ब्लड कैंसर और जटिल रक्त रोगों की पहचान में मददगार बनेगा AI, KGMU में जुटे देश भर के हीमेटोलॉजिस्ट

KGMU Lucknow: लखनऊ में हीमेटोलॉजी विशेषज्ञों ने बताया कि AI तकनीक ब्लड कैंसर के सटीक निदान और पर्सनलाइज्ड थेरेपी में मददगार बन रही है। वहीं, PICC लाइन से कैंसर मरीजों को बार-बार सुई चुभाने के दर्द से राहत मिलेगी।

Update:2026-08-23 20:02 IST

KGMU Lucknow

KGMU Lucknow: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब ब्लड कैंसर सहित रक्त से जुड़ी जटिल बीमारियों के सटीक निदान और व्यक्तिगत उपचार (पर्सनलाइज्ड थेरेपी) में डॉक्टरों के लिए एक क्रांतिकारी उपकरण साबित होने जा रहा है। केजीएमयू के ब्राउन हॉल में आयोजित छठे 'ऑल इंडिया कॉन्फ्रेंस फॉर यंग हीमेटोलॉजिस्ट ओरिएंटेशन प्रोग्राम' (YHOP) के दौरान विशेषज्ञों ने इस बात पर विस्तार से चर्चा की कि किस तरह एआई तकनीक मरीज के ब्लड टेस्ट, बोन मैरो रिपोर्ट और मेडिकल हिस्ट्री का त्वरित विश्लेषण कर असामान्य कोशिकाओं की पहचान और बीमारी के जोखिम का सटीक पूर्वानुमान लगा सकती है।

केजीएमयू की कुलपति व वरिष्ठ हीमेटोलॉजिस्ट डॉ. सोनिया नित्यानंद ने बताया कि ल्यूकेमिया, लिम्फोमा और मल्टीपल मायलोमा जैसे रक्त कैंसर में एआई मरीज के संपूर्ण डेटा का विश्लेषण कर यह पहले ही बता सकता है कि किस दवा का कितना असर होगा या बीमारी के दोबारा लौटने (रिलैप्स) की कितनी संभावना है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि एआई केवल एक सहायक टूल है, विशेषज्ञ डॉक्टरों का विकल्प नहीं; अंतिम निर्णय चिकित्सक ही लेंगे। इस दौरान सीएमसी वेल्लोर के पूर्व विभागाध्यक्ष पद्मश्री डॉ. मामन चैंडी ने युवा डॉक्टरों को मेडिकल तकनीकों के साथ-साथ मरीजों और तीमारदारों से संवेदनशील संवाद स्थापित करने का विशेष प्रशिक्षण दिया।

PICC लाइन: कैंसर मरीजों को बार-बार नस में सुई चुभाने के दर्द से मिलेगी मुक्ति

लखनऊ। कीमोथेरेपी, लंबे समय तक चलने वाले आईवी (IV) इंजेक्शन या नसों के जरिए पोषण लेने वाले कैंसर और आईसीयू के गंभीर मरीजों के लिए 'पेरिफेरली इंसर्टेड सेंट्रल कैथेटर' (PICC लाइन) तकनीक एक बड़ा वरदान साबित हो रही है। डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के हीमेटोलॉजी विभाग की अध्यक्ष डॉ. नम्रता अवस्थी ने एक विशेष कार्यशाला के दौरान बताया कि इस तकनीक के जरिए हाथ की नस से एक पतली ट्यूब (कैथेटर) डालकर उसे हृदय के पास स्थित मुख्य बड़ी नस तक पहुंचाया जाता है, जिससे मरीजों को हर बार नई नस खोजने और बार-बार सुई चुभाने के दर्द से पूरी तरह राहत मिल जाती है।

डॉ. अवस्थी के अनुसार, पीआईसीसी लाइन डालने की प्रक्रिया विशेषज्ञता वाली होती है और इसे आमतौर पर अल्ट्रासाउंड गाइडेंस की मदद से सुरक्षित तरीके से डाला जाता है ताकि नस में चोट या खून का थक्का (क्लॉट) बनने का जोखिम न रहे। इसके साथ ही, नर्सिंग स्टाफ के लिए इसके सुरक्षित प्रबंधन, संक्रमण से बचाव और एक साथ दी जाने वाली दवाओं की सही जानकारी होना बेहद महत्वपूर्ण है।

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