संस्कृति खत्म! बांग्लादेश की चेतना को कट्टरपंथियों ने किया आग के हवाले, ढाका में 'छायानट' की ऐतिहासिक विरासत हुई खाक!

Chayanat Attack: बांग्लादेश के ढाका में छायानट पर हमला, 1961 से चल रही सांस्कृतिक विरासत नष्ट, कला, संस्कृति और मानव चेतना को बड़ा झटका, बटमूल ब्लास्ट और नवीनतम आग की घटना का विवरण।

Update:2025-12-22 17:42 IST

Chayanat Attack: बांग्लादेश में संस्कृति और कला की एक प्रतिष्ठित संस्था ‘छायानट’ पर भयंकर हमला हुआ है, जिसने पूरे देश के सांस्कृतिक माहौल को झकझोर दिया है। 18 दिसंबर 2025 की रात ढाका के धानमंडी इलाके में छायानट के दफ्तर को न केवल तोड़फोड़ का शिकार बनाया गया, बल्कि आग के हवाले भी कर दिया गया। इस घटना में केवल इमारत ही नहीं जली, बल्कि उस जगह से जुड़े सांस्कृतिक और कलात्मक इतिहास का भी बहुत बड़ा हिस्सा समाप्त हो गया। अब वहां केवल जले हुए खंडहर और राख बची है।

1961 से बंगाली संस्कृति और कला की रक्षा करने वाली संस्था

छायानट बांग्लादेश में सांस्कृतिक धरोहर के रूप में पहचानी जाती है। इसकी स्थापना 1961 में हुई थी, जब बांग्लादेश अभी पाकिस्तान का हिस्सा था और इसे पूर्वी पाकिस्तान कहा जाता था। उस समय पाकिस्तानी शासन बंगाली भाषा और संस्कृति पर अंकुश लगाने की कोशिश कर रहा था। ऐसे में छायानट ने संगीत, नाटक और कला के माध्यम से बंगाली संस्कृति और अस्मिता को बचाने का बीड़ा उठाया। संस्थापक कलाकारों में कलिम शरीफी, कवयत्री सुफिया कमाल, वहीदुल हक और मोखलेसुर रहमान जैसे नाम शामिल थे। उन्होंने संगीत और कला के जरिए समाज में जागरूकता फैलाने का काम किया।

बटमूल ब्लास्ट के बावजूद संस्कृति और पहचान का प्रतीक

छायानट की सबसे प्रमुख और ऐतिहासिक परंपरा ‘पोहेला बैशाख’ का आयोजन था। यह बंगाली नववर्ष का स्वागत समारोह है, जो हर साल रमना पार्क में बटमूल के पेड़ के नीचे मनाया जाता था। यह आयोजन सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण और समाज की पहचान का प्रतीक माना जाता था। 14 अप्रैल 2001 को इसी आयोजन के दौरान रमना पार्क में हुए ‘बटमूल ब्लास्ट’ में आतंकवादियों ने बम विस्फोट किए थे। उस हमले में 10 लोग मारे गए और कई घायल हुए। लेकिन छायानट ने न केवल इस घटना के बाद भी अपने कार्यक्रम जारी रखे, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर को बचाने के लिए लगातार काम किया।

संस्कृति और मानव चेतना पर बड़ा धक्का

छायानट का नाम ही गहन अर्थ रखता है। ‘छाया’ और ‘नृत्य’ का मेल इस संस्था की कला और संरक्षण की दृष्टि को दर्शाता है। इसके तहत संगीत, रवींद्र संगीत, बाउल गीत और विभिन्न पारंपरिक कला रूपों की शिक्षा दी जाती थी। संस्था ने वर्षों से बंगाली समाज में कला, संस्कृति और सांस्कृतिक आत्मसम्मान की भावना को जीवित रखा। लेकिन 18 दिसंबर 2025 की रात इस विरासत पर हमला हुआ। छायानट भवन में तोड़फोड़ और आग लगाकर उसे पूरी तरह नष्ट कर दिया गया। यह केवल एक इमारत का नुकसान नहीं था, बल्कि संस्कृति, कला और मानव चेतना पर हमला था। इस हमले के साथ ही छायानट के माध्यम से बनाए गए समावेशी सांस्कृतिक वातावरण और कलाकारों के सपनों को भी धक्का लगा है।

संस्कृति और सामाजिक जागरूकता का प्रतीक

छायानट की स्थापना के बाद से यह संस्था केवल कला और संस्कृति का केंद्र नहीं रही, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतिरोध का प्रतीक भी बनी। यह संस्था यह दिखाती थी कि कैसे संगीत, नाटक और कला के माध्यम से समाज में जागरूकता और पहचान को संरक्षित किया जा सकता है। भारत और बांग्लादेश के कलाकारों के सहयोग से छायानट ने बांग्लादेश में सांस्कृतिक पुनर्जागरण की भूमिका निभाई। हालांकि अब छायानट भवन नष्ट हो गया है, लेकिन इसकी सांस्कृतिक विरासत और उसकी प्रेरणा आज भी जीवित है। सवाल यह उठता है कि क्या आने वाले नववर्ष में बटमूल के नीचे रवींद्र संगीत गूंज पाएगा? जवाब है, वर्तमान में वहां केवल राख और नाउम्मीदी है। लेकिन छायानट की संकल्पना और इसके संस्थापक कलाकारों की मेहनत हमेशा कला और संस्कृति की लड़ाई में प्रेरणा का स्रोत बनेगी।

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