'कामदेव से शहाबुद्दीन तक...' जिनके नाम से आज भी थर-थर कांपता है बिहार, जानिए वो विधायक जो बने गैंगस्टर

Bihar Gangsters: कामदेव सिंह से लेकर मोहम्मद शहाबुद्दीन तक, बिहार की राजनीति और अपराध का रिश्ता हमेशा डरावना रहा है। जानिए कैसे बाहुबली नेताओं ने अपराध, जातीय वर्चस्व और सत्ता की साज़िशों से ‘जंगलराज’ की कहानी लिखी।

Harsh Srivastava
Published on: 3 Nov 2025 7:35 PM IST (Updated on: 3 Nov 2025 7:39 PM IST)
कामदेव से शहाबुद्दीन तक... जिनके नाम से आज भी थर-थर कांपता है बिहार, जानिए वो विधायक जो बने गैंगस्टर
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Bihar Gangsters: बिहार यह वह मिट्टी है जहाँ की हवा में हमेशा सत्ता की सनक और बंदूक की गूंज गूंजती रही है। 1947 में आज़ादी के बाद से लेकर 2025 के आधुनिक दौर तक, बिहार ने एक खौफनाक दास्तान लिखी है, जहाँ अपहरण, हत्या और राजनीतिक संरक्षण के सहारे बाहुबलियों ने अपने साम्राज्य खड़े किए। कुख्यात कामदेव सिंह से शुरू होकर मोहम्मद शहाबुद्दीन तक, हर बाहुबली ने बिहार में 'जंगलराज' की एक नई परिभाषा गढ़ी। यह कहानी उन माफियाओं की है, जिन्होंने बूथ कैप्चरिंग से शुरुआत की और आज साइबर क्राइम तक अपना विस्तार कर चुके हैं। ये वही अपराधी थे जो विधायक बने और विधायक अपराधी। 'बिहार की क्राइम कथा' के पन्ने खोलते हैं, जहाँ अपराध और राजनीति का नेक्सस बिहार की सत्ता की कुंजी बन गया।

आज़ादी के बाद अपराध का बीज (1947-1960)

स्वतंत्र भारत में बिहार की मिट्टी में अपराध के बीज तभी बोए गए, जब जातीय वर्चस्व और आर्थिक असमानता ने गैंगवार की नींव रखी। 1947 के बंटवारे के बाद, ग्रामीण इलाकों में भूमिहार और राजपूत समुदायों के बीच के विवाद हिंसक होने लगे। बेगूसराय जैसे जिलों में स्थानीय जमींदारों ने अपनी सत्ता बचाने के लिए गुंडों को संरक्षण दिया।

कामदेव सिंह (जन्म 1930) उस दौर के उभरते अपराधी के प्रतीक थे, जिन्होंने 1950 तक डकैती और तस्करी में नाम कमाया। राजनीतिक अस्थिरता ने पुलिस को कमजोर किया और 1952 के पहले विधानसभा चुनावों में बूथ कैप्चरिंग की शुरुआत हुई, जो गैंगस्टर्स का पहला राजनीतिक हथियार बनी। 1957 के चुनाव में कामदेव सिंह ने 34 पोलिंग बूथ कब्जाए, जिससे उनके संरक्षक की जीत हुई। कामदेव सिंह को स्थानीय लोग 'सम्राट' और 'रोबिन हुड' कहते थे, क्योंकि वह गरीबों की मदद करता था, लेकिन उसकी बेरहमी भी कुख्यात थी। 1960 तक, बिहार के उत्तरी जिलों तक उसका वर्चस्व पहुँच चुका था, और अपराध का राजनीतिकरण शुरू हो गया था।

कामदेव से शहाबुद्दीन: मसल पावर का उदय (1960-1980)

1960 के दशक में कामदेव सिंह का साम्राज्य अपने चरम पर पहुँचा। उसने जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान अपनी पकड़ मजबूत की। 1969 के चुनावों में उसने मटिहानी में 34 बूथ कब्जाए, जिससे राजनीतिक दलों ने उसे हायर करना शुरू कर दिया। इस दौर में जातीय संघर्ष बढ़ा और भूमिहार गैंग्स ने पिछड़ी जातियों को निशाना बनाया। 1970 तक बिहार में 20-30 बड़े गैंग्स रंगदारी और हत्याओं में शामिल थे। लेकिन, 1980 में पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में कामदेव सिंह की मौत हो गई। गंगा नदी किनारे भागते हुए उसे गोली मारी गई। उसकी मौत ने सूरजभान सिंह जैसे नए बाहुबलियों को जन्म दिया, जो 26 आपराधिक मामलों के बावजूद मोकामा से राजनीति में आए। इसी दशक में अपहरण उद्योग ने बूथ कैप्चरिंग की जगह लेनी शुरू कर दी।

जंगलराज का आगाज़ और सिवान का सुल्तान (1980-2000)

बिहार में 1980 के दशक में लालू प्रसाद यादव के सत्ता में आने के साथ ही जंगलराज के आगाज़ को जोड़कर देखा जाता है, जहाँ गैंगस्टर्स को खुला राजनीतिक संरक्षण मिला।

