Muzaffarnagar News: पिटबुल के पहरे में कैद थी जिंदगी, पुलिस छापेमारी से खुला बंधुआ मजदूरी का सच

Muzaffarnagar News: मुजफ्फरनगर में संयुक्त छापेमारी के दौरान कई मजदूरों को मुक्त कराया गया। पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई तथा मानवीय पहल की व्यापक सराहना हो रही है।

Update:2026-06-25 19:34 IST

पिटबुल के पहरे में कैद थी जिंदगी, पुलिस छापेमारी से खुला बंधुआ मजदूरी का सच (Photo- Newstrack)

Muzaffarnagar News: मुजफ्फरनगर के तितावी थाना क्षेत्र के माड़ी गांव में स्थित एक दोना-पत्तल फैक्ट्री में चल रहे बंधुआ मजदूरी के भयावह खेल का खुलासा होने के बाद हर कोई हैरान है। लेबर विभाग, पुलिस और प्रशासन की संयुक्त टीम ने फैक्ट्री पर छापेमारी कर 12 मजदूरों को बंधन मुक्त कराया। इन मजदूरों की कहानी सुनकर अधिकारियों से लेकर आम लोग तक भावुक हो गए।

बताया गया कि हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, झारखंड, बिहार, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों और नेपाल से गरीब लोगों को नौकरी और अच्छी तनख्वाह का लालच देकर यहां लाया जाता था। उन्हें 8 से 12 हजार रुपये मासिक वेतन, भोजन और अन्य सुविधाओं का वादा किया जाता था, लेकिन फैक्ट्री पहुंचते ही उनकी जिंदगी कैद बन जाती थी।

मोबाइल और आधार कार्ड छीन लिए जाते थे, एक वक्त मिलती थी सूखी रोटी

बंधन मुक्त हुए मजदूरों ने बताया कि फैक्ट्री में पहुंचते ही उनके मोबाइल फोन और आधार कार्ड छीन लिए गए। इसके बाद उनसे दिन-रात काम कराया जाता था। मजदूरी तो दूर, उन्हें भरपेट खाना भी नहीं दिया जाता था। मजदूरों का आरोप है कि 24 घंटे में सिर्फ एक बार सूखी चोकर वाली रोटी खाने को मिलती थी।


यदि कोई मजदूर काम करने से मना करता या विरोध करता तो उसे बेरहमी से पीटा जाता था। लाठी-डंडों, बेल्ट और अन्य सामान से मारपीट की जाती थी। कई मजदूरों के शरीर पर गंभीर चोटों के निशान पाए गए हैं। मेडिकल जांच में भी चोटों की पुष्टि हुई है।

मजदूरों पर नजर रखने के लिए रखे गए थे दो पिटबुल डॉग

इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि मजदूरों को भागने से रोकने के लिए फैक्ट्री में दो पिटबुल कुत्ते रखे गए थे। एक कुत्ता फैक्ट्री के बाहर और दूसरा अंदर तैनात रहता था। मजदूरों का कहना है कि इन खतरनाक कुत्तों के डर से कोई भी भागने की हिम्मत नहीं कर पाता था।

पीड़ितों के मुताबिक यदि कोई भागने की कोशिश करता तो उसे और अधिक प्रताड़ित किया जाता था। इसी डर और यातना के माहौल में कई मजदूर लगभग डेढ़ से दो साल तक वहां बंधक बनकर रहने को मजबूर रहे।

एक मजदूर की हिम्मत बनी बाकी लोगों की आजादी की वजह

इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब एक मजदूर किसी तरह फैक्ट्री से निकलने में सफल हो गया। उसने पुलिस को सूचना दी कि फैक्ट्री में कई लोगों को बंधक बनाकर रखा गया है और उनसे जबरन मजदूरी कराई जा रही है।

सूचना मिलने के बाद लेबर विभाग, पुलिस और प्रशासन की संयुक्त टीम ने मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में फैक्ट्री पर छापा मारा। कार्रवाई के दौरान रामू, विक्रम, नारायण, सीताराम, संतोष, शिवम जाटव, जगदीश, राजहंस, साहिल, रंजीत पासवान, दिलशाद, उज्ज्वल और सोनू चौहान समेत मजदूरों को बंधन मुक्त कराया गया।

दो आरोपी गिरफ्तार, कई मौतों की भी जांच

छापेमारी के दौरान पुलिस ने शिवा त्यागी और प्रदीप बालियान को गिरफ्तार किया। पुलिस ने मौके से मजदूरों की पिटाई में इस्तेमाल किए जाने वाले डंडे और अन्य सामान भी बरामद किए।

एसएसपी संजय कुमार वर्मा ने बताया कि मजदूरों के शरीर पर गंभीर चोटों के निशान मिले हैं। पूछताछ में सामने आया कि उन्हें डेढ़ से दो साल तक बंधक बनाकर रखा गया था। उन्हें न वेतन दिया जाता था और न ही बाहर जाने की अनुमति थी।

पुलिस को यह जानकारी भी मिली है कि अत्याचार के दौरान कुछ लोगों की मौत भी हुई थी। एक व्यक्ति की पहचान हो चुकी है और इस दिशा में भी जांच की जा रही है। मामले में विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है, जिनमें आजीवन कारावास तक का प्रावधान है। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ गैंगस्टर की कार्रवाई की भी बात कही है।

