Sonbhadra News: पेंशन बंद होने का डर दिखाकर 31 लाख की साइबर ठगी, दो गिरफ्तार

Sonbhadra News: पेंशन बंद होने का डर दिखाकर ठगी करने वाले गिरोह का खुलासा, PPO नंबर से डेटा जुटाकर APK लिंक और OTP के जरिए रकम उड़ाई गई।

Update:2026-08-13 18:58 IST

पेंशन बंद होने का डर दिखाकर 31 लाख की साइबर ठगी, दो गिरफ्तार (Photo- Newstrack)

Sonbhadra News: पेंशनधारकों को सरकारी अधिकारी बनकर फोन करने और पेंशन बंद होने का भय दिखाकर लाखों रुपये ऐंठने वाले अंतरराज्यीय साइबर गिरोह का साइबर क्राइम पुलिस ने पर्दाफाश किया है। गिरोह के सदस्य रेलवे के सेवानिवृत्त कर्मचारियों और अधिकारियों का डेटा हासिल कर उन्हें निशाना बनाते थे। पीड़ितों को PPO नंबर में गड़बड़ी, मोबाइल नंबर बंद होने और पेंशन संबंधी प्रक्रिया पूरी करने का झांसा देकर गोपनीय बैंकिंग जानकारी हासिल की जाती थी। इसके बाद APK फाइल या लिंक भेजकर मोबाइल की स्क्रीन शेयर कराई जाती और OTP हासिल कर बैंक खातों से रकम उड़ा दी जाती थी। पुलिस ने इस मामले में दो आरोपियों को कोलकाता, पश्चिम बंगाल से गिरफ्तार किया है। आरोपियों के कब्जे से 10 मोबाइल फोन, एक वाई-फाई राउटर, चार सिम कार्ड और 53 हजार रुपये नकद बरामद हुए हैं।

पुलिस अधीक्षक अभिषेक वर्मा के निर्देशन, अपर पुलिस अधीक्षक (ऑपरेशन) ऋषभ रुणवाल के मार्गदर्शन, क्षेत्राधिकारी/सहायक नोडल साइबर हर्ष पाण्डेय के पर्यवेक्षण तथा साइबर क्राइम पुलिस थाना प्रभारी निरीक्षक धीरेन्द्र कुमार चौधरी के नेतृत्व में साइबर अपराध के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत यह कार्रवाई की गई। पुलिस ने मु0अ0सं0-06/2025, धारा 318(4), 336(3), 338, 340(2) बीएनएस और 66-D आईटी एक्ट से संबंधित मामले में कार्रवाई करते हुए गिरोह की कड़ी तक पहुंच बनाई।

पुलिस टीम ने मिलकर खोला साइबर ठगी का राज

कार्रवाई में प्रभारी निरीक्षक धीरेन्द्र कुमार चौधरी, उपनिरीक्षक आशीष कुमार पटेल, हेड कांस्टेबल शिवनन्दन सिंह, हेड कांस्टेबल संजय कुमार वर्मा, कांस्टेबल अभिषेक तिवारी और कांस्टेबल सुनील रावत शामिल रहे। सभी ने तकनीकी साक्ष्यों और डिजिटल इनपुट के आधार पर आरोपियों तक पहुंचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कॉल आया, अधिकारी बने और 31 लाख खाते से गायब

मामला 17 जून 2025 का है। आरोपियों ने पीड़ित को फोन कर खुद को पेंशन संबंधी अधिकारी बताया। बातचीत के दौरान उसे बताया गया कि उसके PPO नंबर में करेक्शन जरूरी है और मोबाइल नंबर बंद हो सकता है। सरकारी प्रक्रिया का डर दिखाकर आरोपियों ने पीड़ित से व्यक्तिगत और बैंकिंग संबंधी जानकारी हासिल कर ली।

इसके बाद साइबर ठगों ने मोबाइल पर APK फाइल अथवा लिंक भेजा। उसे खोलने के बाद स्क्रीन शेयरिंग कराई गई और OTP हासिल कर लिया गया। देखते ही देखते पीड़ित के खाते से करीब 31 लाख रुपये अलग-अलग खातों में स्थानांतरित कर दिए गए। इतना ही नहीं, PhonePe के माध्यम से एक लाख रुपये का लेनदेन कराया गया और 10 लाख रुपये की एफडी भी कराई गई। इस तरह ठगों ने पेंशनधारक की जीवनभर की कमाई पर बड़ा वार किया।

रेलवे के पेंशनरों का डेटा बना ठगी का हथियार

पूछताछ में सामने आया कि गिरोह खास तौर पर रेलवे के पेंशनधारकों, सेवानिवृत्त कर्मचारियों और अधिकारियों को निशाना बनाता था। आरोपियों द्वारा रेलवे के Pension Payment Order यानी PPO से संबंधित जानकारी हासिल करने के लिए अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल किया जाता था।

पुलिस के अनुसार, गिरोह के सदस्य UMEED Portal के RASS Tab पर रेलवे के सेवानिवृत्त कर्मचारियों का डेटा प्राप्त करने के लिए उनकी जन्मतिथि का अनुमान लगाकर विवरण डालते थे। पोर्टल पर डेटा खुलने के बाद उसकी कॉपी अथवा संबंधित जानकारी पेंशनर को भेजी जाती थी। इस तरह पहले विश्वास कायम किया जाता और फिर खुद को रेलवे का अधिकारी बताकर पेंशन संबंधी समस्या दूर कराने के नाम पर ठगी का जाल बिछाया जाता था।

