Purvanchal Gun Culture: पूर्वांचल में 'गन कल्चर' का दबदबा! शान-ओ-शौकत और भौकाल का जरिया बना सरकारी गनर, वाराणसी जोन में 436 सुरक्षाकर्मी

Purvanchal Gun Culture: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में सरकारी गनर अब सुरक्षा की जरूरत से ज्यादा स्टेटस सिंबल बन चुका है। वाराणसी जोन के 9 जिलों में तैनात 436 सरकारी गनरों में से 348 केवल नेताओं की सुरक्षा में लगे हैं। आजमगढ़ जिला इस सूची में सबसे ऊपर है। जानिए किस जिले में नेताओं के पास कितने गनर हैं और क्या कहती है पुलिस।

Update:2026-06-04 08:40 IST

Purvanchal Gun Culture: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में राजनीति, बाहुबल और सरकारी गनर का एक अनोखा ही गठजोड़ देखने को मिलता है। इस इलाके में माफिया से नेता बने बाहुबलियों और रसूखदार नेताओं का दबदबा हमेशा से ही बहुत ज्यादा रहा है। आज के समय में सांसद, विधायक, एमएलसी और जिला पंचायत अध्यक्ष से लेकर छोटे-मोटे नेता और सत्ताधारी दल के पदाधिकारी भी अपने साथ सरकारी गनर लेकर चलना अपनी शान समझते हैं। पूर्वांचल में सरकारी सुरक्षा को लोग अब सुरक्षा की जरूरत से ज्यादा अपना रुतबा और 'टशन' दिखाने का जरिया मानने लगे हैं। नेताओं के अलावा बड़े व्यापारी, उद्योगपति और आपराधिक धमकियों से डरे हुए रसूखदार लोग भी सरकारी गनर के साए में घूम रहे हैं, जिससे पूरे इलाके में गन कल्चर का माहौल बना हुआ है।

वाराणसी जोन के 9 जिलों का आंकड़ा

एक सरकारी आंकड़े के अनुसार, वाराणसी जोन के कुल 9 जिलों में इस समय 436 सरकारी गनर लोगों की सुरक्षा में मुस्तैद हैं। इस पूरी व्यवस्था में सबसे दिलचस्प बात यह है कि इन 436 गनरों में से 348 गनर केवल राजनीतिक दलों के नेताओं की सेवा और सुरक्षा में लगाए गए हैं। इन सुरक्षाकर्मियों में पुलिस विभाग के 264 कांस्टेबल, 80 हेड कांस्टेबल और चार दरोगा यानी सब-इंस्पेक्टर शामिल हैं। शासन और जिला प्रशासन की तरफ से इन नेताओं को उनके रसूख के हिसाब से अलग-अलग रैंक की सुरक्षा दी गई है। अगर जिलों के हिसाब से बात करें, तो इस मामले में आजमगढ़ जिला सबसे आगे है, जहां अकेले 98 गनर तैनात हैं। इसके विपरीत, सबसे शांत और कम गनर वाला जिला भदोही है, जहां केवल 19 गनरों को सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई है।


व्यापारियों और धमकियां पाने वालों को नहीं मिला एक भी दरोगा

नेताओं से इतर अगर समाज के दूसरे वर्गों की बात करें, तो रंगदारी, फिरौती और जान से मारने की धमकियां पाने वाले पीड़ितों को भी सरकार की तरफ से सुरक्षा दी गई है। बड़े व्यापारियों और उद्यमियों की सुरक्षा में कुल सात हेड कांस्टेबल और 29 कांस्टेबल तैनात किए गए हैं। वहीं, अन्य गंभीर धमकियों के शिकार रसूखदार लोगों की सुरक्षा के लिए 13 हेड कांस्टेबल और 40 कांस्टेबलों को ड्यूटी पर लगाया गया है। इस पूरे आंकड़े में हैरान करने वाली बात यह है कि व्यापारियों और धमकियां पाने वाले आम लोगों की सुरक्षा में एक भी दरोगा तैनात नहीं किया गया है, जबकि दरोगा रैंक के सभी अधिकारी नेताओं की सुरक्षा में व्यस्त हैं।

गाजीपुर-जौनपुर में नेताओं की सुरक्षा का बड़ा नेटवर्क

राजनीतिक दलों के नेताओं को मिले गनर के जिलेवार आंकड़ों पर नजर डालें, तो जौनपुर में एक दरोगा, 13 हेड कांस्टेबल और 46 कांस्टेबल नेताओं के साथ चल रहे हैं। गाजीपुर जिले में आठ हेड कांस्टेबल और 51 कांस्टेबल तैनात हैं। चंदौली में एक दरोगा, आठ हेड कांस्टेबल और 18 कांस्टेबल सुरक्षा संभाल रहे हैं। आजमगढ़ में एक दरोगा, 19 हेड कांस्टेबल और 48 कांस्टेबल नेताओं के घेरे में रहते हैं। इसके अलावा मऊ में एक हेड कांस्टेबल और 26 कांस्टेबल, बलिया में 7 हेड कांस्टेबल और 45 कांस्टेबल, मिर्जापुर में एक दरोगा, 13 हेड कांस्टेबल और 10 कांस्टेबल, तथा सोनभद्र में आठ हेड कांस्टेबल और 13 कांस्टेबल सुरक्षा व्यवस्था में लगाए गए हैं।

गनर पाने के लिए हर महीने सैकड़ों आवेदन

पूर्वांचल को शुरू से ही गन कल्चर का गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन अब यह लोगों के लिए एक बड़ा स्टेटस सिंबल बन चुका है। आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं ने तो समाज में अपना खौफ और माहौल बनाए रखने के लिए गनर को अपनी गाड़ी के आगे-पीछे बिठाना अनिवार्य कर लिया है। यही वजह है कि जिलों के पुलिस दफ्तरों में गनर पाने के लिए हर महीने सैकड़ों नए आवेदन आ रहे हैं। इस मामले पर वाराणसी जोन के एडीजी पीयूष मोर्डिया ने बताया कि सरकारी सुरक्षा जिला, मंडल और शासन स्तर की कमेटियों की जांच के बाद ही तय समय के लिए दी जाती है। इसके साथ ही, कई मामलों में कोर्ट के आदेश पर भी पीड़ितों को सुरक्षा मुहैया कराई जाती है।

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