यूपी बिजली व्यवस्था पर कर्मचारी संगठनों के सवाल, वर्टिकल रिस्ट्रक्चरिंग की समीक्षा की मांग
Sonbhadra News: उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था को लेकर विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने वर्टिकल रिस्ट्रक्चरिंग मॉडल पर सवाल उठाए हैं। समिति ने उपभोक्ता समस्याओं, जवाबदेही की कमी और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई वापस लेने की मांग करते हुए सरकार से निष्पक्ष समीक्षा की अपील की है।
Sonbhadra News: उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था को लेकर विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने गुरुवार को सरकार और ऊर्जा निगम प्रबंधन के समक्ष कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। समिति ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि प्रदेश के विभिन्न शहरों, विशेषकर राजधानी लखनऊ में लागू की गई वर्टिकल रिस्ट्रक्चरिंग व्यवस्था उपभोक्ताओं और कर्मचारियों दोनों के लिए परेशानी का कारण बन रही है। समिति ने इस व्यवस्था की निष्पक्ष समीक्षा कर इसे वापस लेने तथा पूर्व की उपभोक्ता हितैषी व्यवस्था बहाल करने की मांग उठाई है।
संघर्ष समिति के केंद्रीय पदाधिकारियों ने कहा कि बिजली व्यवस्था को अधिक प्रभावी, जवाबदेह और उपभोक्ता केंद्रित बनाने के लिए कर्मचारियों के अनुभवों को नजरअंदाज करने के बजाय उनसे संवाद स्थापित करना समय की जरूरत है। समिति का मानना है कि केवल प्रशासनिक ढांचे में बदलाव करने से व्यवस्था बेहतर नहीं होती, बल्कि जमीनी स्तर पर उसके प्रभावों का मूल्यांकन भी जरूरी होता है।
उपभोक्ता भटक रहे, जिम्मेदारी तय नहीं
संघर्ष समिति के अनुसार, पहले विद्युत वितरण व्यवस्था में उपखंड अधिकारी (एसडीओ) और अधिशासी अभियंता के पास अपने क्षेत्र से जुड़े अधिकांश कार्यों की जिम्मेदारी होती थी। उपभोक्ताओं को किसी भी समस्या के समाधान के लिए अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ते थे। एक ही स्थान पर शिकायत दर्ज होती थी और उसके समाधान की जवाबदेही भी तय रहती थी।
लेकिन नई व्यवस्था लागू होने के बाद 33 केवी और 11 केवी लाइनों के संचालन, मीटरिंग, बिलिंग और अनुरक्षण जैसे कार्य अलग-अलग इकाइयों में बांट दिए गए हैं। इससे उपभोक्ताओं के सामने सबसे बड़ी समस्या यह खड़ी हो गई है कि आखिर उनकी शिकायत का समाधान कौन करेगा। कई मामलों में उपभोक्ताओं को अलग-अलग अधिकारियों के पास भेजा जा रहा है, जिससे शिकायतों के निस्तारण में देरी और असुविधा बढ़ रही है।
स्मार्ट मीटर की तरह सामने आ रहीं व्यावहारिक चुनौतियां
संघर्ष समिति ने कहा कि स्मार्ट मीटर और प्रीपेड स्मार्ट मीटर व्यवस्था लागू होने के दौरान भी अनेक व्यावहारिक समस्याएं सामने आई थीं। उसी प्रकार वर्टिकल रिस्ट्रक्चरिंग व्यवस्था लागू होने के बाद भी फील्ड स्तर पर कई दिक्कतें महसूस की जा रही हैं। इसलिए जरूरी है कि सरकार केवल कागजी आंकड़ों के आधार पर नहीं बल्कि वास्तविक परिस्थितियों को देखते हुए इस व्यवस्था का व्यापक मूल्यांकन करे।
समिति का कहना है कि विश्व स्तर पर उपभोक्ता सेवाओं के लिए सिंगल विंडो सिस्टम को सबसे प्रभावी मॉडल माना जाता है। ऐसी व्यवस्था में उपभोक्ता को एक ही स्थान पर समाधान मिलता है और जवाबदेही भी स्पष्ट रहती है।
उत्पीड़नात्मक कार्रवाई वापस लेने की मांग
संघर्ष समिति ने केवल प्रशासनिक बदलावों पर ही सवाल नहीं उठाए, बल्कि बिजली कर्मियों के खिलाफ हुई कार्रवाईयों को लेकर भी नाराजगी जताई। समिति ने कहा कि नवंबर 2024 में पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण संबंधी फैसलों के बाद कर्मचारियों के बीच असंतोष का माहौल बना था। उस दौरान शांतिपूर्ण आंदोलन में शामिल कर्मचारियों और संविदा कर्मियों के खिलाफ की गई कार्रवाईयों का असर आज भी कार्य वातावरण पर दिखाई दे रहा है।
समिति ने मांग की कि आंदोलन के कारण की गई सभी उत्पीड़नात्मक कार्रवाईयों को तत्काल वापस लिया जाए और सेवा से हटाए गए संविदा कर्मियों को बहाल किया जाए। उनका कहना है कि भय और अविश्वास के माहौल में बेहतर परिणामों की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
बिजली कर्मियों के अनुभवों का लाभ उठाने की सलाह
संघर्ष समिति ने सुझाव दिया कि वितरण क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए वर्षों का अनुभव रखने वाले बिजली कर्मियों की राय और सुझावों को प्राथमिकता दी जाए। कर्मचारियों के व्यावहारिक अनुभव का उपयोग कर उपभोक्ता सेवाओं में सुधार, तकनीकी एवं वाणिज्यिक हानियों में कमी तथा निगमों की कार्यक्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है।
समिति ने दावा किया कि उत्पादन निगम और ट्रांसको में प्राप्त उपलब्धियां यह साबित करती हैं कि यदि कर्मचारियों को सकारात्मक कार्य वातावरण, पर्याप्त संसाधन और नीतिगत सहयोग मिले तो उत्कृष्ट परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। उत्पादन निगम लगातार लाभ अर्जित कर रहा है जबकि पारेषण क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई है।
‘बिजली कर्मियों पर भरोसा करे सरकार’
संघर्ष समिति के संयोजक शैलेन्द्र दुबे ने कहा कि उत्तर प्रदेश के बिजली कर्मियों ने उत्पादन और पारेषण क्षेत्रों में अपनी क्षमता का परिचय दिया है। यदि उन्हें अवसर और सहयोग मिले तो वितरण क्षेत्र में भी व्यापक सुधार संभव है। उन्होंने विश्वास जताया कि अनुभवी और समर्पित बिजली कर्मी उत्तर प्रदेश के विद्युत वितरण निगमों को देश के अग्रणी संस्थानों की श्रेणी में पहुंचाने की क्षमता रखते हैं।
संघर्ष समिति ने अंत में सरकार और प्रबंधन से अपील की कि टकराव के बजाय संवाद का रास्ता अपनाया जाए, ताकि उपभोक्ताओं को बेहतर सेवाएं मिल सकें और बिजली व्यवस्था अधिक पारदर्शी, जवाबदेह तथा जनहितैषी बन सके।