मोहम्मद शहाबुद्दीन: 1990 में विधानसभा चुनाव जीता और सिवान उनका किला बन गया। 1990 के दशक में उन्होंने किडनैपिंग और हत्याओं का ऐसा सिलसिला शुरू किया कि वह 'खौफ का दूसरा नाम' बन गए।

छोटन शुक्ला और आनंद मोहन: 1994 में छोटन शुक्ला की हत्या के बाद उनके अंतिम संस्कार में जुटी भीड़ ने गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी. कृष्णैया की बेरहमी से हत्या कर दी थी। भीड़ को बाहुबली आनंद मोहन सिंह ने भड़काया था। आनंद मोहन ने बिहार पीपुल्स पार्टी बनाई और अपहरण उद्योग को बढ़ावा दिया।

पप्पू यादव: इसी दौर में पप्पू यादव ने मधेपुरा में अपना गैंग बनाया। 1990 तक 32,000 से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज हुए। 1995 में लालू सरकार पर गैंगस्टर्स को संरक्षण देने के आरोप लगे।

कंगारू कोर्ट: 1995-2000 के दौरान शहाबुद्दीन ने सिवान में कंगारू कोर्ट चलाए। 1998 में मुन्ना शुक्ला ने मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की हत्या करा दी। 2000 तक 200 से ज्यादा हत्याएं दर्ज हुईं।

नितीश का 'सुशासन' बनाम बाहुबलियों का वर्चस्व (2000-2015)

साल 2005 में नितीश कुमार सरकार ने सत्ता संभाली और गैंगस्टर्स पर लगाम लगाने का काम शुरू किया।

तेजाब कांड: 2004 में शहाबुद्दीन ने तेजाब कांड कराया, जिसमें दो भाइयों को तेजाब डालकर मार दिया गया था। शहाबुद्दीन को 2009 में गिरफ्तार किया गया।

सजा और रिहाई: मुन्ना शुक्ला को 2008 में सजा मिली, जबकि आनंद मोहन को मौत की सजा सुनाई गई (बाद में उम्रकैद में बदली)। हालांकि, अनंत सिंह ने 2005 और 2010 में मोकामा से चुनाव जीता। 2008 में सूरजभान सिंह को भी हत्या के मामले में सजा हुई।

बदलते खतरे: इस दौरान अपराध दर घटी, लेकिन बाहुबली राजनीति में बने रहे। साइबर क्राइम की एंट्री हुई, पर जातीय गैंग्स का वर्चस्व कायम रहा। 2013 में अनंत सिंह रेशमा खातून हत्याकांड में फँसे।

विरासत और नए खतरे (2015-2025)

2020 में अनंत सिंह ने आरजेडी के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीता, लेकिन 2022 में उसे 10 साल की सजा मिली।

शहाबुद्दीन की मौत: 2021 में कोविड से शहाबुद्दीन की मौत हो गई।

आनंद मोहन की रिहाई: 2023 में सरकार की नई जेल पॉलिसी की मदद से कुख्यात बाहुबली आनंद मोहन जेल से रिहा हो गए।

पप्पू यादव की वापसी: 2024 में पप्पू यादव ने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा और सांसद बने।

बदलता जुर्म: जुर्म का स्वरूप अब साइबर और सैंड माफिया में बदल गया है।

2025 के विधानसभा चुनाव में वीणा देवी (सूरजभान की पत्नी) और अनंत सिंह जैसे बाहुबली फिर मैदान में हैं। नितीश सरकार ने एनकाउंटर बढ़ाए, लेकिन बाहुबलियों की राजनीतिक विरासत बनी रही।

राजनीति में अपराध का नेक्सस

बिहार के गैंगस्टर्स का सफर जातीय वर्चस्व से शुरू होकर साइबर क्राइम तक जा पहुँचा। कामदेव सिंह से लेकर अनंत सिंह तक, सभी ने कई पार्टियों के टिकट हासिल किए और जीते भी। लालू प्रसाद युग में आरजेडी ने शहाबुद्दीन को संरक्षित किया, तो हाल ही में नीतीश कुमार सरकार ने आनंद मोहन को रिहा कराया। यही नेक्सस बिहार में सत्ता की कुंजी है। 2025 तक बिहार में 20-30 बड़े गैंग्स सक्रिय हैं, जो चुनाव प्रभावित करते हैं। नितीश के सुशासन ने अपराध तो घटाया, लेकिन उसकी जड़ें अभी भी गहरी हैं। बिहार को युवाओं को अपराध से दूर रखने और राजनीति को साफ करने की एक नई शुरुआत की सख्त जरूरत है।

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Hi! I am Harsh Srivastava, currently working as a Content Writer and News Coordinator at Newstrack. I oversee content planning, coordination, and contribute with in-depth articles and news features, especially focusing on politics and crime. I started my journey in journalism in 2023 and have worked with leading publications such as Hindustan, Times of India, and India News, gaining experience across cities including Varanasi, Delhi and Lucknow. My work revolves around curating timely news, in- depth research, and delivering engaging content to keep readers informed and connected.

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