कई मामलों में आरोपी खुद को रेलवे बोर्ड का अधिकारी बताते हुए सेवानिवृत्त कर्मचारियों की सूची और उनके PPO नंबर हासिल करते थे। इसके बाद पेंशन में सुधार, PPO में संशोधन, मोबाइल नंबर अपडेट करने या मोबाइल बंद होने का डर दिखाकर बैंक खाते से जुड़ी गोपनीय जानकारी हासिल की जाती थी।

APK लिंक भेजकर मोबाइल पर कब्जा, OTP मिलते ही रकम ट्रांसफर

गिरोह का तरीका बेहद शातिर था। पहले फोन पर सरकारी अधिकारी बनकर भरोसा जीता जाता था। इसके बाद पीड़ित को किसी प्रक्रिया के नाम पर APK फाइल या लिंक भेजा जाता था। पीड़ित के उसे खोलते ही स्क्रीन शेयरिंग के जरिये मोबाइल पर होने वाली गतिविधियों पर नजर रखी जाती थी। बैंकिंग प्रक्रिया के दौरान आने वाला OTP भी ठगों के हाथ लग जाता था। इसके बाद रकम अलग-अलग बैंक खातों में भेज दी जाती थी।

पुलिस की जांच में यह भी सामने आया है कि गिरोह के सदस्य अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाते थे। कोई डेटा उपलब्ध कराता था, कोई पेंशनधारकों को फोन करता था, कोई बैंक खाते उपलब्ध कराता था तो कोई एटीएम से ठगी की रकम निकालकर गिरोह के दूसरे सदस्यों तक पहुंचाता था।

झारखंड के दो नाम सामने आए, डेटा नेटवर्क की जांच तेज

पूछताछ में पवन मंडल और मुकेश मंडल, निवासी झारखंड, के नाम डेटा उपलब्ध कराने वालों के रूप में सामने आए हैं। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि रेलवे के सेवानिवृत्त कर्मचारियों और अधिकारियों का डेटा आखिर कहां से हासिल किया जाता था और इसमें रेलवे के किन कर्मचारियों की भूमिका थी। इस बिंदु पर पुलिस ने गहन जांच शुरू कर दी है।

पूछताछ में आरोपियों ने धनबाद, समस्तीपुर, हापुड़, सम्भल और मुंगेर समेत विभिन्न स्थानों पर कई लोगों से लाखों रुपये की साइबर ठगी किए जाने की जानकारी दी है। आरोपी रूपक कुमार की भूमिका ठगी की रकम एटीएम से निकालने और उसे गिरोह के दूसरे सदस्यों तक पहुंचाने में सामने आई है।

तकनीकी जांच से खुला जाल, कोलकाता से गिरफ्तारी

मामले की गंभीरता को देखते हुए साइबर क्राइम पुलिस ने आरोपियों की तलाश में बैंक खातों, मोबाइल नंबरों, डिजिटल साक्ष्यों और अन्य तकनीकी माध्यमों की मदद ली। जांच के दौरान मिले सुरागों के आधार पर आरोपियों की पहचान सुनिश्चित की गई। इसके बाद पुलिस टीम ने कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपियों को कोलकाता, पश्चिम बंगाल से गिरफ्तार कर लिया।

गिरफ्तार आरोपियों में मनीष कुमार शाह पुत्र उपेन्द्र शाह निवासी मिर्जा चौकी, थाना साहेबगंज, जनपद साहेबगंज, झारखंड, उम्र करीब 30 वर्ष और रूपक कुमार पुत्र अरूण कुमार निवासी गोपडीह बांका, थाना चन्दना, झारखंड, उम्र करीब 54 वर्ष शामिल हैं।

पुलिस ने आरोपियों के पास से 10 मोबाइल फोन, एक वाई-फाई राउटर, 53 हजार रुपये नकद और चार सिम कार्ड बरामद किए हैं। पुलिस गिरोह से जुड़े अन्य लोगों और डेटा उपलब्ध कराने वाले नेटवर्क की भी पड़ताल कर रही है।

साइबर ठगों से बचने के लिए पुलिस ने किया सतर्क

पुलिस ने आमजन, खासकर पेंशनधारकों और सेवानिवृत्त कर्मचारियों से बेहद सतर्क रहने की अपील की है। पेंशन, बैंक खाता, PPO नंबर या मोबाइल बंद होने का भय दिखाकर फोन करने वाले किसी अनजान व्यक्ति को OTP, ATM PIN, UPI PIN या बैंकिंग संबंधी कोई गोपनीय जानकारी न दें। किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर APK फाइल या लिंक डाउनलोड न करें और मोबाइल की स्क्रीन शेयरिंग भी न करें।

रेलवे या किसी सरकारी विभाग का अधिकारी बनकर फोन करने वाले व्यक्ति की पहचान और उसकी बात की सत्यता की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करें। साइबर ठगी होने पर समय गंवाए बिना तत्काल साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत दर्ज कराएं। समय पर सूचना देने से ठगी की रकम को रोकने और अपराधियों तक पहुंचने में पुलिस को मदद मिल सकती है।

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