सोनभद्र से काशी तक 751 किमी की गुप्तकाशी दर्शन यात्रा, 51 देवस्थलों से होकर पहुंचेगा संतों का कारवां
Sonbhadra News: सोनभद्र में सावन मास के दौरान गुप्तकाशी दर्शन यात्रा का शुभारंभ हुआ। संतों का कारवां 51 प्रमुख देवस्थलों और ऋषियों की तपोभूमियों से होते हुए 751 किमी की यात्रा कर काशी पहुंचेगा।
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Sonbhadra News: प्रकृति, संस्कृति, संस्कार और पंचतत्वों के संरक्षण का संदेश लेकर पवित्र सावन मास में रविवार को गुप्तकाशी दर्शन यात्रा का शुभारंभ हुआ। गुप्तकाशी सेवा ट्रस्ट के संयोजन में आयोजित इस आध्यात्मिक एवं पर्यावरण संरक्षण यात्रा की शुरुआत सोन-रेणुका त्रिवेणी संगम पर स्थित प्राचीन सोमनाथ महादेव मंदिर में विधिविधान से रुद्राभिषेक और पूजन-अर्चन के साथ की गई। यात्रा का उद्देश्य केवल धार्मिक स्थलों के दर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि सनातन परंपरा, ऋषि संस्कृति, प्रकृति संरक्षण और जल स्रोतों के महत्व का संदेश जन-जन तक पहुंचाना भी है।
बारह वर्षों से जारी है आध्यात्मिक यात्रा की परंपरा
गुप्तकाशी सेवा ट्रस्ट की यह यात्रा लगातार 12 वर्षों से विभिन्न देवस्थलों, ऋषियों की तपोभूमियों और प्राचीन साधना केंद्रों को जोड़ती आ रही है। इस वर्ष भी यात्रा में उन पवित्र स्थलों को शामिल किया गया है, जिनका संबंध क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से रहा है। यात्रा के दौरान श्रद्धालु और संत भुतेश्वर दरबार, अमर गुफा, मंगलेश्वर नाथ, मत्स्येंद्र नाथ, शिवद्वार, गिरिजाशंकर, गौरी-शंकर, बरैला महादेव और मार्कंडेय तपोवन मारकुंडी सहित अनेक प्रमुख देवस्थलों की यात्रा करेंगे।इसके अलावा पंचमुखी महादेव तथा नगर ऊंटारी स्थित वंशीधर मंदिर समेत कुल 51 दुर्लभ देवस्थलों और ऋषियों की साधना स्थली तक पहुंचने का कार्यक्रम है। इन स्थानों के दर्शन और पूजन के बाद यात्रा लगभग 751 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए बाबा काशी विश्वनाथ की नगरी पहुंचेगी।
ऋषियों की तपोभूमि से जल लेकर काशी में होगा अभिषेक
यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी गुप्तकाशी क्षेत्र की प्राचीन तपस्थलियों से पवित्र जल का संग्रहण है। यात्रा दल इन साधना स्थलों पर स्थित प्राकृतिक जलस्रोतों से जल एकत्र करेगा। यही पवित्र जल वाराणसी पहुंचने के बाद बाबा काशी विश्वनाथ के जलाभिषेक में अर्पित किया जाएगा। आयोजकों के अनुसार इस पहल के पीछे जल, जंगल, जमीन और पंचतत्वों के संरक्षण के प्रति समाज को जागरूक करने का भाव भी जुड़ा हुआ है।यात्रा में विभिन्न क्षेत्रों से आए संत-महात्माओं का सान्निध्य मिल रहा है। आंध्र प्रदेश के गुरुकुल परंपरा से जुड़े संत नागमलय महादेश्वर मुनि, विजयगढ़ राजगुरु पीठ के स्वामी ध्यानानंद गिरि तथा गुप्तनाथ धाम की साधक-आराधक साध्वी नीलम नाथ सहित अनेक संत और विभिन्न मत-पंथों के पूज्य संत यात्रा में सहभागी हैं।
आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश
गुप्तकाशी दर्शन यात्रा को धार्मिक आस्था और पर्यावरण चेतना के संगम के रूप में देखा जा रहा है। आयोजकों का कहना है कि भारतीय परंपरा में प्रकृति को सृष्टि का अभिन्न अंग माना गया है। नदियां, पहाड़, वन, जलस्रोत और पंचतत्व केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और सभ्यता के आधार हैं। इसी सोच के साथ यात्रा के माध्यम से लोगों को प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण और अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का संदेश दिया जा रहा है।यात्रा के शुभारंभ अवसर पर श्रद्धालुओं और संतों में विशेष उत्साह देखने को मिला। सोमनाथ महादेव के जयघोष और पूजन-अर्चन के बीच यात्रा दल ने काशी की ओर प्रस्थान किया। रास्ते में पड़ने वाले देवस्थलों पर दर्शन, पूजन और साधना के साथ स्थानीय लोगों को भी प्रकृति और संस्कृति संरक्षण के प्रति जागरूक किया जाएगा।
जनप्रतिनिधियों और गणमान्य लोगों ने दी विदाई
यात्रा को रवाना करने के अवसर पर भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष रमेश मिश्रा, जिला पंचायत सदस्य प्रतिनिधि संजीव त्रिपाठी, राबर्ट्सगंज के पूर्व ब्लाक प्रमुख रमेश मिश्रा, पूर्व ब्लाक प्रमुख नगमा प्रवीण सिंह तथा विजयगढ़ राजगुरु पीठ के महंत अशोक गोस्वामी सहित अनेक गणमान्य लोगों की उपस्थिति रही। सभी ने यात्रा की सफलता की कामना करते हुए संतों और श्रद्धालुओं को शुभकामनाएं दीं।सोमनाथ महादेव के पूजन से शुरू हुई यह यात्रा अब देवस्थलों और ऋषि तपोभूमियों से गुजरते हुए काशी विश्वनाथ की नगरी तक पहुंचेगी। गुप्तकाशी की धरती से एकत्र पवित्र जल जब बाबा विश्वनाथ के चरणों में अर्पित होगा, तब यह यात्रा आस्था, परंपरा, पर्यावरण और सनातन संस्कृति के एक साथ जुड़ने का प्रतीक बनेगी।