जगदीश ने सुनाई दर्द भरी दास्तान

बंधन मुक्त हुए मजदूर जगदीश ने बताया कि वह सीतापुर का रहने वाला है। उसे अंबाला से यह कहकर लाया गया था कि हर महीने 8 हजार रुपये वेतन मिलेगा, तीन बार चाय और खाना दिया जाएगा। लेकिन यहां आने के बाद न पैसा मिला, न खाना और न ही कोई सुविधा।

उसने बताया कि मोबाइल और आधार कार्ड छीन लिए गए थे। विरोध करने पर बेल्ट और डंडों से पीटा जाता था। एक समय ऐसा था जब उन्हें सिर्फ जिंदा रहने भर का खाना दिया जाता था। जगदीश ने बताया कि एक साथी मजदूर के भागकर पुलिस तक पहुंचने की वजह से ही आज वे सभी आजाद हो सके हैं।

पुलिस की कार्रवाई की हर तरफ हो रही सराहना

एसएसपी संजय कुमार वर्मा ने बताया कि सूचना मिलने के बाद पुलिस, लेबर विभाग और प्रशासन ने संयुक्त कार्रवाई की। मजदूरों को मुक्त कराने वाली टीम को 25 हजार रुपये का पुरस्कार भी दिया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि आरोपी रेलवे स्टेशन और बस अड्डों पर गरीब लोगों को नौकरी का झांसा देकर अपने जाल में फंसाते थे। इसके बाद उन्हें फैक्ट्री में लाकर बंधक बना लिया जाता था।

जब पुलिस थाने में सजी दावत, भावुक हो गए मजदूर और परिजन

इस पूरे मामले का सबसे मानवीय और भावुक पहलू तब सामने आया जब बंधन मुक्त कराए गए मजदूरों और उनके परिजनों के लिए थाना परिसर में विशेष भोजन की व्यवस्था की गई।

आमतौर पर पुलिस थानों की पहचान कार्रवाई और अपराध से जुड़ी खबरों से होती है, लेकिन इस बार तितावी थाने में इंसानियत का ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने सभी का दिल जीत लिया।

नेपाल, बिहार, राजस्थान और उत्तराखंड सहित विभिन्न स्थानों से अपने परिजनों को लेने पहुंचे परिवार जब वर्षों बाद अपने अपनों से मिले तो कई लोगों की आंखें भर आईं। यह सिर्फ मिलन का क्षण नहीं था, बल्कि नई जिंदगी मिलने की खुशी का अवसर भी था।

महिला पुलिसकर्मियों ने संभाली रसोई, अधिकारियों ने परोसा भोजन

थाना परिसर में महिला पुलिसकर्मी खुद रसोई संभालती नजर आईं। कहीं कचौरी बनाई जा रही थी तो कहीं अन्य पकवान तैयार किए जा रहे थे। वहीं क्षेत्राधिकारी, थाना प्रभारी और अन्य पुलिसकर्मी अपने हाथों से मजदूरों और उनके परिजनों को भोजन परोसते दिखाई दिए।

कई मजदूरों ने कहा कि वर्षों बाद उन्हें इतना सम्मान और अपनापन मिला है। उनके लिए यह भोजन सिर्फ खाना नहीं था, बल्कि सम्मान, आजादी और नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक था।

सरकार देगी आर्थिक सहायता

अधिकारियों के अनुसार भारत सरकार की ओर से सभी मुक्त कराए गए मजदूरों को तत्काल 30-30 हजार रुपये की सहायता राशि दी जा रही है। इसके अलावा विवेचना पूरी होने के बाद नाबालिग मजदूरों को 2 लाख रुपये और अन्य मजदूरों को 1-1 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा।

लोगों से की गई सतर्क रहने की अपील

सीओ फुगाना विश्वजीत सिंह ने लोगों से अपील की कि किसी भी अनजान व्यक्ति के झांसे में न आएं। नौकरी करने से पहले पूरी जानकारी हासिल करें और जहां काम करने जा रहे हैं वहां पहले से काम कर रहे लोगों से भी जानकारी लें। बिना जांच-पड़ताल के किसी के साथ जाने से ऐसे गिरोहों का शिकार बनने का खतरा बढ़ जाता है।


इंसानियत और कानून का अनोखा संगम

मुजफ्फरनगर में सामने आया यह मामला सिर्फ बंधुआ मजदूरी के खिलाफ बड़ी कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह कानून और इंसानियत के अनोखे संगम की भी मिसाल है। एक ओर पुलिस ने बंधक मजदूरों को आजादी दिलाई, वहीं दूसरी ओर उन्हें सम्मान, सुरक्षा और अपनापन देकर यह साबित कर दिया कि वर्दी के पीछे संवेदनशील दिल भी धड़कता है।

जो लोग वर्षों तक प्रताड़ना और भय के साये में जीते रहे, उनके लिए मुजफ्फरनगर पुलिस केवल एक सरकारी विभाग नहीं, बल्कि नई जिंदगी देने वाला परिवार बनकर सामने आई है। यह कहानी लंबे समय तक लोगों को इंसानियत, संवेदनशीलता और साहस की याद दिलाती रहेगी।

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