Lucknow News: जब मेगापिक्सल नहीं, ‘साइंस और सब्र’ से खिंचती थीं तस्वीरें, लखनऊ में मिली 137 साल पुरानी किताब
Lucknow Photography Exhibition: लखनऊ की फोटोग्राफी प्रदर्शनी में 1889 में प्रकाशित 137 साल पुरानी दुर्लभ किताब प्रदर्शित की गई। जानिए डिजिटल कैमरे से पहले फोटोग्राफी कैसे विज्ञान और धैर्य पर निर्भर थी।
Lucknow News (Image Credit-Newstrack)
लखनऊ: आज हर जेब में स्मार्टफोन है और सेकंड के सौवें हिस्से में दर्जनों तस्वीरें क्लिक हो जाती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब न डिजिटल सेंसर थे, न ऑटो-फोकस और न कोई रेडीमेड फिल्टर, तब एक तस्वीर को आकार देने में कितना विज्ञान और सब्र लगता था? नवाबों के शहर लखनऊ में आयोजित 'छठी ऑल इंडिया फोटोग्राफी प्रदर्शनी' में सामने आई 137 साल पुरानी एक दुर्लभ पुस्तक ने कैमरे के उस ऐतिहासिक और जादुई दौर की कई अनकही परतों को खोल दिया है।
1889 का वो दुर्लभ दस्तावेज, जिसने सहेजा कैमरे का इतिहास
कॉलेज ऑफ आर्ट्स फोटोग्राफिक सोसाइटी (CAPS), लखनऊ की इस विशेष प्रदर्शनी में सबसे बड़ा आकर्षण बनी वर्ष 1889 में प्रकाशित पुस्तक—'A Dictionary of Photography for the Amateur and Professional Photographer'। ई. जे. वॉल द्वारा लिखी गई इस ऐतिहासिक पुस्तक के पन्ने भले ही वक्त की मार से पीले और जर्जर हो चुके हैं, लेकिन इसमें दर्ज जानकारियां आज भी लेंस की दुनिया के लिए अनमोल धरोहर हैं। यह पुस्तक उस दौर का प्रमाण है जब फोटोग्राफी महज शौक नहीं, बल्कि एक कठिन साधना थी।
'ए से जेड' तक: जब फोटोग्राफी सिर्फ कला नहीं, शुद्ध विज्ञान थी
कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स के असिस्टेंट प्रोफेसर (फोटोग्राफी) अतुल हुंडू के अनुसार, यह किताब उस दौर के शौकिया और पेशेवर फोटोग्राफरों के लिए तैयार की गई ए-टू-जेड डिक्शनरी है। इसमें 19वीं सदी के भारी-भरकम कैमरा उपकरणों, लेंस की बनावट, अपर्चर के नियमों और रासायनिक प्रक्रियाओं का बेहद बारीकी से विवरण मिलता है। किताब में 'एब्सोल्यूट टेम्परेचर' और 'एब्सोल्यूट जीरो' जैसे भौतिक विज्ञान के सिद्धांतों की भी व्याख्या है, जो दर्शाती है कि उस दौर में एक मुकम्मल तस्वीर खींचने के लिए फोटोग्राफर को रसायन और भौतिकी दोनों का गहरा ज्ञान होना जरूरी था।
डिजिटल पीढ़ी के लिए जीवंत टाइम-ट्रैवल
प्रदर्शनी में पहुंचे आज के दौर के युवा फोटोग्राफरों और कला के विद्यार्थियों के लिए यह अनुभव किसी टाइम-मशीन के सफर जैसा रहा। इस ऐतिहासिक शब्दकोश के साथ-साथ प्रदर्शनी में 'Micro-Art', 'Practical Effects of Photography' और 'The A-Z of Creativity' जैसी अन्य दुर्लभ पुस्तकें भी प्रदर्शित की गईं। इन किताबों ने नई पीढ़ी को समझाया कि आज के आसान 'सिंगल क्लिक' के पीछे 130 साल से भी ज्यादा का तकनीकी विकास और संघर्ष छिपा है।
फोटोग्राफी के अकादमिक इतिहास का भी केंद्र रहा है लखनऊ
तस्वीरों की दुनिया में लखनऊ का नाता सिर्फ ऐतिहासिक इमारतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका अकादमिक इतिहास भी बेहद समृद्ध रहा है। लखनऊ विश्वविद्यालय देश के उन गिने-चुने शुरुआती संस्थानों में शामिल था, जिसने फोटोग्राफी में बाकायदा परास्नातक (मास्टर्स) प्रोग्राम शुरू किया था। इसी अकादमिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स की डॉ. तुलिका साहू ने फोटोग्राफी में पीएचडी हासिल कर इस क्षेत्र में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर स्थापित किया।
137 साल पुराना यह दस्तावेज आज के डिजिटल दौर में यह साबित करता है कि कैमरे का स्वरूप चाहे जितना बदल गया हो, लेकिन बेहतरीन विजुअल की आत्मा हमेशा नजरिए, विज्ञान और धैर्य से ही तय होती है।