष 2025 में विश्वविद्यालय में 73,487 लोगों ने रक्तदान किया और इनमें केवल 264 यानी 0.36 प्रतिशत लोगों में चक्कर आने या बेहोशी जैसी प्रतिक्रिया दर्ज हुई।
यानी 99.6 प्रतिशत से अधिक रक्तदान में ऐसी प्रतिक्रिया नहीं हुई। इसके बावजूद अध्ययन का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि पहली बार रक्तदान करने वाले व्यक्ति को यदि चक्कर या बेहोशी का अनुभव हो जाए तो उसके दोबारा रक्तदाता बनने की संभावना बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि विशेषज्ञ अब केवल सुरक्षित रक्तदान ही नहीं, बल्कि रक्तदाता के पहले अनुभव को सुखद बनाने और उसके डर को दूर करने को भी रक्त उपलब्धता से जोड़कर देख रहे हैं।
KGMU के अध्ययन को ‘बायोइंफॉर्मेशन’ के नवीन अंक में स्थान मिला है। अध्ययन में रक्ताधान चिकित्सा विभाग की प्रो. तूलिका चंद्रा, डॉ. ज्योति भारती और डॉ. मल्लिका अग्रवाल शामिल रहीं। आंकड़ों के अनुसार रक्तदान के बाद होने वाली प्रतिक्रिया पुरुषों में 0.45 प्रतिशत और महिलाओं में 0.19 प्रतिशत दर्ज की गई। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि पहली बार रक्तदान करने वालों में ऐसी प्रतिक्रिया का खतरा नियमित रक्तदाताओं की तुलना में 3.2 गुना अधिक था। प्रतिक्रिया के कारण 60 रक्तदाता रक्तदान की प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाए और इनमें पहली बार रक्तदान करने वाले पुरुषों की संख्या अधिक थी।
चक्कर क्यों आता है? शरीर में वास्तव में क्या होता है
रक्तदान के दौरान या उसके तत्काल बाद होने वाले चक्कर और बेहोशी को चिकित्सा विज्ञान में अक्सर वासोवैगल रिएक्शन कहा जाता है। रक्त देखकर डरना, सुई को लेकर चिंता, दर्द की आशंका, मानसिक तनाव, खाली पेट होना, शरीर में पानी की कमी और रक्तदान के दौरान रक्त की मात्रा में थोड़ी कमी—ये सभी शरीर के स्वायत्त तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं।
कुछ लोगों में इसके कारण हृदय गति और रक्तचाप अचानक गिर सकते हैं। मस्तिष्क तक क्षणिक रूप से रक्त प्रवाह कम होने पर व्यक्ति को सिर हल्का लगना, आंखों के सामने अंधेरा छाना, पसीना आना, जी मिचलाना, कमजोरी या बेहोशी महसूस हो सकती है। इसे देखकर पहली बार रक्तदान करने वाला व्यक्ति समझ सकता है कि रक्तदान से उसके शरीर को नुकसान हुआ है, जबकि अधिकांश वासोवैगल प्रतिक्रियाएं थोड़े समय में ठीक हो जाती हैं।
दुनिया के अलग-अलग रक्तदान अध्ययनों में भी पहली बार रक्तदान, कम उम्र और अपेक्षाकृत कम शरीर वजन को वासोवैगल प्रतिक्रिया के प्रमुख जोखिम कारकों में पाया गया है। 2026 में प्रकाशित उत्तर भारत के एक अध्ययन में भी पहली बार रक्तदान करने वालों, युवा और कम वजन वाले रक्तदाताओं में ऐसी प्रतिक्रिया का जोखिम अधिक मिला।
सबसे दिलचस्प आंकड़ा—99.64% में ऐसी प्रतिक्रिया नहीं
KGMU के आंकड़ों को दूसरे नजरिए से देखें तो अध्ययन रक्तदान की सुरक्षा के बारे में भी महत्वपूर्ण संदेश देता है। कुल 73,487 रक्तदान में केवल 264 लोगों में चक्कर या बेहोशी जैसी प्रतिक्रिया दर्ज हुई। अर्थात लगभग 99.64 प्रतिशत रक्तदान में ऐसी प्रतिक्रिया नहीं हुई।
यही आंकड़ा पहली बार रक्तदान करने वाले लोगों की काउंसिलिंग में उपयोगी हो सकता है। रक्तदान से पहले यदि उन्हें बताया जाए कि चक्कर आने की आशंका बहुत कम है और यदि ऐसा हुआ भी तो प्रशिक्षित कर्मचारी उसे संभाल सकते हैं, तो सुई और बेहोशी को लेकर होने वाली चिंता कम की जा सकती है।भारत में पहले हुए अध्ययनों में भी रक्तदान को सामान्यतः सुरक्षित प्रक्रिया पाया गया है और प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं में अधिकांश हल्की वासोवैगल प्रतिक्रियाएं ही रही हैं।
264 प्रतिक्रियाओं में अधिकांश मामूली, कोई जानलेवा जटिलता नहीं
