Uttarakhand Politics: बसपा का खिसक रहा 'वोटबैंक' ! भाजपा वाली रणनीति से 'मिशन 2027' शुरू

Uttarakhand News: उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर बहुजन समाज पार्टी ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग रणनीति तेज कर दी है। पार्टी गांव स्तर पर छोटी बैठकों के जरिए जनसंपर्क बढ़ा रही है।

Update:2026-05-28 13:09 IST

Mayawati

Uttarakhand News: उत्तराखंड में 2027 की चुनावी बिसात अभी पूरी तरह बिछी भी नहीं है, लेकिन बहुजन समाज पार्टी ने अपने पुराने सोशल इंजीनियरिंग वाले हथियार पर फिर से धार चढ़ानी शुरू कर दी है। पार्टी सुप्रीमो मायावती ने साफ कर दिया है कि इस बार लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं, बल्कि बहुजन सत्ता की कहानी दोबारा लिखने की होगी। फर्क बस इतना है कि इस बार मंचों की भीड़ से ज्यादा भरोसा मोहल्ले की बैठकों और बूथ की चौपालों पर किया जा रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि जहां बाकी दल हेलीकॉप्टर और हाईटेक प्रचार की तैयारी में जुटे हैं, वहीं बसपा गांव की गलियों में छोटी-छोटी बैठकों के जरिए राजनीतिक गणित साधने निकली है। पार्टी का मानना है कि बड़ी रैलियों में नेता ज्यादा दिखते हैं और जनता कम सुनती है, जबकि छोटी बैठकों में बेरोजगारी, पलायन, आरक्षण और सरकारी योजनाओं की जमीनी सच्चाई खुलकर सामने आती है।

मायावती का संदेश

मायावती ने कार्यकर्ताओं को साफ संदेश दिया है कि दलित, पिछड़ा, मुस्लिम, अल्पसंख्यक और आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण सभी को जोड़कर बहुजन गठजोड़ मजबूत करना होगा। यानी बसपा अब यह बताने में लगी है कि वह सिर्फ एक जाति की पार्टी नहीं, बल्कि उन सभी की राजनीतिक छतरी है जिन्हें चुनाव के वक्त तो याद किया जाता है, लेकिन सत्ता बनते ही फाइलों के नीचे दबा दिया जाता है।

बसपा तीसरा विकल्प?

उत्तराखंड की राजनीति में अब तक भाजपा और कांग्रेस की बारी-बारी से सरकार बनने की परंपरा रही है। ऐसे में बसपा खुद को तीसरे विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है। हालांकि राजनीतिक गलियारों में सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या जनता तीसरे विकल्प को वोट देगी या फिर हर चुनाव की तरह आखिरी वक्त में कम खराब विकल्प चुनने पर मजबूर हो जाएगी।

बसपा का खिसक रहा वोट बैंक

बसपा नेतृत्व को यह भी डर सता रहा है कि उसका पारंपरिक वोट बैंक धीरे-धीरे दूसरे दलों की ओर खिसक रहा है। शायद यही वजह है कि मायावती ने नेताओं को खास तौर पर चेताया है कि विपक्षी दलों की वोट काटो नीति से सावधान रहें। साथ ही कार्यकर्ताओं को BSP सरकारों के पुराने प्रशासनिक फैसलों और कल्याणकारी योजनाओं की याद जनता को दिलाने का टास्क भी दिया गया है क्योंकि भारतीय राजनीति में पुरानी उपलब्धियों की फाइलें चुनाव आते ही फिर से धूल झाड़कर बाहर निकाल ली जाती हैं।

उम्मीदवार चयन को लेकर भी मायावती ने साफ संकेत दिए हैं कि सिर्फ पैसे वाले चेहरे टिकट नहीं पाएंगे। पार्टी इस बार ऐसे उम्मीदवारों पर दांव लगाने की बात कर रही है जिनकी स्थानीय पकड़ मजबूत हो और जो सामाजिक समीकरण साध सकें। हालांकि राजनीति के जानकार मुस्कुरा कर कहते हैं कि चुनाव आते-आते जमीनी पकड़ और आर्थिक मजबूती अक्सर एक ही गाड़ी में सफर करते नजर आते हैं।

फिलहाल बसपा की रणनीति साफ है बहुजन वोटों को फिर से एक मंच पर लाना और भाजपा-कांग्रेस के बीच फंसे मतदाता को यह एहसास दिलाना कि राजनीति में तीसरा दरवाजा अभी बंद नहीं हुआ है। अब देखना यह होगा कि उत्तराखंड की जनता इस प्रयोग को गंभीर विकल्प मानती है या फिर इसे भी चुनावी मौसम का एक और सामाजिक समीकरण समझकर आगे बढ़ जाती है।

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