Varanasi News: खून नहीं, सांस बताएगी डायबिटीज! BHU-ताइवान के वैज्ञानिकों ने बनाया नैनो-सेंसर

Varanasi News: BHU और ताइवान के वैज्ञानिकों ने सांस में एसीटोन गैस मापकर डायबिटीज का संकेत देने वाला नैनो-सेंसर विकसित किया है। जानिए कैसे काम करती है यह तकनीक।

Update:2026-08-06 18:34 IST

Diabetes Detection Nano Sensor (Image Credit-Social Media)

वाराणसी। डायबिटीज (मधुमेह) की जांच के लिए बार-बार उंगली में सुई चुभाकर खून का नमूना देने वाले मरीजों के लिए राहत की उम्मीद जगी है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के भौतिकी विभाग और ताइवान के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक विशेष नैनो-सेंसर विकसित किया है, जो इंसान की सांस का विश्लेषण कर डायबिटीज का संकेत देने में सक्षम है।

यह तकनीक सांस में मौजूद एसीटोन गैस के स्तर को मापने पर आधारित है। शरीर में जब ऊर्जा के लिए वसा का इस्तेमाल बढ़ता है, तो एसीटोन बनता है और सांस के जरिए बाहर निकलता है। शोध के अनुसार, मधुमेह की कुछ स्थितियों में सांस में एसीटोन का स्तर बढ़ सकता है। ऐसे में सेंसर सांस में मौजूद एसीटोन की मात्रा का विश्लेषण कर डायबिटीज से संबंधित संकेत दे सकता है।

देश में डायबिटीज के बड़ी संख्या में मरीजों को देखते हुए यह तकनीक भविष्य में कम दर्द वाली और सुविधाजनक जांच के विकल्प के रूप में उपयोगी साबित हो सकती है। हालांकि, इसे नियमित चिकित्सकीय जांच का विकल्प मानने से पहले इसकी सटीकता और क्लिनिकल उपयोगिता को बड़े स्तर पर सत्यापित करना जरूरी होगा। फिलहाल इस तकनीक के पेटेंट की प्रक्रिया चल रही है।

सेलेनियम, ग्राफीन और कार्बन नैनोट्यूब्स से तैयार हुआ सेंसर

यह नैनो-सेंसर सेलेनियम, ग्राफीन और कार्बन नैनोट्यूब्स जैसे संवेदनशील पदार्थों के संयोजन से तैयार किया गया है। इन सामग्रियों की मदद से सेंसर हवा में मौजूद एसीटोन गैस की बेहद कम मात्रा में भी बदलाव को पहचानने की क्षमता रखता है।

इस शोध को बीएचयू के प्रोफेसर नीरज मेहता के मार्गदर्शन में शोधकर्ता सचिन कुमार यादव ने ताइवान की मिंग ची यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर मेंग-फैंग लिन के सहयोग से विकसित किया है।

इंसुलिन की कमी और एसीटोन बनने का क्या है संबंध?

शोधकर्ता सचिन कुमार यादव के अनुसार, जब शरीर में इंसुलिन की कमी होती है या ग्लूकोज का उपयोग ऊर्जा के लिए पर्याप्त रूप से नहीं हो पाता, तो शरीर ऊर्जा प्राप्त करने के लिए वसा को तोड़ना शुरू कर सकता है। इस प्रक्रिया में कीटोन बॉडीज बनती हैं, जिनमें एसीटोन भी शामिल है। एसीटोन सांस के जरिए शरीर से बाहर निकलता है।

नैनो-सेंसर इसी एसीटोन के स्तर को मापकर शरीर में होने वाले इन बदलावों का संकेत प्राप्त करता है। इससे भविष्य में सांस के नमूने के जरिए डायबिटीज से संबंधित जांच को आसान बनाने की संभावना बनती है।

ऐसे काम करता है नैनो-सेंसर

यह तकनीक एक विशेष सेंसिंग मैटेरियल पर आधारित है। जब व्यक्ति की सांस में मौजूद एसीटोन गैस इस संवेदनशील सामग्री के संपर्क में आती है, तो उसके भौतिक गुणों में सूक्ष्म बदलाव होता है।

सेंसर इन बदलावों को पहचानकर एक इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल तैयार करता है। इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम इस सिग्नल का विश्लेषण कर सांस में मौजूद एसीटोन की मात्रा का आकलन करता है।

इस पूरी प्रक्रिया में रक्त का नमूना लेने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे भविष्य में डायबिटीज की जांच को अधिक सुविधाजनक और कम असुविधाजनक बनाने की संभावना है।

स्मार्टफोन और स्मार्टवॉच से जुड़ सकता है सेंसर

शोधकर्ताओं के अनुसार, भविष्य में इस नैनो-सेंसर को स्मार्टफोन या स्मार्टवॉच जैसी डिवाइस से जोड़ा जा सकता है। इससे सेंसर से मिलने वाले डेटा को डिजिटल माध्यम से रिकॉर्ड और साझा किया जा सकेगा। संभावित रूप से डॉक्टर मरीज की रिपोर्ट को दूर से भी देख सकेंगे।

हालांकि, इस तकनीक को बड़े पैमाने पर मरीजों की जांच में इस्तेमाल करने से पहले इसकी विश्वसनीयता, संवेदनशीलता और सटीकता की विस्तृत चिकित्सकीय जांच जरूरी होगी। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि सांस आधारित यह तकनीक डायबिटीज की स्क्रीनिंग या निगरानी में किस स्तर तक प्रभावी साबित होती है।

बीएचयू और ताइवान के वैज्ञानिकों का यह संयुक्त शोध नॉन-इनवेसिव डायबिटीज डिटेक्शन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। यदि तकनीक आगे के परीक्षणों में सफल रहती है, तो आने वाले समय में डायबिटीज की जांच के लिए रक्त के नमूने पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

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