अध्ययन में दर्ज प्रतिक्रियाओं का स्वरूप भी रक्तदाताओं का डर कम करने वाला है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अधिकांश प्रतिक्रियाएं हल्की थीं। इनमें चक्कर, पसीना, जी मिचलाना, कमजोरी और चेहरे का पीला पड़ना जैसे लक्षण शामिल थे। मध्यम प्रतिक्रिया में कुछ देर के लिए बेहोशी, रक्तचाप गिरना या उल्टी हो सकती है, जबकि गंभीर प्रतिक्रिया में लंबे समय तक बेहोशी, ऐंठन अथवा गिरने के कारण चोट लगने जैसी स्थिति संभव है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि KGMU के अध्ययन में कोई जानलेवा जटिलता सामने नहीं आई। यानी समस्या का बड़ा हिस्सा चिकित्सकीय खतरे से अधिक रक्तदाता के अनुभव और उसके मन में पैदा होने वाले भय से जुड़ा दिखाई देता है। पहला रक्तदान ही तय कर सकता है कि व्यक्ति जीवनभर रक्तदाता बनेगा या नहीं
यह पहलू केवल KGMU तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में भी पाया गया है कि पहली बार रक्तदान के दौरान वासोवैगल प्रतिक्रिया होने से व्यक्ति के दोबारा रक्तदान के लिए लौटने की संभावना कम हो सकती है। एक बड़े अध्ययन में बिना किसी परेशानी के पहला रक्तदान करने वालों की एक वर्ष के भीतर वापसी दर 82 प्रतिशत थी, जबकि वासोवैगल प्रतिक्रिया झेलने वाले पहली बार के रक्तदाताओं में यह घटकर 55 प्रतिशत रह गई।
इसका अर्थ रक्त बैंकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। रक्तदान व्यवस्था केवल नए लोगों को शिविर तक लाने से मजबूत नहीं होती। पहली बार आए रक्तदाता को नियमित रक्तदाता में बदलना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
यदि एक युवा 20 या 25 वर्ष की उम्र में पहली बार रक्तदान करता है और उसका अनुभव अच्छा रहता है तो वह पात्रता और चिकित्सकीय मानकों के अनुसार आने वाले वर्षों में कई बार रक्तदान कर सकता है। लेकिन पहली बार चक्कर आने के बाद उसके मन में यह धारणा बन जाए कि “रक्तदान मुझे सूट नहीं करता”, तो स्वास्थ्य की दृष्टि से पात्र होने के बावजूद वह हमेशा के लिए रक्तदान छोड़ सकता है।
डर भी चक्कर की आशंका बढ़ा सकता है
पहली बार रक्तदान करने वालों में प्रतिक्रिया अधिक होने के पीछे केवल शरीर नहीं, मन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पहली बार सुई लगने का डर, खून देखकर घबराहट, “कहीं कमजोरी न हो जाए” जैसी आशंका और आसपास किसी दूसरे रक्तदाता को असहज होते देखना चिंता बढ़ा सकता है।
हाल के अध्ययनों में रक्तदान से पहले की चिंता और वासोवैगल प्रतिक्रिया के बीच संबंध पाया गया है। 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन में पहली बार रक्तदान करने वालों में पूर्व काउंसिलिंग और मांसपेशियों को नियंत्रित तरीके से कसने की तकनीक को ऐसी प्रतिक्रियाओं को कम करने में उपयोगी पाया गया।
इसीलिए प्रो. तूलिका चंद्रा का जोर पहली बार रक्तदान करने वालों की काउंसिलिंग पर है। उनके अनुसार पहली बार रक्तदान करने वालों में तनाव और चिंता के कारण चक्कर या बेहोशी हो सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति रक्तदान करने के लिए स्वस्थ नहीं है। सही काउंसिलिंग से उसका डर दूर कर उसे भविष्य का नियमित रक्तदाता बनाया जा सकता है।
सिर्फ समझाना नहीं, पानी पिलाना भी बन सकता है उपाय
रक्तदान से पहले पर्याप्त पानी पीना साधारण सलाह लग सकती है, लेकिन इसके पीछे वैज्ञानिक आधार है। 2026 में प्रकाशित 70,860 रक्तदाताओं के एक अध्ययन में रक्तदान से करीब 15 से 20 मिनट पहले 250 मिलीलीटर पानी लेने वाले समूह में वासोवैगल प्रतिक्रिया की दर उन लोगों की तुलना में कम मिली जिन्हें पूर्व-हाइड्रेशन नहीं दिया गया था। अध्ययन में मांसपेशियों को कसने वाली तकनीक भी उपयोगी पाई गई। अन्य अध्ययनों में भी रक्तदान से पहले पानी और रक्तदान के दौरान पैरों तथा शरीर की बड़ी मांसपेशियों को कुछ समय के लिए कसने की तकनीक को चक्कर या बेहोशी की आशंका घटाने से जोड़ा गया है।
इस तकनीक को Applied Muscle Tension कहा जाता है। इसमें प्रशिक्षित व्यक्ति कुछ सेकंड के लिए पैरों, पेट या शरीर की बड़ी मांसपेशियों को कसता और फिर ढीला करता है। इससे रक्तचाप को अचानक गिरने से रोकने में मदद मिल सकती है। हालांकि इसे रक्तदान केंद्र के प्रशिक्षित कर्मियों की सलाह के अनुसार करना बेहतर है।
रक्तदान से पहले चार चीजें बदल सकती हैं पूरा अनुभव
पहली बार रक्तदान करने वाले व्यक्ति को खाली पेट नहीं जाना चाहिए। सामान्य भोजन करने, पर्याप्त पानी पीने, पिछली रात पर्याप्त नींद लेने और अत्यधिक थकान की अवस्था में रक्तदान न करने जैसी साधारण सावधानियां अनुभव बेहतर कर सकती हैं।रक्तदान के दौरान सिर हल्का लगने, पसीना आने, जी मिचलाने या आंखों के सामने अंधेरा छाने लगे तो इसे छिपाना नहीं चाहिए। ये वासोवैगल प्रतिक्रिया के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। तत्काल रक्त बैंक कर्मचारी को बताने पर व्यक्ति को उचित स्थिति में लिटाकर और आवश्यक देखभाल देकर प्रतिक्रिया को गंभीर होने से रोका जा सकता है। रक्तदान के तुरंत बाद उठकर तेजी से चलने के बजाय कुछ समय आराम करना भी जरूरी है।
‘रक्तदान से कमजोरी हो जाएगी’—सबसे पुराना डर
रक्तदान से जुड़ी एक बड़ी सामाजिक भ्रांति स्थायी कमजोरी की है। सामान्यतः पात्र और स्वस्थ व्यक्ति से नियंत्रित मात्रा में रक्त लिया जाता है। शरीर रक्त के तरल हिस्से और रक्त कोशिकाओं की भरपाई क्रमशः करता है। इसलिए पात्रता जांच के बाद निर्धारित अंतराल पर किया गया रक्तदान सामान्यतः सुरक्षित माना जाता है।लेकिन रक्तदान को स्वास्थ्य सुधारने या वजन घटाने का साधन भी नहीं समझना चाहिए।
विशेष रूप से “एक रक्तदान से 650 कैलोरी बर्न होती है” जैसे दावे सोशल मीडिया और कई वेबसाइटों पर बार-बार दिखाई देते हैं, लेकिन इन्हें रक्तदान का स्थापित चिकित्सकीय लाभ बताना उचित नहीं है। इसी तरह सामान्य आबादी में रक्तदान को सीधे “हार्ट अटैक से बचाने” वाले उपाय के रूप में प्रस्तुत करने के लिए भी पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।
रक्तदान का सबसे महत्वपूर्ण और प्रमाणित लाभ इससे कहीं बड़ा है—दान किया गया रक्त किसी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति, ऑपरेशन के मरीज, प्रसूता, कैंसर रोगी, थैलेसीमिया मरीज या किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति की चिकित्सा में काम आ सकता है।
रक्त की फैक्ट्री नहीं बन सकती, इसलिए इंसान ही है स्रोत
चिकित्सा विज्ञान ने कृत्रिम हृदय, रोबोटिक सर्जरी और जीन चिकित्सा तक बड़ी प्रगति की है, लेकिन अस्पतालों की आवश्यकता के अनुरूप मानव रक्त के सभी घटकों का पूर्ण व्यावहारिक विकल्प अभी उपलब्ध नहीं है। रक्त और उसके घटकों की जरूरत काफी हद तक स्वैच्छिक रक्तदाताओं से ही पूरी होती है। यही कारण है कि रक्तदान व्यवस्था के लिए केवल “कितने यूनिट रक्त एकत्र हुए” देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि पहली बार रक्तदान करने वालों में से कितने लोग दूसरी, तीसरी और चौथी बार वापस आए।
KGMU का अध्ययन इसी दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देता है। 73 हजार से अधिक रक्तदान में प्रतिक्रिया की दर बेहद कम होने के बावजूद यदि एक मामूली चक्कर किसी व्यक्ति को जीवनभर रक्तदान से दूर कर देता है, तो रक्त बैंक की चुनौती चिकित्सा से आगे बढ़कर मनोविज्ञान और संवाद की भी हो जाती है।
इसलिए भविष्य की रक्तदान रणनीति का मंत्र शायद यह होना चाहिए—पहली बार रक्त देने वाले को केवल डोनर मत समझिए, उसे भविष्य का नियमित रक्तदाता बनाइए। उसके पहले अनुभव को सुरक्षित, सहज और भयमुक्त बनाना ही स्थायी रक्तदान संस्कृति की सबसे मजबूत नींव हो सकती है।